Tuesday, 15 May 2018

राजनीतिक समस्याएँ वेद में समाधान


         विश्व में विभिन्न शासन पद्धतियाँ चल रही हैं. सब प्रकार की विधियों को अपने-अपने देश में उत्तम माना जाता है किन्तु फिर भी विश्व में कहीं शान्ति नहीं है. कहीं न कहीं , किसी न किसी प्रकार इन सब प्रकार की शासन पद्धतियों का विरोध हो रहा है तथा इसमें परिवर्तन के लिए विद्रोह की आवाजें, विद्रोह के स्वर आज अनेक देशों में सुनने को मिल रहे हैं. आजकल प्रचलित इन शासन पद्धतियों में एकतंत्र शासन पद्धति, सीमित एकतंत्र शासन पद्धति, प्रजातंत्र शासन पद्धति, गणतंत्र शासन पद्धति आदि प्रमुख रूप से मिलती हैं. इन में से किस प्रकार की शासन पद्धति को सर्वोत्तम माना जावे, इसका परिक्षण करने के लिए हमें वेद की शरण में जाना होता है, क्योंकि वेद ही विश्व में एकमात्र एसा ग्रन्थ है, जिससे न केवल विश्व की सब समस्याओं का समाधान मिलता है अपितु सत्य-पथ के दर्शन भी होते हैं.
राजा प्रजा की दया तक

        जब हम वेद के पन्नों का अवलोकन करते हैं तो हम पाते हैं कि वेद अपने राजा के निर्वाचन का आदेश देता है. इस प्रकार की स्पष्ट घोषणा यजुर्वेद के अध्याय २० के मन्त्र संख्या ९ में इस प्रकार की गयी है-:
विशी राजा प्रतिष्ठिता
१ राजा की सता प्रजा की इच्छा तक
     इसका भाव यह है कि राजा की प्रतिष्ठा व स्थिति अर्थात् राजा को सम्मान व उस की सत्ता तब तक ही रह सकती है, जब तक उस राजा की प्रजा उसे पसंद करती है. भाव यह कि प्रजा की इच्छा पर ही राजा का स्वामित्व अथवा उसकी सत्ता निर्भर है. प्रजा की प्रसन्नता राजा के कार्यों पर ही निर्भर करती है. यदि राजा अपनी  प्रजा की सुख सुविधाओं को बढाने की व्यवस्था का प्रयत्न करता रहता है तो प्रजा उसको राजा के पद पर बनाए रखती है किन्तु ज्यों ही राजा निरंकुश होता है त्यों ही प्रजा उससे रुष्ट हो जाती है     इसका भाव यह है कि राजा की प्रतिष्ठा व स्थिति अर्थात् राजा को सम्मान व उस की सत्ता तब तक ही रह सकती है, जब तक उस राजा की प्रजा उसे पसंद करती है. भाव यह कि प्रजा की इच्छा पर ही राजा का स्वामित्व अथवा उसकी सत्ता निर्भर है. प्रजा की प्रसन्नता राजा के कार्यों पर ही निर्भर करती है. यदि राजा अपनी प्रजा की सुख सुविधाओं को बढाने की व्यवस्था का प्रयत्न करता रहता है तो प्रजा उसको राजा के पद पर बनाए रखती है किन्तु ज्यों ही राजा निरंकुश होता है त्यों ही प्रजा उससे रुष्ट हो जाती है तथा यह प्रजा स्वयं को राजा की निरंकुशता से बचाने के लिए उसे राजा के पद से हटा देती है. इस प्रकार की ही व्यवस्था ऋग्वेद में भी दी गयी है. यथा: आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलि: |
विशस्त्वा सर्वा वान्छन्तु माँ त्वद्राष्टमधि भ्रशत ||ऋग्वेद १०.१..१७३||
    इस मन्त्र में पुरोहित को प्रजा का प्रतिनिधि कहा गया है तथा यह पुरोहित प्रजा का प्रतिनिधि होने के नाते राजा का राज्याभिषेक करता है. इस अवसर पर पुरोहित ऋग्वेद का यह मन्त्र ही उच्चारण करता है.  इस मन्त्र के माध्यम से राजा को राज्याभिषेक के समय ही सावधान करता है कि हे राजन्! आज मैं तेरा राज्याभिषेक प्रजा के प्रतिनिधि के नाते कर रहा हूँ और तूं तब तक ही इस पद पर रहेगा, जब तक प्रजा का तेरे लिए विशवास बना हुआ है. ज्यों ही तूं प्रजा के विश्वास को तोड़ेगा त्यों ही प्रजा तुझे इस पद से हटा देगी. आओं मन्त्र का अवलोकन करें :-
प्रजा का प्रतिनिधि पुरोहित
     मन्त्र कह  रहा है कि पुरोहित सदा प्रजा का प्रतिनिधि होता है. यह प्रातिनिधि स्वरूप पुरोहित प्रजा के ही आदेश पर, प्रजा के ही द्वारा चुने गए अपने प्रतिनिधि को सिंहासनारूढ़ करने का कार्य करता है. इस प्रकार वह जो कार्य कर रहा होता है, प्रजा के प्रतिनिधि के रूप में ही करता है अर्थात् वह राजा का जो राजतिलक करने जा रहा होता है तथा करता है, वह कार्य प्रजा की आज्ञा को, प्रजा के निर्णय को मानो पूर्ण करने के लिए ही कर रहा होता है. यह हमारी प्राचीन वैदिक व्यवस्था थी. यदि हम आज के युग पर प्रकाश डालें तो हम पाते हैं कि आज प्रजा हमारी वैदिक प्रथा के ही अनुरूप हमारे बनाए गए संविधान के अनुरूप अपने जिन प्रतिनिधियों का चुनाव शासन चलाने के लिए कराती है, हमारा आज का राष्ट्रपति पुरोहित स्वरूप उन जन-भावनाओं का आदर करते हुए उन प्रतिनिधियों का राज्याभिषेक करता है तथा उन्हें सिंहासन की चाबी थमाने के लिए एक शपथ ग्रहण समारोह करता है तथा प्रधान मंत्री, जिसे हम राजा कह सकते हैं तथा उनकी मंत्रिमंडल, जिसे हम व्यवस्था का भाग मान सकते हैं को सोगन्ध दिलाते हैं अर्थात् उनका राजतिलक करते हैं. इस प्रकार हमारी वैदिक परंपरा के अनुसार आज भी राजा को सिंहासनारूढ़ करने के लिए पुरोहित स्वरूप राजतिलक का कार्य किया जाता है.
२ पुरोहित ही चुनाव अधिकारी
    यह सब करते हुए हमारे इस वेद मन्त्र के अनुसार पुरोहित नवनिर्वाचित राजा को संबोधित करते हुए कहता है कि हे राजन्! मैं तुझे प्रजा से चुनकर लाया हूँ अर्थात् इससे पूर्व इस पुरोहित ने चुनाव आयोग का कार्य करते हुए चुनाव की घोषणा की तथा फिर चुनाव हुए और मतदान के परिणाम स्वरूप उस राजा को प्रजा ने चुना. इसलिए ही पुरोहित चुनाव आयोग के प्रतिनिधि स्वरूप आज का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए अब शपथ ग्रहण समारोह में उस राजा का राज्याभिषेक करते हुए उपदेश करते हुए चुने गए इस प्रतिनिधि को कह रहा है कि मैं तुझे इस प्रजा के प्रतिनिधि स्वरूप चुनकर लाया हूँ. इसलिए अब तूं इस योग्य हो गया है कि इस देश की राजसत्ता को संभाल सके. अत: आज मैं तुझे राजा बनाता हूँ
तथा यह आशा करता हूँ कि जब तक तूं इस कार्य के लिए अधिग्रहित किया गया है, तब तक निरंतर जनहित के कार्य करता रहेगा, जनकल्याण के कार्य करता रहेगा.
३ जनता का विशवास बनाए रखना
    हे राजन्! आज तुझे जो सत्ता सौंपी जा रही है, जनता ने जो तेरे ऊपर विशवास स्थापित किया है, तूं उस विशवास पर खरा उतरने क लिए निरंतर स्थिर रहते हुए बड़ी मजबूती से अपने कर्तव्यों को पूर्ण करना. कभी कर्तव्य से विमुख न होना. जनसेवा के कार्य कार्य करते हुए कभी विचलित न होना, कभी दुरूखी न होना. यह तेरा मुख्य कर्तव्य है, यह तेरा मुख्य कार्य है, इसे करने में सदा दिन-रात एक कर देना.
४ जनता सदा तेरे ही जयघोष लगावे
    हे राजन्! तूं एसे कार्य कर कि सारी प्रजा तेरे यश के गान गावें. अपने बच्चों को तेरे जीवन की गाथाएँ सुनावें तथा उन्हें तेरे जैसा ही बनने के लिए प्रेरित करें. प्रजा तेरे गुणों का सदा गान करती रहे, वह तेरी लम्बी व दीर्घायु की सदा कामना कराती रहे तथा लम्बे समय तक तेरी सत्ता में अपना जीवन व्यतीत करने की इच्छा करे. वह तेरी अनुगामी रहते हुए सदा तेरे से मार्गदर्शन पाने की इच्छा रखे. तूं इस प्रकार के कार्य कर, इस प्रकार का शौर्य दिखा कि जनता तेरे कार्यों में ही अपना हित समझे तथा सदा तेरी छात्रछाया में ही रहना पसंद करे. सदा तेरे ही जयघोष लगाती रहे.
५ सदा उतम कार्य करना
    हे राजन्! कभी कोई इस प्रकार का कार्य न करना कि जिसके कारण तेरी सत्ता छिन सकती हो. अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए सदा उत्तम कार्य करना, प्रजा का विशवासपात्र बने रहना.
६ प्रजा कभी भी उसे हटा सकती है   
   इन तथ्यों से यह बात स्पष्ट ध्वनित हो रही है कि राजा तब तक ही सत्ता का स्वामी रह सकता है, जब तक प्रजा की दया उस पर बनी हुई है. यदि प्रजा की दया का हाथ उससे उठ जाता है तो फिर वह कितने भी यत्न कर के भी सत्ता का स्वामी नहीं रह सकता. जनता उसे किसी भी समय कान पकड़ कर सत्ता से विमुख कर सकती है. राजगद्दी से हटा सकती है, उसे पद्च्युत कर सकती है.
डा.अशोक आर्य

Tuesday, 8 May 2018

प्रभु दर्शन के लिए सात्विक भोजन आवश्यक


          हमारी सदा ही यह इच्छा रही है कि हम उस पिता को , उस प्रभु को प्राप्त करें किन्तु कैसे? इस निमित्त हम अपनी अन्दर की वासनाओं का नाश करें। वासना विनाश के लिए अपने अन्दर ज्ञान का दीप जलाएं। ज्ञान का दीप जलाने के लिए सात्विक अन्न का प्रयोग करना आवश्यक है। जब मन वासना रहित होगा, अन्दर ज्ञान का प्रकाश होगा तथा जब यह शरीर सात्विक भोजन पर निर्भर होगा तो हम प्रभु को पाने में सफल होंगे। इस तथ्य पर ही यह मन्त्र इस प्रकार प्रकाश डाल रहा है :-

              इन्द्रा याहि तुतुजान उप ब्रह्माणि हरिव:
               सुते दधिष्व नश्चन: ॥ ऋग्वेद १.३.६ ॥
         इस मन्त्र में तीन बातों पर, तीन बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार कहा गया है, उपदेश किया गया है :-
१. वासनाओं का नाश     
             जितेन्द्रीय पुरुष को इन्द्र के नाम से सम्बोधित करते हुए मन्त्र कहता है कि हे जितेन्द्रिय पुरुष! तू अति शीघ्रता से सब वासनाओं का नाश करता हुआ मेरे समीप आ। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन्त्र के अनुसार प्रभु प्राप्ति की प्रथम तथा प्रमुख सीढी वासनाओं का नाश ही है। जब तक वासनाओं का नाश नहीं होता तब तक प्रभु प्राप्ति की ओर प्रथम कदम भी नहीं रखा जा सकता। इसलिए प्रभु दर्शन के अभिलाषी प्राणी को सर्व प्रथम जो कार्य करना होता है, उसे हम वासनाओं का नाश के नाम से जानते हैं। अत: प्रभु प्राप्ति के पथिक को सर्व प्रथम वासना नाश रुपी मार्ग को पकडना होता है। यह ही प्रभु दर्शन का प्रथम साधन है, प्रथम सीढी है।
२. ज्ञान से वासनाओं का नाश      
            वासनाओं का नाश करने के इच्छुक हे प्रशस्त इन्द्रिय रुपी घोडों से युक्त प्राणी! तु सदा ज्ञान के मध्य निवास करने वाला बन। ज्ञान प्राप्ति की रुचि के बिना तू ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए तेरे लिए यह आवश्यक है कि यदि तूं ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा रखता है तो अपने अन्दर ज्ञान को पाने की इच्छा पैदा कर, रुचि पैदा कर । जब तक तेरे अन्दर ज्ञान नहीं है, तब तक वासनाओं का नाश सम्भव ही नहीं है। जब तुझे अच्छे व बुरे का ज्ञान ही नहीं है, तब तक तूं बुराई को करे तथा यह इच्छा शक्ति भी अपने अन्दर पैदा कर कि तू ने उत्तम ज्ञान को पैदा करना है, ग्रहण करना है। जब तक तेरे अन्दर वासनाओं को मारने के लिए, वासनाओं का हनन करने के लिए ज्ञान ही नहीं है, वासनाओं की बुराई को तू जानता ही नहीं है, तब तक इनका नाश नहीं कर सकता। इसलिए महान् ज्ञानी बनना तेरे लिए आवश्यक है। यह ज्ञान ही है जो हमें वासनाओं की हानियों की जानकारी देने वाला है। यह ज्ञान ही तो है जो वासनाओं का नाश करता है।
३. उत्तम अन्न का सेवन      
       अपने शरीर में हमने शक्ति पैदा करनी है। शक्ति ही सब सफलताओं का मार्ग है, सब सफलताओं का मूल है। इस शक्ति को ही सोम कहते हैं । इसलिए हे प्राणी! अपने शरीर में सोम की उत्पत्ति के लिए, शक्ति की उत्पत्ति के लिए, मैंने जो अन्न तेरे लिए दिया है, पैदा किया है, तू उसे धारण करने के योग्य बन, अपने अन्दर एसे गुण पैदा कर कि तू इस अन्न का उपभोग करने के योग्य बन सके, इस अन्न को ग्रहण कर। यह अन्न ही तेरा भोजन है, यह अन्न ही तेरी क्षुधा पूर्ति का साधन है, यह अन्न ही तेरे जीवन का मुख्य भाग है। इस प्रकार यह मन्त्र उपदेश कर रहा है कि गेहूं , चावल , जौ, उडद, दालें, तिल आदि वस्तुएं , जिन्हें अन्न का नाम दिया गया है, ही तू खाने के लिए सेवन कर, इनका ही उपभोग कर, इन्हें ही तू ग्रहण कर। मांस मनुष्य का भोजन नहीं है, इसलिए तू ने मांस , मदिरा आदि तुच्छ पदार्थों का अपने भोजन के रूप में सेवन नहीं करना। एसे गन्दे भोजन का सेवन कर तू अपनी बुद्धि को रजस वृत्तियों वाला बना कर  वैष्यिक वृत्तिवाला बनकर, तामस वृत्ति वाला बनकर सोम रक्षण का कार्य नहीं कर पावेगा। सोम रक्षण एसी दूषित वृत्तियों से नहीं होता। यदि तू अपने शरीर में सोम की ,शक्ति की रक्षा करना चाहता है तो यह आवश्यक है कि तू उत्तम अन्न व दालों आदि का ही सेवन कर। मांस, मदिरा के सम्बन्ध में सोच भी न, देख भी न।
        इससे  ही शक्ति अर्थात् सोम की प्राप्ति होगी। इस के अतिरिक्त हे जीव! तू यह भी कर:-
क)     तू सदा सात्विक भोजन कर
ख)    सात्विक भोजन की प्राप्ति से तू सूक्ष्म बुद्धि वाला बनकर ज्ञान प्राप्ति के कार्य में लग जा।
ग)     ज्ञान प्राप्ती से तु अच्छे व बुरे की परख करने वाला बन।
घ)     अच्छे व बुरे का पारखी बनकर तू अपने अन्दर की विषय वासनाओं की हानि को समझ तथा अपनी वासनाओं का विनाश कर।
   ड)     वासनाओं का विनाश कर तू अपने आप को प्रभु को पाने के योग्य बना।


डा.अशोक आर्य

Friday, 4 May 2018

ऋषि दयानन्द का ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ गागर में सागर”


ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ संसार में सुविख्यात ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने संसार में विद्यमान पदार्थों के सत्य स्वरूप का प्रकाश किया है। यह ग्रन्थ चौदह समुल्लासों में है। प्रथम दस समुल्लास ग्रन्थ पूर्वाद्ध कहलाते हैं और बाद के चार समुल्लास उत्तरार्ध कहलाते हैं। प्रथम सम्मुलास में ईश्वर के एक सौ से अधिक नामों की व्याख्या के साथ मंगलाचरण की समीक्षा की गई है। दूसरा समुल्लास बाल शिक्षा विषय पर है जिसमें इस विषय के साथ भूत प्रेतादि के निषेध सहित जन्म पत्र व सूर्यादि ग्रह के मनुष्य के जीवन पर प्रभाव की समीक्षा की गई है। तीसरा समुल्लास मुख्यतः अध्ययनाध्यापन विषय पर है। इसके साथ इस समुल्लास में गुरुमन्त्र व्याख्या, प्राणायामशिक्षा, सन्ध्या अग्निहोत्र पर उपदेश, उपनयन समीक्षा, ब्रह्मचर्य उपदेश, पठन पाठन की विशेष विधि, ग्रन्थों के प्रमाण व अप्रमाण होने का विषय सहित स्त्री व शूद्रों के अध्ययन की विधि का वर्णन है। चौथे समुल्लास में समावर्तन एवं विवाह का विषय है। इस समुल्लास में इन विषयों के अतिरिक्त गुण कर्मानुसार वर्ण व्यवस्था, स्त्री पुरुष व्यवहार, पंचमहायज्ञ, गृहस्थ धर्म उपदेश, पण्डित व मूर्खों के लक्षण सहित पुनर्विवाह, नियोग एवं गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता पर विचार किया गया है और वेदों का मन्तव्य व सिद्धान्त सूचित किया गया है। पांचवे समुल्लास में वानप्रस्थ आश्रम और संन्यासाश्रम का विषय है।


छठे समुल्लास में राजधर्म, दण्ड व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, युद्ध, राज्य की रक्षा, व्यापार में राज्य की ओर से कर स्थापन, साक्षियों के कर्तव्यों पर उपदेश, झूठी साक्षी पर दण्ड का विधान एवं चोरों को दण्ड आदि के विधान से अवगत कराया गया है। यूं तो सभी समुल्लास महत्वपूर्ण हैं परन्तु सातवे और आठवें समुल्लास में ईश्वर, जीव व प्रकृति आदि विषयों के वर्णन के कारण इन समुल्लासों का विशेष महत्व है। सातवें समुल्लास में ईश्वर, ईश्वर स्तुतिप्रार्थनोपासना, ईश्वर ज्ञान का प्रकार, ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के अवतार का निषेध, जीव की स्वतन्त्रता, ईश्वर तथा जीव की भिन्नता, ईश्वर के समुण व निर्गुण स्वरूप का तात्पर्य व उनके वर्णन सहित वेद विषयक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये गये हैं। आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, ईश्वर व प्रकृति की भिन्नता, मनुष्य की आदि सृष्टि में उत्पत्ति के स्थान का निर्णय, आर्य और मलेच्छ की व्याख्या एवं ईश्वर का ब्रह्माण्ड को धारण करना विषय सम्मिलित किये गये हैं। नवम् समुल्लास में विद्या, अविद्या, बन्धन तथा मोक्ष का विषय वर्णित है। दसवें समुल्लास में आचार अनाचार तथा भक्ष्य एवं अभक्ष्य पदार्थों का वर्णन किया गया है। ग्यारहवें समुल्लास में आर्यावर्तदेश के मत-मतान्तरों के खण्डन व मण्डन के विषय सहित अन्य अनेक विषय सम्मिलित हैं। इसमें आर्यसमाज विषय सहित आर्यवर्तीय राजवंशावली भी प्रस्तुत की गई है। बारहवें समुल्लास में चारवाक, नास्तिक, बौद्ध एवं जैन मतों की समीक्षा है। अन्त के दो समुल्लासों में ईसाई तथा यवन मत की समीक्षा है। ग्रन्थ के अन्त में स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रस्तुत किया गया है। इसके अन्तर्गत 51 विषयों पर ऋषि दयानन्द जी ने अपनी मान्यतायें लिखी हैं। यही वैदिक मान्यतायें हैं और इन मान्यताओं को ही संक्षेप में वैदिक धर्म कहते हैं। यह मन्तव्य ऐसे हैं कि यदि इन्हें कोई मनुष्य अपना ले तो वह सभी मत मतान्तरों से अधिक उत्तम व उपयोगी मनुष्य बनने के साथ परजन्म में भी दूसरों से अधिक उन्नत योनि व जीवन प्राप्त करता है।

स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश में 51 विषय सम्मिलित किये गये हैं। यह विषय हैं ईश्वर, वेद, धर्म-अधर्म, जीव, ईश्वर-जीव सम्बन्ध यथा व्याप्य-व्यापक, उपास्य-उपासक और पिता-पुत्र आदि, अनादि पदार्थ, सृष्टि प्रवाह से अनादि, सृष्टि, सृष्टि का प्रयोजन, सृष्टि सकर्तृक, बन्ध, मुक्ति, मुक्ति के साधन, अर्थ-अनर्थ, काम, वर्णाश्रम, राजा, प्रजा, न्यायकारी, देव-असुर-राक्षस-पिशाच, देवपूजा, शिक्षा, पुराण, तीर्थ, पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा, मनुष्य, संस्कार, यज्ञ, आर्य-दस्यु, आर्यावर्त्त व आर्य, आचार्य, शिष्य, गुरु, पुरोहित, उपाध्याय, शिष्टाचार, आठ प्रमाण, आप्त, परीक्षा, परोपकार, स्वतन्त्र-परतन्त्र, स्वर्ग, नरक, जन्म, मृत्यु, विवाह, नियोग, स्तुति, प्रार्थना, उपासना एवं सगुणनिर्गुणस्तुतिप्रार्थनोपासना। ऋषि दयानन्द ने इन शीर्षक से वैदिक मन्तव्य को स्पष्ट किया है। ऋषि दयानन्द जी ने जो भी लिखा है उसे हम गागर में सागर कह सकते हैं। इसे पढ़कर एवं आचरण में लाकर मनुष्य अपने जीवन को अन्य सामान्य लोगों से कहीं अधिक श्रेष्ठ, ईश्वर की आज्ञा के अनुरूप व महत्वपूर्ण बना सकता है। इन मन्तव्यों में स्वामी जी ने दो से पांच वाक्यों में वैदिक मन्तव्यों का जिस प्रकार से चित्रण किया है वह संसार के धार्मिक व सामाजिक साहित्य में अन्यत्र एक साथ इस उत्तमता से उपलब्ध नहीं होता। अतः सुधी पाठकों व ऋषि भक्तों को इन मन्तव्यों को पढ़ते रहना चाहिये और इसके अनुसार अपना जीवन बनाना चाहिये। वेद प्रचार के लिए यह लघु पुस्तक एक उत्तम साधन हो सकता है। वाणी से भी लोगों में इन बातों को समझाना आवश्यक है।

इन मन्तव्यों में प्रथम ईश्वर विषयक मन्तव्य को प्रस्तुत किया गया है और इस पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि ईश्वर, कि जिस के ब्रह्म परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिस के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है। इन लक्षणों वाली सत्ता को ही ऋषि दयानन्द परमेश्वर मानते थे। हम व संसार के सभी लोगों को भी इन लक्षणों से युक्त ईश्वर को ही परमात्मा वा ईश्वर स्वीकार करना चाहिये और इसके विपरीत लक्षण वाली सत्ता को ईश्वर स्वीकार नहीं करना चाहिये। यदि हम ऐसा करते हैं तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। हम यह भी कहना चाहते हैं कि कोई भी विद्वान किसी भी मत का क्यों न हो, इसमें दिये हुए ईश्वर विषयक एक भी लक्षण को अन्यथा सिद्ध नहीं कर सकता और न अब तक कोई कर पाया है। आश्चर्य यह है कि सभी मत-मतान्तरों के विद्वान व अनुयायी न्यूनाधिक इन लक्षणों से विपरीत ईश्वर की सत्ता को मानते हैं। ऐसे विद्वान अपना तो अकल्याण करते ही हैं अपने अनुयायियों का भी अकल्याण करते हैं। जो भी मनुष्य ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानना चाहें उनके लिए ऋषि का यह मन्तव्य विचारणीय एवं स्वीकार करने योग्य है।

धर्म की भी अत्यन्त महत्वपूर्ण परिभाषा ऋषि दयानन्द जी ने अपने मन्तव्यों में दी है। उनके अनुसार पक्षपातरहित, न्यायाचरण, सत्यभाषणादि युक्त ईश्वराज्ञा जो वेदों से अविरुद्ध है वही धर्म है। इसके विपरीत धर्म विषयक जो मान्यतायें हैं, वह अधर्म हैं। इस परिभाषा को सभी मत-मतान्तरों पर लागू किया जाये तो यह कह सकते हैं कि संसार में प्रचलित सभी मत वा धर्मों की जो मान्यतायें ऋषि दयानन्द के धर्म विषयक इस मन्तव्य के अनुरूप व अनुकूल है, उसी सीमा तक वह धर्म हैं। इनके विपरीत को धर्म कदापि नहीं कह सकते। अन्य मन्तव्यों पर कुछ न लिख कर हम पाठकों से अनुरोध करेंगे कि वह सत्यार्थप्रकाश में ऋषि के मन्तव्यों को पढ़कर उसे बार बार पढ़े जब तक कि वह उन्हें हृदयंगम न हो जाये। ऐसा करने व इसके अनुसार आचरण करने पर साधक का निश्चित रूप से कल्याण होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता


हम ईश्वर तत्व पर निष्पक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करते हैं। हम संसार के समस्त ईश्वरवादियों से पूछना चाहते हैं कि क्या ईश्वर नाम का कोई पदार्थ इस सृष्टि में विद्यमान है, भी वा नही? जैसे कोई अज्ञानी व्यक्ति भी सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, तारे, आकाशगंगाओं, वनस्पति एवं प्राणियों के अस्तित्व पर कोई शंका नहीं करेगा, क्या वैसे ही इन सब वास्तविक पदार्थों के मूल निर्माता व संचालक ईश्वर तत्व पर सभी ईश्वरवादी शंका वा संदेह से रहित हैं? क्या संसार के विभिन्न पदार्थों का अस्तित्व व स्वरूप किसी की आस्था व विश्वास पर निर्भर करता है? यदि नहीं तब इन पदार्थों का निर्माता माने जाने वाला ईश्वर क्यों किसी की आस्था व विश्वास के आश्रय पर निर्भर है? हमारी आस्था न होने से क्या ईश्वर नहीं रहेगा? हमारी आस्था से संसार का कोई छोटे से छोटा पदार्थ भी न तो बन सकता है और न आस्था के समाप्त होने से किसी पदार्थ की सत्ता नष्ट हो सकती है, तब हमारी आस्थाओं से ईश्वर क्योंकर बन सकता है और क्यों हमारी आस्था समाप्त होने से ईश्वर मिट सकता है?

क्या हमारी आस्था से सृष्टि के किसी भी पदार्थ का स्वरूप बदल सकता है? यदि नहीं, तो क्यों हम अपनी-२ आस्थाओं के कारण ईश्वर के रूप बदलने की बात कहते हैं? संसार की सभी भौतिक क्रियाओं के विषय में कहीं किसी का विरोध नहीं, कहीं आस्था, विश्वास की बैसाखी की आवश्यकता नहीं, तब क्यों ईश्वर को ऐसा दुर्बल व असहाय बना दिया, जो हमारी आस्थाओं में बंटा हुआ मानव और मानव के मध्य विरोध, हिंसा व द्वेष को बढ़ावा दे रहा है। हम सूर्य को एक मान सकते हैं, पृथिवी आदि लोकों, अपने-२ शरीरों को एक समान मानकर आधुनिक भौतिक विद्याओं को मिलजुल कर पढ़ व पढ़ा सकते हैं, तब क्यों हम ईश्वर और उसके नियमों को एक समान मानकर परस्पर मिलजुल कर नहीं रह सकते? हम ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि एवं उसके नियमों पर बिना किसी पूर्वाग्रह के संवाद व तर्क-वितर्क प्रेमपूर्वक करते हैं, तब क्यों इस सृष्टि के रचयिता ईश्वर तत्व पर किसी चर्चा, तर्क से घबराते हैं? क्यों किचित् मतभेद होने मात्र से फतवे जारी करते हैं, आगजनी, हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। क्या सृष्टि के निर्माता ईश्वर तत्व की सत्ता किसी की शंका व तर्क मात्र से हिल जायेगी, मिट जायेगी?

यदि ईश्वर तर्क, विज्ञान वा विरोधी पक्ष की आस्था व विश्वास तथा अपने पक्ष की अनास्था व अविश्वास से मिट जाता है, तब ऐसे ईश्वर का मूल्य ही क्या है? ऐसा परजीवी, दुर्बल, असहाय, ईश्वर की पूजा करने से क्या लाभ? उसे क्यों माना जाये? क्यों उस कल्पित ईश्वर और उसके नाम से प्रचलित कल्पित धर्मों में व्यर्थ माथापच्ची करके धनसमय व श्रम का अपव्यय किया जाये?

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

मनुष्य और पश्वादियों में जीवात्मा एक जैसा है


हम संसार में मनुष्यों सहित अनेक पशु, पक्षी व अन्य अनेक प्राणी योनियों को देखते हैं। सभी मनुष्यों व जीवित प्राणियों में एक अनादि, अमर, अल्पज्ञ, सूक्ष्म व ससीम चेतन जीवात्मा होता है। इन सभी प्राणी योनियों में जो जीवात्मायें हैं वह एक जैसी हैं। अनेक मनुष्यों को मनुष्य और अन्य सभी प्राणियों के शरीरों में उनकी आत्मायें एक जैसी हैं व नहीं, भ्रमित देखा जाता है। कुछ वर्ष पूर्व हम अपने कार्यालय में बैठे थे। वहां जीवात्मा की चर्चा चली तो एक मित्र पूरे विश्वास के साथ बोले कि मनुष्य का आत्मा अन्य प्राणी योनियों के शरीरों की आत्माओं से भिन्न है। उनकी मान्यता थी कि मनुष्य के कर्म कैसी भी क्यों न हों, मनुष्य की मृत्यु होने पर उसकी आत्मा का पुनर्जन्म मनुष्य योनि में ही होता है। उनके अनुसार गाय की आत्मा का पुनर्जन्म गाय योनि में, जिस प्रजाति का जो आत्मा है, उसका भावी जन्म उसी प्रजाति में होता है। हमें अपने मित्र के यह विचार उचित प्रतीत नहीं लगे थे। हमने उनके विचारों का प्रतिवाद किया और बताया कि जीवात्मा सभी योनियों में एक जैसा व समान है परन्तु आत्माओं के पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार परमात्मा ने उनकी इस जन्म की योनि निर्धारित की है। योगदर्शन के ऋषि ने एक सूत्र में कहा कि हमारी जाति, आयु और भोग हमारे प्रारब्ध के अनुसार परमात्मा निर्धारित करता है। इस पर विचार करें तो यह सिद्धान्त वेदानुकूल होने सहित तर्क व युक्ति के आधार पर भी उचित लगता है। इसके आधार पर हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही हमें यह मनुष्य योनि मिली है। पूर्व जन्म में हो सकता है कि हम मनुष्य रहे हों और यह भी सम्भव है कि हम मनुष्य न रहे हों अपितु किसी पक्षी या पशु आदि योनि में रहे हों। हमारे इस जन्म की जाति, आयु और भोग का कारण हमारा पूर्व जन्मों के कर्म वा प्रारब्ध है। हमने उन्हीं दिनों इस विषय पर एक लेख भी लिखा था जो कुछ आर्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। आज पुनः इस विषयक पर पाठकों तक ऋषि दयानन्द जी के विचार पहुंचाने का मन हुआ जिसका परिणाम यह लेख व इसकी आगामी कुछ पंक्तियां हैं।


कोई भी बात तभी स्वीकार की जा सकती है जब उसके पीछे पर्याप्त तर्क व युक्तियां हों। एक अन्य प्रमाण यह होता है कि उस बात को उस विषय का कोई बड़ा प्रामाणिक विद्वान भी स्वीकार करता हो। इस दृष्टि से हम इस विषय में ऋषि दयानन्द के विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऋषि दयानन्द वेदों के प्रमाणिक विद्वान थे। वह ईश्वर भक्त एवं योगी थे और उनके विषय में यह प्रसिद्ध है कि वह 16 घंटे तक की समाधि लगा सकते थे परन्तु देश की दुर्दशा के कारण उसका सुधार करने के लिए उन्होंने अपने समाधि के सुख का त्याग कर दिया था। वह प्रातः लगभग 1 घंटा व रात्रि में अधिक समय तक समाधिस्थ अवस्था में रहते थे। जो मनुष्य दीर्घकालीन समाधि लगाने में सिद्ध होते हैं वह ईश्वर के सान्निध्य के कारण अपनी मान्यताओं को अधिक सत्यता व प्रमाण के साथ कहते हैं ऐसा माना जा सकता है। यदि वह असत्य कथन करेंगे तो उनकी समाधि अवस्था में बाधा आ सकती है। समाधि के लिए एक पात्रता यह भी है कि साधक मन, वचन व कर्म से सत्य का ही विचार व प्रचार करे।

सत्यार्थ प्रकाश के नवम् समुल्लास में स्वामी दयानन्द जी ने एक प्रश्न उपस्थित किया है जिसमें कहा है कि मनुष्य और अन्य पश्चादि के शरीर में जीव एक से हैं या भिन्न भिन्न जाति के? दूसरा प्रश्न उन्होंने यह लिखा है कि मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य के शरीर में और स्त्री का पुरुष के और पुरुष का स्त्री के शरीर में जाता आता है वा नहीं? इन प्रश्नों का ऋषि ने उत्तर देते हुए लिखा है कि मुनष्य और पशुओं में जीव एक से हैं परन्तु पाप पुण्य के योग से मलिन और पवित्र होते हैं। दूसरे प्रश्न के उत्तर में वह बताते हैं मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य में आता जाता है। क्योंकि जब पाप बढ़ जाता है, पुण्य न्यून होता है तब मनुष्य का जीव पश्वादि नीच शरीर में और जब धर्म अधिक तथा अधर्म न्यून होता है तब देव अर्थात् विद्वानों का शरीर मिलता है। और जब पुण्य पाप बराबर होता है तब साधारण मनुष्य जन्म होता है। इसमें भी पुण्य पाप के उत्तम, मध्यम और निकृष्ट होने से मनुष्यादि में भी उत्तम, मध्यम, निकृष्ट शरीरादि सामग्री वाले होते हैं। और जब अधिक पाप का फल पश्वादि शरीर में भोग लिया है, पुनः पाप पुण्य के तुल्य होने वा रहने से मनुष्य शरीर में आता है और पुण्य के फल भोग कर फिर भी मध्यस्थ मनुष्य के शरीर में आता है।

ऋषि दयानन्द जी आगे लिखते हैं कि जब जीव शरीर से निकलता है उसी का नाम मृत्युऔर शरीर के साथ संयोग होने का नाम जन्महै। जब शरीर छोड़ता है तब यमालय अर्थात् आकाशस्थ वायु में रहता है क्योंकि यमेन वायुनावेद में लिखा है कि यम नाम वायु का है। इसके बाद ऋषि दयानन्द ने अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें लिखी है जिसका ज्ञान हमारे आज के विद्वत समाज को भी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि दयानन्द ने जानकारी सम्भवतः किसी ऋष्योक्त वा आप्त ग्रन्थ के आधार पर लिखी है। यह भी सम्भव है कि ऋषि जी ने यह जानकारी अपने शास्त्रीय ज्ञान के आधार पर अपने विचारों के मननपूर्वक लिखी हो। उन्होंने जो लिखा है वह प्रामाणिक तथ्य हैं और हम सबको आवश्यकता पड़ने पर इस जानकारी को विरोधी विचारों का खण्डन करते हुए इसे प्रस्तुत करना चाहिये। ऋषि लिखते हैं कि मृत्यु होने के साथ वा बाद शरीर से जो जीवात्मा निकलती है वह आकाशस्थ वायु में रहती है। इस जीवात्मा को धर्मराज अर्थात् परमेश्वर उसके पाप पुण्यानुसार जन्म देता है। वह वायु, अन्न, जल अथवा शरीर के छिद्र द्वारा दूसरे के शरीर में ईश्वर की प्रेरणा से प्रविष्ट होता है। (जीवात्मा) जो (पुरुष शरीर में) प्रविष्ट होकर क्रमशः वीर्य में जा गर्भ में स्थित हो शरीर धारण कर (प्रसव काल में) बाहर आता (जन्म लेता) है। जो स्त्री के शरीर धारण करने योग्य कर्म हों तो स्त्री और पुरुष के शरीर धारण करने योग्य कर्म हों तो पुरुष के शरीर में प्रवेश करता है। और नपुंसक गर्भ की स्थिति-समय स्त्री पुरुष के शरीर में सम्बन्ध करके रज वीर्य के बराबर होने से होता है। इसी प्रकार नाना प्रकार के जन्म मरण में तब तक जीव पड़ा रहता है कि जब तक उत्तम कर्मोपासना ज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को नहीं पाता। क्योंकि उत्तम कर्मादि करने से मनुष्यों में उत्तम जन्म और मुक्ति में महाकल्प पर्यन्त जन्म मरण दुःखों से रहित होकर आनन्द में रहता है।

उपर्युक्त पंक्तियों में हमने ऋषि दयानन्द जी के विचारों को प्रस्तुत किया है जो वेद शास्त्रानुकूल व प्रमाणित हैं। वेदों और शास्त्रों में जीवात्मा का जो स्वरूप उपलब्ध होता है, आज का विज्ञान अभी वहां तक पहुंच नहीं पाया है और वह जीव को उस रूप में स्वीकार नहीं करता जैसा जीव का वर्णन वेद आदि शास्त्रों व ऋषियों के ग्रन्थों में मिलता है। ईश्वर व जीव विषयक वैदिक शास्त्रों की बातें सत्य हैं जिन्हें विज्ञान को स्वीकार करने में समय लगेगा क्योंकि यह विषय अभौतिक होने के कारण मनुष्य की आत्मा के चिन्तन मनन सहित स्वाध्याय और योगाभ्यास आदि से अनुभव करने योग्य है। ऋषि दयानन्द जी ने जो कहा है उसके अनुसार मनुष्य व अन्य सभी पश्वादि योनियों में जो चेतन जीवात्मायें हैं वह सब एक जैसी हैं। वह कर्मानुसार एक योनि से दूसरी योनि में आ जा सकती हैं। स्त्री के शरीर की आत्मा पुरुष शरीर में व पुरुष की आत्मा स्त्री शरीर में आ जा सकती है। मृत्यु होने पर जीवात्मा शरीर से निकलने के बाद आकाशस्थ वायु में रहती है। मनुष्य जन्म होने से पहले वह भावी पिता के शरीर में प्रवेश करती है। पिता के शरीर से वह माता के शरीर में जाती है और वहां से प्रसव काल में वह जन्म के समय शिशु रूप में बाहर आती है। शिशु रूप में जन्म के बाद वह किशोर, किशोर से युवा, प्रौढ़ व वृद्ध अवस्थाओं से गुजर कर पुनः मृत्यु को प्राप्त होती है। हम आशा करते हैं कि पाठकों को आत्मा के आवागमन विषयक ऋषि दयानन्द के शास्त्रसम्मत विचारों का ज्ञान हो गया होगा। यही विचार ज्ञान विज्ञान सम्मत होने के साथ सत्य व यथार्थ भी हैं। सभी मनुष्यों को आत्मा विषयक इन्हीं विचारों को स्वीकार करना चाहिये और इसके विरोधी विचारों को स्वीकार नहीं करना चाहिये। आत्मा विषयक इन विचारों को पढ़कर अपने भ्रम को दूर कर दूसरों के भ्रम को भी दूर करना चाहिये। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य