आर्य यह वैदिक ही नहीं सामाजिक नियम है
कि जो व्यक्ति स्वावलंबी है , जो व्यक्ति दूसरों पर निर्भर न हो कर
अपने सब कार्य,सब व्यवसाय आदि स्वयं करता है, समाज
उसे आदर की दृष्टि से देखता है , उसे सम्मान देता है स्वावलंबी व्यक्ति
जहाँ भी जाता है , उसका खूब आदर सत्कार होता है. ऐसे व्यक्ति
द्वारा अपना कम स्वयं करने से उसका अनुभव दूसरों से अधिक होता है, उसकी
कार्यकुशलता भी अन्यों से कहीं अधिक होती है तथा वह जो कार्य करता है , उसे
करने में उसकी गति भी तीव्र होती है द्य इस तथ्य को ऋग्वेद में बड़े ही सुन्दर विधि
से इस मन्त्र में स्पष्ट किया गया है रू स्वःस्वायधायसेकृणुतामृत्विगृत्विजम्।
स्तोमंयज्ञंचादरंवनेमाररिमावयम्॥ ऋ02.5.7 मन्त्र कहता है कि हे मानव ! स्वावलंबन
को तुम अपनी पिष्टी के लिए धारण करो हे यज्ञमान ! तुम ऋतु के अनुकूल यज्ञ करो. हमने
दान दिया है, अत: हम अधिक प्रशंसा और यज्ञ ( संमान ) को
प्राप्त करें. मन्त्र में सर्वप्रथम स्वावलंबन पर बल दिया गया है. आगे बढ़ने से
पूर्व स्वावलंबन के सम्बन्ध में जानकारी होना आवश्यक है , इसे जाने बिना
हम मन्त्र के भाव को ठीक से नहीं समझ सकते द्य अतरू आओ हम पहले हम स्वावलंबन शब्द
को समझें - स्वावलंबन क्या है? - स्वावाकंबन से अभिप्राय स्वत्व की
अनुभूति और उसका प्रकाशन से होता है. जब मानव स्व को ही भूल जावे तो उसका अवलंबन
भी कैसे करेगा?
एक पौराणिक कथा के अनुसार पवन पुत्र हनुमान को
एक शाप के अंतर्गत स्वत्व से उसे भुला दिया गया था , इस कारण अत्यंत
शक्तियों का स्वामी होने पर भी हनुमान जी निष्क्रीय से ही रहते थे. वह स्वशक्ति से
अनभिज्ञ ही रहते थे. इस कारण सदा भयभीत से, भीरु से होकर
भटकते रहते थे द्य जब उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाया गया तो उन्हें
पुनरूपता चला कि वह तो शक्ति का भण्डार है , बस फिर क्या था
वीरों की भांति उठ खड़े हुए तथा शस्त्र हाथ में लिए, शत्रु के संहार
को चल पड़े, जिधर भी निकले, शत्रु को दहलाते
चले गए , उनका नाम सुनकर ही शत्रु कांपने लगे. इससे स्पष्ट होता है की जब तक
हम स्व को नहीं जानते, तब तक हम कुछ भी नहीं कर पाते इस लिए स्व की
जानकारी, स्व का परिचय ,स्व का ज्ञान होना आवश्यक है, किन्तु
यह स्व किसे कहते हैं , इसे भी जानना आवश्यक है. स्व का अर्थ है - स्व
से भाव होता है आत्मा या जीवात्मा स्व का भाव स्पष्ट होंने से हम स्वालंबन का अर्थ
भी सरलता से कर सकते है. स्व के अर्थ को आगे बढ़ाते हुए हम कह सकते हैं कि
स्वावलंबन का अर्थ हुआ -- उस आत्मा अथवा जीवात्मा के प्रकाश का आश्रय लेना अथवा उस
आतंरिक शक्ति का उपयोग और प्रयोग करना द्य जब कोई व्यक्ति स्व का अवलंबन करता है
तो उस में किसी प्रकार की स्वार्थ भावना नहीं रहती द्य सब प्रकार के स्वार्थों से
वह ऊपर उठ जाता है द्यवह अपने पण को स्वाहा कर देता है , इदं न मम आर्थात
यह मेरा नहीं है, की भावना उसमें बलवती होती है द्य इससे स्पस्ट
होता है कि आत्मिक शक्ति का अवलंबन ही स्वावलंबन होने से वेद में स्वाहा और सवधा
शब्दों का अत्यधिक व सम्मान से प्रयोग होता है द्य यग्य में हम जो भी पदार्थ डालते
हैं यग्य अग्नि उसे अपने पास न रख कर सूक्षम कर आगे बढा देता है , इसे
बढ़ने के पश्चात आगे बांटने के इए वायु मंडल को दे देता है द्य जब मानव अपने जीवन
को यग्य मय बना लेता है तो वह भी दो हाथों से कमाता है तथा हजारों हाथों से बांटने
लगता है . आप कहेंगे दो हाथों से कमा कर हजारों हाथों से बांटने के लिए तो सामग्री
ही उसके पास न रहे गी, इसका अर्थ क्या हुआ ? इसका भाव है कि
हे मानव ! तू इतना म्हणत कर , तू इतना पुरुषार्थ कर, इतना
यत्न कर कि जो तू ने कमाया है वह तेरी शक्ति से कहीं अधिक होगा क्योंकि तुने आकूत
प्रयत्न किया है , इससे तेरे पास इतनी सम्पति होगी कि जो हजारों
हाथों से भी बांटने पर भी समाप्त न होगी अपितु निरंतर बढती ही चली जावेगी. यह ही
मानव की यज्ञ रूपता है
इदं न ममष् का अर्थ - जब हम स्वाहा शब्द का प्रयोग करते हैं
तो साथ ही बोलते हैं इदं न ममष्. अर्थात जो कुछ मैंने यग्य, में डाला है
उसमें मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ समाज का दिया हुआ होने के कारण
उस समाज का ही है , इस त्याग बुद्धि की उत्पत्ति ही स्वाहा -
बुद्धि है. इस शब्द के प्रयोग से हम में नम्रता आ जाती है, सेवा का भाव
जागृत होता है, साथ ही यह भी हम जान जाते हैं कि हमारे पास जो
कुछ भी है, वह हमारा नहीं है, हम तो मात्र
रक्षक हैं , तो किसी को कुछ भी देते समय हमें कष्ट के स्थान
पर गर्व होगा स्वधा स भाव - एक और तो स्वार्थ भाव को छोड़ना है तो दूसरी ओर स्वधा
शब्द दिया गया है द्यजिसका भाव है -- स्व - आत्मप्रकाश , मनोबल, आत्मिक
बल को, ढ - धारण करना द्य तुच्छ स्वार्थ - बुद्धि को छोड़ना चाहिए ओर अपने
अन्दर स्वधा या आत्मिक बल को धारण करना चाहिए द्य यही स्वाहा ओर स्वधा का वास्तविक
अर्थ है द्य अतएव मन्त्र में कहा गया है कि स्व अर्था. अतएव आत्मा के ज्ञान के लिए
स्वधा ( आत्मिक बल ) को प्राप्त करो द्य इससे स्पस्ट होता है कि स्वधा का अर्थ है
आत्मिक बल द्य यह आत्म बल ही है जो मानव में नवशक्ति का संचार करता है , यह
आत्मिक बल ही है , जिससे मानव बड़े महान एवं दुर्घर्ष कार्य करने
में भी सफल हो जाता है , इसके बिना मानव कुछ भी नहीं कर सकता,
वह
अधूरा होता है . अतरू आत्मबल अर्थात स्वधा के द्वारा ही मानव में यज्ञीय भावना आती
है,परोपकार की अग्नि उसमें प्रदीप्त होती है , दान देने में
प्रवृति होती है ओर दूसरों के सहयोग की भावना जागृत होती है द्य इससे उसे यश मिलता
है , उसे कीर्ति मिलती है तथा सर्वत्र उसका गुणगान होता है डॉ.अशोक आर्य
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