Thursday, 11 August 2016

हैदराबाद सत्याग्रह शहीद आर्य समाजी

ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा याद करो इन आर्य समाजियों की कुर्बानी
                संसार के सम्मानित राष्ट्रों का इतिहास उन व्यक्तियों के चरित्रों से सदा भरपूर रहा है, जिन्होंने उच्च एवं पवित्र उद्देष्यों की पूर्ति के लिए महान् से महान् त्याग किया और समय पड़ने पर इस संघर्ष में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया और पीछे बलिदानों के अवषेश रख गए, जो अनुगामियों का पथ प्रदर्शन कर सकते हैं
शहीदों को मृत्यु कभी स्पर्श नहीं करती अपितु वे स्वयं मर कर अमर हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है। ऐसी महान् आत्माओं का रक्त कदापि व्यर्थ नहीं गया अपितु समय आने पर एक ऐसे प्रखर प्रचंड रूप में प्रवाहित हो निकला जिसमें हिंसा, अत्याचार और पाशविकता के दल स्वतः निमग्न हो गए। ये व्यक्ति धर्म-प्रचार, सदुपदेश, प्रजावाद की प्रस्थापना, शांति और प्रेम एवं सत्य को साधारण व्यक्तियों तक पहुंचाने के लिये अपने जीवन-लक्ष्य की कठिनाईयों को पार कर आगे बढ़ते ही रहे। इन्होंने सदा पराक्रान्तों का साथ दिया और मानवता के उच्च आदर्शो के रक्षक हुए और इन हेतुओं से निज तन-मन-धन की बलि देकर स्पष्ट कर दिया कि इनका सेवा कार्य में कितना उत्साह था तथा बलिवेदी से कितना ऊंचा प्रेम था।
आर्य समाज के शहीद मरने के बाद अमर हो गये और इन हुतात्माओं के रक्त से हैदराबाद में वैदिक धर्म का जो चमन सींचा गया, वह अब एक विस्तृत उद्यान बन गया है और रियासत में वैदिक धर्म का नव सन्देश दे रहा है। यहां हम कुछ आर्य समाजी शहीदों का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं जो वर्तमान में संसार में उपस्थित तो नहीं हैं पर वे सबके ह्रदयों  में स्मरण रहेंगे और ऐसा प्रतीत होता है कि हम इन्हें कभी भूल नहीं सकेंगे।
1. वेद प्रकाश जी
                वेद प्रकाष जी का पूर्व नाम दासप्पा था। दासप्पा संवत् 1827 में गुजोटी में पैदा हुए। इनकी माता का नाम रेवती बाई और पिताश्री का नाम रामप्पा था। गरीब माता-पिता को इसकी क्या सूचना थी कि उनका बेटा बड़ा होकर हुतात्मा बनेगा और वैदिक धर्म के मार्गं में शहीद होकर अमर हो जाएगा। दासप्पा ने मराठी माध्यम से आठवीं श्रेणी तक षिक्षा ग्रहण की। जैसे-जैसे ये बढ़ते गये वैसे-वैसे वे धर्म की ओर आकर्षित होते गये। वे आर्य समाज के सत्संगों में बराबर सम्मिलित होते थे। वैदिक धर्म के आकर्षण ने इन्हें महर्शि दयानन्द का पक्का भक्त बना दिया। आर्य समाजी बनने के बाद यह वेद प्रकाश कहलाने लगे थे। इनका आर्य समाज में असाधारण प्रेम एवं निश्ठा के ही कारण गुंजोटी में आर्य समाज की नींव डाली गयी पर स्थानीय इर्स्यालू यवन इन्हें देखकर जलने लगे थे। वेद प्रकाश जी सुगठित शरीर एवं सद्गुण रखते थे और लाठी-तलवार चलाने की विद्या में पर्याप्त दक्ष थे। इनकी यह दक्षता कई भयंकर संकटों के समय इनकी सहायक सि( हुई। कई बार विरोधी दल ने इन पर आक्रमण किये और ये अपने आपको सुरक्षित रखने में सफल हुए।

 गुंजोटी का छोटे खां नाम का एक पठान स्त्रियों को गलत निगाहों से देखता था। एक दिन वेद प्रकाश  जी ने इसे ऐसा करने से रोका और सावधान किया कि भविष्य में इस प्रकार कुद्रष्टि मातसमाज पर न डालें। यह बात गुण्डों को हृदयग्राही न थी और सब इनके शत्रु हो गए। वेद प्रकाश जी ने गुंजोटी में हिन्दुओं के लिये पान की एक दुकान खोल दी और चांद खान पान का एक व्यापारीद्ध इनका शत्रु हो गया और भीतर ही भीतर इनके विरुद्ध  षड्यंत्र रचने लगा। एक दिन यवनों ने स्थानीय आर्य समाज के मन्त्री के मकान पर अकस्मात् धावा बोल दियाइसकी सूचना वेद प्रकाश जी को मिली, वे इन आक्रमणकारियों को रोकने के लिए निःशस्त्र ही चले गये। मन्त्री के मकान के समीप दो-तीन मुसलमानों ने इन्हें पकड़ लिया और आठ-नौ व्यक्तियों ने इन्हें नीचे गिरा कर हत्या कर दी। विषेश उल्लेखनीय बात यह है कि उस दिन पुलिस ने वहां के प्रतिष्ठित हिन्दुओं को थाने में बुलाकर बैठा रखा था। आक्रमकत्र्ताओं और हत्यारों को पहचान लिया गया और न्यायालय में गवाह भी उपस्थित किये, पर फिर भी हत्यारों को निर्दोश घोषित कर दिया गया। वेद प्रकाश जी का रक्त हैदराबाद में पहला रक्त था जो बड़ी निर्दयता के साथ बहाया गया था और इसके बाद वीर आर्यों के बलिदानों का एक सिलसिला सा चल पड़ा।
2. धर्म प्रकाश  जी
 धर्म प्रकाश जी का पूर्व नाम नागप्पा था। नागप्पा जी का जन्म कल्याणी में संवत् 1839 में हुआ था। इनके पिताश्री का नाम सायन्ना था। इनका पदार्पण जब आर्य समाज में हुआ तब से ये धर्म प्रकाश  कहलाने लगे। कल्याणी एक मुस्लिम नवाब की जागीर थी। वहां मुसलमानों का अत्याचार नंग-नाच कर रहा था। मुसलमानो के अत्याचारों को देखकर धर्म प्रकाश इसकी रोक-थाम की तैयारी में लग गये। हिन्दुओं को शस्त्र विद्या सिखाने लगे। कल्याणी के मुसलमान हिन्दुओं के शारीरिक अभ्यास से रुस्ठ हो गये और उन्होंने इनकी हत्या करने की कमर कस ली। कल्याणी के इस धर्मवीर पर कई बार आक्रमण किये गये पर आक्रमकारियों को सफलता नहीं मिली। कल्याणी के खाकसार इनकी हत्या की ताक में रहने लगे। 27 जून 1837 ई. की रात को धर्म प्रकाश  आर्य समाज कल्याणी के सत्संग से अपने घर वापस जा रहे थे कि खाकसारों ने इन्हें एक गली में घेर कर बरछों और भालों की सहायता से मार डाला। वेद प्रकाश  की हत्या से आर्य समाज में शोक  व दुःख की लहर दौड़ गयी। इस हत्याकाण्ड के हत्यारे भी न्यायालय से निर्दोष छोड़ दिये गये।
3. महादेव जी
 महादेव जी अकोलगा के रहने वाले थे। साकोल आर्य समाज के सत्संगों में जब इन्हें कई बार सम्मिलित होने का अवसर मिला, तब वैदिक धर्म का जादू इन पर चढ़ गया। इनके मन और मस्तिक्ष पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि आर्य समाजी बन जाने के बाद वैदिक धर्म के प्रचार की धुन लग गयी। तरुणोत्साह और साहस इन्हें इस मार्ग पर आगे बढ़ाता ही रहा। महादेव जी की मुखाकष्ति पर तेज था। भाषण देते समय इनके मुख से जो वाक्य निकलते, उन्हें लोग बड़ी तन्मयता और रुचि से सुनते और एक तरुण आर्य युवक को प्रचार के काम में  इस प्रकार तल्लीन देखकर लोगों को भी इच्छा होती थी कि वे भी इसी प्रकार बनें। महादेव जी के प्रचार का काम जब प्रगति पर था उस समय मुसलमान इनके अकारण षत्रु बन गये। कई बार इन पर इस द्रष्टि से आक्रमण हुए कि वे सदा के लिए मौन हो जाए पर वे बचते ही रहे।
एक दिन की घटना है कि महादेव जी अपने प्रिय धर्म प्रचारार्थ कहीं जा रहे थे कि रास्ते में किसी अज्ञात व्यक्ति ने पीछे से आकर छुरा घोंप दिया और 14 जुलाई 1938 के दिन यह आर्य युवक 25 वर्ष की आयु में सदा के लिए इस संसार से बिदा हो गया।
4. श्याम लाल जी
  धर्मवीर श्याम लाल जी का जन्म 1903 ई. भालकी में हुआ था। इनके पिताश्री का नाम भोला प्रसाद और माता का छोटूबाई था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में हुई। ये एक पौराणिक परिवार से थे। इनके एक मामा आर्य समाजी थे, जिनके प्रभाव से श्याम लाल जी के ज्येश्ठ भ्राता बंसीलाल जी वैदिक धर्म के अनुयायी और स्वामी दयानन्द के अन्तःकरण के भक्त बन गये और आर्य समाज के सर्वप्रिय नेता भी कहलाने लगे। गुलबर्गा में आपके ही प्रयासों से आर्य समाज की स्थापना हुई। वे स्वयं इस समाज के मन्त्री बनकर कार्य संचालन करते रहे। 1925 ई. में वकील बने और उदगीर में वकालत करने लगे। निजी जीविकोपयोगी कार्य करते हुए आर्य समाज का प्रचार भी करते थे। 1926 ई. में इन्हें चर्म रोग लग गया और वह इतना बढ़ा कि पूरा शरीर फूल गया। रोग निवारणार्थ आप लाहौर गये। अभी आप लाहौर में ही थे कि 1926 ई. में स्वामी श्रद्धानन्द  जी शहीद हो गये। स्वामी जी के इस बलिदान का प्रभाव इन पर अत्यधिक पड़ा। लाहौर से वापस आकर उदगीर में आर्य समाज की स्थापना की और प्रतिज्ञा की कि आजीवन वैदिक धर्म का प्रचार करेंगे। उदगीर के तात्कालीन मुसलमान तहसीलदार ने स्थानीय मुसलमानों को प्रेरित कर इनके मकान पर आक्रमण करवा दिया, परन्तु यह आक्रमण विफल रहा। आर्य समाज उदगीर की स्थापना के बाद आपके अथक प्रयासों से विजय दशमी के अवसर पर प्रथम बार जुलूस निकाला गया। होली के जुलूस के अवसर पर आप पर पुनः आक्रमण हुआ पर इस बार भी आप बच गये। श्याम लाल जी ने अछूतों के लिए एक पाठशाला, एक व्यायाम शाला तथा एक निःशुल्क चिकित्सालय भी स्थापित किया। 1928 ई. में उदगीर आर्य समाज का वार्षिकोत्सव हुआ और इसी के बाद पुलिस आपका पीछा करने लगी। इसी वर्ष धारा 104 के अधीन आप पर झूठा मुकद्दमा चलाया गया और आपसे दो हजार की जमानत और मुचलका लिया गया। श्याम लाल जी उदगीर से बाहर निकलकर भालकी, कल्याणी, औराद, शाहजहानी, लातूर तथा औसा आदि स्थानों पर प्रचार करने लगे। कई बार मुसलमानों ने आप पर आक्रमण किया और कई ऐसे अवसर आये जब कि हिन्दुओं ने आपको अपने पास आश्रय देना अस्वीकार किया। आपने कई रातें मार्ग पर चलते हुए बितायीं और दिन में फिर प्रचार कार्य किया। 1935 ई. में माणिक नगर की यात्रा के अवसर पर मुसलमानों ने आप पर छुरा घोंप देने का प्रयत्न किया पर एक नवयुवक बीच में आया, स्वयं जख्मी हुआ और इन्हें बचा लिया। 1938 ई. में इन पर पुलिस ने एक झूठा मुकद्दमा चलाया और न्यायालय ने इन्हें दीर्घकालिक दण्ड दिया। अभी आप कारावास में दंड भोग रहे थे कि आपका देहांत हो गया। पं. श्याम लाल जी का नाम हैदराबाद आर्य समाज के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा क्योंकि ये अपने अथक प्रयत्नों, संघर्ष और श्रद्धा से आर्य समाज को शक्तिषाली और विस्तृत करने की चिन्ता अन्तिम श्वास तक करते रहे।
5. व्यंकटराव जी
  व्यंकटराव जी कंधार जिला नांदेड़ के रहने वाले थे। इन्होंने स्टेट कांग्रेस द्वारा संचालित सत्याग्रह में भाग लिया और दण्ड भोगते रहे। कारावास के अधिकारियों द्वारा मार-पीट के कारण 18 अप्रैल 1938 ई. में आप परलोक सिधार गये।
6. विष्णु भगवान् जी
 विष्णु भगवान् जी ताण्डूर ;गुलबर्गाद्ध के रहने वाले थे। इन्होंने गुलबर्गा में ही सत्याग्रह किया और वहीं इन्हें कारावास का दण्ड दिया गया। आपको गुलबर्गा से औरंगाबाद और फिर हैदराबाद जेल में रखा गया और यहां दूसरे सत्याग्रहियों के साथ इन्हें इतना पीटा गया कि ये सहन न कर सके और 2 मई 1939 ई. में आपने 30 वर्ष की आयु में अपना शरीरान्त किया।
7. माधवराव सदाशिवराव  जी
 आप लातूर के रहने वाले थे। आपने 30 वर्ष की आयु में आर्य सत्याग्रह में भाग लिया और गुलबर्गा जेल में बन्द कर दिये गए। 26 मई 1939 ई. के दिन कड़कती धूप में नंगे पैर जेल में कठिन परिश्रम करने से रोगग्रस्त हो गए। चिकित्सा का कोई प्रबन्ध नहीं किया गया और आप इस प्रकार निजाम सरकार की क्रूरता के कारण देहावसान कर गये। माधव राव सदाशिवराव के देहान्त की सूचना पाकर असंख्य नर-नारी इनके अन्तिम दर्शन करने गए पर पुलिस ने रोक  दिया और जेल में ही इनका शव अग्नि की भेंट कर दिया गया।
8. पाण्डुरंग जी
उस्मानाबाद के रहने वाले युवा आर्य सत्याग्रही को सत्याग्रह के कारण ही कारावास का दंड दिया गया था। गुलबर्गा जेल में इन पर इन्फुएंजा का आक्रमण हुआ पर चिकित्सा का कोई प्रबन्ध न किया गया। हालत चिन्ताजनक होती गई। 25 मई 1939 के दिन इन्हें नागरिक औषधालय में भेजा गया और वहीं 27 मई को इनका देहान्त हो गया। असंख्य नर-नारी इनके अन्तिम दर्शन को आए पर पुलिस ने इन्हें वापस जाने पर विवश कर दिया और पुलिस द्वारा ही इनका अन्तिम संस्कार किया गया।
9. राधाकृष्ण  जी
 राधाकृष्ण जी निजामाबाद के एक राजस्थानी थे। 1903 ई. में आपका जन्म हुआ था। आपके पिता का नाम जीतमल था। 1934 ई. में आप आर्य समाजी बने और तभी से इसके प्रचार की धुन लग गई। इन्होंने ही निजामाबाद में आर्य समाज की स्थापना की थी। इसी कारण आप पुलिस की वक्रद्रष्टि में खटने लगे। मुहर्रम के दिनों में आप पर मुकद्दमा चलाया गया और इनसे एक साल के लिए दो हजार रुपये का मुचलका लेकर छोड़ा गया। आर्य सत्याग्रह के समय आप बड़े उत्साह के साथ चन्दा एकत्रित करने में जुटे थे। 2 सितम्बर 1931 ई. के दिन एक अरबी ने छुरा घोंप कर मार डाला और यह बात सर्व विदित हो गई कि इनकी हत्या के षड्यंत्र में पुलिस का हाथ था।
10. लक्ष्मण राव जी आपने धार्मिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह किया। जेल के कठोर व्यवहार को सहन न कर सकने के कारण 3 अगस्त 1939 ई. को हैदराबाद जेल में आपका देहान्त हो गया।
11. शिवचन्द्र जी
 आपका जन्म 3 मार्च 1916 ई. में दुबलगुण्डी में हुआ था। आपके पिताश्री का नाम अन्नपक्षप्पा था। 1935 ई. में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। सरकार की ओर से आपको छात्रवष्त्ति भी प्राप्त हुई थी। आप हुमनाबाद की एक पाठशाला में अध्यापक हो गये थे। पाठशाला के अवकाष  के समय आप आर्य समाज के साहित्य का अध्ययन किया करते थे। आर्य समाज के लिए आपने बड़े उत्साह और श्रद्धा से काम किया। शोलापुर से आप सत्याग्रहियों को हैदराबाद लाते थे और सत्याग्रह के समाचार हैदराबाद से बाहर भेजते थे। 3 मार्च 1942 ई. के दिन होली में जुलूस के अवसर पर मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया, फलस्वरूप आप शहीद हो गए। आप के साथ आपके साथी लक्ष्मण राव जी, राम जी अगडे़ और नरसिंह राव जी गोलियों का निषाना बने थे।

12. राम कृष्ण जी
 राम कृष्ण जी का जन्म लावसी ग्राम में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था और यह शहीद होने से केवल दो सप्ताह पूर्व ही आर्य समाजी बने थे। एक दिन पठानों ने घोषणा की थी कि उस दिन वे मन्दिर को तोड़ेंगे, जिसे धर्म पर विश्वास हो वे आकर उन मन्दिरों को उनके हाथों से बचा लें।सब हिन्दू घबरा कर अपने-अपने मकानों में बैठ गये किन्तु जब राम ने यह घोषणा सुनी तो वे क्रोधाग्नि से जल उठे। पुजारियों ने कभी इन्हें मन्दिर में प्रवेश होने नहीं दिया था और फिर आर्य समाजी होने के कारण इन्हें मन्दिर और इन मन्दिरों की मूर्तियों से क्या रुचि, परन्तु पठानों की इस घोषणा को इन्होंने सम्पूर्ण हिन्दू जाति के लिए एक चैलेंज समझा और जाति की मान रक्षा  हेतु मन्दिर द्वार पर अपना डेरा डाला। यहाँ इन पर गोलियों की वर्षा हुई, घायल होने पर भी आपने पठानों को मार भगाया और हिन्दू जाति की लाज रख ली। स्वयं शहीद होकर इन्होंने मन्दिर की रक्षा की और जिस जाति में वे पैदा हुए थे, उसकी प्रतिष्टा रख ली।
13. भीम राव जी
  आप हिपला उदगीरद्ध के रहने वाले थे। इनके मित्र माणिक राव की बहन को मुसलमानों ने मुसलमान बना लिया था। भीमराव ने उसे शुद्ध कर लिया था। इस कारण मुसलमानों ने क्रोधित होकर इनके घर को आग लगा दी और इन्हें मार कर इनके हाथ-पांव काट डाले और इन्हें आग में जला दिया।
14. माणिक राव जी
 यह भी हिपला उदगीरद्ध के रहने वाले थे। इनकी बहन को मुसलमान बना लिया गया था। जब इनकी बहन को शुद्ध कर लिया गया तो मुसलमानों ने माणिक राव जी को गोलियों का निशाना बना दिया था।
15. सत्य नारायण जी
  आप अम्बोलगा ;वीदरद्ध के रहने वाले थे। आर्य समाज का काम बड़े जोष  के साथ करते थे, इसीलिए मुसलमान इनके शत्रु हो गए। मुहर्रम के दिनों में वे बाजार से जा रहे थे कि एक मुसलमान ने पीछे से तलवार से हमला कर दिया। वे तुरन्त ही चिकित्सालय पहुंचाए गये पर वहां जाते ही परलोक सिधार गये।
16. महादेव जी
यह तिवाड़े के रहने वाले थे। गुलबर्गा में ही सत्याग्रह करने के कारण जेल में  डाल दिए गये थे। जेल वालों के अत्याचार से 1939 ई. में ही चल बसे।
17. अर्जुन सिंह जी
 आप आर्य समाज के एक नर-रत्न थे। आप तालुका कन्नड़ औरंगाबाद में पैदा हुए थे। बचपन से ही आप हैदराबाद में रहने लगे थे। अपने उत्साह और निष्ठां के कारण आप हैदराबाद दयानन्द मुक्ति दल के सेनापति बनाए गए थे। सम्वत् 1861 में जंगली विठ्ठोबा की यात्रा में कुषल प्रबन्ध करने के बाद घर वापस लौट रहे थे कि मार्ग में कुछ सशस्त्र मुसलमानों ने आप पर आक्रमण कर दिया, तुरन्त ही उस्मानिया दवाखाना भेजे गए पर दूसरे ही दिन परलोक सिधार गये।
18. गोविन्द राव जी
आप निलंगा जिला बीदर के रहने वाले थे। सत्याग्रह करके जेल गये। पर वहां के अत्याचारों को सहन न कर सकने के कारण देहावसान कर गये।
19. गोन्दिराव जी, लक्ष्मण राव जी इन दोनों ने सत्याग्रह में अपनी जान की बाजी लगा दी। आर्य समाजी शहीदों का यह बहुत ही संक्षिप्त परिचय है। जिसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हैदराबाद में वे निजाम सरकार और मुसलमानों के अत्याचारों का किस प्रकार निषाना बने और वैदिक पताका को ऊॅंचा रखने के लिए किस प्रकार इन्होंने अपना अन्तिम रक्त बिन्दु तक बहा दिया।

यदि किसी आर्य महानुभाव के पास उपरोक्त क्रांतिकारियों की फोटो उपलब्ध हो तो वे उस फोटो को दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा को उपलब्ध कराने की कष्पा करें। जिससे इन क्रांतिकारियों की स्मष्ति में कार्यक्रम आयोजित कर इनको सच्ची श्रधान्जली अर्पित की जा सके और लोगों को इनके विशय में सम्पूर्ण जानकारी हासिल कराई जा सके। फोटो ईमेल कर सकते हैं| ..........(दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) राजीव 

Thursday, 28 July 2016

मूर्तिपूजा पर निष्पक्ष विचार

मेरे अनेक मूर्तिपूजक मित्र है। सभी जानते है कि मैं मूर्तिपूजा नहीं करता क्यूंकि ईश्वरीय ज्ञान वेद में मूर्तिपूजा को अमान्य कहा है। कारण ईश्वर निराकार और सर्वव्यापक है। इसलिए सृष्टि के कण कण में व्याप्त ईश्वर को केवल एक मूर्ति में सीमित करना ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव के विपरीत है। ईश्वर हमारे ह्रदय में स्थित आत्मा में वास करते है। इसलिए ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना के लिए मूर्ति अथवा मंदिर कि कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए अपने भीतर ही ईश्वर को खोजना चाहिए।
आज एक मित्र ने मुझसे मूर्तिपूजा को लेकर शंका पूछी। उन्होंने कहा मूर्तिपूजा अध्यात्म जगत में प्रथम सीढ़ी है। जो अल्पमति लोग है उनके लिए मूर्तिपूजा का प्रावधान किया गया था। मैंने उत्तर दिया फिर तो पहली सीढ़ी चढ़ने के पश्चात अगली सीढ़ी चढ़कर निराकार ईश्वर कि स्तुति-प्रार्थना एवं उपासना तक अनेक लोगों को पहुँचना चाहिए। मगर हम किसी भी मूर्तिपूजक की ऐसी प्रगति नहीं देख पाते।
उल्टा हम उनकी अवनति देखते है। उदहारण के लिए वैदिक काल में केवल निराकार ईश्वर कि उपासना का प्रावधान था। मध्यकाल में बुद्ध और जैन मत वालों ने बुत पूजा आरम्भ करी। उन्हें देखकर श्री राम जी और श्री कृष्ण जी की मूर्तियां बनाई जाने लगी। मध्य काल के अग्रिम भाग में विभिन्न पुराणों की रचना हुई। जिससे अनेक कल्पित अवतार प्रचलित हुए। विभिन्न अवतारों की मूर्तियां बनने लगी। कालांतर में देवियों का प्रवेश हुआ। मूर्तिपूजा में विभिन्न मतों के प्रवर्तकों, गुरुओं आदि जुड़ गए। अगली सीढ़ी तो अभी बहुत दूर थी। कलियुग में केवल मूर्ति का सहारा ऐसा सिखाया गया। इसका प्रभाव ऐसा हुआ कि मूर्तिपूजा में अब एक ऐसा दौर आया कि लोग श्री राम, श्री कृष्ण और वीरवर हनुमान जी को भी भूलने लग गए। महान पुरुषों का स्थान अब साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां एवं अजमेर वाले गरीब नवाज़ की कब्र ने ले लिया। बुत परस्ती अब कब्र परस्ती में बदल गई। जिन हिन्दुओं को अगली सीढ़ी चढ़ना था वो जमीन के अंदर समा गए। अक्ल में दखल देना बंद हुआ। हिन्दुओं को इतनी भी मति न रही कि साईं बाबा और गरीब नवाज सभी बिगड़े काम बनाने वाले बन गए। राम और कृष्ण के मंदिरों खाली हो गए। रामायण-महाभारत और गीता का पाठ छूट गया। वेद, दर्शन और स्मृतियों का स्वाध्याय तो अतीत कि बात हो गई। साईं संध्या गाई जा रही है। अब कब्रों पर कलमा पढ़ सुन्नत की तैयारी हो रही है।


आगे ईश्वर ही इस हिन्दू समाज का रक्षक होगा। इसलिए मित्रों इस काल्पनिक तर्क से बाहर निकले कि मूर्तिपूजा अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं अपितु गहरा गड्ढा है। इसमें जो एक बार गिरा। तो निकलने के लिए बहुत प्रयास करना होगा।
आईये वेद विदित निराकार ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना और उपासना अपने ह्रदय में स्थित आत्मा में ही करें। इसी में हिन्दू समाज का भला है।
(इस लेख का उद्देश्य हिन्दू समाज में मूर्तिपूजा के कारण हो रही दुर्दशा से सभी को परिचित करवाना है। कृपया निष्पक्ष रूप से अपनी प्रतिक्रिया दीजिये) आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
लेख 
डॉ विवेक आर्य 

Wednesday, 27 July 2016

नई शिक्षा निति में लागू हो संस्कृत!!

यदि आप संस्कृत की दी हुई रोटी खाते हैं तो सभी सदस्यों से निवेदन इस पत्र को मानव संसाधन विकास मंत्रालय कोnep.edu@gov.in पर ईमेल करें। आप और भी कुछ जोड़ने के लिए स्वतन्त्र हैं।सुझाव भेजने की अन्तिम तिथि ३१/०७/२०१६ है।आप अपना नाम तथा हस्ताक्षर कर साधारण डाक से भी भेज सकते हैं।आज आपके पास अवसर है। आगे आने वाले २० वर्षों तक संस्कृत को सुरक्षित रखने में अपना योगदान करें। यह ऐतिहासिक क्षण है। अपनी वफादारी निभाएं।

.......प्रिय सदस्यों! नई शिक्षानीति २०१६ की कमेटी ने संस्कृत बोलने/ समझने वाले लोगों की संख्या जनगणना २००१का हवाला देखते हुए १४०००(चौदह हजार), हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या ४०℅ (अड़तालीस करोड़)पूरे देश में बताकर महत्वहीन माना है तथा उचित स्थान नहीं दिया। पूरे देश में केवल ३℅ अंग्रेजी जानने वालों की सुविधा का ध्यान रखते हुए पूरे देश पर अंग्रेजी थोप दी गयी है।अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया है । अत: यह समय व्यर्थ के चुटकुलों , आराम के संदेशों का नहीं है। hrd को ईमेल करने का है। कविता,कहानी ३१ जुलाई के बाद जी भर के शेयर करना।फिलहाल जिसकी कृपा से रोटी,कपड़े, गाड़ी,मकान ,सैर-सपाटा आदि का सतत आनन्द आप,आपके बच्चे ले रहे हैं,उसके संरक्षण एवं संवर्धन को सुनिश्चत करने के लिए nep.edu@gov.in पर ईमेल करो। देश और देश की भाषाओं के प्रति वफादारी दिखाओ।
जिन सदस्यों ने संस्कृत भाषा को नई शिक्षानीति २०१६ में उचित स्थान देने के लिए सुझाव ईमेल किये हैं, उन सभी का हार्दिक आभार। अब आप अपने मित्रों से ईमेल कराने का प्रयास करें। संस्कृत विरोधी लोग लोकसभा तथा राज्यसभा में सक्रिय हो चुके हैं। आप सभी से निवेदन है कि आप अपने राजनैतिक प्रतिनिधियों के सहयोग हेतु  प्रयास शुरू करें। अब तक हम ५ सांसदों की ओर से सुझाव भिजवा चुके हैं तथा आगे भी प्रयास जारी है।
डॉ व्रजेश गौतम ,अध्यक्ष ,संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली
सम्पर्क सूत्र 9968812963
9868879710 डॉ दयालु (महासचिव) (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) 

Wednesday, 13 July 2016

सवेंदनशीलता की अनूठी मिसाल

पिछले दिनों मुम्बई की सड़क पर दुर्घटना में एक कुत्ते और आदमी की मौत हो गयी थी दुर्घटना के काफी देर बाद तक उस आदमी के पास से लोग गुजरते तो रहे पर कोई पास नहीं आया| किन्तु उस मृत कुत्ते के पास एक कुत्ता बैठा पाया| यही हाल उत्तराखंड में देखने को मिला| शायद इंसानों को संवेदनशीलता के मामले में इन बेजुबान जानवरों से कुछ सीख लेना चाहिए उत्‍तराखंड के चंपावत में बंदरों ने इंसानियत की एक ऐसी मिशाल पेश की जिसे शायद इंसान भी ना पेश कर सके। मगर दुख भरी बात यह रही कि सभी बंदरों को अपनी जान देनी पड़ी। चंपावत के लोहाघाट रोडवेज कार्यशाला में बने पानी के टैंक में एक बंदर का बच्‍चा डूबने लगा। यह देखकर 10 बंदर उसे बचाने के लिए टैंक में कूद गए। फिर बंदर पानी से बाहर नहीं निकल पाए और उनकी मौत हो गई।
सूचना पाकर मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने सभी बंदरों के शवों को बाहर निकाला और पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया। बाद में उन्‍हें रोडवेज कार्यशाला परिसर में दफना दिया गया। जानकारी के मुताबिक सोमवार की देर शाम एक बंदर का बच्चा अपनी मां से बिछड़ कर छमनियां स्थित रोडवेज कार्यशाला परिसर में वाहनों की साफ-सफाई के लिए बने पानी के टैंक में गिर गया, जिसे बचाने की खातिर अन्य सभी बंदर टैंक में कूद गए।
हालांकि टैंक में पानी करीब तीन फिट था, लेकिन टैंक की करीब 10 फिट की गहराई होने के कारण कोई भी बंदर वहां से निकल नहीं पाया। काफी देर तक टैंक में फंसे रहने के कारण टैंक में डूबे सभी 10 बंदरों की मौत हो गई।..........दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा खबर और चित्र डेली हंट से साभार 


Sunday, 26 June 2016

विद्वान कौन है?

विद्वान शब्द विद् धातु से निष्पन्न हुआ है, जो कि ज्ञान अर्थ में प्रयुक्त होता है। सामान्य रूप में यदि हम विद्वान शब्द का अर्थ का विचार करें तो जैसे जिस व्यक्ति के पास धन होता है , उसे धनवाला या धनवान कहते है, जिसके पास बल है उसे हम बलवान कहते है। वैसे ही जिसके पास ज्ञान है उसे हम ज्ञानवाला या ज्ञानवान कहते है, उसी को दूसरे शब्द से कहे तो जिसके पास विद्या हो उसको विद्यावान व विद्वान कहा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो व्यक्ति ज्ञान से युक्त होता है उसको विद्वान कह सकते है ।


कहते है एक बार एक विद्वान के खिलाफ मुकदमा चल रहा था। दार्शनिक, तर्कशास्‍त्री और कानून के विद्वानों को उस विद्वान की जांच करने के लिए बुलाया गया था। मामला संगीन था। क्‍योंकि विद्वान ने स्वीकार किया था कि वह गांव-गांव घूमकर कहता है कि तथाकथित ज्ञानी लोग अज्ञानी, अनिश्‍चय में जीने वाले, धूर्त, पाखंडी  और संभ्रमित होते है।
उस पर आरोप लगाया गया कि वह राज्‍य के विद्वानों पुरुषो का सम्‍मान नहीं कर रहा है। उनके बारे में लोगों को गलत पाठ पढ़ा रहा है| यह सब सुन 
राजा ने कहा, ‘’में तुम्हे दंड दूँ  अपनी सफाई में   तुम पहले बोलों।‘’
विद्वान ने कहा, ‘’पहले कागज और कलम ले आओ।‘’
कागज और कलम मंगवाये गये। ‘’इनमें से सात लोगों को ये दे दो और उनसे कहो कि वे सब एक सवाल का जवाब लिखें, ‘’रोटी क्‍या है?’’
उन सबने अपने-अपने कागज पर लिखा। वे कागज राजा को दिये गये और उसने उन्‍हें पढ़कर सुनाया:
पहले ने लिखारोटी एक भोजन है।
दूसरे ने लिखावह आटा और पानी है।
तीसरे ने लिखाईश्वर की भेट है।
चौथे ने लिखासींका हुआ आटा है।
पांचवें ने लिखाआप किस चीज को रोटी कहते है इस पर निर्भर है।
छठे ने लिखाएक पोषक तत्‍व।
सांतवे ने लिखाकोई नहीं जानता कि रोटी क्‍या है।
विद्वान ने कहा: हे राजन ‘’जब ये सब मिलकर यह तय नहीं कर पाये कि रोटी क्‍या है तब बाकी चीजों के बारे में निर्णय ले सकेंगे। जैसे मैं सही हूं या गलत। क्‍या आप किसी की जांच परख या मूल्‍यांकन करने का काम ऐसे लोगों को सौंप सकते है। जो एक विषय पर एक मत ना हो क्‍या अजीब नहीं है कि उस चीज के बारे में एक मत नहीं सके जिसे वे रोज खाते है। और फिर भी मुझे मुर्ख सिद्ध करने में सभी राज़ी हो एक मत हो गए। इनकी राय का आपकी नजरो क्‍या मूल्‍य है? मुझे दंड देने से पहले आप खुद सोच ले!


अब यहाँ शंका होती है कि ,समाज में, लोक में अथवा शास्त्रों में क्या विद्वान शब्द से सामान्य ज्ञान से युक्त व्यक्ति का ग्रहण किया जाता है वा नहीं ? प्रयोग होता है तो किस अर्थ में ?
सूक्ष्मतया ,निश्चयात्मक रूप में अच्छी प्रकार से जानता है उसी को उस विषय का विशेष विद्वान माना जाता है । जिन्होनें शास्त्रों को अच्छी प्रकार अध्ययन- अध्यापन किया है, और उस पठित विद्या को क्रियात्मक रूप में अपने जीवन व्यवहार में उतारा है, उन विषयों का प्रत्यक्ष अनुभव किया है ,साक्षात्कार किया है ऐसा व्यक्ति वास्तविक (तात्विक) विद्वान होता है । जिसकी आत्मा से सत्य उभरकर आता हो, जिसके अंतकरण से ही जिसका जीवन ही बोलता है जैसे कि इस विषय में उदाहरण देखना हो तो हम उपनिषद में नारद और सनत कुमार संवाद में देख सकते है । उसमें नारद जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि हे भगवन ! मैंने अनेक शास्त्रों को पढ़ा है परंतु मैं शोकग्रस्त हूँ | मैंने सुना है कि जो तात्विक विद्वान होता है वह कभी शोक -ग्रस्त नहीं होता । मैं शाब्दिक विद्वान् हूँ तात्विक नहीं | इससे ज्ञात होता है कि केवल शास्त्रों को पढ़ लेने मात्र से व्यक्ति विद्वान नहीं कहलाता । यहाँ विद्वान का स्तर बहुत ऊँचा है।.....लेख आचार्य ऋषिदेव (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) 


Monday, 20 June 2016

मेरी ढाई शंका!!

शंका दो हो या तीन किन्तु यह ढाई शंका कैसे? जितनी उत्सुकता यह जानने कि आप लोगों होगी उतनी ही मेरी थी| यह कोई लघुकथा नहीं बल्कि एक जीता जागता सत्य है जिसने एक मुस्लिम विद्वान को निरुतर कर दिया था| वाक्या जनवरी 2016 विश्व पुस्तक मेले का था| देश, विदेश से आये पुस्तक प्रेमी धार्मिक, सामाजिक, स्वास्थ और साहित्य आदि पर लिखी पुस्तकें खरीद रहे थे| किन्तु इन सब के बीच पुस्तकों की आड़ में कुछ सम्प्रदाय धर्मांतरण का कुचक्र भी रच रहे थे| एक चर्चित इस्लामिक स्टाल पर कुछेक लोगों की भीड़ देखकर में भी पहुँच गया| पता चला कुरान ए शरीफ की प्रति लोगों को फ्री बांटी जा रही है| शांति प्रेम और आपसी मेल जोल को इस्लाम का संदेश बताया जा रहा था| खैर जिज्ञाषा वश मेने भी फ्री में कुरान पाने को उनका दिया आवेदन फॉर्म भरने की ठानी जिसमें वो नाम-पता और मोबाइल नम्बर लिखवा रहे थे ताकि बाद में लोगों से सम्पर्क साधा जा सके| एकाएक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी जी के साथ स्टाल में पधारे सामान्य अभिवादन से पश्चात उन्होंने मुस्लिम विद्वान् के सामने अपना प्रश्न रखा कि में अपनी धर्मपत्नी के साथ इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ,,,
यह सुन मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर प्रसन्त्ता की अनूठी आभा दिखाई दी| मुस्लिम धर्मगुरु ने अपने दोनों हाथ खोलकर कहा आपका स्वागत है| लेकिन उन सज्जन ने कहा इस्लाम स्वीकार करने से पहले मेरी ढाई शंका है आपको उनका निवारण करना होगा| यदि आप उनका निवारण कर पाए तो ही में इस्लाम स्वीकार कर सकता हूँ!! मुस्लिम विद्वान ने शंकित से भाव से उनकी ओर देखते हुए प्रश्न किया महोदय शंका या तो दो हो या तीन ये ढाई शंका का क्या तुक है?
सज्जन ने अपने मुस्कुराते हुए कहा जब में शंका रखूँगा आप खुद समझ जायेंगे यदि आप तैयार हो तो में अपनी पहली शंका आपके सामने रखूं? मुस्लिम विद्वान् ने कहा जी रखिये|
सज्जन- मेरी पहली शंका है कि सभी इस्लामिक बिरादरी के मुल्कों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या 50 फीसदी से ज्यादा है मसलन मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है उनमें एक भी देश में समाजवाद नहीं है, लोकतंत्र नहीं है, वहां अन्य धर्मो में आस्था रखने वाले लोग सुरक्षित नहीं है, जिस देश में मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं कट्टर इस्लामिक शासन कि मांग होने लगती है मतलब उदारवाद नहीं रहता, लोकतंत्र नही रहता, लोगों से उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता छीन सी ली जाती है आप इसका कारण स्पष्ट करें, ऐसा क्यों? में इस्लाम स्वीकार कर लूँगा!! मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर एक शंका ने हजारों शंकाए खड़ी कर दी| फिर भी उसने अपनी शंकाओं को छिपाते हुए कहा, दूसरी शंका प्रकट करें|
सज्जन – मेरी दूसरी शंका है, पुरे विश्व में यदि वैश्विक आतंक पर नजर डाले तो इस्लामिक आतंक की भागीदारी 95 फीसदी के लगभग है| अधिकतर मारने वाले आतंकी मुस्लिम ही क्यों होते है? अब ऐसे में यदि मैंने इस्लाम स्वीकार किया तो आप मुझे कौनसा मुसलमान बनओंगे? हर रोज जो या तो कभी मस्जिद के धमाके में मर जाता, तो कभी जरा सी चुक होने पर पर इस्लामिक कानून के तहत दंड भोगने वाला या फिर वो मुसलमान जो हर रोज बम धमाकेकर मानवता की हत्या कर देता है, इस्लाम के नाम पर मासूमों का खून बहाने वाला या सीरिया की तरह औरतो को अगुवा कर बाजार में बेचने वाला, मतलब में मरने वाला मुसलमान बनूंगा या मारने वाला? यह सुनकर दूसरी शंका ने मानों उन विद्वान पर हजारों मन बोझ डाल दिया हो| दबी सी आवाज़ में उसने कहा बाकि बची आधी शंका बोलो? आर्य सज्जन ने मंद सी मुस्कान के साथ कहा वो आधी शंका मेरी धर्मपत्नी जी की है| इनकी शंका आधी इसलिए है कि इस्लाम नारी समाज को पूर्ण दर्जा नहीं देता हमेशा उसे पुरुष की तुलना में आधी ही समझता है तो इसकी शंका को भी आधा ही आँका जाये! मुस्लिम विद्वान ने कुछ लज्जित से स्वर में कहा जी मोहतरमा फरमाइए!

सज्जन की धर्मपत्नी जी ने बड़े सहज भाव से कहा ये इस्लाम कबूल कर ले मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं किन्तु मेरी इनके साथ शादी हुए करीब 35 वर्ष हो गये यदि कल इस्लामिक रवायतो, उसुलो के अनुसार किसी बात पर इन्हें गुस्सा आ गया और मुझे तलाक, तलाक, तलाक कह दिया तो बताइए में इस अवस्था में कहाँ जाउंगी? यदि तलाक भी ना दिया और कल इन्हें कोई पसंद आ गयी और ये उससे निकाह करके घर ले आये तो बताइए उस अवस्था में, मैं  मेरे का बच्चों का मेरे गृहस्थ जीवन क्या होगा? तो ये मेरी आधी शंका है| इस प्रश्न के वार से मुस्लिम विद्वान को निरुत्तर कर दिया उसने इन जबाबों से बचने के लिए कहा आप अपना परिचय दे सकते है| सज्जन ने कहा मेरी शंका ही मेरा परिचय है यदि आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर होगा हमारी ढाई शंका का निवारण आपके पास होगा तो आप मुझे बताना| सज्जन तो वहां से चले गये मौलाना साहब सर पकडकर बैठे रहे| किन्तु इस सारे वार्तालाप से मेरे मन में जरुर एक शंका खड़ी हो गयी कि आखिर ये सज्जन कौन है| बाद में मुझे पता चला कि सज्जन आर्य समाज से जुड़े एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व है| यह सब जानकार मेरे मुंह से अनायास ही एक स्वर फूट पड़ा कि आर्य समाज अमर रहे..........(दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) lekh rajeev choudhary