Thursday, 11 January 2018

मानसिक सामर्थ्य का सामर्थ्य


लेख प्रस्तुति :- आचार्य नवीन केवली
हमारे जीवन में संकल्प शक्ति का बहुत ही बड़ा महत्व है । इसी से व्यक्ति के जीवन का निर्माण होता है, व्यक्ति अपने जीवन को ही परिवर्तन करके नया रंग भर सकता है, निम्न स्तर से व्यक्ति महान बन जाता है। हम जो भी इच्छा करते हैं वह दो प्रकार की होती है , एक सामान्य इच्छा और एक विशेष इच्छा, यह विशेष इच्छा ही जब उत्कृष्ट, दृढ़ व प्रबल बन जाती है उसी को ही संकल्प कहते हैं । हम जो कुछ भी क्रिया करते हैं उसके तीन ही साधन हैं शरीर, वाणी और मन । वाणी और शरीर में क्रिया आने से पहले मन में ही होती है अर्थात् कर्म का प्रारम्भिक रूप मानसिक ही होता है । मन में हम बार-बार आवृत्ति करते हैं कि :- “मैं उसको ऐसा बोलूँगा...”, “मैं इस कार्य को करूँगा....” उसके पश्चात् ही वाणी से बोलते अथवा शरीर से करते हैं । मन में यह जो दोहराना होता है, यही संकल्प होता है।

व्यक्ति का जीवन उत्कृष्ट, आदर्शमय होगा या निकृष्ट होगा यह उसकी इच्छा, संकल्प अथवा विचार से ही निर्धारित होता है । किसी शास्त्रकार ने कहा भी है कि :- “यन्मनसा चिन्तयति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति, यत् कर्मणा करोति तदभिसंपद्यते” अर्थात् जिस प्रकार का विचार व्यक्ति करता है उसका जीवन भी उस प्रकार का बन जाता है । योग शास्त्र के इस वाक्य -“चित्तं ही प्रख्या-प्रवृत्ति-स्थितिशीलत्वात् त्रिगुणम्” के अनुसार चित्त वा मन तीन-तत्वों से बना है, सत्व-गुण, रजोगुण और तमोगुण। कभी किसी गुण की अधिकता होती है तो कभी किसी की न्यूनता होती रहती है । जिसकी अधिकता वा प्रबलता होती है उसका प्रभाव अधिक मन में, क्रिया में अथवा जीवन-व्यवहार में देखा जाता है । अतः मन में उठने वाले विचार वा संकल्प भी तीन ही प्रकार के होते हैं, सात्त्विक संकल्प, राजसिक संकल्प तथा तामसिक संकल्प, परन्तु यहाँ व्यक्ति स्वतन्त्र होता है कि किस प्रकार के संकल्प को मन में स्थान दे, क्योंकि मन में दो प्रकार से परिवर्तन होता है, एक है वृत्ति रूप में और दूसरा है पदार्थ रूप में । वृत्ति अर्थात् विचारों की भिन्नता होने से परिवर्तन देखा जाता है जिसको कि निरन्तर अभ्यास करने से व्यक्ति नियन्त्रण करने में समर्थ हो सकता है और जिस प्रकार की इच्छा करेगा उस प्रकार का विचार उठा सकता है परन्तु पदार्थ रूप में जो परिवर्तन आता है उसको नियन्त्रण नहीं किया जा सकता ।   
किसी भी कार्य के प्रारंभ करने से पहले संकल्प करना हमारी प्राचीन परम्परा रही है। हमारी वैदिक परम्परानुगत यज्ञ आदि जो भी शुभ कार्य करते हैं सर्वप्रथम  हम संकल्प पाठ से ही आरंभ करते हैं। संकल्प के माध्यम से व्यक्ति मजबूत बनता है, अन्दर से दृढ़, बलवान् होता जाता है। प्रत्येक क्षेत्र में हर प्रकार से उन्नति करने के लिए व्यक्ति को स्वयं को संकल्पवान बनाना चाहिए। जिसको मन में संकल्प कर लिया उसको व्यवहार में क्रियान्वयन करना ही है । जिसका संकल्प जितना मजबूत होता है उसको उतनी ही सफलता मिलती जाती है ।
संकल्प शक्ति को बढाने के लिए सबसे पहले हमें छोटे छोटे संकल्प लेने चाहिए जो कि हमारे लिये लाभदायक हों, हमारे जीवन के साथ-साथ अन्यों के लिए भी उपयोगी हों और उसको पूरा बल लगा कर तन-मन-धन से निष्ठा पूर्वक पूर्ण करना चाहिए। जैसे कि हम संकल्प ले सकते हैं प्रातः काल जल्दी उठने का और रात्रि को जल्दी सोने का और जिस समय का निश्चय किया हो उसी समय ही उठना और सोना चाहिए। इस प्रकार संकल्प लेकर पूरा करने से मन भी दृढ़ होता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
धीरे-धीरे बड़े-बड़े कार्यों का संकल्प लेना चाहिये जैसे कि “मुझे किसी भी परिस्थिति में सत्य ही बोलना है”, “मुझे कभी भी आलस्य नहीं करना है” “मैं कभी चोरी नहीं करूँगा, सदा पुरुषार्थ ही करूँगा” “मैं किसी के लिए भी कभी अपशब्द का प्रयोग नहीं करूँगा”, “कभी क्रोध नहीं करूँगा”, “ किसी से इर्ष्या-द्वेष नहीं करूँगा” “ मैं सदा गरीब,निर्धन,असहाय, जरुरतमन्द व्यक्तिओं की सहायता करूँगा” । इस प्रकार एक-एक संकल्प को लेकर जीवन भर निभाना चाहिए जिससे अपना जीवन भी सुधरता है, विकसित होता है,  स्वयं का विश्वास भी बढ़ता है साथ-साथ अन्य लोग भी उस व्यक्ति के ऊपर विश्वास करने लग जाते हैं कि- “यह व्यक्ति जो भी संकल्प लेता है, मन में जो ठान लेता है उसको करके ही छोड़ता है” और ऐसा विचार कर अनेक प्रकार से सहयोग भी करते हैं, इस प्रकार धीरे धीरे हम इसी संकल्प शक्ति के माध्यम से बड़े से बड़ा कार्य भी करने में समर्थ हो जाते हैं। शास्त्रों में भी शारीरिक शक्ति की अपेक्षा मानसिक शक्ति के महत्व को अधिक स्वीकार किया है। योग दर्शन के भाष्यकार लिखते हैं कि – “मानसिक-बल-व्यतिरेकेण कः दंडकारण्यं शून्यं कर्तुम् उत्सहेत्” अर्थात् केवल शारीरिक कर्म के द्वारा कौन भला मानसिक बल के बिना दंडकारण्य को शून्य करने में समर्थ हो सकता है ।  
संसार की सफलताओं का मूल मन्त्र है उत्कृष्ट मानसिक शक्ति, दृढ़ संकल्प शक्ति, इसी की प्रबलता से संसार में व्यक्ति को कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं रह जाता । अपार धन- संपत्ति हो, चाहे उत्कृष्ट विद्या हो, समाज में प्रतिष्ठा हो वा मान-सम्मान हो सब कुछ इसी साधन के माध्यम से व्यक्ति प्राप्त कर लेता है । लौकिक सफलताओं के साथ-साथ यह एक ऐसा आधार- स्तम्भ है जिसके द्वारा एक आध्यात्मिक व्यक्ति भी अपनी साधना क्षेत्र में सफल हो जाता है । यह एक ऐसी दिव्य विभूति है जिससे मनुष्य ऐश्वर्यवान् बन जाता और अकल्पनीय, अविश्वसनीय कार्यों को करते हुए सबको हतप्रभ कर देता है। संकल्प एक ऐसा कवच है जो कि धारण करने वाले को माता के समान सभी प्रकार के विपरीत अथवा विकट-परिस्थितिओं से निरन्तर रक्षा करता रहता है । किसी भी लौकिक अथवा आध्यात्मिक कामनाओं की पूर्ति का मूल मन्त्र संकल्प ही है । किसी भी सफल व्यक्ति के जीवन का यदि हम निरीक्षण करें तो ज्ञात होगा कि उसकी सफलता के पीछे अवश्य ही संकल्प का हाथ होगा ।
जब हम कोई लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं तो उसकी सिद्धि के लिए सर्व प्रथम दृढ़ संकल्प और उसके पश्चात् अत्यन्त उद्योग, कठोर पुरुषार्थ, एकाग्रता व तत्परता भी आवश्यक होता है । यह सत्य है कि संकल्प और पुरुषार्थ के बिना सफलता की सिद्धि नहीं होती। संकल्प से हमारी बुद्धि लक्ष्य के प्रति स्थिर रहती है और हम अन्तिम क्षण तक सक्रिय बने रहते हैं तथा बड़े से बड़ा अवरोधक तत्व भी हमारी सफलता को रोक नहीं सकते । कभी तमोगुण से प्रभावित होकर, तामसिक संकल्पों से युक्त होकर असत्य, अन्याय, अधर्म, अत्याचार, भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती, व्यभिचार आदि कर्मों के द्वारा अपना तथा दूसरों के जीवन को नष्ट न कर दें इसीलिए वेद में ईश्वर ने निर्देश दिया कि “तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु” अर्थात् मेरा मन सदा कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो, अपना तथा अन्यों की उन्नति के लिए प्रयत्नशील हो ।
जब भी हम कोई संकल्प लेते हैं और लक्ष्य कि ओर चल पड़ते हैं तो संकल्प की सिद्धि और हमारे बीच में अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ व्यवधान बनकर खड़ी हो जाती हैं तो हमें यहाँ अत्यन्त संघर्ष करना होता है । कोई व्यक्ति जब यह कहता है कि – “मैं तो इस कार्य को किसी भी प्रकार से करूँगा ही” तो वह कभी ना कभी सफल हो ही जाता है और ठीक इसके विपरीत जो व्यक्ति संकल्प ही नहीं लेता और कहता है कि मैं तो इस कार्य को नहीं कर पाऊंगा तो वह कभी भी सफल नहीं हो सकता । जब भी हमें किसी कार्य में असफलता मिलती है तब कभी भी हताश-निराश होकर संकल्प को छोड़ नहीं देना चाहिए । विचार करना चाहिए कि - हमारे सामर्थ्य में कहीं कुछ कमी हो, हमारी क्रिया करने की शैली में कमी हो, उस विषयक हमारा अनुभव न हो, अथवा साधनों में कोई न्यूनता हो, क्योंकि असफलता के पीछे यही मुख्य कारण होता है । न्याय शास्त्रकार ने भी कहा है कि – “कर्म-कर्त्रृ-साधन वैगुण्यात्” अर्थात् कर्म में कोई दोष हो, कर्ता में कोई दोष हो अथवा साधनों में कोई दोष हो तो सफलता नहीं मिलती । अतः दोषों को पहचानें और उनको दूर करने का प्रयत्न करें तभी हमारा संकल्प सफल हो पायेगा ।

सबसे बड़ा हमारा लक्ष्य है आनन्द की प्राप्ति, ईश्वर-प्राप्ति अथवा मोक्ष-प्राप्ति । इस महान् लक्ष्य के लिए हमें संकल्प भी उतनी ही महानता से, दृढ़ता के साथ  लेना होगा तथा उतना महान् घोर-पुरुषार्थ भी करना होगा । तो आइये हम सब संकल्पवान बनें और जीवन के अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक-सफल बनायें ।    

पुनर्जन्म का सिद्धान्त

वैदिक सिद्धान्तों में एक प्रमुख सिद्धान्त पुनर्जन्म भी है, जो कि मूल रूप में हमारे भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण आधार स्तम्भ है।इसी सिद्धान्त के आश्रय से समाज में अनेक प्रकार के क्रिया-व्यवहार सम्पादित किये जाते हैं । समाज का एक बहुत बड़ा भाग जैसे कि ब्राह्मण-वर्ग अथवा सभी गृहस्थ-लोग बड़े से बड़ा यज्ञानुष्ठान करते हैं अथवा बड़े से बड़ा परोपकार का कार्य करते हैं, इसका मुख्य आधार यह सिद्धान्त ही होता है । मुख्यतः राष्ट्र की समस्त सुरक्षा व्यवस्था, यदि इस सिद्धान्त को स्वीकार ही न किया जाये तो कदाचित संभव ही नहीं कि कोई सैनिक अपने परिवार के समस्त सुख-सुविधा को छोड़ कर सीमा पर जाकर वर्षा,गर्मी व शीत आदि सब कुछ सहन करते हुए बिना प्रयोजन के अपने आप को मृत्यु के हवाले करदे।‘प्रयोजनमनुद्दिश्यमन्दोऽपि न प्रवर्तते’ अर्थात् बिना प्रयोजन के तो मन्द से मन्द व्यक्ति भी किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता। आखिर बिना लाभ के कोई भला किसी कार्य को क्यों करे? न्याय दर्शन की परिभाषा के अनुसार भी-‘येनप्रयुक्तः प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्’ अर्थात् प्रयोजन उसी को ही कहते हैं कि जिससे प्रेरित होकर सभी प्राणी किसी न किसी कार्य में प्रवृत्त होते हैं। वही लाभ ही होता है जिसको लक्षित करके सभी मनुष्य अपना अपना व्यापार करते हैं, चाहे वह लाभ अभी प्राप्त हो,चाहे कुछ काल के पश्चात् या फिर मृत्यु के पश्चात् । चाहे कोई यज्ञानुष्ठान कर्त्ता हो या परोपकारी हो अथवा कोई सैनिक हो, सभी मनुष्य किसी न किसी रूप में यह मानते ही हैं कि हमें इन सब कर्मों का फल इसी जन्म में भले ही न मिले तो भी अगले जन्म में तो अवश्य मिल ही जायेगा।यह विश्वास ही है जो हमें उत्तम कर्मों को करने में प्रेरित करता है। परन्तु कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी लोग हैं,मुख्यतः पाश्चात्य सभ्यता व विचारों से युक्त लोग जो कि इस सिद्धान्त को स्वीकार ही नहीं करते। वे कहते हैं कि इस में कोई वास्तविकता नहीं है, ये केवल भ्रम, अन्धविश्वास, या मिथ्या परिकल्पना मात्र है ।

जब किसी एक विषय में दो प्रकार के भिन्न-भिन्न ज्ञान प्राप्त होते हैं तब हमारे मन में संशय उत्पन्न हो जाता है ‘संशयःउभयकोटिस्पृग्विज्ञानम्’, और ‘विमृश्यपक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः’ अर्थात् किसी विषय में संशय उठाकर पक्ष और प्रतिपक्ष पूर्वक विचार करकेसत्य पक्ष का निश्चय करना ही निर्णय है, जिससे यथार्थ ज्ञान होता है।तो आइये इस सिद्धान्त की सत्यता के ऊपर कुछ विचार करते हैं और निर्णय पर पहुँचते हैं कि यह पुनर्जन्म तथ्यतः होता भी है या नहीं ? क्योंकि बिना प्रमाण के किसी भी बात को स्वीकार करना बुद्धिमत्ता नहीं है अतः सबसे पहले हमें यह देखना है कि इस विषय में कौन सा प्रमाण उपलब्ध हो सकता है? प्रत्यक्ष,अनुमान या शब्द प्रमाण ? प्रायः हम देखते हैं कि सामान्य मनुष्य केवल प्रत्यक्ष वस्तु के ऊपर ही विश्वास करते हैं और जो वस्तु परोक्ष है या दिखाई नहीं देती ऐसी वस्तु के विषय में या तो संशय युक्त रहते हैं अथवा उसको स्वीकार ही नहीं करते परन्तु विद्वानों में अथवा ऋषियों में इससे विपरीत ही देखा जाता है। इसके विषय में शास्त्रकारों ने कहा भी है कि ‘परोक्ष प्रिया ही वै देवाः प्रत्यक्ष द्विषः’।पुनर्जन्म के विषय में भी सामान्य जन विश्वास नहीं करते क्योंकि यह प्रत्यक्ष का विषय नहीं है। और यदि कभी-कभार ऐसी कोई घटना सुनने में आती है अथवा जब कोई यह दावा करता है कि मुझे पिछले जन्म का स्मरण है या मैं पिछले जन्म में अमुक व्यक्ति के रूप में, अमुक परिवार में,अमुक गाँव में उत्पन्न हुआ था और ये सब मेरे सगे-सम्बन्धी थे। इस प्रकार की  बातों को सुन कर कुछ लोग पुनर्जन्म के ऊपर विश्वास कर लेते हैं। परन्तु यह सब विचारणीय अथवा परिक्षणीय है कि इस प्रकार की घटनाओं में कितनी वास्तविकता है क्योंकि पिछले जन्म के विषय में स्मरण होने और न होने में कुछ विद्वानों का मत भेद है।क्योंकि जिसको स्मरण हो रहा है केवल उसी का ही पुनर्जन्म मानेंगे, जो कि कभी-कभार ही कहीं अपवाद रूप में देखा जाता है तो फिर अधिकांश लोगों का अस्तित्व इससे पूर्व विद्यमान था या नहीं? यह प्रश्न खड़ा हो जायेगा ।यदि केवल पूर्व कि स्मृति के आधार पर ही पुनर्जन्म को स्वीकार करेंगे तो यह कोई सार्वभौम सिद्धान्त या नियम नहीं बन पता है । हम इस विषय को अनुमान प्रमाण के आधार पर विचार करेंगे अथवा इस विषय में शब्द प्रमाण क्या कहते हैं उनको उपस्थापित करने का प्रयत्न करेंगे क्योंकि जब प्रत्यक्ष प्रमाण में स्पष्टता न हो तो वहां अनुमान या शब्द प्रमाण का ही आश्रय लेना श्रेयस्कर होगा।

पुनर्जन्म के सिद्धान्त को समझने से पहले पुनर्जन्म होता क्या है इसको समझ लें तो अच्छा रहेगा। शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार जीवात्मा का नए शरीर के साथ सम्बन्ध हो जाना जन्म कहलाता है और जीवात्मा का उस शरीर से वियोग हो जाना मृत्यु कहलाती है ।मृत्यु के पश्चात् उस जीवात्मा का फिर से एक नए शरीर के साथ संयोग हो जाना ही पुनर्जन्म है । इस पुनर्जन्म में जीवात्मा तो वही एक ही होता है परन्तु यह दृश्यमान शरीर बदलते रहता है अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से परिवर्तित होता रहता है। तो पुनर्जन्म को समझने से पहले जीवात्मा की नित्यता को समझना बहुत आवश्यक है।
गीता में आत्मा की नित्यता के विषय में कहा है कि –नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयतिमारुतः(गीता 2.23)।इसका अर्थ है आत्मा नित्य है, आत्मा को न किसी अस्त्र-शस्त्र से काटा जा सकता है,न ही उसको अग्नि जला सकती है,जल उसको न भिगो सकता है और न ही वायु उसको सुखा सकती है।और भी कहा है कि –‘न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।अजो नित्यः शाश्वतो यं पुराणो न हन्यतेहन्यमाने शरीरे’।(गीता-2.20)  अर्थात् जीवात्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी नष्ट होता,ऐसा भी नहीं है कि कभी था ही नहीं और प्रकट हो गया हो। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत है और शरीर के नष्ट होने से भी नष्ट नहीं होता ।इस प्रकार उपनिषद् का भी वचन है कि ‘अजो ह्येकोजुषमाणोऽनुशेते’(श्वेताश्वेतरोपनिषद – 4-5),अर्थात् अनादि व नित्य जीव इस अनादि प्रकृति का भोग करता है । इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और जन्म-मरण के चक्र से अनेक शरीरों को प्राप्त होता रहता है।

 आइये इस विषय को सबसे पहले हम एक गुरु-शिष्य संवाद या प्रश्नोत्तर के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
शिष्य- गुरु जी! यह पुनर्जन्म होता है वा नहीं ? इसको किस प्रकार समझें ?
गुरु-यह आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया। इसका उत्तर जानने के लिए मेरे कुछ प्रश्नों के उत्तर दो ।
शिष्य- ठीक है गुरु जी, आप प्रश्न कीजिये ।
गुरु- कर्म पहले और फल बाद में या फल पहले और कर्म बाद में, इन दोनों में न्याय पक्ष क्या है ?
शिष्य- गुरु जी! न्याय तो यही है कि कर्म पहले और फल बाद में।
गुरु- अब ये बताओ कि ये जो शरीर हमें प्राप्त हुआ है,यह मुफ्त में मिला है या कुछ कर्म का फल है ?
शिष्य- गुरु जी! ये तो कर्म का फल ही है क्योंकि मुफ्त में तो कुछ भी नहीं मिलता।
गुरु- यदि यह शरीर कर्म का फल है और कर्म पहले होना चाहिए तो वो कर्म आपने कब किया ?
शिष्य- गुरु जी! पिछले जन्म में ।
गुरु- देखिये आपने स्वयं स्वीकार कर लिया ना कि पिछले जन्म में आपने कर्म किया और यह आपका वर्त्तमान जन्म है, तो हो गया न पुनर्जन्म ?
शिष्य- हाँ गुरु जी! अब समझ में आ गया। धन्यवाद् गुरु जी ।
हम इस संवाद से समझ सकते हैं कि पुनर्जन्म होता है ।
हम इस संसार में देखते हैं कि सभी मनुष्य अलग अलग वातावरण, माता-पिता, या साधन-सुविधाओं से युक्त जन्म ग्रहण करते हैं अर्थात् कुछ  बच्चे गरीब व निर्धन माता-पिता के घर, झोपड़ पट्टी व गन्दे वातावरण में जन्म लेते हैं जिनको कि अच्छा भोजन, वस्त्र, शिक्षा और अनेक ऐसे दैनिक व्यवहार के साधन भी उपलब्ध नहीं हो पाते, इसके विपरीत कुछ बच्चे उत्तम व कुलीन माता-पिता के यहाँ जन्म लेते हैं जो कि धन-सम्पत्ति से और सब प्रकार के उत्तम साधन-सुविधाओं से युक्त रहते हैं। उनको उत्तम से उत्तम भोजन और वस्त्र प्राप्त होते हैं अच्छे से अच्छे स्कूल-कॉलेजों में अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त होती है, जो कि उन गरीब बच्चों को कभी सपने में भी नसीब न हो।इस पृथक-पृथक स्थितियों का कुछ न कुछ अवश्य ही कारण होगा और उसका कारण है इनका कर्म क्योंकि सांख्यकार ने भी इसका समाधान करते हुए कहा है कि ‘कर्म वैचित्र्यात् सृष्टि वैचित्र्यम्’(सांख्य-6.41)अर्थात् संसार में जो विविधता देखी जाती है,उसमें सभी मनुष्यों के कर्मों में पृथकता ही कारण है। हम यह भी देखते हैं कि कुछ बच्चों में बचपन से ही किसी किसी विषय में कुछ ऐसी विशेष रूचि, योग्यता या आचम्भित करने वाले कुछ विशेष-व्यक्तित्व प्रकट हो जाते हैं जो कि वर्त्तमान जन्म में उन्होंने किसी से उससे सम्बन्धित कोई विद्या या शिक्षा प्राप्त की नहीं होती और न ही कोई उनका अनुभव रहता है, फिर भी वो रूचि व योग्यता आयी कहाँ से? वो व्यक्तित्व प्रकट हुआ कहाँ से? इसका कारण क्या है ?इस प्रकार विचार करने पर हम यह स्वीकार करने में विवश हो जाते हैं कि वह व्यक्ति निश्चय ही इससे पहले कभी इस विषय में योग्यता प्राप्त किया होगा।
इससे भी यह सिद्ध हो जाता है कि उसका पुनर्जन्म हुआ है। हम यदि यह भी विचार करते हैं कि यह जो हमारा वर्त्तमान का जीवन है यह तो प्रत्यक्ष दिख ही रहा है परन्तु इससे पहले हम थे कहाँ ?क्या इससे पहले भी कोई जीवन था या नहीं ? क्योंकि अभाव से तो किसी भाव की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। मृत्यु के उपरान्त भी हमारी क्या गति होगी ?हम कहाँ जायेंगे? क्योंकि किसी भावात्मक पदार्थ का कभी विनाश होता ही नहीं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि हमारा यह पुनर्जन्म हुआ है और आगे भी जन्म अवश्य होगा।न्याय दर्शन के अनुसार ‘पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः’।(न्याय.- 3.1.18)जब हम किसी नवजात शिशु को देखते हैं तो यह पाते हैं कि बिना किसी वर्त्तमान कारण के वह शिशु कभी मुस्कुराता है तो कभी अचानक भयभीत हो जाता है और कभी रोने लग जाता है। इसका अर्थ है कि वह अवश्य ही किसी पिछली घटनाओं को स्मरण करता हुआ मुस्कुराने,घबराने या रोने आदि कि क्रिया कर रहा है। इससे भी पुनर्जन्म कि ही सिद्धि होती है।ठीक ऐसे ही ‘प्रेत्याहाराभ्यासकृतात् स्तन्याभिलाषात्’।(न्याय.- 3.1.21)यदि हम किसी गाय के नवजात बछड़े को देखते हैं, तो वह जन्म लेते ही दूध पीने के लिए अपनी माँ के स्तन को ढूंढने लग जाता है अथवा किसी बतख के बच्चे को या कुत्ते के पिल्ले को पानी में डाल दें तो वह तैरने लग जाता है। यह भी पूर्व जन्म के संस्कार और तदनुरूप स्मृति के कारण ही सम्भव हो पाता है।

इस विषय में योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि जी ने भी कहा है कि-‘जातिदेशकालव्यवहितानामपि आनन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोः एकरुपत्वात्’(योग-4.9)अर्थात् कर्मानुसार जीवात्मा मनुष्य,पशु,पक्षी,वृक्ष आदि भिन्न-भिन्न जातियों में वा योनियों में, भिन्न-भिन्न देशों में या स्थानों में और भिन्न-भिन्न काल में कर्म फलों को भोगने के लिए जन्म लेते रहता है। पहले जन्म में संग्रहित किये गए कर्मों के संस्कार उसके अनुरूप योनि के प्राप्त होने पर बाद वाले जन्म में भी प्रकट हो जाते हैं और वह उस प्रकार की क्रिया करने लग जाता है क्योंकि स्मृति और संस्कार की एकरूपता होने से।न्यायदर्शनकार महर्षि गौतम जी ने भी पुनर्जन्म को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘पुनरुत्पतिः प्रेत्यभावः’(न्याय-1.1.19) अर्थात् मृत्यु को प्राप्त होकर फिर से उत्पन्न हो जाना प्रेत्यभाव है अर्थात् जीवात्मा का एक शरीर को छोड़कर दुसरे शरीर को प्राप्त हो जाना ही पुनर्जन्म है।पुनर्जन्म की सिद्धि में इस प्रकार गीता में और भी प्रमाण उपलब्ध हैं जैसे कि –वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही।(गीता- 2.22) अर्थात् जिस प्रकार व्यक्ति जीर्ण-शीर्ण हुए पुराने वस्त्र को छोड़कर नये वस्त्रों को धारण कर लेता है ठीक ऐसे ही जीवात्मा जीर्ण हुए शरीर को छोड़कर नये शरीर को प्राप्त हो जाता है।‘देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति’(गीता- 2.13) जैसे हमारे शरीर में बाल्यावस्था,युवावस्था और बृद्धावस्था आदि परिवर्तित होते रहते हैं ठीक ऐसे ही जीवात्मा भिन्न-भिन्न शरीर को प्राप्त होता रहता है।

सांख्यकार महर्षि कपिल मुनि जी भी इसकी पुष्टि में कहते हैं कि ‘तद्बिजात् संसृतिः’।(सांख्य.- 3.3)अर्थात् जीव का विविध योनियों में सूक्ष्म शरीर के साथ संसरण होता है।‘आविवेकाच्च प्रवर्तनमविशेषाणाम्(सांख्य.- 3.4) अर्थात् जब तक विवेकज ज्ञान नहीं हो जाता तब तक जीव शरीर परिवर्तन करता रहता है। इस सिद्धान्त को स्वीकारते हुए योग दर्शनकार क्या कहते हैं आइये देखते हैं –‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः’।(योग.- 2.13) कर्माशय के मूल में अविद्या के होने पर उसका जो फल प्राप्त होता है वह हमें जाति(मनुष्य,पशु,पक्षी आदि का शरीर), तदनुरूप आयु और भोग के रूप में प्राप्त होता है।‘क्लेशमूल कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः’।(योग.- 2.12) अर्थात् क्लेश युक्त कर्माशय से हमें दो प्रकार से फल प्राप्त होता है, कुछ कर्मो के फल इसी जन्म में और कुछ कर्मों के फल अगले जन्म में मिलता है।योग दर्शन के भाष्यकार महर्षि व्यास जी ने – ‘स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढो अभिनिवेशः’। (योग- 2.9)इस सूत्र के भाष्य में भी कहा है कि–‘सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति मा न भूवं भूयासमिति। न चाननुभूतमरण धर्मकस्य एषा भवत्यात्माशीः। एतया च पूर्व जन्मानुभव प्रतीयते’। अर्थात् सभी प्राणी अपनी सत्ता में सदा विद्यमान रहना चाहते हैं,सभी कि यह इच्छा बनी रहती है कि मैं सदा बना रहूँ, मेरी सत्ता कभी नष्ट हो जाये या मैं न होऊं, ऐसा न हो।

मृत्यु से भय करने वाला न तो इस जन्म में अपनी मृत्यु का प्रत्यक्ष अनुभव किया है और न ही शब्द प्रमाण आदि से जाना है और इस प्रकार की भावना बिना मृत्यु के अनुभव किये संभव भी नहीं है, इसीलिए इसमें पूर्वजन्म का अनुभव ही प्रतीत (सिद्ध) होता है। योग दर्शनकार ने तो और भी स्पष्ट कर दिया कि –‘संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्(योग- 3.18)अर्थात् संयम पूर्वक संस्कारों का साक्षात्कार करने से पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है । निरुक्तकार महर्षि यास्क जी भी कहते हैं –‘मृतश्चाहं पुनर्जातो जातश्चाहं पुनर्मृतः,नाना योनि सहस्राणि मयोषितानि यानि वै। अवाङ्मुखः पीड्यमानो जन्तुश्चैव समन्वितः’।(निरुक्त- 13.19)अर्थात् मैं मृत्यु को प्राप्त हो कर फिर जन्म लिया और जन्म लेकर फिर मर गया, इस प्रकार असंख्य योनियों में मैंने निवास किया है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि सूक्ष्मतत्त्वदर्शी बह्मवेत्ता समस्त ऋषि- मुनियों ने भी इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त को एक स्वर में स्वीकार किया है। इस प्रकार वेद में भी इस सिद्धान्त कि पुष्टि में अनेक मन्त्र उपलब्ध हैं जिसको  कि चिन्तन-मनन करना हमारे लिए अत्यन्त ही आवश्यक है।‘अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतोऽमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः’।(ऋ- 1.164.38)अर्थात्यह अमरणधर्मा जीव कर्मानुसार मरण धर्मा शरीर के साथ कभी निम्न योनियों में तो कभी उत्कृष्ट योनियों में अपनी धारणा शक्ति से युक्त हुआ आना जाना करते रहता है ।समातुर्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिमा विवेश’। (ऋ.- 1.164.32)अर्थात् जीवों के अगले जन्मों का आदि और पीछे अन्त नहीं है ।
जीव जब शरीर को छोड़ते हैं तब आकाशस्थ हो गर्भ में प्रवेश कर और जन्म पाकर पृथिवी में चेष्टा से क्रियावान् होते हैं । ‘स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं  मातरं च’।(ऋ.- 1.24.2) अर्थात् वही परमेश्वर पृथिवी के बीच में हमको फिर जन्म देता है जिससे हम लोग फिर पिता और माता और स्त्री,पुत्र,बन्धु आदि को देखते हैं।‘सविता प्रथमेऽहन्नग्निर्द्वितीये वायु...(यजु.- 39.6) अर्थात् जब ये जीव शरीर को छोड़ते तब सूर्य आदि पदार्थों को प्राप्त होकर कुछ काल भ्रमण कर अपने कर्मों के अनुकूल गर्भाशय को प्राप्त हो शरीर धारण कर उत्पन्न होते हैं। ‘ये चित्पूर्व ऋतासाप ऋतावान ऋतावृधः, पितृन्तपस्वतो यम तांश्चिदेवापि गच्छतात्’(ऋ.- 10.54.4)अर्थात् जो पूर्णज्ञानी, सत्यनिष्ठ, यज्ञ करनेवाले,तपोनिष्ठ माता-पिता हैं उनको हे जीव! तू जन्मान्तर में पुनः प्राप्त हो । ‘ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः...गच्छतात्’।(ऋ.-10.154.3)  अर्थात् जो बलवान शूरवीर संग्राम में लड़ते हुए अपने शरीर को भी त्याग देते हैं,तू जन्मान्तर में उन्हें प्राप्त हो ।इतने सारे शब्द प्रमाणों से यह तो सिद्ध हो ही गया कि पुनर्जन्म होता है ।परन्तु कुछ लोग जो यह कहते  हैं कि यदि पुनर्जन्म होता है तो पिछले जन्मों का स्मरण क्यों नहीं होता है? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता कि जीवात्मा अल्पज्ञ होने से भूल जाता है,अतः अपवाद को छोड़कर अधिकांश को स्मरण नहीं रख पाता। पिछले जन्म की बात तो दूर रही हमको तो इस जन्म की ही, बाल्यावस्था की या कुछ दिन पहले की घटना ही स्मरण नहीं होती।
जीवात्मा की अल्पज्ञता में कुछ प्रमाण प्रस्तुत है –‘तया मामद्यमेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा’।(यजुर्वेद- 32.14)अर्थात्हे ज्ञानस्वरुप परमेश्वर! मुझ अल्पज्ञ को उत्तम मेधाबुद्धि से युक्त करके आज ही मेधावी बना दीजिये ।

अचिकित्वाश्चिकितुषश्चिदत्र कवीन्पृच्छामि विद्मने न विद्वान् (ऋ.- 1.164.6)अर्थात्मैं अविद्वान्,अल्पज्ञ इस विद्या व्यवहार में अज्ञान रूपी रोग को दूर करने वाले आप्त विद्वानों को विशेष जानने के लिए पूछता हूँ ।न वि जानामि यदि वेदमस्मि...(ऋ.- 1.164.37)अर्थात् अल्पज्ञता आदि के कारण साधन रूप इन्द्रियों के विना जीव सिद्ध करने योग्य वस्तु को नहीं ग्रहण कर सकता ।इससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा भुलक्कड़ है अतः पिछले जन्म का स्मरण तो संभव नहीं है और स्मरण न हो तो ही अच्छा है क्योंकि यदि स्मरण होने लगे तो पिछले जन्म में हुए सभी दुःखयुक्त घटनाओं को स्मरण करके और अत्यन्त दुखी हो जायेगा तथा जब नया शरीर धारण कर ही लिया तो पिछले जन्म के सभी सम्बन्ध भी निरर्थक हो जाते हैं,उनसे कोई मतलब ही नहीं रह जाता क्योंकि प्रायः ऐसा देखा गया भी है कि जब किसी व्यक्ति को स्मरण हुआ भी है तो उसको पिछले परिवार वाले ले भी नहीं सकते किन्तु वर्त्तमान के सम्बन्धी वा परिवार वालों के साथ ही रहना पड़ता है। इस सिद्धान्त को आधार बना कर कुछ लोग अवतारवाद और श्राद्ध क्रिया आदि को भी स्वीकारकरते हुए समाज में ऐसे अनेक गलत परम्परा व अन्धविश्वास फैला रखे हैं जो कि वैदिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है और प्रमाणों से सत्य भी सिद्ध नहीं होता।और एक अन्तिम बात – जो व्यक्ति गीता के इस वाक्य ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतंकर्म शुभाशुभम्’ और योगदर्शन का सूत्र –‘ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्’ के अनुसार यह समझ लेगा कि किये गए कर्मों का फल अवश्य भोगना ही पड़ेगा और पुण्य कर्म का फल सुख और पाप कर्म का फल दुःख रूप में ही प्राप्त होगा, तो वह कभी भी अन्याय,अधर्म,झूठ,छल-कपट,अत्याचार,अनाचार,भ्रष्टाचार आदि असत्य-व्यवहारों में रूचि नहीं दिखायेगा और सदा सत्यनिष्ठ व सत्याचरण करने वाला बन जायेगा,जिससे व्यक्ति के साथ समाज का भी सुधार व कल्याण होगा। अतः इस पुनर्जन्म के वैदिक सिद्धान्त को इन तर्क,हेतु और प्रमाणों के आधार पर अच्छी प्रकार से विचार व चिन्तन-मनन करके इसकी वास्तविकता को जानें,मानें व स्वीकार करें और अपने क्रिया व्यवहारों को उत्तम बनाते हुए इस जन्म में भी और अगले जन्मों में भी सुख शान्ति को प्राप्त करके अन्त में नित्य स्थायी सुख मोक्ष को भी प्राप्त कर लें। इन शुभेच्छाओं के साथ ...लेख आचार्य नवीन केवली 

जन्म एवं मृत्यु विवेचना

लेख प्रस्तुति कर्ता :- आचार्य नवीन केवली   
समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए परम पिता परमेश्वर ने इस सृष्टि की रचना की, यह शरीर भी बनाया और शरीर को उत्पन्न करने के साथ ही मृत्यु नामक एक वस्तु भी बनायी है तथा इस नियम के साथ बांध भी दिया कि जब-जब शरीर की उत्पत्ति होगी तब-तब मृत्यु भी सुनिश्चित होगी। लोग इस सृष्टि को कुछ मात्रा में समझते हैं, प्रयोग भी करते हैं, इसी प्रकार इस शरीर को भी कुछ मात्रा में जानते हैं और उसका उपयोग भी करते हैं परन्तु लोग इस मृत्यु के स्वरूप को सही रूप में समझते नहीं हैं और अपने लिए उसको हानिकारक मानते हुए घृणा करते हैं, उससे दूर रहना चाहते हैं, बचना चाहते हैं, उसको कोई भी प्राणी प्राप्त करना नहीं चाहता, यदि हठात् किसी की मृत्यु हो भी जाये तो सभी सगे-सम्बन्धी अत्यन्त दुखी हो जाते हैं और शोक सागर में डूबे रहते हैं ।

वास्तविक रूप में देखा जाये तो इस शरीर से जीव का संयोग मात्र होना ही जन्म कहलाता है और शरीर से वियोग होने का नाम ही तो मृत्यु है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जिस समय हमारा शरीर के साथ संयोग होकर जन्म होता है उसी समय मृत्यु का भी जन्म होता है और वह जीवन भर हमारे साथ चलती रहती है । जब भी अवसर देखती है तो हमें अपने गोद में ले लेती है, यह एक व्यवस्था मात्र है । कुछ लोगों का मानना यह है कि मृत्यु सबसे बड़ा दुःख है, मृत्यु सबसे भयंकर व डरावनी होती है परन्तु यह भी सत्य है कि दुःख तो जिन्दगी देती है, मौत तो दुःख से छुटकारा दिलाती है। यह तो सत्य ही है कि जब हमारी मृत्यु होती है तब संसार के सभी वस्तुओं से, सभी प्रकार के सुख व सुख-साधनों से और समस्त सगे-सम्बन्धियों से हमारा वियोग हो जाता है परन्तु उन सब के वियोग होने मात्र से ही दुखी होना उचित नहीं है। हमारी मिथ्या धारणा के कारण ही हम मृत्यु को स्वीकार नहीं करते और मृत्यु से भयभीत होते हैं, उससे बचना चाहते हैं। यदि हमें वास्तविक ज्ञान हो जाये अथवा उचित शिक्षा मिल जाये तो हम इस मृत्यु के दुःख से बच सकते हैं । हमें अपने  व्यवहार में, सोच में कुछ बदलाव लाने पड़ेंगे तभी हम इन अवश्यम्भावी परिस्थितियों में खुद को सामान्य रखते हुए दु:खी होने से स्वयं को बचा सकते हैं ।

इसको हम इस प्रकार समझ सकते हैं जैसे कि - एक बालक का वस्त्र पुराना हो जाता है अथवा फट जाता है तो उस बालक की माँ उस वस्त्र को बदल देती है और उसे नया वस्त्र धारण करवा देती है। वैसे ही हमारी जगत-माता परमेश्वर भी जब हमारे शरीर रूपी वस्त्र को देखती है कि यह तो जीर्ण-शीर्ण हो गया है, किसी दुर्घटना के कारण विदीर्ण हो गया है, हमारे रहने के लिए अथवा धारण करने हेतु उपयुक्त नहीं है तो उसी समय उसको बदल कर नए वस्त्र के रूप में एक नया शरीर धारण करा देती है। ऐसी स्थिति में कोई मन्द-बुद्धि बालक ही होगा जो कि अपनी माता जी के द्वारा फटे-पुराने वस्त्र के बदल दिए जाने पर दुखी होगा, रोयेगा, चिल्लायेगा ।

हम स्वयं यह निरीक्षण करके देख सकते हैं कि जब भी हमारा कोई वस्त्र फट जाये या पुराना हो जाये तो उसको बदलने में संकोच नहीं करते, भय-भीत नहीं होते अथवा दुखी नहीं होते बल्कि हम स्वयं उसको निकाल कर उसके स्थान पर कोई सुन्दर व नया वस्त्र धारण करना पसन्द करते हैं ।जब इस वस्त्र के साथ हमारा व्यवहार इस प्रकार का होता है तो फिर हम शरीर के साथ उससे भिन्न प्रकार का व्यवहार क्यों ? जैसे हम एक अन्तर्वस्त्र के ऊपर और भी एक-दो वस्त्र पहनते हैं, ठीक वैसा ही यह शरीर रूपी वस्त्र है जिसको कि जीवात्मा धारण करता है। यह प्रकृति का नियम है कि प्रत्येक उत्पन्न हुए वस्तु की कुछ समय सीमा भी होती है, भेद मात्र इतना है कि शरीर को ढकने हेतु जो वस्त्र हम धारण करते हैं उसकी समय-सीमा कुछ दो,तीन,चार वर्षों की होती है और जीवात्मा जिस शरीर रूपी वस्त्र को धारण किया है वह दस,बीस, पचास,सौ तक चलती है परन्तु अंत में विनाश तो होना ही है। दोनों के व्यवहार में यदि हम समान बुद्धि बनाकर रखें तो दुःख को दूर किया जा सकता है। और एक मिथ्या ज्ञान के कारण हम दुखी होते हैं जैसे कि “शरीर के नष्ट होने पर मैं भी नष्ट हो जाऊँगा, मेरा भी अस्तित्व समाप्त हो जायेगा” जो कि हमें स्वीकार्य नहीं है । आत्मा को हम यदि नित्य मानें तो दुःख से प्रभावित नहीं होंगे ।  

वास्तव में कोई भी बच्चा व्यवहारों को समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, लोगों का व्यवहार, परम्पराओं को देख कर ही सीखता है। समाज में वह देखता कि किसी के वियोग अथवा मृत्यु होने पर लोग दुखी होते हैं व रोते हैं, शोक मनाते हैं इसीलिए इन व्यवहारों को देखते हुए वह भी शोकाकुल होता है। यदि किसी बालक को बाल्यकाल से ही इस शरीर को वस्त्र के समान मानकर ही व्यवहार करना सिखाया जाये तो इन परिस्थितिओं में वह कभी भी दुखी नहीं होगा ।
ठीक इसी प्रकार जब हम किसी गन्तव्य स्थल पर जाते हैं तो उसके लिए किसी यान-वाहन आदि साधन का प्रयोग करते हैं और लक्ष्य प्राप्ति हो जाने पर उस साधन का परित्याग भी कर देते हैं, किसी-किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तो हमें अनेकों साधन बदलने पड़ते हैं और अगले साधनों के लिए पिछले साधनों को छोड़ना ही पड़ता है, ठीक ऐसा ही हम सब का लक्ष्य एक ही दुःख निवृत्ति और सुख प्राप्ति है, भिन्न शब्द में कहें तो मोक्ष प्राप्ति ही है और उस लक्ष्य की प्राप्ति का साधन यह शरीर है। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ऐसे अनेक शरीर रूपी साधन बदलने पड़ते हैं। प्रायः किसी यात्रा में जब हम किसी साधन को छोड़ कर दूसरे साधन को पकड़ते हैं तो हमें कोई दुःख भी नहीं होता परन्तु जब हम मोक्ष रूपी लक्ष्य के लिए शरीर बदलते हैं तो दुःख होता है। ऐसा क्यों ?

वास्तव में यह हमारी मिथ्या मान्यता के कारण ही होता है। हम ऐसा मानते हैं कि हमारा यह शरीर ज्यों का त्यों बना रहे परन्तु ऐसा होता नहीं है और यह वास्तविकता भी नहीं है क्योंकि कोई भी उत्पन्न हुआ पदार्थ कभी नित्य हो ही नहीं सकता। यह शरीर भी उत्पन्न होने से अनित्य ही है। यदि हम इसको अनित्य ही मानें और पहले से ही मन में बसा लें कि यह कभी भी नष्ट हो सकता है, कभी भी यह वस्त्र बदलना पड़ सकता है अथवा लक्ष्य प्राप्ति के लिए कभी भी साधन बदलना पड़ सकता है तो हमें दुःख नहीं होगा। जब सत्यता को, वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए हम अभ्यस्त हो जायेंगे, पूर्व से ही बार-बार उस सम्भावित घटनाओं की आवृत्ति करते रहेंगे तो अंत में उस स्थिति को सहर्ष स्वीकार कर लेंगे। अपने शरीर को छोड़ना पड़े अथवा अपने सगे-सम्बन्धियों से अलग होना पड़े, यदि हम पूर्व से ही मानसिक सज्जा कर लेंगे और उस आने वाली स्थिति के स्वागत में तैयार खड़े होंगे तो कभी भी दुःख नहीं होगा। उस स्थिति का सामना करते हुए हम कहेंगे कि यह तो हमने पहले से सोच रखा था, यह तो हमें पहले से विदित था, यह कौन सी नयी बात है ? वास्तव में हमें दुःख का अनुभव तब होता है जब हमारी मान्यता के विपरीत कोई घटना घट जाती है। हमारी मान्यता रहती है कि हमारे सम्बन्धी लोग हमसे कभी भी अलग नहीं होंगे और जब इसके विपरीत स्थिति हमारे सामने आ जाती है हमारे परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो हम कहते हैं कि यह क्या हो गया ? मैंने तो कभी ऐसा सोचा भी नहीं था। यही तो हमारी कमी है कि हमने पहले से क्यों नहीं सोचा जो कि अवश्यम्भावी था। इसीलिए हमें उचित है कि पहले से ही इस विषय में सोच-विचार कर तैयार रहें जिससे कि दुःख न हो।

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम् ,भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्री ।
इत्थं विचिन्तयति कोषगते द्विरेफे, हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ।
रात्रि समाप्त होगी, प्रातः काल होगा, सूर्य उदय होगा और कमल खिलेंगे और इस प्रकार मैं मुक्त हो जाऊँगा । कली के भीतर बंद भौंरा ऐसा विचार ही रहा था कि हा शोक ! इतने में एक हाथी आकर कमल को तोड़कर निगल गया । अतः जीवन का कोई विश्वास ही नहीं कि अभी श्वास ले रहे हैं परन्तु अगले क्षण का पता नहीं कि जीवित रहेंगे या नहीं ।  



आध्यात्मिक व्यक्ति का व्यवहार



लेख प्रस्तुति कर्ता – आचार्य नवीन केवली

 हम सब प्रायः संसार की समस्याओं के थपेड़ों से परेशान हो कर अपनी आन्तरिक शान्ति के लिए वा वास्तविक सुख के लिए कभी न कभी आध्यात्मिकता की ओर आशा भरी नजरों से बाट ताकते ही हैं। संसार में अनेक प्रकार की समस्याओं से, दुखों से,पीडाओं से,बाधाओं से, प्रताड़ित होकर उन सबसे छुट्कारा पाने के लिए अनगिनत उपायों को करने के पश्चात् जब हमें निश्चय हो जाता है कि इन सब उपायों से हमारा वास्तविक समाधान होने वाला नहीं है तब हम किसी ऐसे उपाय का अन्वेषण करने लग जाते हैं जहाँ नितान्त शान्ति हो। जब एक जिज्ञासु व्यक्ति अपने जैसे अन्य सामान्य सांसारिक लोगों को देखता है और अपने आप को भी उनसे तुलना करके देखता है तो उसको लगता है कि यहाँ तो सारा संसार ही इन सब समस्याओं से, दुःखों से पीडाओं से पिसा जा रहा है, सभी मनुष्य उस सुख-शान्ति की खोज में लगे हुए हैं । वह जिज्ञासु जब एक योगी महात्मा, वैराग्यवान् व्यक्ति को देखता है तो वहाँ फिर उन लौकिक और आध्यात्मिक दोनों व्यक्तिओं में वह तुलना करके देखता है कि कौन अधिक सुखी है ?



जब हम सांसारिक चिन्ताओं से मुक्त किसी वैरागी, साधु, अथवा सर्वथा राग-द्वेष से रहित, सांसारिक बन्धनों से निर्लिप्त किसी अवधूत संन्यासी को देखते हैं तो हमें लगता है कि वास्तव में यही व्यक्ति पूर्ण तृप्त है, इसी को ही स्थायी सुख की प्राप्ति है। इस व्यक्ति के शरण में चले जायें अथवा इसके जैसा यदि हम भी बन जायें तो हमें भी चिर-शान्ति की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार हम इस आध्यात्मिक मार्ग की ओर मुड जाते हैं, आध्यात्मिक जगत में प्रविष्ट हो जाते हैं । वास्तव में बाह्य आडम्बरों व साधनों को देखकर यह बताना कठिन हो जाता है कि यथार्थ रूप में कौन व्यक्ति कितना सुखी है और कौन कितना दु:खी है। कोई व्यक्ति गोरा है तो वह ज्यादा सुखी होगा और कोई काला है तो दु:खी होगा, कोई रूपवान् है तो सुखी और कुरूप हो तो दु:खी, कोई धनवान् हो तो सुखी और गरीब हो तो दुखी, कोई अच्छे-सुन्दर कपडे पहने तो सुखी और कोई फटी-पुरानी पहने तो दु:खी हो, कोई व्यक्ति अधिक से अधिक शास्त्रों को पढ़ लिया, विद्वान् बन गया, डिग्रियों को प्राप्त कर लिया हो, तो वह सुखी रहता हो, और कोई ज्यादा पढ़ा-लिखा न हो तो वह दुःखी होता हो, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि इन सबसे सुख-दुःख का कोई सम्बन्ध नहीं है।


वास्तव में देखा जाये तो सुख-दुःख का आना तथा उस सुख-दुःख से प्रभावित होकर सुखी-दुखी होना केवल मन के ऊपर ही निर्भर होता है। एक व्यक्ति सामान्य दुःख से भी घबरा जाता है, हताश-निराश व परेशान हो जाता है और एक व्यक्ति के जीवन में पहाड़ जितना दुःख आने पर भी वह दुखी नहीं होता। ठीक ऐसे ही एक व्यक्ति के जीवन में थोडा सा भी सुख मिल जाये तो वह अत्यन्त हर्षित व भावुक हो जाता है और इस के विपरीत एक व्यक्ति सुख का समुद्र भी सामने हो तो शान्त व सामान्य रहता हुआ प्रभावित नहीं होता। इस प्रकार एक सांसारिक व्यक्ति के व्यवहार और एक आध्यात्मिक व्यक्ति के व्यवहार में बहुत ही अन्तर देखा जाता है। दोनों का ही व्यवहार भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है परन्तु जैसे लौकिक लोग दो प्रकार का व्यवहार करते हैं ठीक ऐसे ही एक आध्यात्मिक व्यक्ति का व्यवहार भी दो प्रकार का होता है।


किसी नीतिकार ने कहा है कि “मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्” अर्थात् जो व्यक्ति मन-वाणी और कर्म से पृथक-पृथक व्यवहार करता है उस प्रकार के व्यक्ति को दुरात्मा कहा गया है। परन्तु यह एक विचारणीय विषय है क्योंकि एक अध्यात्मिक योगाभ्यासी भी अन्दर और बाहर के व्यवहारों में भिन्नता रखता है। हमें यह जानना चाहिए कि – एक योगाभ्यासी का व्यवहार कैसे होता है ? एक योगाभ्यासी का व्यवहार भी बाहर कुछ भिन्न होता है और अन्दर कुछ भिन्न प्रकार का होता है, फिर भी लौकिक व्यक्तिओं से पृथक ही होता है।

एक योगाभ्यासी भले ही बाहर से किसी से बातचीत करते रहता है, किसी को उपदेश करते रहता है परन्तु अन्दर से वह ईश्वर के साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध बनाये रखता है, आन्तरिक रूप से कभी ईश्वर के साथ सम्बन्ध टूटने नहीं देता। ईश्वर की उपस्थिति, ईश्वर की अनुभूति मन में सतत बनाये रखता है। मन में ईश्वर-प्रणिधान, ईश्वर के प्रति प्रेम, भक्ति, श्रद्धा बनाये रखता है। समस्त बाह्य क्रिया-कलापों को करते हुए भी आन्तरिक कार्यों में संलग्न रहता है। उसका यदि कहीं पर सम्मान हो रहा हो तो बाहर से वह प्रसन्न मुद्रा में दिखाई देता है परन्तु अन्दर से सम्मान को विष तुल्य मानकर उससे निस्पृह रहता है। बाह्य रूप से किसी से हँसी-मजाक करते हुए भी आन्तरिक रूप से गम्भीर रहता है। बाह्य रूप में किसी के प्रति क्रोध दिखाता हुआ भी आन्तरिक रूप में क्रोध-रहित मन्यु से युक्त रहता है। बाह्य साधनों की न्यूनता के कारण भले ही दुखी-परेशान दिखाई दे परन्तु अन्दर से शान्त-तृप्त और आनन्द से युक्त रहता है। बाहर से भले ही एक भिखारी या गरीब जैसा दीखता हो परन्तु अन्दर वह एक चक्रवर्ती सम्राट की तरह अनुभव करता रहता है । शय्या पर विश्राम करता हुआ, किसी आसन या कुर्सी पर बैठा हुआ, मार्ग पर चलता हुआ, अन्य किसी भी कार्य में लगा हुआ सदा ईश्वर के आनन्द स्वरूप में मग्न रहता है तथा अपने आन्तरिक कार्यों से सम्बद्ध रहता है। अपने चित्त के अन्दर विद्यमान अनेक दुर्गुण-दुर्व्यसनों को, अविद्या आदि क्लेशों को सदा ईश्वर के सान्निध्य में रहता हुआ नष्ट करने का प्रयत्न वा पुरुषार्थ करते रहता है ।  


इससे ठीक विपरीत लौकिक व्यक्ति बाहर भले ही सुखी व प्रसन्न दिखाई दे परन्तु अन्दर से अत्यन्त दुखी रहता है। लोभ,मोह,इर्ष्या,द्वेष,काम,क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं से पीड़ित रहता है और योगाभ्यासी इन सबसे अछूता रहता है। इन सब व्यवहारों को देखने से पता चलता है कि नीतिकार के उस वाक्य का तात्पर्य कुछ पृथक ही है। जो व्यक्ति अन्दर से ईश्वर के प्रति श्रद्धा-विश्वास न रखता हुआ भी लोगों के सामने यह दिखावा करता है कि – “मैं एक आध्यात्मिक व्यक्ति हूँ”। जो व्यक्ति अपने माता-पिता, गुरु आचार्यों के प्रति सम्मान की भावना न रखता हुआ भी बाहर दिखाता है, ऐसा व्यक्ति दुरात्मा कहलाता है। मुख्यतया वे लोग दुरात्मा कहलाने के योग्य हैं जो भलीभांति वेद की आज्ञा को जानते हैं और उसको अन्दर से यथार्थ रूप में पालन भी नहीं करते फिर भी सबके सामने स्वयं को प्रदर्शित करते हैं कि हम वेद को मानते हैं। दुरात्मा वह होता है जो यह दिखाता है कि मैं ईश्वर की उपासना कर रहा हूँ ध्यान कर रहा हूँ परन्तु अन्दर से न ईश्वर के प्रति और न आध्यात्मिक क्रियाओं के प्रति  उसके मन में कोई श्रद्धा-भक्ति होती है, सब सांसारिक विचार ही चलते रहते हैं।
आध्यात्मिक व्यक्ति वह कहलाता है जो वेद को, ईश्वरीय आज्ञाओं को अन्दर से व्यावहारिक रूप में मन-वचन-कर्म से मानता है। ईश्वर को सदा सर्वत्र उपस्थित जानता हुआ कभी भी असत्य, अन्याय, अधर्म आदि से युक्त व्यवहार नहीं करता । तो आईये हम भी समस्त क्रियाओं को करते हुए भी ईश्वर के साथ जुड़े रहें और एक सच्चा आध्यात्मिक बनते हुए अपने जीवन के लक्ष्य को सिद्ध करें .....

  

आत्मा और परमात्मा

वैदिक सिद्धान्त के अनुसार तीन सत्तायें नित्य स्वीकार की गयी हैं। ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इनमें ईश्वर और आत्मा चेतन हैं, जबकि प्रकृति जड़ है। इन तीनों में कुछ समानतायें भी हैं और कुछ भेद भी। तीनों की समानता यह है कि तीनों अनादि, नित्य व सत्तात्मक हैं। भेद यह है कि ईश्वर एक है, आत्मा अनेक(असंख्य) हैं। ये दोनों ही किसी का उपादान कारण नहीं बनतीं परन्तु प्रकृति जड़ होने से अन्य भौतिक वस्तुओं का उपादान कारण बनती है । प्रस्तुत लेख में हम आत्मा और परमात्मा के विषय में ही विचार करेंगे।

आत्मा का स्वरुप :- न्याय दर्शन के अनुसार “इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनो लिंगमिति” अर्थात् इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आत्मा के लक्षण हैं। इनके माध्यम से आत्मा के अस्तित्व का बोध होता है। “प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवन मनोगातीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयात्नाश्चात्मनो लिंगानि” (वैशेषिक दर्शन – ३.२.४.) अर्थात् प्राण को बाहर निकालना, प्राण को बाहर से भीतर लेना, आँख मींचना, आँखें खोलना, प्राण धारण करना, निश्चय करना, स्मरण करना और अहंकार करना, चलना सब इन्द्रियों को चलाना, क्षुधा-तृषा, हर्ष-शोक आदि का होना जीव के लक्षण है। “जन्मादिव्यवस्थातः पुरुषबहुत्वम्” (सांख्य –1.149) अर्थात् संसार में एक ही काल में किसी का जन्म हो रहा है, किसी की मृत्यु हो रही है, इन्हें देख कर यही ज्ञात होता है कि आत्माएं अनेक हैं। “इदनीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेद:” (सांख्य – 1.151) अर्थात् वर्त्तमान समय में पुरुषों का अत्यन्त अभाव न होना ही इस बात का प्रमाण है कि आत्माएं मुक्तिकाल को भोग कर पुनः जन्म लेती हैं।
इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ-प्रकाश में लिखते हैं कि “ दोनों (आत्मा-परमात्मा) चेतन स्वरुप हैं, स्वभाव दोनों का पवित्र है, अविनाशी और धार्मिकता आदि है परन्तु परमेश्वर के सृष्टि-उत्पत्ति, स्थिति,प्रलय, सबको नियम में रखना, जीवों को पाप-पुण्य रूप फलों का देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं और जीव के संतानोत्पत्ति, उनका पालन,शिल्प-विद्या आदि अच्छे बुरे कर्म करना है।
“आत्मा परिछिन्न है, जीव का स्वरुप अल्पज्ञ, अल्प अर्थात् सूक्ष्म है” (सत्यार्थ-प्रकाश) । आत्मा जब शरीर धारण करती है तभी उसका नाम जीवात्मा होता है। वह अपने द्वारा कृत कर्मों का फल स्वयं भोगती है, “स ही तत्फलस्य भोक्तेति” अन्य नहीं। आत्मा अच्छे-बुरे कर्मों को करने में स्वतन्त्र हैं “स्वतन्त्रः कर्ता” किन्तु कृत कर्मों के फल भोगने में पराधीन है इसीलिए अच्छे कर्मों का फल सुख और बुरे कर्मों का फल दुःख रूप में भोगना पड़ता है। यह संक्षेप में आत्मा का स्वरुप है।
परमात्मा का स्वरुप :- महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के शब्दों के अनुसार, ईश्वर सच्चिदानंदस्वरुप, निराकार,सर्वशक्तिमान,न्यायकारी,दयालु,अजन्मा,अनन्त,निर्विकार,अनादि,अनुपम,सर्वाधार, सर्वेश्वर,सर्वव्यापक,सर्वान्तर्यामी,अजर,अमर,अभय,नित्य,पवित्र और सृष्टिकर्ता है। इसके अतिरिक्त स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में अनेकों गुण वाचक नाम से ईश्वर के स्वरुप को दर्शाया है, जैसे कल्याणकारी होने से शिव और दुष्टों को पीड़ा देने से रूद्र आदि।
योग दर्शन में बताया गया है कि “क्लेशकर्मविपाकाशयै: अपरामृष्ट: पुरुषविशेष: ईश्वरः” अर्थात् अविद्या आदि पांच क्लेश, सकाम कर्म, उन कर्मों के फल, और संस्कारों से रहित जीवात्माओं से भिन्न स्वरुप वाला ईश्वर होता है । और भी कहा - “स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्” ( योग.) वह ईश्वर गुरुओं का भी गुरु, आदि गुरु है। “तस्य वाचकः प्रणवः” अर्थात् उस परमेश्वर का मुख्य नाम है ‘ओ३म्’, उसी की उपासना करनी चाहिये ।
वेद में कहा भी गया है – “न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते” ...( अथर्ववेद ) अर्थात् ईश्वर केवल एक ही है, न दो है न तीन है, इस प्रकार दो, तीन आदि संख्या का प्रतिषेध करके अनेक ईश्वर के मत का खण्डन कर दिया है । “मा चिदन्यत् विशंसत सखायो मा रिषन्यत...अर्थात् हे विद्वानो ! व्यर्थ के चक्कर में मत पड़ो, परमैश्वर्यशाली परमात्मा को छोड़ कर और किसी की स्तुति मत करो। तुम सब मिल कर केवल एक आनंद वर्षक परमेश्वर की ही स्तुति करो । “एक एव नमस्यो विक्ष्वीड्य” ( अथर्व.) अर्थात् एक ही ईश्वर नमस्कार करने योग्य है। “एको विश्वस्य भुवनस्य राजा”- (ऋग.) अर्थात् सम्पूर्ण विश्व का एक ही राजा ईश्वर है। “ईशा वास्यमिदं सर्वं”...( यजुर्वेद.) ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है।
ईश्वर के मुख्य कार्य :-
१.सृष्टि की उत्पत्ति करना ।
२.सृष्टि का पालन वा संचालन करना ।
३.प्रलय का समय आने पर सृष्टि का विनाश करना ।
४.सृष्टि के प्रारंभ में वेदों का ज्ञान देना ।
५.समस्त जीवों को उनके कर्मानुसार सुख-दुःख रूप फल देना ।
 आत्मा के कार्य – आत्मा अपने गत कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेकर संसार में रहता हुआ शुभाशुभ कर्म करता है। प्रत्येक जन्म में उसे भिन्न-भिन्न माता-पिता आदि प्राप्त होते हैं। कभी कोई किसी का बच्चा बनता है तो कभी कोई किसी का माता-पिता आदि । संसार में रहते हुए चेतन व अचेतनों से अनेक प्रकार के सम्बन्ध को जोड़ता और तोड़ता है । भिन्न-भिन्न योनियों में जाता हुआ तदनुसार सन्तान उत्पन्न करता, पालन करता है।
 परन्तु आत्माओं के द्वारा प्राप्त सभी योनियों को तीन विभागों में बाँट सकते हैं। पहला है भोग योनि, दूसरा है कर्म-भोग योनि और तीसरा है कर्म योनि। भोग योनि वह है जहाँ केवल पिछले कर्मों का ही फल भोगना पड़ता है, बुद्धि-विवेकपूर्वक कर्म करने की सुविधा नहीं होती ।इस योनि में मुख्यतः जीवात्मा खाना,पीना,सोना,सन्तान पैदा करना आदि कार्य करता है। इस योनि में किये गए अच्छे-बुरे कर्मों का फल अगले जन्म में प्राप्त नहीं होता क्योंकि इसमें जीवात्मा के कर्म स्वाभाविक ज्ञान के आश्रित होते हैं, इसीलिए पाप-पुण्य, उन्नति-अवनति आदि का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जीवात्मा जब मनुष्य शरीर को प्राप्त करता है, तब उसे पिछले जन्मों के कर्मों का फल भी भोगना होता है और नये कर्म भी करने पड़ते हैं   इसीलिए इस योनि को ही कर्म-भोग योनि कहा जाता है। इस योनि में जीव को ईश्वर द्वारा एक विशेष प्रकार की बुद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सही-गलत का विवेचन करने में समर्थ हो पता है। तदनुसार कृत कर्मों का फल सुख-दुःख रूप में उसे भोगना पड़ता है। उसके द्वारा इस जन्म में किये गए अच्छे-बुरे कर्म ही आगामी जन्म का कारण बनते हैं। तीसरे प्रकार के कर्म योनि वाले जीव वो होते हैं जिनको कोई फल भोगना नहीं होता परन्तु वे केवल सृष्टि के अन्य प्राणियों के उपकार के लिए ही जन्म लेते, जो कि सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न हो कर अन्यों को वेद ज्ञान प्रदान करते हैं।
मनुष्य योनि में जीवात्मा के मुख्य कर्म कुछ निम्नलिखित हैं –
क. सर्वप्रथम इस योनि में जीवात्मा का लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होता है ।
ख. ज्ञान प्राप्ति और अज्ञान की समाप्ति करना।
ग. वेद का अध्ययन करना एवं वेदानुकुल जीवन-यापन करना ।
घ. ऋषियों के द्वारा प्रोक्त आश्रम-व्यवस्था तथा वर्ण-व्यवस्था का पालन करना।
ङ.  पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण और देव-ऋण से उऋण होना ।
च. ध्यान-उपासना, प्राणायाम आदि द्वारा प्रतिदिन आत्मा की शुद्धि करना ।
छ. मन-वचन-कर्म से एक रूपता रखते हुए सत्याचरण करना ।
ज. परोपकार की भावना को अधिक से अधिक बढ़ाना ।
आत्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध :- आत्मा और परमात्मा दोनों ही पृथक-पृथक नित्य सत्तायें हैं फिर भी अनादि कल से होने के कारण दोनों का सम्बन्ध भी अनादि है जैसे कि : -
ईश्वर पिता और जीवात्मा पुत्र
ईश्वर माता और जीवात्मा पुत्र
ईश्वर गुरु और जीवात्मा शिष्य 
ईश्वर मित्र और जीवात्मा मित्र
ईश्वर स्वामी और जीवात्मा सेवक
ईश्वर उपास्य और जीवात्मा उपासक
ईश्वर व्यापक और जीवात्मा व्याप्य ....इत्यादि और अनेक प्रकार के सम्बन्ध हैं ।..लेख आचार्य नवीन केवली