Wednesday, 18 January 2017

स्वावलंबी को सर्वत्र प्रतिष्ठा व सम्मान मिलता है

आर्य यह वैदिक ही नहीं सामाजिक नियम है कि जो व्यक्ति स्वावलंबी है , जो व्यक्ति दूसरों पर निर्भर न हो कर अपने सब कार्य,सब व्यवसाय आदि स्वयं करता है, समाज उसे आदर की दृष्टि से देखता है , उसे सम्मान देता है स्वावलंबी व्यक्ति जहाँ भी जाता है , उसका खूब आदर सत्कार होता है. ऐसे व्यक्ति द्वारा अपना कम स्वयं करने से उसका अनुभव दूसरों से अधिक होता है, उसकी कार्यकुशलता भी अन्यों से कहीं अधिक होती है तथा वह जो कार्य करता है , उसे करने में उसकी गति भी तीव्र होती है द्य इस तथ्य को ऋग्वेद में बड़े ही सुन्दर विधि से इस मन्त्र में स्पष्ट किया गया है रू स्वःस्वायधायसेकृणुतामृत्विगृत्विजम्। स्तोमंयज्ञंचादरंवनेमाररिमावयम्॥ ऋ02.5.7 मन्त्र कहता है कि हे मानव ! स्वावलंबन को तुम अपनी पिष्टी के लिए धारण करो हे यज्ञमान ! तुम ऋतु के अनुकूल यज्ञ करो. हमने दान दिया है, अत: हम अधिक प्रशंसा और यज्ञ ( संमान ) को प्राप्त करें. मन्त्र में सर्वप्रथम स्वावलंबन पर बल दिया गया है. आगे बढ़ने से पूर्व स्वावलंबन के सम्बन्ध में जानकारी होना आवश्यक है , इसे जाने बिना हम मन्त्र के भाव को ठीक से नहीं समझ सकते द्य अतरू आओ हम पहले हम स्वावलंबन शब्द को समझें - स्वावलंबन क्या है? - स्वावाकंबन से अभिप्राय स्वत्व की अनुभूति और उसका प्रकाशन से होता है. जब मानव स्व को ही भूल जावे तो उसका अवलंबन भी कैसे करेगा?

एक पौराणिक कथा के अनुसार पवन पुत्र हनुमान को एक शाप के अंतर्गत स्वत्व से उसे भुला दिया गया था , इस कारण अत्यंत शक्तियों का स्वामी होने पर भी हनुमान जी निष्क्रीय से ही रहते थे. वह स्वशक्ति से अनभिज्ञ ही रहते थे. इस कारण सदा भयभीत से, भीरु से होकर भटकते रहते थे द्य जब उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाया गया तो उन्हें पुनरूपता चला कि वह तो शक्ति का भण्डार है , बस फिर क्या था वीरों की भांति उठ खड़े हुए तथा शस्त्र हाथ में लिए, शत्रु के संहार को चल पड़े, जिधर भी निकले, शत्रु को दहलाते चले गए , उनका नाम सुनकर ही शत्रु कांपने लगे. इससे स्पष्ट होता है की जब तक हम स्व को नहीं जानते, तब तक हम कुछ भी नहीं कर पाते इस लिए स्व की जानकारी, स्व का परिचय ,स्व का ज्ञान होना आवश्यक है, किन्तु यह स्व किसे कहते हैं , इसे भी जानना आवश्यक है. स्व का अर्थ है - स्व से भाव होता है आत्मा या जीवात्मा स्व का भाव स्पष्ट होंने से हम स्वालंबन का अर्थ भी सरलता से कर सकते है. स्व के अर्थ को आगे बढ़ाते हुए हम कह सकते हैं कि स्वावलंबन का अर्थ हुआ -- उस आत्मा अथवा जीवात्मा के प्रकाश का आश्रय लेना अथवा उस आतंरिक शक्ति का उपयोग और प्रयोग करना द्य जब कोई व्यक्ति स्व का अवलंबन करता है तो उस में किसी प्रकार की स्वार्थ भावना नहीं रहती द्य सब प्रकार के स्वार्थों से वह ऊपर उठ जाता है द्यवह अपने पण को स्वाहा कर देता है , इदं न मम आर्थात यह मेरा नहीं है, की भावना उसमें बलवती होती है द्य इससे स्पस्ट होता है कि आत्मिक शक्ति का अवलंबन ही स्वावलंबन होने से वेद में स्वाहा और सवधा शब्दों का अत्यधिक व सम्मान से प्रयोग होता है द्य यग्य में हम जो भी पदार्थ डालते हैं यग्य अग्नि उसे अपने पास न रख कर सूक्षम कर आगे बढा देता है , इसे बढ़ने के पश्चात आगे बांटने के इए वायु मंडल को दे देता है द्य जब मानव अपने जीवन को यग्य मय बना लेता है तो वह भी दो हाथों से कमाता है तथा हजारों हाथों से बांटने लगता है . आप कहेंगे दो हाथों से कमा कर हजारों हाथों से बांटने के लिए तो सामग्री ही उसके पास न रहे गी, इसका अर्थ क्या हुआ ? इसका भाव है कि हे मानव ! तू इतना म्हणत कर , तू इतना पुरुषार्थ कर, इतना यत्न कर कि जो तू ने कमाया है वह तेरी शक्ति से कहीं अधिक होगा क्योंकि तुने आकूत प्रयत्न किया है , इससे तेरे पास इतनी सम्पति होगी कि जो हजारों हाथों से भी बांटने पर भी समाप्त न होगी अपितु निरंतर बढती ही चली जावेगी. यह ही मानव की यज्ञ रूपता है

 इदं न ममष् का अर्थ - जब हम स्वाहा शब्द का प्रयोग करते हैं तो साथ ही बोलते हैं इदं न ममष्. अर्थात जो कुछ मैंने यग्य, में डाला है उसमें मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ समाज का दिया हुआ होने के कारण उस समाज का ही है , इस त्याग बुद्धि की उत्पत्ति ही स्वाहा - बुद्धि है. इस शब्द के प्रयोग से हम में नम्रता आ जाती है, सेवा का भाव जागृत होता है, साथ ही यह भी हम जान जाते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह हमारा नहीं है, हम तो मात्र रक्षक हैं , तो किसी को कुछ भी देते समय हमें कष्ट के स्थान पर गर्व होगा स्वधा स भाव - एक और तो स्वार्थ भाव को छोड़ना है तो दूसरी ओर स्वधा शब्द दिया गया है द्यजिसका भाव है -- स्व - आत्मप्रकाश , मनोबल, आत्मिक बल को, ढ - धारण करना द्य तुच्छ स्वार्थ - बुद्धि को छोड़ना चाहिए ओर अपने अन्दर स्वधा या आत्मिक बल को धारण करना चाहिए द्य यही स्वाहा ओर स्वधा का वास्तविक अर्थ है द्य अतएव मन्त्र में कहा गया है कि स्व अर्था. अतएव आत्मा के ज्ञान के लिए स्वधा ( आत्मिक बल ) को प्राप्त करो द्य इससे स्पस्ट होता है कि स्वधा का अर्थ है आत्मिक बल द्य यह आत्म बल ही है जो मानव में नवशक्ति का संचार करता है , यह आत्मिक बल ही है , जिससे मानव बड़े महान एवं दुर्घर्ष कार्य करने में भी सफल हो जाता है , इसके बिना मानव कुछ भी नहीं कर सकता, वह अधूरा होता है . अतरू आत्मबल अर्थात स्वधा के द्वारा ही मानव में यज्ञीय भावना आती है,परोपकार की अग्नि उसमें प्रदीप्त होती है , दान देने में प्रवृति होती है ओर दूसरों के सहयोग की भावना जागृत होती है द्य इससे उसे यश मिलता है , उसे कीर्ति मिलती है तथा सर्वत्र उसका गुणगान होता है डॉ.अशोक आर्य 

Friday, 6 January 2017

विश्व पुस्तक मेले में आर्य समाज क्यों?

कई रोज पहले की बात है दो लड़कियां ऑटो में जा थी जो आपस में चर्च और ईसाइयत की महानता का बखान कर रही थी. मैंने स्वभाव वश पूछ लिया, बहन आप इसाई हो? उन्होंने कहा नहीं! तो फिर अपने धर्म को भी जानों पढो, संसार में इससे महान कोई सभ्यता और धर्म नहीं है. उनमें से एक बोली कौन से धर्म की बात कर रहे हो भईया, आसाराम वाला, राधे माँ वाला, संत रामपाल या नित्यानद वाला? यह प्रश्न शूल की तरह मेरे ह्रदय में चुभा. हालाँकि आर्य युवक अपने तर्कों से अपनी क्षमता का परिचय देने में समर्थ हैं. पर गलती उन भोली-भाली लड़कियों की नहीं थी. गलती हमारी है क्योंकि बच्चों को जो दिया जाता है वो वही वापस मिलता है. जब हम बच्चों को कीर्तन जागरण पर नाच कूद और तथाकथित ढोंगी बाबाओं के पाखंड देंगे तो बदले में हमें यही जवाब मिलेंगे. वो समझेंगे शायद यही धर्म है. क्योंकि हमेशा से समाज में धर्म जीवन के हर पहलु को प्रभावित करता आया है जब तक हम बच्चों को वैदिक सभ्यता का वातावरण नहीं देंगे कुछ ऐसा नहीं देंगे कि उनमें संस्कार पनपे तब तक बच्चें माता-पिता का तिरस्कार करेंगे. चर्च की महानता का जिक्र करेंगे, कुरान का पाठ करेंगे, धर्मांतरण करेंगे. यदि आज आधुनिक शिक्षा के साथ वैदिक संस्कार मिले तो में दावे के साथ कह सकता हूँ आज भी राम, दशरत के कहने पर महल त्याग देगा. वरना तो वर्द्ध आश्रम के द्वार दशरत का स्वागत करेंगे...

आज सवाल यह है कि क्या सबके पास आर्ष साहित्य है? वर्तमान की चकाचोंध दिखाकर नई पीढ़ी को भ्रष्ट होने से बचाने के लिए क्या सबके पास तर्कों की कसोटी पर खरी उतरने वाली विश्व की एक मात्र पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश है? आखिर हम इन छोटी-छोटी अल्प मूल्य की पुस्तकें भी अपने घर क्यों नहीं रख पाए? क्या अगली पीढ़ी को संस्कारवान बनाने का कार्य हमारा नहीं है? अपनी बेटी-बेटे उनके कोमल मन पर हम वैदिक सभ्यता की छाप छोड़ने में पीछे क्यों? में उन्हें साधू संत बनाने की नहीं कह रहा बस इतना कि आपकी सेवा करे और आगे एक बेहतर समाज खड़ा करे. कुछ दिन पहले की बात है मेट्रो के अन्दर मैंने एक बुजुर्ग को कहते सुना कि आजकल के बच्चें मेट्रो के अन्दर दिए जाने वाले दिशा निर्देश का सही से पालन नहीं करते. फिर वो खुद ही बोल उठा, जो माँ-बाप की नहीं सुनते वो मेट्रो अनाउंसर की कैसे सुनेगे? यह वह दुःख है जो आज हर माँ-बाप किसी न किसी रूप में अपने अन्तस् में महसूस कर रहा है.

ऐसा नहीं है सब लोग धर्म से विमुख है बस यह सोचते है क्या होगा वेद पढने से क्या हासिल होगा सत्यार्थ प्रकाश पढने से! ये सब पुरानी बातें है आज आधुनिक जमाना है ये सब चीजें कोई मायने नहीं रखती आदि –आदि सवालों से अपने मन को बहला लेते है. पर जब हम जरा सा भी दुखी होते है तब सबसे पहले ईश्वर याद आता है. अच्छा आज अपनी आत्मा से एक छोटे से सवाल का जवाब देना बिलकुल निष्पक्ष होकर और यह सवाल किसी एक से नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति से है, क्या अपने अस्तित्व का बोद्ध करना पाप है? क्या सत्य- असत्य को जानना न्याय-अन्याय को जानना तर्क संगत ठहराना अनुचित है? आखिर हमारा जन्म क्यों हुआ? दो जून का भोजन सैर सपाटा तो जानवर भी कर लेते है. या फिर सिर्फ इसलिए की हम बस मोबाईल पर गेम खेले या अपने घर परिवार तक सिमित रहे? जिस महान सभ्यता में वेदों की भूमि में हमारा जन्म हुआ क्या हम पर उत्तरदायित्व नहीं है कि इसका स्वरूप बिना बिगाड़े हम अगली पीढ़ी के हाथ में सोपने का कार्य करे?

अक्सर बातों-बातों यह सुना जाता है कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा न बच्चों में संस्कार बचे न मर्यादा. पर कभी किसी ने सोचा है इसके जिम्मेदार कौन है जरा सोचिये जब हमे जमाना और संस्कार ठीक मिला था जिसका हम अक्सर जिक्र करते है तो उसका वर्तमान में स्वरूप क्यों बिगड़ा? में समझता हूँ कौन है उसका दोषी? दो चार घंटे कीर्तन-जागरण कर या गाड़ी में दो भजन चला लेना धर्म है? नहीं वो मनोरंजन हो सकता है लेकिन धर्म नहीं!! प्रत्येक परिवार जिसमें 4 लोग है ओसतन हर महीने 500 सौ या 700 रूपये का इन्टनेट डाटा इस्तेमाल कर लेते है. में यह नही कह रहा वो क्यों करते है यह सब आज जीवन का हिस्सा बन चूका है. लेकिन जब अपने ग्रंथो का मामला आता है तो हम बचत करते दिख जाते है. ऐसा क्यों? जबकि सब जानते है की इंटरनेट का प्रयोग एक बार बच्चे की मानसिकता धूमिल कर सकता है किन्तु हमारा वैदिक साहित्य जिसमें एक बार किया निवेश उसे कभी पतन की और नहीं जाने देगा. वरन  पीढ़ियों तक उसे बचत खाते की तरह परिवार को ब्याज में संस्कार देता रहेगा. यदि वो 10 मिनट भी अपने ग्रंथो वेद उपनिषद में देगा तो उसके संस्कार जाग उठेंगे.

आर्य समाज की किसी धर्म-मत से लड़ाई नहीं है बस यह तो हजारों साल के पाखंड, कुरीतियों और कुप्रथाओं से लड़ रहा है, जिसमें यह रक्त रंजित भी हुआ कभी स्वामी दयानन्द के रूप में, कभी श्रद्धानन्द जी रूप में, कभी पंडित लेखराम के रूप में. अब आर्य समाज पुनः अंगड़ाई ले चुका है, एक बार आना 2017 के विश्व पुस्तक मेले में देखना सभी धर्मों ,पंथों और मत-मतान्तरों के विभिन्न स्टाल लगे मिलेंगे. इसाई समाज बाइबिल को लेकर इस्लामिक समाज कुरान के प्रचार में कोई आसाराम को निर्दोष बताता मिलेगा तो कोई राधे माँ का गुणगान करता दिख जायेगा. ओशो का अश्लील साहित्य बिकता मिलेगा. हिंदी साहित्य हाल में केवल और केवल आर्यसमाज ही राष्ट्रवादी, समाज सुधारक, नवचेतना, सदाचारी, पाखंडों से मुक्ति दिलाने वाला, विधर्मियों के जाल से बचाने वाला साहित्य वितरित करता दिखेगा.


हर वर्ष देश विदेश से हजारों की संख्या में प्रकाशन धार्मिक संस्था पुस्तकों के माध्यम से अपनी संस्कृति का प्रचार करने यहाँ आते है, निशुल्क कुरान और बाइबिल यह बांटी जाती है. चुपचाप धर्मांतरण के जाल यहाँ बिछाये जाते है. हमारी संस्कृति पर हमला किया जाता है उस समय जब लोग धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हमारे वैदिक धर्म को नीचा दिखाने की नाकाम कोशिश करते है तब आर्य समाज क्या करे? उस समय जिस हिन्दू के हाथ में सत्यार्थ प्रकाश होता है वो ही विजयी होता है. जिसके पास नहीं होता वो हार जाता है. अब तो सब समझ गये होंगे कि आर्य समाज का पुस्तक मेले में जाना कोई व्यापारिक प्रयोजन नहीं है बल्कि अपनी महान वैदिक सभ्यता का पहरेदार बनकर जाता है. 50 रूपये की कीमत का सत्यार्थ प्रकाश दानी महानुभाओं के सहयोग से 10 रूपये में उपलब्ध कार्य जाता है. गत वर्ष  हिंदी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश ने समूचे मेले में सभी भाषाओं में विक्री होने वाली किसी एक पुस्तक की सर्वाधिक विक्री का रिकॉर्ड स्थापित किया था. उर्दू, अंग्रेजी वा अन्य भाषाओं में सत्यार्थ प्रकाश की विक्री इसके अतिरिक्त रही और विशेष बात यह है कि सत्यार्थ प्रकाश की यह प्रतियां मुस्लिम सहित मुख्यतः गैर आर्य समाजियों के घरों में गई. इस बार फिर आप सभी से निवेदन है आपको आमन्त्रण है आओ आर्य समाज के साथ इस राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में अपने कीमती समय की आहुति देवें...राजीव चौधरी 

Tuesday, 3 January 2017

हमारे प्राचीन ग्रंथों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए: इसरो चीफ

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख ए. एस. किरण कुमार ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिहाज से प्राचीन भारतीय ग्रंथों की सराहना की है। उन्होंने देश के गौरव के उसके गरिमामयी इतिहास से जुड़े होने पर जोर देते हुए कहा कि प्राचीन ग्रंथों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

कुमार ने कहा कि जिस विज्ञान को आज जाना जाता है वह तुलनात्मक रुप से आधुनिक मूल का है, लेकिन यह जिस परंपरा से निकला है वह मौजूदा इतिहास से कहीं पहले का है। उन्होंने कहा, 'यह कई सदियों में विकसित हुआ है और इसकी व्याख्या सुपरिचित और सुपरिभाषित कदमों के संदर्भ में की जाती है।'
मनिपाल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पहुंचे इसरो प्रमुख ने कहा, 'जीवन और अस्तित्व के मूलभूत मुद्दों का निदान करने वाले व्यापक तौर पर स्वीकार्य वैज्ञानिक सिद्धांत, खोज और अविष्कार आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्याओं के आधार बनते हैं। वैदिक और आधुनिक यूनानी लेखनी प्राचीन ज्ञान के सार हैं। उपनिषद, भगवद्गीता, ब्राह्मण सूत्र, श्रीमद्भागवत और महाभारत प्राचीन ज्ञान का स्रोत हैं।'
उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल प्राइज विजेता और चीनी वैज्ञानिक तु-यूयू का हवाला देते हुए कहा कि ऐंटी मलेरियल ड्रग विकसित करने में मिली असाधारण सफलता के लिए 1500 साल पुराने चीनी लेखों से ही उन्हें मदद मिली थी। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि करीब 18,000 पुराने लेखों के अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न तरह के दर्द जिसमें कि माइग्रेन और असह्नीय पीठ दर्द भी शामिल है, उसके इलाज में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति की तुलना में ऐक्यूपंक्चर कहीं ज्यादा कारगर है।

इसी तरह उन्होंने भारतीय ध्यान और योग पद्धति की भी सराहना करते हुए कहा कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में यह निकल कर आया है कि ध्यान-योग पद्धति किस तरह से हमारे जीन्स को प्रभावित करती है, जिससे हमें तनाव को कम करने और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है।

उन्होंने कहा कि हमें अपने प्राचीन ग्रंथों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अगर हमने इन्हें सत्यापित किया, इनका व्यापक अध्ययन किया और सही ढंग से शोध किया गया तो इनसे महत्वपूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

Tuesday, 27 December 2016

प्रभु के दरबार में सब प्रार्थनायें स्वीकार होती हैं

प्रभु सर्वशक्तिशाली है तथा हम सब का पालक है । वह हमारी सब प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है । यह सब जानकारी इस मन्त्र के स्वाध्याय से मिलती है , जो इस प्रकार है रू-
             वृषायूथेववंसगःकृष्टीरियर्त्योजसा।
             ईशानोअप्रतिष्कुतः॥ ऋ01.7.8 
     इस मन्त्र में चार बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है ।
१. प्रभु प्रजाओं को सुख देता है :-
परम पिता परमात्मा सर्व शक्तिशाली है। उसकी अपार शक्ति है। संसार की सब शक्तियों का स्रोत वह प्रभु ही है। इस से ही प्रमाणित होता है कि प्रभु अत्यधिक शक्तिशाली है। अपरीमित शक्ति से परिपूर्ण होने के कारण ही वह सब को शक्ति देने का कार्य करता है। जब स्वयं के पास शक्ति न हो, धन न हो, वह किसी अन्य को कैसे शक्ति देगा, कैसे दान देगा। किसी अन्य को कुछ देने से पहले दाता के पास वह सामग्री होना आवश्यक है, जो वह दान करना चाहता हो। इस कारण ही प्रभु सर्व शक्तिशाली हैं तथा अपने दान से सब पर सुखों की वर्षा करते हैं।

२. प्रभु सब को सुपथ पर ले जाते हैं -
परम पिता परमात्मा हम सब को सुपथ पर चलाते हैं, जिस प्रकार गाडी के कोचवान के इशारे मात्र से, संकेत मात्र से गाडी के घोडे चलते हैं,गति पकडते हैं, उस प्रकार ही हम प्रभु के आज्ञा में रहते हुए, उस के संकेत पर ही सब कार्य करते हैं। हम, जब भी कोई कार्य करते हैं तो हमारे अन्दर बैठा हुआ वह पिता हमें संकेत देता है कि इस कार्य का प्रतिफल क्या होगा?, यह हमारे लिए करणीय है या नहीं। जब हम इस संकेत को समझ कर इसे करते हैं तो निश्चय ही हमारे कार्य फलीभूत होते हैं। वेद के इस संन्देश को ही बाइबल ने ग्रहण करते हुए इसे बाइबल का अंग बना लिया। बाइबल में भी यह संकेत किया गया  है कि भेडों के झुण्ड को सुन्दर गति वाला गडरिया प्राप्त होता है, उनका संचालन करता है , उन्हें चलाता है। भेड के लिए तो यह प्रसिद्ध है कि यह एक चाल का अनुवर्तत्व करती हैं। एक के ही पीछे चलती हैं। यदि उस का गडरिया तीव्रगामी न होगा तो भेडों की चाल भी धीमी पड जावेगी तथा गडरिया तेज गति से चलने वाला होगा तो यह भेडें उस की गति के साथ मिलने का यत्न करते हुए अपनी गती को भी तेज कर लेंगी। बाइबल ने प्रजाओं को भेड तथा प्रभु को चरवाहा शब्द दिया है, जो वेद में प्रजाओं तथा प्रभु का ही सूचक है।

३. प्रभु से औज मिलता है :-
परम, पिता परमात्मा ओज अर्थात शक्ति देने वाले हैं। जो लोग कृषि अथवा उत्पादन के कार्यों में लगे होते हैं, उन्हें शक्ति की, उन्हें ओज की आवश्यकता होती है। यदि उनकी शक्ति का केवल ह्रास होता रहे तो भविष्य में वह बेकार हो जाते हैं, ओर काम नहीं कर सकते। शिथिल होने पर जब प्रजाएं कर्म - हीन हो जाती हैं तो उत्पादन में बाधा आती है। जब कुछ पैदा ही नहीं होगा तो हम अपना भरण-पोषण कैसे करेंगे? इस लिए वह पिता उन लोगों की शक्ति की रक्षा करते हुए, उन्हें पहले से भी अधिक शक्तिशाली तथा ओज से भर देते हैं ताकि वह निरन्तर कार्य करता रहे। इस लिए ही मन्त्र कह रहा है कि जब हम प्रभु का सान्निध्य पा लेते हैं, प्रभु का आशीर्वाद पा लेते हैं, प्रभु की निकटता पा लेते हैं तो हम ( जीव ) ओजस्वी बन जाते है ।
४. प्रभु सबकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं:- परमपिता परमात्मा को मन्त्र में इशान कहा गया है। इशान होने के कारण वह प्रभु सब प्रकार के ऐश्वर्यों के अधिष्ठाता हैं, मालिक हैं, संचालक हैं। प्रभु कभी प्रतिशब्द नहीं करते, इन्कार नहीं करते, अपने भक्त से कभी मुंह नहीं फेरते। न करना, इन्कार करना तो मानो उन के बस में ही नहीं है। उन का कार्य देना ही है। इस कारण वह सबसे बडे दाता हैं। वह सब से बडे दाता इस कारण ही हैं क्योंकि जो भी उन की शरण में आता है, कुछ मांगता है तो वह द्वार पर आए अपने शरणागत को कभी भी इन्कार नहीं करते,निराश नहीं करते। खाली हाथ द्वार से नहीं लौटाते। इस कारण हम कभी सोच भी नहीं सकते कि उस पिता के दरबार में जा कर हम कभी खाली हाथ लौट आवेंगे, हमारी प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी। निश्चित रुप से प्रभु के द्वार से हम झोली भर कर ही लौटेंगे। डा. अशोक आर्य


Sunday, 25 December 2016

प्रभु के अनन्त दान

परमपिता परमात्मा अनेक प्रकार के असीमित दान करने वाला है । जीव इन दानों का पूरी तरह से प्रयोग नहीं कर सकता ।सम्भव ही नहीं है क्योंकि जीव की सीमित शक्ति इन सब का प्रयोग कर ही नहीं सकती । इस पर ही इस मन्त्र में प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया गया है कि रू- तुञ्जेतुञ्जेयउत्तरेस्तोमाइन्द्रस्यवज्रिणः। नविन्धेअस्यसुष्टुतिम्॥ ऋ01.7.7 इस मन्त्र में दो बातों पर परम पिता परमात्मा ने बल दिया है । रू- १. प्रभु की स्तुति कभी पूर्ण नहीं होती रू- इस सूक्त के छटे मन्त्र में यह बताया गया था कि प्रभु सत्रावदन है अर्थात इस जगत में , इस संसार में जितनी भी वस्तुएं हमें दिखाई देती हैं , उन सब के दाता , उन सब के देने वाले वह प्रभु ही हैं । हमारे अन्दर जो ज्ञान है , हमारे शरीर के अन्दर विराजमान हमारे शत्रु , जो काम , क्रोध, मद , लोभ, अहंकार आदि के नाम से जाने जाते हैं , यह सब हमारे गुणों को , हमारी अचˎछाईयों को, हमारे ज्ञान को ढक देते हैं । इस का भाव यह है कि हमारी जितनी भी अच्छी बातें हैं , हमारे जितने भी अच्छे आचरण हैं , हमारे जितने भी उतम गुण हैं , हमारे जितने भी अच्छे विचार हैं , उन सब को, हमारे अन्दर के निवास करने वाले यह शत्रु प्रकट नहीं होनें देते , उन्हें रोक लेते हैं , ढक देते हैं।

इन गुणों को यह शत्रु प्रकाशित नहीं होने देते । इस कारण हमें तथा हमारे आस पास के लोगों को , जीवों को हमारे गुणों का पता ही नहीं चल पाता । इस कारण इन गुणों का लाभ नहीं उठाया जा सकता , इन गुणों का सदुपयोग नहीं किया जा सकता । यह शत्रु हमारे गुणों पर सदा प्रहार करते रहते हैं , आक्रमण करते रहते हैं, इन गुणों को कभी प्रकट ही नहीं होने देते । इन को सदा आवरण में रखने का प्रयास करते हैं ताकि प्रभु द्वारा जीव मात्र के कल्याण के लिए दिए गये यह अनुदान किसी को दिखाई ही न दें , जीव इन का लाभ ही न उठा सके , जीव इन का सदुपयोग ही न कर सके । यह अनुदान इन शत्रुओं पर वज्र का प्रहार करने वाले होते हैं , इन्हें नष्ट करने वाले होते हैं किन्तु हमारे अन्दर निवास कर रहे यह शत्रु इन अनुदानों को हमारे तक पहुंचने से रोकने में ही सदा सक्रिय रहते हैं । परम पिता परमात्मा परमैश्वर्यशाली, परम शक्तिशाली है । उस पिता के पास सब प्रकार की धन सम्पदा है । वह इस जगत की सब सम्पदा का स्वामी है । वह ही इन शत्रुओं का विनाश करने में सशक्त होते हैं तथा इन शत्रुओं का विनाश करने के लिए जीव के सहायक होते हैं । इस लिए हम उस पिता की स्तुति करते हैं।

हम उस परमात्मा की स्तुति तो करते हैं किन्तु हमारे अन्दर एसी शक्तियां भी नहीं है कि हम कभी प्रभु की स्तुति को पूर्ण कर सकें । हम प्रभु की स्तुति तो करते हैं किन्तु कभी भी उसकी उतम स्तुति को प्राप्त ही नहीं कर पाते क्योंकि प्रभु की स्तुति का कभी अन्त तो होता ही नहीं । हम चाहे कितने ही उत्कृष्ट स्तोमों से उसे स्मरण करें , चाहे कितने ही उतम भजनों से उस की वन्दना करें , चाहे कितने ही उतम गीत , उतम प्रार्थानाएं उसकी स्तुति में प्रस्तुत करें , तब भी उस पिता की स्तुति पूर्ण नहीं हो पाती , यह सब गीत , सब प्रार्थानाएं, सब भजन उस प्रभु की स्तुति की पूर्णता तक नहीं ले जा पाते । इस सब का भाव यह है कि जीव कभी भी प्रभु की प्रार्थाना को पूर्ण नहीं कर पाता । उसे जीवन पर्यन्त उसकी प्रार्थना करनी होती है । उस की प्रार्थना में निरन्तरता , अनवर्तता बनी रहती है। यह उस की प्रार्थानाओं की श्रृंखला का एक भाग मात्र ही होती है । आज की प्रार्थना के पश्चात अगली प्रार्थना की त्यारी आरम्भ हो जाती है । इस प्रकार जब तक जीवन है , हम उसकी प्रार्थना करते रहते हैं , इस का कभी अन्त नहीं आता । इस मन्त्र में प्रथमतया इस बात पर ही प्रकाश डाला गया है । २. हम उस दाता की स्तुति करते हुए हार जाते हैं रू- हमारे परम पिता परमात्मा एक महान दाता हैं । वह निरन्तर हमें कुछ न कुछ देते ही रहते हैं । वह दाता होने के कारण केवल देने वाले हैं । वह सदा देते ही देते हैं ,बदले में कुछ भी नहीं मांगते।

जीव स्वार्थी है अथवा याचक है, भिखारी है । यह सदा लेने ही लेने का कार्य करता है । प्रभु से सदा कुछ न कुछ मांगता ही रहता है । कभी कुछ देने की नहीं सोचता जब कि प्रभु केवल देते ही देते हैं , कभी कुछ मांगते नहीं। इतना ही नहीं प्रभु देते हुए कभी थकते ही नहीं । प्रभु संसार के , इस जगत के प्रत्येक प्राणी के दाता हैं , प्रत्येक प्राणी को कुछ न कुछ देते ही रहते हैं । इस जगत के अपार जन समूह व अन्य सब प्रकार के जीवों को देते हुए भी उनका हाथ कभी थकता नहीं । दिन रात परोपकार करते हुए जीवों को दान बांटते हुए भी उन्हें कभी थकान अनुभव नहीं होती जबकि जीव ने देना तो क्या लेते लेते भी थक जाता है । प्रभु एक महान दाता है । जीव इस दान को ग्रहण करने वाला है । प्रभु के पास अपार सम्पदा है , जिसे वह दान के द्वारा सदा बांटता रहता है , जीव दान लेने वाला है किन्तु यह दान लेते हुए भी थक जाता है । इससे स्पष्ट होता है कि जीव की स्तुति का कभी अन्त नही होता । प्रभु से वह सदा कुछ न कुछ मांगता ही रहता है । हमारी मांग का , हमारी प्रार्थना का , हमारी स्तुति का कभी अन्त नहीं होता । इस कारण यह कभी भी नहीं हो सकता कि मैं ( जीव ) प्रभु के दानों की कभी पूर्ण रुप से स्तुति कर सकूं । परमात्मा देते देते कभी हारते नहीं , कभी थकते नहीं किन्तु मैं स्तुति करते हुए , यह सब प्राप्त करते हुए भी थक जाता हूं ।
डा. अशोक आर्य १०४ शिप्रा अपार्टमेन्ट ,कौशाम्बी २०१०१० गाजियाबाद ( उ.प्र.) चलभाष , ०९७१८५२८०६८

Tuesday, 13 December 2016

World Book Fair 2017

जैसा की आप सभी जानते है हर वर्ष की भांति राजधानी दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला 2017 इस बार 7 जनवरी से 15 जनवरी 2017 तक लगने वाला है. नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस पुस्तक मेले आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा एक बार फिर  वेद, उपनिषद, सत्यार्थ प्रकाश आदि वैदिक साहित्य लेकर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है,  सौजन्य से आर्य समाज, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

राख से बनी आग स्वामी श्रद्धानन्द

अपना धन अपनी सम्पत्ति यहाँ तक की अपनी संतान को भी को राष्ट्र के लिए दान करने वाले इस वीर सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद जी से भला कौन परिचित नहीं होगा! यदि कोई नहीं है तो उसे सुन लेना होगा क्योंकि इतिहास में ऐसे उदहारण विरले ही कभी पैदा होते है. जब हजारों सालों की गुलामी में लिपटा भारत इस गुलामी को अपना भाग्य समझने लगा था. जब भारतीयों की चेतना भी गुलामी की जंजीर में इस तरह जकड दी गयी थी कि लोग आजादी के सूरज की बात करना भी किसी चमत्कार की तरह मानते थे. ऐसे समय में इस भारत में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की अगुवाई में धर्म और देश बचाने को एक आन्दोलन खड़ा हुआ जिसे लोगों ने आर्य समाज के नाम से जाना. इसी आन्दोलन के सिपाही भारत माँ के एक लाल का नाम था स्वामी स्वामी श्रदानंद जिसने स्वामी दयानन्द जी महाराज से प्रेरणा लेकर आजादी की मशाल लेकर चल निकला गुलामी के घनघोर अँधेरे में आजादी का पथ खोजने. तब गाँधी जी ने कहा था की आर्यसमाज हिमालय से टकरा रहा हैं. वो हिमालय था कई हजार साल का पाखंड और हजारों साल की गुलामी. लेकिन चट्टानों से ज्यादा आर्य समाज के होसले कहीं ज्यादा ज्यादा बुलंद निकले.

सन 1856 को पंजाब के जालंधर जिले के तलवन गाँव में जन्मे मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) के निराशापूर्ण जीवन में आशा की क्षीण प्रकार रेखा उस समय उदय हुई, जब बरेली में उन्हें स्वामी दयानन्द का सत्संग मिला. स्वामी जी के गरिमामय चरित्र ने उन्हें प्रभावित किया. उस समय जहाँ भारतवर्ष के अधिकतर नवयुवक सिवाय खाने-पीने, भोगने और उसके लिए धनसंचय करने के अलावा अपना कुछ और कर्तव्य ना समझते थे गुलामी में जन्म लेते थे और उस दासता की अवस्था को अपना भाग्य समझकर गंदगी के कीड़ों की तरह उसी में मस्त रहते थे उस समय आर्यावर्त की प्राचीन संस्कृति का सजीव चित्र खींचकर न केवल आर्यसंतान के अन्दर ही आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया अपितु यूरोपियन विद्वानों को भी उनकी कल्पनाओं की असारता दिखाकर चक्कर में डाल दिया. जिस समय लोग राजनैतिक और धार्मिक दासता का शिकार थे. जिस समय लोग दुर्व्यसनो में लीन थे उस समय स्वामी श्रद्धानन्द जी ने लोगों को आत्मचिंतन, राष्ट्रचिन्तन करना सिखाया. स्वामी जी के एक-एक कथन क्रांतिकारियों के लिए गीता बनते चले गये.

देश को राजनेतिक परतंत्रता से मुक्त कर स्वामी जी का उद्देश्य धार्मिक था. ताकि हम धार्मिक रूप से भी स्वतंत्र हो, हिन्दू समाज में समानता उनका लक्ष्य था. जातिवाद, छुआछूत को दूर कर शिक्षा एवं नारी जाति में जागरण कर वह एक महान समाज की स्थापना करना चाहते थे. जो की गुलाम भारत में बहुत कठिन काम था. छोटे बड़े छूत-अछूत का भाव लोग वानरी के मृत बच्चे की तरह चिपकाए घूम रहे थे. 11 फरवरी 1923 को भारतीय शुद्धि सभा की  स्थापना करते समय स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा शुद्धि आंदोलन आरम्भ किया गया. स्वामी जी द्वारा इस अवसर पर कहा गया की जिस धार्मिक अधिकार से मुसलमानों को तब्लीग और तंजीम का हक हैं उसी अधिकार से उन्हें अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस अपने घरों में लौटाने का हक हैं. आर्यसमाज ने 1923 के अंत तक 30 हजार मलकानों को शुद्ध कर दिया. लेकिन 23 दिसम्बर 1926 को शुद्धि कार्य से रुष्ट होकर मुसलमानों ने स्वामी श्रदानंद की हत्या कर दी तो गाँधी जी ने हत्यारे अब्दुल रशीद को भी अपना भाई बताया.

आर्यसमाज की ओर से इस सम्बन्ध में पत्र लिखे गए, जिनका वर्णन पंडित अयोध्याय प्रसाद जी बी.ए. द्वारा लिखित इस्लाम कैसे फैलामें किया गया हैं पर गाँधी जी हठ पर अड़े रहे ओर अहिंसा की अपनी परिभाषा बनाते रहे. जबकि सावरकर ने रत्नागिरी के विट्ठल मंदिर में हुई शोक सभा में कहा- पिछले दिन, अब्दुल रशीद नामक एक धर्मांध मुस्लमान ने स्वामी जी के घर जाकर उनकी हत्या कर दी. स्वामी श्रदानंद जी हिन्दू समाज के आधार स्तम्भ थे. उन्होंने सैकड़ों मलकाना राजपूतों को शुद्ध करके पुन: हिन्दू धर्म में लाया था. वे हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे. यदि कोई घमंड में हो के स्वामी जी के जाने से सारा हिन्दुत्व नष्ट होगा, तो उसे मेरी चुनौती हैं. जिस भारत माता ने एक श्रदानंद का निर्माण किया, उसके रक्त की एक बूंद से लाखों तलवारें तथा तोपें हिन्दू धर्म को विचलित कर न सकी, वह एक श्रदानंद की हत्या से नष्ट नहीं होगा बल्कि अधिक पनपेगा.

सन्यासी की हत्या का स्मरण रखोलेख में सावरकर ने लिखा- हिन्दू जाति के पतन से दिन रात तिलमिलाने वाले हे महाभाग सन्यासी. तुम्हारा परमपावन रक्त बहाकर तुमने हम हिंद्युओं को संजीवनी दी हैं. तुम्हारा यह ऋण हिन्दू जाति आमरण न भूल सकेगी. हुतात्मा की राख से अधिक शक्तिशाली इस संसार में अन्य कोई होगा क्या? वही भस्म हे हिंदुयों! फिर से अपने भाल पर लगाकर संगठन ओर शुद्धि का प्रचार ओर प्रसार करो ओर उस वीर सन्यासी की स्मृति ओर प्रेरणा हम सबके हृदयों में निरंतर प्रजल्वित रहे, अपनी संपत्ति अपना परिवार, अपना जीवन और अपना सर्वस समाज के लिए दान करने वाले अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द जी को शत-शत नमन

 राजीव चौधरी