Tuesday, 8 May 2018

प्रभु दर्शन के लिए सात्विक भोजन आवश्यक


          हमारी सदा ही यह इच्छा रही है कि हम उस पिता को , उस प्रभु को प्राप्त करें किन्तु कैसे? इस निमित्त हम अपनी अन्दर की वासनाओं का नाश करें। वासना विनाश के लिए अपने अन्दर ज्ञान का दीप जलाएं। ज्ञान का दीप जलाने के लिए सात्विक अन्न का प्रयोग करना आवश्यक है। जब मन वासना रहित होगा, अन्दर ज्ञान का प्रकाश होगा तथा जब यह शरीर सात्विक भोजन पर निर्भर होगा तो हम प्रभु को पाने में सफल होंगे। इस तथ्य पर ही यह मन्त्र इस प्रकार प्रकाश डाल रहा है :-

              इन्द्रा याहि तुतुजान उप ब्रह्माणि हरिव:
               सुते दधिष्व नश्चन: ॥ ऋग्वेद १.३.६ ॥
         इस मन्त्र में तीन बातों पर, तीन बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार कहा गया है, उपदेश किया गया है :-
१. वासनाओं का नाश     
             जितेन्द्रीय पुरुष को इन्द्र के नाम से सम्बोधित करते हुए मन्त्र कहता है कि हे जितेन्द्रिय पुरुष! तू अति शीघ्रता से सब वासनाओं का नाश करता हुआ मेरे समीप आ। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन्त्र के अनुसार प्रभु प्राप्ति की प्रथम तथा प्रमुख सीढी वासनाओं का नाश ही है। जब तक वासनाओं का नाश नहीं होता तब तक प्रभु प्राप्ति की ओर प्रथम कदम भी नहीं रखा जा सकता। इसलिए प्रभु दर्शन के अभिलाषी प्राणी को सर्व प्रथम जो कार्य करना होता है, उसे हम वासनाओं का नाश के नाम से जानते हैं। अत: प्रभु प्राप्ति के पथिक को सर्व प्रथम वासना नाश रुपी मार्ग को पकडना होता है। यह ही प्रभु दर्शन का प्रथम साधन है, प्रथम सीढी है।
२. ज्ञान से वासनाओं का नाश      
            वासनाओं का नाश करने के इच्छुक हे प्रशस्त इन्द्रिय रुपी घोडों से युक्त प्राणी! तु सदा ज्ञान के मध्य निवास करने वाला बन। ज्ञान प्राप्ति की रुचि के बिना तू ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए तेरे लिए यह आवश्यक है कि यदि तूं ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा रखता है तो अपने अन्दर ज्ञान को पाने की इच्छा पैदा कर, रुचि पैदा कर । जब तक तेरे अन्दर ज्ञान नहीं है, तब तक वासनाओं का नाश सम्भव ही नहीं है। जब तुझे अच्छे व बुरे का ज्ञान ही नहीं है, तब तक तूं बुराई को करे तथा यह इच्छा शक्ति भी अपने अन्दर पैदा कर कि तू ने उत्तम ज्ञान को पैदा करना है, ग्रहण करना है। जब तक तेरे अन्दर वासनाओं को मारने के लिए, वासनाओं का हनन करने के लिए ज्ञान ही नहीं है, वासनाओं की बुराई को तू जानता ही नहीं है, तब तक इनका नाश नहीं कर सकता। इसलिए महान् ज्ञानी बनना तेरे लिए आवश्यक है। यह ज्ञान ही है जो हमें वासनाओं की हानियों की जानकारी देने वाला है। यह ज्ञान ही तो है जो वासनाओं का नाश करता है।
३. उत्तम अन्न का सेवन      
       अपने शरीर में हमने शक्ति पैदा करनी है। शक्ति ही सब सफलताओं का मार्ग है, सब सफलताओं का मूल है। इस शक्ति को ही सोम कहते हैं । इसलिए हे प्राणी! अपने शरीर में सोम की उत्पत्ति के लिए, शक्ति की उत्पत्ति के लिए, मैंने जो अन्न तेरे लिए दिया है, पैदा किया है, तू उसे धारण करने के योग्य बन, अपने अन्दर एसे गुण पैदा कर कि तू इस अन्न का उपभोग करने के योग्य बन सके, इस अन्न को ग्रहण कर। यह अन्न ही तेरा भोजन है, यह अन्न ही तेरी क्षुधा पूर्ति का साधन है, यह अन्न ही तेरे जीवन का मुख्य भाग है। इस प्रकार यह मन्त्र उपदेश कर रहा है कि गेहूं , चावल , जौ, उडद, दालें, तिल आदि वस्तुएं , जिन्हें अन्न का नाम दिया गया है, ही तू खाने के लिए सेवन कर, इनका ही उपभोग कर, इन्हें ही तू ग्रहण कर। मांस मनुष्य का भोजन नहीं है, इसलिए तू ने मांस , मदिरा आदि तुच्छ पदार्थों का अपने भोजन के रूप में सेवन नहीं करना। एसे गन्दे भोजन का सेवन कर तू अपनी बुद्धि को रजस वृत्तियों वाला बना कर  वैष्यिक वृत्तिवाला बनकर, तामस वृत्ति वाला बनकर सोम रक्षण का कार्य नहीं कर पावेगा। सोम रक्षण एसी दूषित वृत्तियों से नहीं होता। यदि तू अपने शरीर में सोम की ,शक्ति की रक्षा करना चाहता है तो यह आवश्यक है कि तू उत्तम अन्न व दालों आदि का ही सेवन कर। मांस, मदिरा के सम्बन्ध में सोच भी न, देख भी न।
        इससे  ही शक्ति अर्थात् सोम की प्राप्ति होगी। इस के अतिरिक्त हे जीव! तू यह भी कर:-
क)     तू सदा सात्विक भोजन कर
ख)    सात्विक भोजन की प्राप्ति से तू सूक्ष्म बुद्धि वाला बनकर ज्ञान प्राप्ति के कार्य में लग जा।
ग)     ज्ञान प्राप्ती से तु अच्छे व बुरे की परख करने वाला बन।
घ)     अच्छे व बुरे का पारखी बनकर तू अपने अन्दर की विषय वासनाओं की हानि को समझ तथा अपनी वासनाओं का विनाश कर।
   ड)     वासनाओं का विनाश कर तू अपने आप को प्रभु को पाने के योग्य बना।


डा.अशोक आर्य

Friday, 4 May 2018

ऋषि दयानन्द का ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ गागर में सागर”


ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ संसार में सुविख्यात ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने संसार में विद्यमान पदार्थों के सत्य स्वरूप का प्रकाश किया है। यह ग्रन्थ चौदह समुल्लासों में है। प्रथम दस समुल्लास ग्रन्थ पूर्वाद्ध कहलाते हैं और बाद के चार समुल्लास उत्तरार्ध कहलाते हैं। प्रथम सम्मुलास में ईश्वर के एक सौ से अधिक नामों की व्याख्या के साथ मंगलाचरण की समीक्षा की गई है। दूसरा समुल्लास बाल शिक्षा विषय पर है जिसमें इस विषय के साथ भूत प्रेतादि के निषेध सहित जन्म पत्र व सूर्यादि ग्रह के मनुष्य के जीवन पर प्रभाव की समीक्षा की गई है। तीसरा समुल्लास मुख्यतः अध्ययनाध्यापन विषय पर है। इसके साथ इस समुल्लास में गुरुमन्त्र व्याख्या, प्राणायामशिक्षा, सन्ध्या अग्निहोत्र पर उपदेश, उपनयन समीक्षा, ब्रह्मचर्य उपदेश, पठन पाठन की विशेष विधि, ग्रन्थों के प्रमाण व अप्रमाण होने का विषय सहित स्त्री व शूद्रों के अध्ययन की विधि का वर्णन है। चौथे समुल्लास में समावर्तन एवं विवाह का विषय है। इस समुल्लास में इन विषयों के अतिरिक्त गुण कर्मानुसार वर्ण व्यवस्था, स्त्री पुरुष व्यवहार, पंचमहायज्ञ, गृहस्थ धर्म उपदेश, पण्डित व मूर्खों के लक्षण सहित पुनर्विवाह, नियोग एवं गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता पर विचार किया गया है और वेदों का मन्तव्य व सिद्धान्त सूचित किया गया है। पांचवे समुल्लास में वानप्रस्थ आश्रम और संन्यासाश्रम का विषय है।


छठे समुल्लास में राजधर्म, दण्ड व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, युद्ध, राज्य की रक्षा, व्यापार में राज्य की ओर से कर स्थापन, साक्षियों के कर्तव्यों पर उपदेश, झूठी साक्षी पर दण्ड का विधान एवं चोरों को दण्ड आदि के विधान से अवगत कराया गया है। यूं तो सभी समुल्लास महत्वपूर्ण हैं परन्तु सातवे और आठवें समुल्लास में ईश्वर, जीव व प्रकृति आदि विषयों के वर्णन के कारण इन समुल्लासों का विशेष महत्व है। सातवें समुल्लास में ईश्वर, ईश्वर स्तुतिप्रार्थनोपासना, ईश्वर ज्ञान का प्रकार, ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के अवतार का निषेध, जीव की स्वतन्त्रता, ईश्वर तथा जीव की भिन्नता, ईश्वर के समुण व निर्गुण स्वरूप का तात्पर्य व उनके वर्णन सहित वेद विषयक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये गये हैं। आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, ईश्वर व प्रकृति की भिन्नता, मनुष्य की आदि सृष्टि में उत्पत्ति के स्थान का निर्णय, आर्य और मलेच्छ की व्याख्या एवं ईश्वर का ब्रह्माण्ड को धारण करना विषय सम्मिलित किये गये हैं। नवम् समुल्लास में विद्या, अविद्या, बन्धन तथा मोक्ष का विषय वर्णित है। दसवें समुल्लास में आचार अनाचार तथा भक्ष्य एवं अभक्ष्य पदार्थों का वर्णन किया गया है। ग्यारहवें समुल्लास में आर्यावर्तदेश के मत-मतान्तरों के खण्डन व मण्डन के विषय सहित अन्य अनेक विषय सम्मिलित हैं। इसमें आर्यसमाज विषय सहित आर्यवर्तीय राजवंशावली भी प्रस्तुत की गई है। बारहवें समुल्लास में चारवाक, नास्तिक, बौद्ध एवं जैन मतों की समीक्षा है। अन्त के दो समुल्लासों में ईसाई तथा यवन मत की समीक्षा है। ग्रन्थ के अन्त में स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रस्तुत किया गया है। इसके अन्तर्गत 51 विषयों पर ऋषि दयानन्द जी ने अपनी मान्यतायें लिखी हैं। यही वैदिक मान्यतायें हैं और इन मान्यताओं को ही संक्षेप में वैदिक धर्म कहते हैं। यह मन्तव्य ऐसे हैं कि यदि इन्हें कोई मनुष्य अपना ले तो वह सभी मत मतान्तरों से अधिक उत्तम व उपयोगी मनुष्य बनने के साथ परजन्म में भी दूसरों से अधिक उन्नत योनि व जीवन प्राप्त करता है।

स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश में 51 विषय सम्मिलित किये गये हैं। यह विषय हैं ईश्वर, वेद, धर्म-अधर्म, जीव, ईश्वर-जीव सम्बन्ध यथा व्याप्य-व्यापक, उपास्य-उपासक और पिता-पुत्र आदि, अनादि पदार्थ, सृष्टि प्रवाह से अनादि, सृष्टि, सृष्टि का प्रयोजन, सृष्टि सकर्तृक, बन्ध, मुक्ति, मुक्ति के साधन, अर्थ-अनर्थ, काम, वर्णाश्रम, राजा, प्रजा, न्यायकारी, देव-असुर-राक्षस-पिशाच, देवपूजा, शिक्षा, पुराण, तीर्थ, पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा, मनुष्य, संस्कार, यज्ञ, आर्य-दस्यु, आर्यावर्त्त व आर्य, आचार्य, शिष्य, गुरु, पुरोहित, उपाध्याय, शिष्टाचार, आठ प्रमाण, आप्त, परीक्षा, परोपकार, स्वतन्त्र-परतन्त्र, स्वर्ग, नरक, जन्म, मृत्यु, विवाह, नियोग, स्तुति, प्रार्थना, उपासना एवं सगुणनिर्गुणस्तुतिप्रार्थनोपासना। ऋषि दयानन्द ने इन शीर्षक से वैदिक मन्तव्य को स्पष्ट किया है। ऋषि दयानन्द जी ने जो भी लिखा है उसे हम गागर में सागर कह सकते हैं। इसे पढ़कर एवं आचरण में लाकर मनुष्य अपने जीवन को अन्य सामान्य लोगों से कहीं अधिक श्रेष्ठ, ईश्वर की आज्ञा के अनुरूप व महत्वपूर्ण बना सकता है। इन मन्तव्यों में स्वामी जी ने दो से पांच वाक्यों में वैदिक मन्तव्यों का जिस प्रकार से चित्रण किया है वह संसार के धार्मिक व सामाजिक साहित्य में अन्यत्र एक साथ इस उत्तमता से उपलब्ध नहीं होता। अतः सुधी पाठकों व ऋषि भक्तों को इन मन्तव्यों को पढ़ते रहना चाहिये और इसके अनुसार अपना जीवन बनाना चाहिये। वेद प्रचार के लिए यह लघु पुस्तक एक उत्तम साधन हो सकता है। वाणी से भी लोगों में इन बातों को समझाना आवश्यक है।

इन मन्तव्यों में प्रथम ईश्वर विषयक मन्तव्य को प्रस्तुत किया गया है और इस पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि ईश्वर, कि जिस के ब्रह्म परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिस के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है। इन लक्षणों वाली सत्ता को ही ऋषि दयानन्द परमेश्वर मानते थे। हम व संसार के सभी लोगों को भी इन लक्षणों से युक्त ईश्वर को ही परमात्मा वा ईश्वर स्वीकार करना चाहिये और इसके विपरीत लक्षण वाली सत्ता को ईश्वर स्वीकार नहीं करना चाहिये। यदि हम ऐसा करते हैं तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। हम यह भी कहना चाहते हैं कि कोई भी विद्वान किसी भी मत का क्यों न हो, इसमें दिये हुए ईश्वर विषयक एक भी लक्षण को अन्यथा सिद्ध नहीं कर सकता और न अब तक कोई कर पाया है। आश्चर्य यह है कि सभी मत-मतान्तरों के विद्वान व अनुयायी न्यूनाधिक इन लक्षणों से विपरीत ईश्वर की सत्ता को मानते हैं। ऐसे विद्वान अपना तो अकल्याण करते ही हैं अपने अनुयायियों का भी अकल्याण करते हैं। जो भी मनुष्य ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानना चाहें उनके लिए ऋषि का यह मन्तव्य विचारणीय एवं स्वीकार करने योग्य है।

धर्म की भी अत्यन्त महत्वपूर्ण परिभाषा ऋषि दयानन्द जी ने अपने मन्तव्यों में दी है। उनके अनुसार पक्षपातरहित, न्यायाचरण, सत्यभाषणादि युक्त ईश्वराज्ञा जो वेदों से अविरुद्ध है वही धर्म है। इसके विपरीत धर्म विषयक जो मान्यतायें हैं, वह अधर्म हैं। इस परिभाषा को सभी मत-मतान्तरों पर लागू किया जाये तो यह कह सकते हैं कि संसार में प्रचलित सभी मत वा धर्मों की जो मान्यतायें ऋषि दयानन्द के धर्म विषयक इस मन्तव्य के अनुरूप व अनुकूल है, उसी सीमा तक वह धर्म हैं। इनके विपरीत को धर्म कदापि नहीं कह सकते। अन्य मन्तव्यों पर कुछ न लिख कर हम पाठकों से अनुरोध करेंगे कि वह सत्यार्थप्रकाश में ऋषि के मन्तव्यों को पढ़कर उसे बार बार पढ़े जब तक कि वह उन्हें हृदयंगम न हो जाये। ऐसा करने व इसके अनुसार आचरण करने पर साधक का निश्चित रूप से कल्याण होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता


हम ईश्वर तत्व पर निष्पक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करते हैं। हम संसार के समस्त ईश्वरवादियों से पूछना चाहते हैं कि क्या ईश्वर नाम का कोई पदार्थ इस सृष्टि में विद्यमान है, भी वा नही? जैसे कोई अज्ञानी व्यक्ति भी सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, तारे, आकाशगंगाओं, वनस्पति एवं प्राणियों के अस्तित्व पर कोई शंका नहीं करेगा, क्या वैसे ही इन सब वास्तविक पदार्थों के मूल निर्माता व संचालक ईश्वर तत्व पर सभी ईश्वरवादी शंका वा संदेह से रहित हैं? क्या संसार के विभिन्न पदार्थों का अस्तित्व व स्वरूप किसी की आस्था व विश्वास पर निर्भर करता है? यदि नहीं तब इन पदार्थों का निर्माता माने जाने वाला ईश्वर क्यों किसी की आस्था व विश्वास के आश्रय पर निर्भर है? हमारी आस्था न होने से क्या ईश्वर नहीं रहेगा? हमारी आस्था से संसार का कोई छोटे से छोटा पदार्थ भी न तो बन सकता है और न आस्था के समाप्त होने से किसी पदार्थ की सत्ता नष्ट हो सकती है, तब हमारी आस्थाओं से ईश्वर क्योंकर बन सकता है और क्यों हमारी आस्था समाप्त होने से ईश्वर मिट सकता है?

क्या हमारी आस्था से सृष्टि के किसी भी पदार्थ का स्वरूप बदल सकता है? यदि नहीं, तो क्यों हम अपनी-२ आस्थाओं के कारण ईश्वर के रूप बदलने की बात कहते हैं? संसार की सभी भौतिक क्रियाओं के विषय में कहीं किसी का विरोध नहीं, कहीं आस्था, विश्वास की बैसाखी की आवश्यकता नहीं, तब क्यों ईश्वर को ऐसा दुर्बल व असहाय बना दिया, जो हमारी आस्थाओं में बंटा हुआ मानव और मानव के मध्य विरोध, हिंसा व द्वेष को बढ़ावा दे रहा है। हम सूर्य को एक मान सकते हैं, पृथिवी आदि लोकों, अपने-२ शरीरों को एक समान मानकर आधुनिक भौतिक विद्याओं को मिलजुल कर पढ़ व पढ़ा सकते हैं, तब क्यों हम ईश्वर और उसके नियमों को एक समान मानकर परस्पर मिलजुल कर नहीं रह सकते? हम ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि एवं उसके नियमों पर बिना किसी पूर्वाग्रह के संवाद व तर्क-वितर्क प्रेमपूर्वक करते हैं, तब क्यों इस सृष्टि के रचयिता ईश्वर तत्व पर किसी चर्चा, तर्क से घबराते हैं? क्यों किचित् मतभेद होने मात्र से फतवे जारी करते हैं, आगजनी, हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। क्या सृष्टि के निर्माता ईश्वर तत्व की सत्ता किसी की शंका व तर्क मात्र से हिल जायेगी, मिट जायेगी?

यदि ईश्वर तर्क, विज्ञान वा विरोधी पक्ष की आस्था व विश्वास तथा अपने पक्ष की अनास्था व अविश्वास से मिट जाता है, तब ऐसे ईश्वर का मूल्य ही क्या है? ऐसा परजीवी, दुर्बल, असहाय, ईश्वर की पूजा करने से क्या लाभ? उसे क्यों माना जाये? क्यों उस कल्पित ईश्वर और उसके नाम से प्रचलित कल्पित धर्मों में व्यर्थ माथापच्ची करके धनसमय व श्रम का अपव्यय किया जाये?

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

मनुष्य और पश्वादियों में जीवात्मा एक जैसा है


हम संसार में मनुष्यों सहित अनेक पशु, पक्षी व अन्य अनेक प्राणी योनियों को देखते हैं। सभी मनुष्यों व जीवित प्राणियों में एक अनादि, अमर, अल्पज्ञ, सूक्ष्म व ससीम चेतन जीवात्मा होता है। इन सभी प्राणी योनियों में जो जीवात्मायें हैं वह एक जैसी हैं। अनेक मनुष्यों को मनुष्य और अन्य सभी प्राणियों के शरीरों में उनकी आत्मायें एक जैसी हैं व नहीं, भ्रमित देखा जाता है। कुछ वर्ष पूर्व हम अपने कार्यालय में बैठे थे। वहां जीवात्मा की चर्चा चली तो एक मित्र पूरे विश्वास के साथ बोले कि मनुष्य का आत्मा अन्य प्राणी योनियों के शरीरों की आत्माओं से भिन्न है। उनकी मान्यता थी कि मनुष्य के कर्म कैसी भी क्यों न हों, मनुष्य की मृत्यु होने पर उसकी आत्मा का पुनर्जन्म मनुष्य योनि में ही होता है। उनके अनुसार गाय की आत्मा का पुनर्जन्म गाय योनि में, जिस प्रजाति का जो आत्मा है, उसका भावी जन्म उसी प्रजाति में होता है। हमें अपने मित्र के यह विचार उचित प्रतीत नहीं लगे थे। हमने उनके विचारों का प्रतिवाद किया और बताया कि जीवात्मा सभी योनियों में एक जैसा व समान है परन्तु आत्माओं के पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार परमात्मा ने उनकी इस जन्म की योनि निर्धारित की है। योगदर्शन के ऋषि ने एक सूत्र में कहा कि हमारी जाति, आयु और भोग हमारे प्रारब्ध के अनुसार परमात्मा निर्धारित करता है। इस पर विचार करें तो यह सिद्धान्त वेदानुकूल होने सहित तर्क व युक्ति के आधार पर भी उचित लगता है। इसके आधार पर हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही हमें यह मनुष्य योनि मिली है। पूर्व जन्म में हो सकता है कि हम मनुष्य रहे हों और यह भी सम्भव है कि हम मनुष्य न रहे हों अपितु किसी पक्षी या पशु आदि योनि में रहे हों। हमारे इस जन्म की जाति, आयु और भोग का कारण हमारा पूर्व जन्मों के कर्म वा प्रारब्ध है। हमने उन्हीं दिनों इस विषय पर एक लेख भी लिखा था जो कुछ आर्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। आज पुनः इस विषयक पर पाठकों तक ऋषि दयानन्द जी के विचार पहुंचाने का मन हुआ जिसका परिणाम यह लेख व इसकी आगामी कुछ पंक्तियां हैं।


कोई भी बात तभी स्वीकार की जा सकती है जब उसके पीछे पर्याप्त तर्क व युक्तियां हों। एक अन्य प्रमाण यह होता है कि उस बात को उस विषय का कोई बड़ा प्रामाणिक विद्वान भी स्वीकार करता हो। इस दृष्टि से हम इस विषय में ऋषि दयानन्द के विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऋषि दयानन्द वेदों के प्रमाणिक विद्वान थे। वह ईश्वर भक्त एवं योगी थे और उनके विषय में यह प्रसिद्ध है कि वह 16 घंटे तक की समाधि लगा सकते थे परन्तु देश की दुर्दशा के कारण उसका सुधार करने के लिए उन्होंने अपने समाधि के सुख का त्याग कर दिया था। वह प्रातः लगभग 1 घंटा व रात्रि में अधिक समय तक समाधिस्थ अवस्था में रहते थे। जो मनुष्य दीर्घकालीन समाधि लगाने में सिद्ध होते हैं वह ईश्वर के सान्निध्य के कारण अपनी मान्यताओं को अधिक सत्यता व प्रमाण के साथ कहते हैं ऐसा माना जा सकता है। यदि वह असत्य कथन करेंगे तो उनकी समाधि अवस्था में बाधा आ सकती है। समाधि के लिए एक पात्रता यह भी है कि साधक मन, वचन व कर्म से सत्य का ही विचार व प्रचार करे।

सत्यार्थ प्रकाश के नवम् समुल्लास में स्वामी दयानन्द जी ने एक प्रश्न उपस्थित किया है जिसमें कहा है कि मनुष्य और अन्य पश्चादि के शरीर में जीव एक से हैं या भिन्न भिन्न जाति के? दूसरा प्रश्न उन्होंने यह लिखा है कि मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य के शरीर में और स्त्री का पुरुष के और पुरुष का स्त्री के शरीर में जाता आता है वा नहीं? इन प्रश्नों का ऋषि ने उत्तर देते हुए लिखा है कि मुनष्य और पशुओं में जीव एक से हैं परन्तु पाप पुण्य के योग से मलिन और पवित्र होते हैं। दूसरे प्रश्न के उत्तर में वह बताते हैं मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य में आता जाता है। क्योंकि जब पाप बढ़ जाता है, पुण्य न्यून होता है तब मनुष्य का जीव पश्वादि नीच शरीर में और जब धर्म अधिक तथा अधर्म न्यून होता है तब देव अर्थात् विद्वानों का शरीर मिलता है। और जब पुण्य पाप बराबर होता है तब साधारण मनुष्य जन्म होता है। इसमें भी पुण्य पाप के उत्तम, मध्यम और निकृष्ट होने से मनुष्यादि में भी उत्तम, मध्यम, निकृष्ट शरीरादि सामग्री वाले होते हैं। और जब अधिक पाप का फल पश्वादि शरीर में भोग लिया है, पुनः पाप पुण्य के तुल्य होने वा रहने से मनुष्य शरीर में आता है और पुण्य के फल भोग कर फिर भी मध्यस्थ मनुष्य के शरीर में आता है।

ऋषि दयानन्द जी आगे लिखते हैं कि जब जीव शरीर से निकलता है उसी का नाम मृत्युऔर शरीर के साथ संयोग होने का नाम जन्महै। जब शरीर छोड़ता है तब यमालय अर्थात् आकाशस्थ वायु में रहता है क्योंकि यमेन वायुनावेद में लिखा है कि यम नाम वायु का है। इसके बाद ऋषि दयानन्द ने अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें लिखी है जिसका ज्ञान हमारे आज के विद्वत समाज को भी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि दयानन्द ने जानकारी सम्भवतः किसी ऋष्योक्त वा आप्त ग्रन्थ के आधार पर लिखी है। यह भी सम्भव है कि ऋषि जी ने यह जानकारी अपने शास्त्रीय ज्ञान के आधार पर अपने विचारों के मननपूर्वक लिखी हो। उन्होंने जो लिखा है वह प्रामाणिक तथ्य हैं और हम सबको आवश्यकता पड़ने पर इस जानकारी को विरोधी विचारों का खण्डन करते हुए इसे प्रस्तुत करना चाहिये। ऋषि लिखते हैं कि मृत्यु होने के साथ वा बाद शरीर से जो जीवात्मा निकलती है वह आकाशस्थ वायु में रहती है। इस जीवात्मा को धर्मराज अर्थात् परमेश्वर उसके पाप पुण्यानुसार जन्म देता है। वह वायु, अन्न, जल अथवा शरीर के छिद्र द्वारा दूसरे के शरीर में ईश्वर की प्रेरणा से प्रविष्ट होता है। (जीवात्मा) जो (पुरुष शरीर में) प्रविष्ट होकर क्रमशः वीर्य में जा गर्भ में स्थित हो शरीर धारण कर (प्रसव काल में) बाहर आता (जन्म लेता) है। जो स्त्री के शरीर धारण करने योग्य कर्म हों तो स्त्री और पुरुष के शरीर धारण करने योग्य कर्म हों तो पुरुष के शरीर में प्रवेश करता है। और नपुंसक गर्भ की स्थिति-समय स्त्री पुरुष के शरीर में सम्बन्ध करके रज वीर्य के बराबर होने से होता है। इसी प्रकार नाना प्रकार के जन्म मरण में तब तक जीव पड़ा रहता है कि जब तक उत्तम कर्मोपासना ज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को नहीं पाता। क्योंकि उत्तम कर्मादि करने से मनुष्यों में उत्तम जन्म और मुक्ति में महाकल्प पर्यन्त जन्म मरण दुःखों से रहित होकर आनन्द में रहता है।

उपर्युक्त पंक्तियों में हमने ऋषि दयानन्द जी के विचारों को प्रस्तुत किया है जो वेद शास्त्रानुकूल व प्रमाणित हैं। वेदों और शास्त्रों में जीवात्मा का जो स्वरूप उपलब्ध होता है, आज का विज्ञान अभी वहां तक पहुंच नहीं पाया है और वह जीव को उस रूप में स्वीकार नहीं करता जैसा जीव का वर्णन वेद आदि शास्त्रों व ऋषियों के ग्रन्थों में मिलता है। ईश्वर व जीव विषयक वैदिक शास्त्रों की बातें सत्य हैं जिन्हें विज्ञान को स्वीकार करने में समय लगेगा क्योंकि यह विषय अभौतिक होने के कारण मनुष्य की आत्मा के चिन्तन मनन सहित स्वाध्याय और योगाभ्यास आदि से अनुभव करने योग्य है। ऋषि दयानन्द जी ने जो कहा है उसके अनुसार मनुष्य व अन्य सभी पश्वादि योनियों में जो चेतन जीवात्मायें हैं वह सब एक जैसी हैं। वह कर्मानुसार एक योनि से दूसरी योनि में आ जा सकती हैं। स्त्री के शरीर की आत्मा पुरुष शरीर में व पुरुष की आत्मा स्त्री शरीर में आ जा सकती है। मृत्यु होने पर जीवात्मा शरीर से निकलने के बाद आकाशस्थ वायु में रहती है। मनुष्य जन्म होने से पहले वह भावी पिता के शरीर में प्रवेश करती है। पिता के शरीर से वह माता के शरीर में जाती है और वहां से प्रसव काल में वह जन्म के समय शिशु रूप में बाहर आती है। शिशु रूप में जन्म के बाद वह किशोर, किशोर से युवा, प्रौढ़ व वृद्ध अवस्थाओं से गुजर कर पुनः मृत्यु को प्राप्त होती है। हम आशा करते हैं कि पाठकों को आत्मा के आवागमन विषयक ऋषि दयानन्द के शास्त्रसम्मत विचारों का ज्ञान हो गया होगा। यही विचार ज्ञान विज्ञान सम्मत होने के साथ सत्य व यथार्थ भी हैं। सभी मनुष्यों को आत्मा विषयक इन्हीं विचारों को स्वीकार करना चाहिये और इसके विरोधी विचारों को स्वीकार नहीं करना चाहिये। आत्मा विषयक इन विचारों को पढ़कर अपने भ्रम को दूर कर दूसरों के भ्रम को भी दूर करना चाहिये। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

सन्ध्या वा ईश्वरोपासना क्यों करें?”


सन्ध्या भली भांति ईश्वर का ध्यान करने को कहते हैं। यही ईश्वर की पूजा कहलाती है। इससे भिन्न प्रकार से यदि ईश्वर की पूजा आदि करते हैं तो जो लाभ ईश्वर के सत्य स्वरूप का ध्यान व चिन्तन करने से मिलता है वह अन्य प्रकार से या तो मिलता नहीं या बहुत कम मिलता है। ज्ञानी व विज्ञान कर्मी जानते हैं कि यदि हम कोई भी काम करें और वह ज्ञान विज्ञान के अनुकूल न हो तो सफलता नहीं मिलती। इसी प्रकार से यदि हम ईश्वर की पूजा, ध्यान व उपासना आदि करते हैं तो हमें उसकी विधि के ज्ञान के अनुरूप होने पर पहले विचार कर लेना चाहिये। ईश्वर का ध्यान व सन्ध्या करने से पूर्व हमें ईश्वर व आत्मा के विषय में ज्ञान होना चाहिये। ईश्वर क्या है? इस प्रश्न का एक उत्तर यह है कि ईश्वर वह है जिसने इस सारी सृष्टि को बनाया है, जो इसका पालन व संचालन कर रहा है, इसे सृष्टि को धारण करना भी कहते हैं तथा जो इस सृष्टि की अवधि वा आयु पूर्ण होने पर इसकी प्रलय करता है। ईश्वर ने इस सृष्टि, इसके लोक-लोकान्तर ही नहीं बनाये अपितु हमारी पृथिवी पर अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि पदार्थों की उत्पत्ति सहित समस्त अन्न, फल, वनस्पतियों व ओषधियों एवं गाय आदि प्राणियों को भी उसी ने बनाया है। ईश्वर का सत्य स्वरूप सृष्टि के आरम्भ में सबसे प्रथम ईश्वर ने ही वेदों के द्वारा प्रकाशित व उद्घाटित किया था। विचार करने पर हम पाते हैं कि यदि ईश्वर वेदों का प्रकाश न करता तो हम ईश्वर, जीवात्मा सहित अन्य पदार्थों का ज्ञान कदापि प्राप्त नहीं कर पाते। इसके अतिरिक्त ईश्वर ने वेदों का प्रकाश कर हमें भाषा प्रदान की व हमें बोलना भी उसी ने सिखाया है। वेदों के आधार पर ईश्वर का जो स्वरूप हमारी दृष्टि में आता है उसका उल्लेख ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय सहित लघु ग्रन्थों स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश, आर्योद्देश्यरत्नमाला एवं आर्यसमाज के दूसरे नियम में भी किया है। समूचे वेद भाष्य में भी हमें ईश्वर के यथार्थ व सत्य स्वरूप के दर्शन होते हैं। हम यहां आर्यसमाज के दूसरे नियम के अनुसार पाठकों के लिए ईश्वर का सत्य स्वरूप, जैसा कि वेदों से प्राप्त होता है, उद्धृत कर रहे हैं। स्वामी दयानन्द जी लिखते हैं कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।ऋषि दयानन्द जी ने इन शब्दों में ईश्वर का सत्यस्वरूप बताकर इसी स्वरूप वाले ईश्वर की उपासना का करना आवश्यक बताया है।


वेद यह भी बताते हैं कि इस सृष्टि की रचना वा उत्पत्ति ईश्वर ने अपने किसी निजी प्रयोजन के लिए नहीं की है अपितु अपनी शाश्वत प्रजा चेतन जीवात्माओं को सुख पहुंचाने के लिए की है। ईश्वर ने हमारे कर्मानुसार हमें मनुष्य बनाया है। हम इस जीवन में जो सुख भोग रहे है, अतीत में भोग चुके हैं व आगे भी भोगेंगे उनका आधार व कारण परम पिता परमेश्वर ही है। इस जन्म से पूर्व भी अनन्त बार हम जन्म लेकर इसी प्रकार से व इससे भी अधिक सुख भोग चुकें हैं और भविष्य में अनन्त काल तक भोगेंगे। इसके बदले में हम ईश्वर को अपनी कोई वस्तु क्या दे सकते हैं? यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह जब किसी भी मनुष्य से उपकृत होता है तो वह उसका धन्यवाद करता है। वह किसी का अहसान लेना नहीं चाहता और यदि लेना पड़ता है तो उसकी कीमत दिया करता है। परमात्मा ने हम पर इतनी कृपा की है कि जितनी अन्य कोई नहीं कर सकता। अतः हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं और सभी को रखना भी चाहिये। कृतज्ञता का भाव रखने से हमारे अहंकार का नाश होता है। यह ज्ञातव्य है कि अहंकारी मनुष्य का नाश उसके अहंकार के कारण ही होता है। अहंकार कोई अच्छा मानवीय गुण नहीं है। इसका सभी को त्याग करना ही चाहिये। अहंकार के विपरीत विनयशीलता का गुण होता है। मनुस्मृति में एक प्रामाणिक बात कही गई है कि अभिवादन-शील मनुष्य जो प्रति दिन व नियमित रूप से ज्ञान व आयु में वृद्ध लोगों की सेवा किया करता है उसकी आयु, विद्या, यश व बल बढ़ता है। मनु जी के यह विचार समाज में प्रत्यक्ष सत्य सिद्ध होते हुए पाये जाते हैं। अतः आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति के लिए मनुष्यों को अहंकार का नाश कर विनयशील स्वभाव को धारण करना चाहिये। हम ईश्वर के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों पर चर्चा कर रहे हैं। परमात्मा ने हमारे लिए सृष्टि बनाई, हमें माता-पिता के द्वारा सुख का सर्वोत्तम साधन यह मनुष्य शरीर दिया, हमारे लिए संसार में भोजन, वस्त्र, आवास आदि के लिए नाना पदार्थ बनाये और उनका उपयोग करने के लिए वेदों के द्वारा हमें शिक्षा दी, अतः हमारा कर्तव्य है कि हम उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हुए उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना किया करें। ऐसा करने से ही हम अपनी हानि से बच सकते हैं और हमें अनेक प्रकार से लाभ पहुंचता है। अतः सभी मनुष्यों को ईश्वर की उपासना वा संन्ध्या आदि कर्म यथासमय अर्थात् प्रातः व सायं की संन्ध्या वेला में अवश्यमेव करने चाहिये।

सन्ध्या कैसे करें? इसके लिए हमें वेद वा वेदानुकुल ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव को बताने वाले ऋषि व आप्त पुरूषों के ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। वैदिक विद्वानों द्वारा लिखे गये ईश्वर विषयक ग्रन्थों का अध्ययन करने पर भी हमारी आत्मा ईश्वर के गुणों को अपनी आत्मा से ग्रहण करती है। हम जब ईश्वर के सत्य गुण-कर्म-स्वभाव को बताने वाले ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो हमारी आत्मा उसे पढ़कर व जानकर उसके सत्य होने की पुष्टि करती है। यह ध्यान रहे कि अध्ययन करते हुए हमें अपने विवेक को जाग्रत रखना होता है। किसी भी बात को आंखे बन्द कर स्वीकार नहीं करना चाहिये। बुद्धि से सत्य व असत्य का विवेचन करके ही सत्य को स्वीकार करना चाहिये। ऐसा करने से ही हम सत्य को जान पाते हैं और हमें उसके अनुरूप क्रियायें करने से लाभ होता है। स्वाध्याय के लिए सत्यार्थप्रकाश, आर्याभिविनय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, योगदर्शन, ऋग्वेद ज्योति, यजुर्वेदज्योति, अथर्ववेदज्योति, श्रुति सौरभ आदि ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द व आर्य विद्वानों के वेदभाष्य पठनीय हैं। इन्हें पढ़कर ईश्वर का सत्य स्वरूप ज्ञात हो जाता है, सारी शंकायें व भ्रान्तियां दूर हो जाती है और ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने की प्रेरणा मिलती है।

ईश्वर की उपासना न केवल विद्वानों को ही करनी चाहिये अपितु सभी मनुष्यों को भी करनी चाहिये। ईश्वर की उपासना से ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त होता है। हमारे बुरे गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होता है। ईश्वर ज्ञान स्वरूप व आनन्द स्वरूप है। सन्ध्या व उपासना करने से हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है और दुःख दूर होकर आनन्द की उपलब्धि होती है। इन लाभों को प्राप्त करने के लिए हमें ईश्वर की भक्ति वा सन्ध्या अवश्य करनी चाहिये। सन्ध्या करने से हमें सत्य कर्मों को करने की प्रेरणा मिलने सहित बुरे कर्मों के प्रति अनिच्छा भी उत्पन्न होती है जिससे हमारा यह जीवन व परजन्म भी सुधरता है। ईश्वर की उपासना के लिए ऋषि दयानन्द जी ने सन्ध्यानाम की एक पुस्तक लिखी है। इसे पढ़कर ही सबको सन्ध्या करनी चाहिये। सन्ध्या से पूर्व व सन्ध्या करते हुए सन्ध्या के अर्थों पर भी दृष्टि डालनी चाहिये व उनके अनुसार चिन्तन व ईश्वर का ध्यान करना चाहिये। सन्ध्या का मन्त्र बोलते हुए उसके अर्थों की भावना भी बननी चाहिये। यदि ऐसा नहीं होगा तो सन्ध्या करने में मन नहीं लगेगा व उससे सन्ध्या करने का लाभ नहीं होगा। मन्त्रों के अर्थ जानने से हमें ईश्वर की हमारे ऊपर जो अहेतुकी कृपा अर्थात् हम पर अकारण कृपा हो रही है व ईश्वर से हमें जो सुख प्राप्त हो रहे हैं, उसका ज्ञान होता है। लेख का विस्तार न कर हम सन्ध्या के समर्पण मन्त्र में उपासक द्वारा ईश्वर को सम्बोधित कर कहे गये शब्दों को प्रस्तुत कर रहे हैं। उपासक ईश्वर को कहता है हे परमेश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जप और उपासना आदि कर्मों को करके हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को शीघ्र प्राप्त होंवे।सन्ध्या करने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस कारण भी हम सन्ध्या करते हैं। यह उपलब्धि व प्राप्ति न धन से हो सकती है, न रूतबे से व न अन्य किसी प्रकार से, यह प्राप्ति होती है ईश्वर व आत्मा के यथार्थ ज्ञान, स्वाध्याय व ईश्वर का भली भांति ध्यान करने से। यह भी जान लें कि ईश्वर की उपासना से जो लाभ राजा व बड़े बड़े धनवानों को नहीं होता वह लाभ ईश्वर भक्तों, उपासकों व योगियों को होता है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Wednesday, 2 May 2018

सात्विक अन्न सेवन से क्रियाशील बन सब का पालन करें


हम सदा सात्विक अन्न का सेवन करें । सात्विक अन्न के सेवन से क्रियाशीलता बढती है। क्रियाशील व्यक्ति ही शुभ कर्म कर सकता है। क्रियाशील व्यक्ति ही वह शक्ति रखता है जिससे अपना ही नहीं अन्य लोगों का भी पालन कर सकता है। हम एसा ही बनें, इस बात को ऋग्वेद के प्रथम मण्ड्ल के इस तृतीय सूक्त के प्रथम मन्त्र में इस प्रकार बताया गया है:

अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती ।
पुरुभुजा चनस्यतम ॥ऋग्वेद १.३.१ ॥
१. सात्विक भोजन 
इस मन्त्र में जो प्रथम प्रार्थना की गयी है , अश्विन कुमारों से जो प्रथम चीज मांगी गई है, वह है सात्विक भोजन। सात्विक भोजन की मांग करते हुए प्रार्थना की है कि हे प्राणापाणों! मैं यज्ञशील बनना चाहता हूं, इसलिये आप एसी व्यवस्था करें कि मैं यज्ञशील बनने के लिए सात्विक अन्न खाने की ही इच्छा करुं। सात्विक भोजन एक एसा साधन है, जिससे शरीर के विकार पैदा ही नहीं हो पाते तथा जो पहले से होते हैं, वह भी दूर हो जाते हैं। शारीरिक व्याधियो से बचे हुए हम भली प्रकार से यज्ञ आदि कर्म कर सकते हैं। इस लिए प्रभु हमारे लिए एसा अन्न दो, जो सात्विक हो , हम एसे अन्न का ही सदा सेवन करें। सात्विक अन्न के सेवन से हमारी बुद्धि भी सात्विक होती है ॥ सात्विक बुद्धि ही जीवन को यज्ञमय बनाने का कार्य करती है । इस लिए हम सदा सात्विक भोजन करें।
क्रियाशील हो शुभ कार्य करें 
सात्विक भोजन करने वाले के प्राण - अपान स्वयमेव ही सुरक्षित हाथों में चले जाते हैं । इस मन्त्र में भी यही कामना की गई है कि हे प्रभु! सात्विक भोजन करने से हमारे प्राण तथा अपान सात्विक होने पर हम गतिशील हाथों वाले हों , क्रियाशील हों , कार्यशील हो, अकर्मण्यता से , कार्य से मन चुराने से सदा दूर रहें। इस प्रकार हम जो क्रियाशील बन कर भी एसी क्रिया करें, एसे कार्य करें , जो शुभ हों। हम अपने करों से, अपने हाथों से सदा शुभ कर्म ही करें। इस प्रकार हम शुभ कर्मों के पति , अधिपति, साधक और अधिकारी बनें। हम जो भी कर्म करें, जो भी कार्य करें , जो भी क्रिया करें, उसका परिणाम शुभ ही हो अर्थातˎ हमारी क्रियाशीलता से सदा शुभ ही शुभ प्रकट हो, शुभ ही शुभ दिखाई दे। हम अपनी क्रियाशीलता स्वरुप जो भी कर्म करें, उन कर्मों से कभी भी चपलता या दुष्टता न प्रकट हो , दुष्टता वाले कर्म हम कभी न करें।
शुभ कर्म करते हुए हम अनेक लोगों का, अनेक प्राणियों का पालन करने वाले बनें प्राणियों के सहयोगी बनें , उनके कष्टों में उनके सहायक बनें।
३. शुभ से क्या अभिप्राय है?
शुभ का अभी प्राय है एसे कर्म, जिनसे लोगों को लाभ हो ,लोगों का शुभ हो, अपना ही नहीं अन्य लोगों का भी कल्याण करने वाले हों. सब को सुख देने वाले हों, एसे कर्म जो केवल अपने लिए ही शुभ न करे अपितु अन्य लोगों का भी शुभ करें, अन्य लोगों का भी पालन करें , अन्य लोगों को भी उन्नत करें। अत: एसे कार्य, एसे कर्म , जिन के करने से अपने शुभ के साथ ही साथ अन्य लोगों का भी हित हो, यह ही सत्य है, यह ही शुभ है। अत: हम सदा उत्तम , परहितकारी, सर्वहितकारी कर्म ही करें । इस मन्त्र की यह पंक्ति यह ही आदेश दे रही है।
४. प्राणापान को अश्विना शब्द से स्मरण क्यों किया गया है
प्राणापान को अश्विना शब्द से स्मरण क्यों किया गया है? आओ इस पर भी कुछ विचार करें । अश्विना शब्द नाश्वान के लिए प्रयोग होता है। जहां तक प्राणों का सम्बन्ध है, यह स्थायी नहीं हैं, यह कभी भी तथा कहीं भी रुक सकते
हैं। यह रहेंगे या नहीं इस सम्बन्ध में हमें कुछ भी नहीं पता। यह शरीर इन प्राणॊं के आधार पर क्रिया में रहता है या नहीं, क्रिया कर पाने में सक्षम रहता भी है या नहीं , यह भी हम नहीं जानते। हां! इन प्राणॊं की क्रियाशीलता ही हमें चलाती है, इन की क्रियाशीलता से ही हमें भूख लगती है, इनकी क्रिया शीलता ही हमें संसार में ऊंचा ले जाती है। यह हमारी क्रियाशीलता ही हमारी सब उन्नतियों का आधार है|
इसलिए मन्त्र में कहा गया है कि हे मानव! तूं ने सदा सात्विक अन्न की ही इच्छा करनी है, सात्विक अन्न की ही कामना करनी है, सात्विक अन्न प्राप्ति की ही अभिलाषा करनी है। यह सात्विक अन्न ही तेरा कल्याण करेगा।

डा. अशोक आर्य