Tuesday, 27 December 2016

प्रभु के दरबार में सब प्रार्थनायें स्वीकार होती हैं

प्रभु सर्वशक्तिशाली है तथा हम सब का पालक है । वह हमारी सब प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है । यह सब जानकारी इस मन्त्र के स्वाध्याय से मिलती है , जो इस प्रकार है रू-
             वृषायूथेववंसगःकृष्टीरियर्त्योजसा।
             ईशानोअप्रतिष्कुतः॥ ऋ01.7.8 
     इस मन्त्र में चार बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है ।
१. प्रभु प्रजाओं को सुख देता है :-
परम पिता परमात्मा सर्व शक्तिशाली है। उसकी अपार शक्ति है। संसार की सब शक्तियों का स्रोत वह प्रभु ही है। इस से ही प्रमाणित होता है कि प्रभु अत्यधिक शक्तिशाली है। अपरीमित शक्ति से परिपूर्ण होने के कारण ही वह सब को शक्ति देने का कार्य करता है। जब स्वयं के पास शक्ति न हो, धन न हो, वह किसी अन्य को कैसे शक्ति देगा, कैसे दान देगा। किसी अन्य को कुछ देने से पहले दाता के पास वह सामग्री होना आवश्यक है, जो वह दान करना चाहता हो। इस कारण ही प्रभु सर्व शक्तिशाली हैं तथा अपने दान से सब पर सुखों की वर्षा करते हैं।

२. प्रभु सब को सुपथ पर ले जाते हैं -
परम पिता परमात्मा हम सब को सुपथ पर चलाते हैं, जिस प्रकार गाडी के कोचवान के इशारे मात्र से, संकेत मात्र से गाडी के घोडे चलते हैं,गति पकडते हैं, उस प्रकार ही हम प्रभु के आज्ञा में रहते हुए, उस के संकेत पर ही सब कार्य करते हैं। हम, जब भी कोई कार्य करते हैं तो हमारे अन्दर बैठा हुआ वह पिता हमें संकेत देता है कि इस कार्य का प्रतिफल क्या होगा?, यह हमारे लिए करणीय है या नहीं। जब हम इस संकेत को समझ कर इसे करते हैं तो निश्चय ही हमारे कार्य फलीभूत होते हैं। वेद के इस संन्देश को ही बाइबल ने ग्रहण करते हुए इसे बाइबल का अंग बना लिया। बाइबल में भी यह संकेत किया गया  है कि भेडों के झुण्ड को सुन्दर गति वाला गडरिया प्राप्त होता है, उनका संचालन करता है , उन्हें चलाता है। भेड के लिए तो यह प्रसिद्ध है कि यह एक चाल का अनुवर्तत्व करती हैं। एक के ही पीछे चलती हैं। यदि उस का गडरिया तीव्रगामी न होगा तो भेडों की चाल भी धीमी पड जावेगी तथा गडरिया तेज गति से चलने वाला होगा तो यह भेडें उस की गति के साथ मिलने का यत्न करते हुए अपनी गती को भी तेज कर लेंगी। बाइबल ने प्रजाओं को भेड तथा प्रभु को चरवाहा शब्द दिया है, जो वेद में प्रजाओं तथा प्रभु का ही सूचक है।

३. प्रभु से औज मिलता है :-
परम, पिता परमात्मा ओज अर्थात शक्ति देने वाले हैं। जो लोग कृषि अथवा उत्पादन के कार्यों में लगे होते हैं, उन्हें शक्ति की, उन्हें ओज की आवश्यकता होती है। यदि उनकी शक्ति का केवल ह्रास होता रहे तो भविष्य में वह बेकार हो जाते हैं, ओर काम नहीं कर सकते। शिथिल होने पर जब प्रजाएं कर्म - हीन हो जाती हैं तो उत्पादन में बाधा आती है। जब कुछ पैदा ही नहीं होगा तो हम अपना भरण-पोषण कैसे करेंगे? इस लिए वह पिता उन लोगों की शक्ति की रक्षा करते हुए, उन्हें पहले से भी अधिक शक्तिशाली तथा ओज से भर देते हैं ताकि वह निरन्तर कार्य करता रहे। इस लिए ही मन्त्र कह रहा है कि जब हम प्रभु का सान्निध्य पा लेते हैं, प्रभु का आशीर्वाद पा लेते हैं, प्रभु की निकटता पा लेते हैं तो हम ( जीव ) ओजस्वी बन जाते है ।
४. प्रभु सबकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं:- परमपिता परमात्मा को मन्त्र में इशान कहा गया है। इशान होने के कारण वह प्रभु सब प्रकार के ऐश्वर्यों के अधिष्ठाता हैं, मालिक हैं, संचालक हैं। प्रभु कभी प्रतिशब्द नहीं करते, इन्कार नहीं करते, अपने भक्त से कभी मुंह नहीं फेरते। न करना, इन्कार करना तो मानो उन के बस में ही नहीं है। उन का कार्य देना ही है। इस कारण वह सबसे बडे दाता हैं। वह सब से बडे दाता इस कारण ही हैं क्योंकि जो भी उन की शरण में आता है, कुछ मांगता है तो वह द्वार पर आए अपने शरणागत को कभी भी इन्कार नहीं करते,निराश नहीं करते। खाली हाथ द्वार से नहीं लौटाते। इस कारण हम कभी सोच भी नहीं सकते कि उस पिता के दरबार में जा कर हम कभी खाली हाथ लौट आवेंगे, हमारी प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी। निश्चित रुप से प्रभु के द्वार से हम झोली भर कर ही लौटेंगे। डा. अशोक आर्य


Sunday, 25 December 2016

प्रभु के अनन्त दान

परमपिता परमात्मा अनेक प्रकार के असीमित दान करने वाला है । जीव इन दानों का पूरी तरह से प्रयोग नहीं कर सकता ।सम्भव ही नहीं है क्योंकि जीव की सीमित शक्ति इन सब का प्रयोग कर ही नहीं सकती । इस पर ही इस मन्त्र में प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया गया है कि रू- तुञ्जेतुञ्जेयउत्तरेस्तोमाइन्द्रस्यवज्रिणः। नविन्धेअस्यसुष्टुतिम्॥ ऋ01.7.7 इस मन्त्र में दो बातों पर परम पिता परमात्मा ने बल दिया है । रू- १. प्रभु की स्तुति कभी पूर्ण नहीं होती रू- इस सूक्त के छटे मन्त्र में यह बताया गया था कि प्रभु सत्रावदन है अर्थात इस जगत में , इस संसार में जितनी भी वस्तुएं हमें दिखाई देती हैं , उन सब के दाता , उन सब के देने वाले वह प्रभु ही हैं । हमारे अन्दर जो ज्ञान है , हमारे शरीर के अन्दर विराजमान हमारे शत्रु , जो काम , क्रोध, मद , लोभ, अहंकार आदि के नाम से जाने जाते हैं , यह सब हमारे गुणों को , हमारी अचˎछाईयों को, हमारे ज्ञान को ढक देते हैं । इस का भाव यह है कि हमारी जितनी भी अच्छी बातें हैं , हमारे जितने भी अच्छे आचरण हैं , हमारे जितने भी उतम गुण हैं , हमारे जितने भी अच्छे विचार हैं , उन सब को, हमारे अन्दर के निवास करने वाले यह शत्रु प्रकट नहीं होनें देते , उन्हें रोक लेते हैं , ढक देते हैं।

इन गुणों को यह शत्रु प्रकाशित नहीं होने देते । इस कारण हमें तथा हमारे आस पास के लोगों को , जीवों को हमारे गुणों का पता ही नहीं चल पाता । इस कारण इन गुणों का लाभ नहीं उठाया जा सकता , इन गुणों का सदुपयोग नहीं किया जा सकता । यह शत्रु हमारे गुणों पर सदा प्रहार करते रहते हैं , आक्रमण करते रहते हैं, इन गुणों को कभी प्रकट ही नहीं होने देते । इन को सदा आवरण में रखने का प्रयास करते हैं ताकि प्रभु द्वारा जीव मात्र के कल्याण के लिए दिए गये यह अनुदान किसी को दिखाई ही न दें , जीव इन का लाभ ही न उठा सके , जीव इन का सदुपयोग ही न कर सके । यह अनुदान इन शत्रुओं पर वज्र का प्रहार करने वाले होते हैं , इन्हें नष्ट करने वाले होते हैं किन्तु हमारे अन्दर निवास कर रहे यह शत्रु इन अनुदानों को हमारे तक पहुंचने से रोकने में ही सदा सक्रिय रहते हैं । परम पिता परमात्मा परमैश्वर्यशाली, परम शक्तिशाली है । उस पिता के पास सब प्रकार की धन सम्पदा है । वह इस जगत की सब सम्पदा का स्वामी है । वह ही इन शत्रुओं का विनाश करने में सशक्त होते हैं तथा इन शत्रुओं का विनाश करने के लिए जीव के सहायक होते हैं । इस लिए हम उस पिता की स्तुति करते हैं।

हम उस परमात्मा की स्तुति तो करते हैं किन्तु हमारे अन्दर एसी शक्तियां भी नहीं है कि हम कभी प्रभु की स्तुति को पूर्ण कर सकें । हम प्रभु की स्तुति तो करते हैं किन्तु कभी भी उसकी उतम स्तुति को प्राप्त ही नहीं कर पाते क्योंकि प्रभु की स्तुति का कभी अन्त तो होता ही नहीं । हम चाहे कितने ही उत्कृष्ट स्तोमों से उसे स्मरण करें , चाहे कितने ही उतम भजनों से उस की वन्दना करें , चाहे कितने ही उतम गीत , उतम प्रार्थानाएं उसकी स्तुति में प्रस्तुत करें , तब भी उस पिता की स्तुति पूर्ण नहीं हो पाती , यह सब गीत , सब प्रार्थानाएं, सब भजन उस प्रभु की स्तुति की पूर्णता तक नहीं ले जा पाते । इस सब का भाव यह है कि जीव कभी भी प्रभु की प्रार्थाना को पूर्ण नहीं कर पाता । उसे जीवन पर्यन्त उसकी प्रार्थना करनी होती है । उस की प्रार्थना में निरन्तरता , अनवर्तता बनी रहती है। यह उस की प्रार्थानाओं की श्रृंखला का एक भाग मात्र ही होती है । आज की प्रार्थना के पश्चात अगली प्रार्थना की त्यारी आरम्भ हो जाती है । इस प्रकार जब तक जीवन है , हम उसकी प्रार्थना करते रहते हैं , इस का कभी अन्त नहीं आता । इस मन्त्र में प्रथमतया इस बात पर ही प्रकाश डाला गया है । २. हम उस दाता की स्तुति करते हुए हार जाते हैं रू- हमारे परम पिता परमात्मा एक महान दाता हैं । वह निरन्तर हमें कुछ न कुछ देते ही रहते हैं । वह दाता होने के कारण केवल देने वाले हैं । वह सदा देते ही देते हैं ,बदले में कुछ भी नहीं मांगते।

जीव स्वार्थी है अथवा याचक है, भिखारी है । यह सदा लेने ही लेने का कार्य करता है । प्रभु से सदा कुछ न कुछ मांगता ही रहता है । कभी कुछ देने की नहीं सोचता जब कि प्रभु केवल देते ही देते हैं , कभी कुछ मांगते नहीं। इतना ही नहीं प्रभु देते हुए कभी थकते ही नहीं । प्रभु संसार के , इस जगत के प्रत्येक प्राणी के दाता हैं , प्रत्येक प्राणी को कुछ न कुछ देते ही रहते हैं । इस जगत के अपार जन समूह व अन्य सब प्रकार के जीवों को देते हुए भी उनका हाथ कभी थकता नहीं । दिन रात परोपकार करते हुए जीवों को दान बांटते हुए भी उन्हें कभी थकान अनुभव नहीं होती जबकि जीव ने देना तो क्या लेते लेते भी थक जाता है । प्रभु एक महान दाता है । जीव इस दान को ग्रहण करने वाला है । प्रभु के पास अपार सम्पदा है , जिसे वह दान के द्वारा सदा बांटता रहता है , जीव दान लेने वाला है किन्तु यह दान लेते हुए भी थक जाता है । इससे स्पष्ट होता है कि जीव की स्तुति का कभी अन्त नही होता । प्रभु से वह सदा कुछ न कुछ मांगता ही रहता है । हमारी मांग का , हमारी प्रार्थना का , हमारी स्तुति का कभी अन्त नहीं होता । इस कारण यह कभी भी नहीं हो सकता कि मैं ( जीव ) प्रभु के दानों की कभी पूर्ण रुप से स्तुति कर सकूं । परमात्मा देते देते कभी हारते नहीं , कभी थकते नहीं किन्तु मैं स्तुति करते हुए , यह सब प्राप्त करते हुए भी थक जाता हूं ।
डा. अशोक आर्य १०४ शिप्रा अपार्टमेन्ट ,कौशाम्बी २०१०१० गाजियाबाद ( उ.प्र.) चलभाष , ०९७१८५२८०६८

Tuesday, 13 December 2016

World Book Fair 2017

जैसा की आप सभी जानते है हर वर्ष की भांति राजधानी दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला 2017 इस बार 7 जनवरी से 15 जनवरी 2017 तक लगने वाला है. नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस पुस्तक मेले आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा एक बार फिर  वेद, उपनिषद, सत्यार्थ प्रकाश आदि वैदिक साहित्य लेकर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है,  सौजन्य से आर्य समाज, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

राख से बनी आग स्वामी श्रद्धानन्द

अपना धन अपनी सम्पत्ति यहाँ तक की अपनी संतान को भी को राष्ट्र के लिए दान करने वाले इस वीर सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद जी से भला कौन परिचित नहीं होगा! यदि कोई नहीं है तो उसे सुन लेना होगा क्योंकि इतिहास में ऐसे उदहारण विरले ही कभी पैदा होते है. जब हजारों सालों की गुलामी में लिपटा भारत इस गुलामी को अपना भाग्य समझने लगा था. जब भारतीयों की चेतना भी गुलामी की जंजीर में इस तरह जकड दी गयी थी कि लोग आजादी के सूरज की बात करना भी किसी चमत्कार की तरह मानते थे. ऐसे समय में इस भारत में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की अगुवाई में धर्म और देश बचाने को एक आन्दोलन खड़ा हुआ जिसे लोगों ने आर्य समाज के नाम से जाना. इसी आन्दोलन के सिपाही भारत माँ के एक लाल का नाम था स्वामी स्वामी श्रदानंद जिसने स्वामी दयानन्द जी महाराज से प्रेरणा लेकर आजादी की मशाल लेकर चल निकला गुलामी के घनघोर अँधेरे में आजादी का पथ खोजने. तब गाँधी जी ने कहा था की आर्यसमाज हिमालय से टकरा रहा हैं. वो हिमालय था कई हजार साल का पाखंड और हजारों साल की गुलामी. लेकिन चट्टानों से ज्यादा आर्य समाज के होसले कहीं ज्यादा ज्यादा बुलंद निकले.

सन 1856 को पंजाब के जालंधर जिले के तलवन गाँव में जन्मे मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) के निराशापूर्ण जीवन में आशा की क्षीण प्रकार रेखा उस समय उदय हुई, जब बरेली में उन्हें स्वामी दयानन्द का सत्संग मिला. स्वामी जी के गरिमामय चरित्र ने उन्हें प्रभावित किया. उस समय जहाँ भारतवर्ष के अधिकतर नवयुवक सिवाय खाने-पीने, भोगने और उसके लिए धनसंचय करने के अलावा अपना कुछ और कर्तव्य ना समझते थे गुलामी में जन्म लेते थे और उस दासता की अवस्था को अपना भाग्य समझकर गंदगी के कीड़ों की तरह उसी में मस्त रहते थे उस समय आर्यावर्त की प्राचीन संस्कृति का सजीव चित्र खींचकर न केवल आर्यसंतान के अन्दर ही आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया अपितु यूरोपियन विद्वानों को भी उनकी कल्पनाओं की असारता दिखाकर चक्कर में डाल दिया. जिस समय लोग राजनैतिक और धार्मिक दासता का शिकार थे. जिस समय लोग दुर्व्यसनो में लीन थे उस समय स्वामी श्रद्धानन्द जी ने लोगों को आत्मचिंतन, राष्ट्रचिन्तन करना सिखाया. स्वामी जी के एक-एक कथन क्रांतिकारियों के लिए गीता बनते चले गये.

देश को राजनेतिक परतंत्रता से मुक्त कर स्वामी जी का उद्देश्य धार्मिक था. ताकि हम धार्मिक रूप से भी स्वतंत्र हो, हिन्दू समाज में समानता उनका लक्ष्य था. जातिवाद, छुआछूत को दूर कर शिक्षा एवं नारी जाति में जागरण कर वह एक महान समाज की स्थापना करना चाहते थे. जो की गुलाम भारत में बहुत कठिन काम था. छोटे बड़े छूत-अछूत का भाव लोग वानरी के मृत बच्चे की तरह चिपकाए घूम रहे थे. 11 फरवरी 1923 को भारतीय शुद्धि सभा की  स्थापना करते समय स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा शुद्धि आंदोलन आरम्भ किया गया. स्वामी जी द्वारा इस अवसर पर कहा गया की जिस धार्मिक अधिकार से मुसलमानों को तब्लीग और तंजीम का हक हैं उसी अधिकार से उन्हें अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस अपने घरों में लौटाने का हक हैं. आर्यसमाज ने 1923 के अंत तक 30 हजार मलकानों को शुद्ध कर दिया. लेकिन 23 दिसम्बर 1926 को शुद्धि कार्य से रुष्ट होकर मुसलमानों ने स्वामी श्रदानंद की हत्या कर दी तो गाँधी जी ने हत्यारे अब्दुल रशीद को भी अपना भाई बताया.

आर्यसमाज की ओर से इस सम्बन्ध में पत्र लिखे गए, जिनका वर्णन पंडित अयोध्याय प्रसाद जी बी.ए. द्वारा लिखित इस्लाम कैसे फैलामें किया गया हैं पर गाँधी जी हठ पर अड़े रहे ओर अहिंसा की अपनी परिभाषा बनाते रहे. जबकि सावरकर ने रत्नागिरी के विट्ठल मंदिर में हुई शोक सभा में कहा- पिछले दिन, अब्दुल रशीद नामक एक धर्मांध मुस्लमान ने स्वामी जी के घर जाकर उनकी हत्या कर दी. स्वामी श्रदानंद जी हिन्दू समाज के आधार स्तम्भ थे. उन्होंने सैकड़ों मलकाना राजपूतों को शुद्ध करके पुन: हिन्दू धर्म में लाया था. वे हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे. यदि कोई घमंड में हो के स्वामी जी के जाने से सारा हिन्दुत्व नष्ट होगा, तो उसे मेरी चुनौती हैं. जिस भारत माता ने एक श्रदानंद का निर्माण किया, उसके रक्त की एक बूंद से लाखों तलवारें तथा तोपें हिन्दू धर्म को विचलित कर न सकी, वह एक श्रदानंद की हत्या से नष्ट नहीं होगा बल्कि अधिक पनपेगा.

सन्यासी की हत्या का स्मरण रखोलेख में सावरकर ने लिखा- हिन्दू जाति के पतन से दिन रात तिलमिलाने वाले हे महाभाग सन्यासी. तुम्हारा परमपावन रक्त बहाकर तुमने हम हिंद्युओं को संजीवनी दी हैं. तुम्हारा यह ऋण हिन्दू जाति आमरण न भूल सकेगी. हुतात्मा की राख से अधिक शक्तिशाली इस संसार में अन्य कोई होगा क्या? वही भस्म हे हिंदुयों! फिर से अपने भाल पर लगाकर संगठन ओर शुद्धि का प्रचार ओर प्रसार करो ओर उस वीर सन्यासी की स्मृति ओर प्रेरणा हम सबके हृदयों में निरंतर प्रजल्वित रहे, अपनी संपत्ति अपना परिवार, अपना जीवन और अपना सर्वस समाज के लिए दान करने वाले अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द जी को शत-शत नमन

 राजीव चौधरी 

Wednesday, 2 November 2016

महर्षि दयानंद सरस्वती जी के निर्वाण पर्व पर

दीपावली के दिन हर वर्ष की भांति दिल्ली रामलीला मैदान में एक बार फिर स्वामी दयानन्द जी के निर्वाण पर्व पर आर्यों का विशाल हुजूम देखने को मिला. वैदिक जय-जयकार करते ऋषि भक्त स्वामी दयानन्द जी के समाज हित और देश हित के कार्यों की सराहना करते दे रहे थे. किन्तु निर्वाणपर्व की पूर्व संध्या पर दिल्ली सभा के कार्यालय में यज्ञ के पश्चात स्वामी सम्पूर्णानन्द जी ने दुखद स्वर में एक बात कही जिसने सभी को कुछ पल के लिए भावुक कर दिया था. कि वैसे तो दीपावली का त्यौहार खुशियों का त्यौहार है किन्तु जब दीपावली की रात आती है तो मन में एक दुःख के लहर सी भी दौड़ जाती है कि वर्षो पहले आज की ही रात भारत माता ने अपने एक महान सपुत्र दया के देव दयानन्द को खोया था. दुनिया में अभी तक अनेक महापुरुष हुए और उनके सिद्धांत मानने वाले भी करोड़ों लोग है किन्तु वो लोग उनके सिद्धांतों को उस स्वरूप में नहीं बचा पाए जिस स्वरूप में उन्हें बनाया गया था. परन्तु आर्य समाज एक ऐसी संस्था है जिसने स्वामी जी के महान सिद्धांतों को उसी स्वरूप में बचाकर तो रखा ही साथ में यदि किसी ने उन सिद्धांतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिस की तो उसे बाहर का रास्ता भी दिखाया.

जब जगन्नाथ ने अंग्रेजो के बहकावे में आकर ऋषि दयानन्द जी को दूध में जहर मिलाकर दे दिया, स्वामी जी की  हालत बिगड़ने लगी, डॉ अलीमरदान ने दवा के बहाने स्वामी जी के शरीर में जहर से भरा इंजेक्शन लगा दिया और स्वामी जी के शरीर से जहर फूटने लगा अतः रसोईये को अपनी गलती महसूस हुई,तो उसने स्वामी जी के पास जाकर माफी मांगी. मुझे क्षमा कर दिजिए,स्वामी जी। मैने भयानक पाप किया हैं, आप के दूध में शीशायुक्त जहर मिला दिया था. ये तुने क्या किया?समाज का कार्य अधुरा ही रह गया। अभी लोगों की आत्मा को और जगाना था, स्वराज की क्रांति लानी थी.  पर जो होना था हो गया तु अब ये पैसा ले और यहां से चला जा नहीं तो राजा तुझे मृत्यु दंड दे देगें। ऐसे थे हमारे देव दयानन्द जी, दया का भंडार,करुणा के सागर आकाश के समान विशाल ह््रदय जो अपने हत्यारे को भी क्षमा कर गये थे। जिसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा दीपावली की रात देश में लाखो दीप जलाकर जब एक दीप बुझ गया.
यू तो स्वतन्त्र भारत में ऋषि निर्वाणोत्सव पहली बार सन 1949  में मनाया गया और इस अवसर पर मुख्य वक्ता स्वतन्त्र भारत के राष्ट्रध्यक्ष चक्रवर्ती राजगोपालचारी थे इस अवसर पर समारोह की अध्यक्षता कर रहे  केन्द्रीय मंत्री श्री नरहरि विष्णु गाडगिल जी ने बोलते हुए कहा कि यदि यह देश स्वामी दयानन्द के मार्ग पर चला होता तो कश्मीर पाकिस्तान में न जाता  इस बात को अल जमीयत अखबार ने मोटे अक्षरो में मुख्य पेज पर दिया। इसकी एक प्रति लेकर मौलाना अबुल कलाम आजाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के पास लेकर पहुंचे और शिकायत की कि आपका मन्त्री शुद्धी का प्रचार कर रहा है.   अगले साल 1950  मुख्यवक्ता के रुप में सरदार बल्लभभाई पटेल पधारे और उन्हौनें अपने भाषण में कहा कि यदि हमनें स्वामी दयानन्द की बात मानी होती तो आज कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में लटका न होता.

 इसके कुछ दिन बाद ही बम्बई में सरदार पटेल जी का निधन हो गया और उनके इस कथन के अभिप्राय को पूरी तरह  न जाना जा सका। लेकिन इंडियन एक्सप्रैस नई दिल्ली के 7  जून 1990 के अंक में प्रकाशित एक व्क्तव्य से पूरी तरह स्पस्ट हो गया उसमें लिखा था. देश के स्वतंत्र हो जाने पर यहां रहे ब्रिटिष सैनिकों अधिकारियों ने भारत सरकार को कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपने की सलाह दी थी. इससे पाकिस्तान को कश्मीर के मामले को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने का अवसर मिला. इसी के परिणाम स्वरूप भारत को पाकिस्तान के तीन चार आक्रमणों का सामना करना पड़ा. इसी संदर्भ में सरदार पटेल के अनुसार यह सब ऋषि दयानन्द की बात न मानने के कारण हुआ. सत्यार्थ प्रकाश के छटे सम्मुलास में उन्होंने लिखा है कि मंत्री स्वराज स्वदेश में उत्पन्न होने चाहिए. वे जिनकी जड़े अपने देश की मिट्टी में हो,जो विदेश से आयातीत न हो और जिनकी आस्था अपने धर्म संस्कृति ,सभ्यता,परम्पराओं में हो. दयानन्द के उक्त लेख की अवेहलना के कारण ही हमने इतनी हानि उठाई है. विदेशी प्रशासक कुशल तो हो सकता है,पर हितेषी नहीं. पटेल आर्य समाज के कार्यो से भली भांति परिचित थे. जब नेहरु ने पटेल से कहा कि हैदराबाद ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाई है, ऐसे में उसके अंतरिम मामलों में दखल देना क्या उचित रहेगा? सरदार पटेल ने नेहरु की ओर देखते हुए कहा आर्य समाज के नेत्तर्त्व में जनक्रांति हो चुकी है जिसने हैदराबाद के विलय की नींव रख दी है बस आप पुलिस कारवाही के आदेश दीजिये..

स्वामी दयानन्द जी का मत था भिन्न-भिन्न भाषा प्रथक-प्रथक शिक्षा और अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है. दयानन्द के शब्दों में जब तक एक मत एक हानि-लाभ,एक सुख-दुःख न मानें तब तक उन्नति होना बहुत कठिन है. जब भूगोल में एक मत था उसी में सबकी निष्ठा थी और एक दूसरे का सुख-दुःख,हानि-लाभ आपस में सब समान समझते थे तभी तक सुख था. स्वामी जी हमेशा कहते थे एक धर्म,एक भाषा और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित होना कठिन है. सब उन्नतियों का केन्द्र स्थान एक है। जहां भाषा व भावना में एकता आ जाए वहां सागर की भांति सारे सुःख एक-एक करके प्रवेश करने लगते हैं. मैं चाहता हूं कि देश के राजा महाराजा अपने शासन में सुधान व संशोधन करें. अपने-अपने राज्य में धर्म भाषा और भाव में एकता करें। फिर भारत में आप ही आप सुधार हो जाएगा.....Rajeev choudhary 


Thursday, 15 September 2016

जिन्दा माँ पर कर दिया..श्राद्ध

रोहन बाज़ार में मिठाई की दूकान से गुज़र रहा था तभी उसे उसका एक दोस्त मिला ! तो उसने अपने दोस्त से पूछा क्या चल रहा है आज कल...
दोस्त ने कहा कुछ नहीं बस माँ का श्राद्ध है तो मिठाई लेने आया था ! रोहन ने कहा पागल माँ तो अभी मुझे बाजार में मिली थी और तुम ऐसी बात कर रहे हो शर्म नहीं आती क्या तुम्हे?
दोस्त ने मुस्कुराते हुए कहा... देखो लोग माँ बाप के मरने के बाद श्राद्ध करते है ! पर जब माँ बाप जिंदा होते है तो उन्हें खून के आंसू रुलाते है...!
मेरी माँ जिंदा है तो उनकी सब पसंद की हर चीज़ में मेरे घर में रखता हूँ  क्योंकि मैं उनकी हर कामना जो पूरी करना चाहता हूँ. उनके मरने के बार श्राद्ध से क्या वो संतुष्ट होंगी. जब उनके ज़िंदा रहते हुए मैंने उनके लिए कुछ ना क्या होंगा तो? मेरा मानना  है कि जीते जी माता पिता को हर हाल में खुश रखना ही उनका सच्चा श्राद्ध है!
 उसने आगे कहा कि मेरी माँ को मिठाई में लड्डू, फलों में आम आदि पसंद है ! में वह सब उन्हें खिलाता हूँ ! 
लोग मंदिरों में जाकर अगरबत्तियां लगाते है में न मंदिर जाता हूँ और न अगरबत्तियां जलाता हूँ, हाँ माँ के सो जाने पर उनके कमरे में मच्छर भागने की अगरबत्ती अवश्य जला देता हूँ !
जब माँ सुबह उठती है तब उनका चश्मा साफ़ करके उन्हें दे देता हूँ, मुझे लगता है कि ईश्वर की फोटो, तस्वीर साफ़ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ़ करने में मिलता है !
वह कुछ और कहता इससे पहले ही उसकी माँ हाथ में झोला लिए स्वयं वहां आ पहुंची तब उसने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखते हुए हंसकर कहा – ‘भाई बात यह है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोस कर उसे जीते जी तृप्त करूँ ! यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है ! हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते है ! पंडितों को खीर पुड़ी खिलाते है ! रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिये कि गाय-कौवों को खिलाया हुआ ऊपर पहुंचता है या नहीं, यह किसे पता? पर माता-पिता की सेवा का फल जरुर मिलता यह सबको पता है...आर्य समाज (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) 

Tuesday, 13 September 2016

भारतीय मूल के सांसद ने ऋग्वेद पर हाथ रख ली शपथ,

जितेश गढ़िया ने ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में ब्रिटिश भारतीय सांसद के तौर पर शपथ ली। वह ऐसा करने वाले सबसे कम आयु के व्यक्ति हैं। वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के करीबी माने जाते हैं। बता दें कि ब्रिटिश संसद के अपर हाउस में भारतीय मूल के लगभग 20 सांसद हैं।

इस दौरान ख़ास बात यह रही कि गढ़िया ने क्वीन एलिजाबेथ-द्वितीय के प्रति वफादारी की शपथ भारत के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद पर हाथ रखकर ली है। माना गया है कि यह ग्रंथ दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसका इतिहास 1500 बीसी से शुरू होता है। ब्रिटेन की संसद में नए सदस्यों को बाइबल के अलावा दूसरे धार्मिक ग्रंथ चुनने की भी अनुमति है। हालांकि, बता दें कि इससे पहले किसी भी ब्रिटिश भारतीय ने ऋग्वेद पर हाथ रखकर शपथ नहीं ली थी। जितेश गढ़िया गुजरात से संबंध रखते हैं। वह दो साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे।

 वह ब्रिटेन और भारत के बीच कुछ बड़ी इन्वेस्टमेंट में भी शामिल रह चुके हैं। कहा जाता है कि पिछले साल जब पीएम नरेंद्र मोदी लंदन गए थे तो गढ़िया ने ही उनका भाषण लिखा था। उन्हें पीएम मोदी का काफी करीबी माना जाता है।
गढ़िया गुजरात से संबंध रखते हैं। वह दो साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे। वह ब्रिटेन और भारत के बीच कुछ बड़ी इन्वेस्टमेंट में भी शामिल रहे हैं। कहा जाता है कि पिछले साल जब नरेंद्र मोदी लंदन गए थे तो जितेश ने ही उनका भाषण लिखा था। उन्हें नरेंद्र मोदी का काफी करीबी माना जाता है।

जितेश गढ़िया यूरोप की फाइनेंश कंपनी एबीन और बारक्लेज के साथ भी काम कर चुके हैं। कहा जाता है कि वह टाटा स्टील की ब्रिटेन की कोरस को खरीदने में हुई डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।

 ब्रिटिश संसद में सांसद के रूप में शपथ लेने के बाद जितेश ने कहा कि वह ऐसे समय संसद में शामिल हो रहे हैं, जब ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। उन्होंने कहा कि वह फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर के लिए भविष्य में अच्छी संभावनाएं सुनिश्चित करने में मदद करना चाहता हैं।

उन्होंने कहा कि उनका फोकस ब्रिटेन सहित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध मजबूत करने में योगदान देने पर भी होगा।....

आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा