जैसा की आप सभी जानते है हर वर्ष की भांति राजधानी दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला 2017 इस बार 7 जनवरी से 15 जनवरी 2017 तक लगने वाला है. नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस पुस्तक मेले आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा एक बार फिर वेद, उपनिषद, सत्यार्थ प्रकाश आदि वैदिक साहित्य लेकर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है, सौजन्य से आर्य समाज, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
Tuesday, 13 December 2016
राख से बनी आग स्वामी श्रद्धानन्द
अपना धन अपनी
सम्पत्ति यहाँ तक की अपनी संतान को भी को राष्ट्र के लिए दान करने वाले इस वीर
सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद जी से भला कौन परिचित नहीं होगा! यदि कोई नहीं है तो
उसे सुन लेना होगा क्योंकि इतिहास में ऐसे उदहारण विरले ही कभी पैदा होते है. जब
हजारों सालों की गुलामी में लिपटा भारत इस गुलामी को अपना भाग्य समझने लगा था. जब भारतीयों
की चेतना भी गुलामी की जंजीर में इस तरह जकड दी गयी थी कि लोग आजादी के सूरज की
बात करना भी किसी चमत्कार की तरह मानते थे. ऐसे समय में इस भारत में स्वामी
दयानन्द सरस्वती जी की अगुवाई में धर्म और देश बचाने को एक आन्दोलन खड़ा हुआ जिसे
लोगों ने आर्य समाज के नाम से जाना. इसी आन्दोलन के सिपाही भारत माँ के एक लाल का
नाम था स्वामी स्वामी श्रदानंद जिसने स्वामी दयानन्द जी महाराज से प्रेरणा लेकर
आजादी की मशाल लेकर चल निकला गुलामी के घनघोर अँधेरे में आजादी का पथ खोजने. तब
गाँधी जी ने कहा था की आर्यसमाज हिमालय से टकरा रहा हैं. वो हिमालय था कई हजार साल
का पाखंड और हजारों साल की गुलामी. लेकिन चट्टानों से ज्यादा आर्य समाज के होसले कहीं
ज्यादा ज्यादा बुलंद निकले.
सन 1856
को पंजाब के जालंधर जिले के तलवन गाँव में जन्मे मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) के
निराशापूर्ण जीवन में आशा की क्षीण प्रकार रेखा उस समय उदय हुई, जब
बरेली में उन्हें स्वामी दयानन्द का सत्संग मिला. स्वामी जी के गरिमामय चरित्र ने
उन्हें प्रभावित किया. उस समय जहाँ भारतवर्ष के अधिकतर नवयुवक सिवाय खाने-पीने,
भोगने और उसके लिए धनसंचय करने के अलावा अपना कुछ और कर्तव्य ना
समझते थे गुलामी में जन्म लेते थे और उस दासता की अवस्था को अपना भाग्य समझकर
गंदगी के कीड़ों की तरह उसी में मस्त रहते थे उस समय आर्यावर्त की प्राचीन संस्कृति
का सजीव चित्र खींचकर न केवल आर्यसंतान के अन्दर ही आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न
किया अपितु यूरोपियन विद्वानों को भी उनकी कल्पनाओं की असारता दिखाकर चक्कर में
डाल दिया. जिस समय लोग राजनैतिक और धार्मिक दासता का शिकार थे. जिस समय लोग
दुर्व्यसनो में लीन थे उस समय स्वामी श्रद्धानन्द जी ने लोगों को आत्मचिंतन,
राष्ट्रचिन्तन करना सिखाया. स्वामी जी के
एक-एक कथन क्रांतिकारियों के लिए गीता बनते चले गये.
देश को राजनेतिक
परतंत्रता से मुक्त कर स्वामी जी का उद्देश्य धार्मिक था. ताकि हम धार्मिक रूप से
भी स्वतंत्र हो, हिन्दू समाज में समानता उनका लक्ष्य था. जातिवाद, छुआछूत
को दूर कर शिक्षा एवं नारी जाति में जागरण कर वह एक महान समाज की स्थापना करना
चाहते थे. जो की गुलाम भारत में बहुत कठिन काम था. छोटे बड़े छूत-अछूत का भाव लोग
वानरी के मृत बच्चे की तरह चिपकाए घूम रहे थे. 11 फरवरी 1923
को भारतीय शुद्धि सभा की स्थापना करते समय
स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा शुद्धि आंदोलन आरम्भ किया गया. स्वामी जी द्वारा इस
अवसर पर कहा गया की जिस धार्मिक अधिकार से मुसलमानों को तब्लीग और तंजीम का हक हैं
उसी अधिकार से उन्हें अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस अपने घरों में लौटाने का हक हैं.
आर्यसमाज ने 1923 के अंत तक 30 हजार
मलकानों को शुद्ध कर दिया. लेकिन 23 दिसम्बर 1926 को
शुद्धि कार्य से रुष्ट होकर मुसलमानों ने स्वामी श्रदानंद की हत्या कर दी तो गाँधी
जी ने हत्यारे अब्दुल रशीद को भी अपना भाई बताया.
आर्यसमाज की ओर
से इस सम्बन्ध में पत्र लिखे गए, जिनका वर्णन पंडित अयोध्याय प्रसाद जी
बी.ए. द्वारा लिखित “इस्लाम कैसे फैला” में किया
गया हैं पर गाँधी जी हठ पर अड़े रहे ओर अहिंसा की अपनी परिभाषा बनाते रहे. जबकि
सावरकर ने रत्नागिरी के विट्ठल मंदिर में हुई शोक सभा में कहा- “पिछले
दिन, अब्दुल रशीद नामक एक धर्मांध मुस्लमान ने स्वामी जी के घर जाकर उनकी
हत्या कर दी. स्वामी श्रदानंद जी हिन्दू समाज के आधार स्तम्भ थे. उन्होंने सैकड़ों
मलकाना राजपूतों को शुद्ध करके पुन: हिन्दू धर्म में लाया था. वे हिन्दू सभा के
अध्यक्ष थे. यदि कोई घमंड में हो के स्वामी जी के जाने से सारा हिन्दुत्व नष्ट
होगा, तो उसे मेरी चुनौती हैं. जिस भारत माता ने एक श्रदानंद का निर्माण
किया, उसके रक्त की एक बूंद से लाखों तलवारें तथा तोपें हिन्दू धर्म को
विचलित कर न सकी, वह एक श्रदानंद की हत्या से नष्ट नहीं होगा
बल्कि अधिक पनपेगा.
“सन्यासी की
हत्या का स्मरण रखो’ लेख में सावरकर ने लिखा- हिन्दू जाति के पतन से
दिन रात तिलमिलाने वाले हे महाभाग सन्यासी. तुम्हारा परमपावन रक्त बहाकर तुमने हम
हिंद्युओं को संजीवनी दी हैं. तुम्हारा यह ऋण हिन्दू जाति आमरण न भूल सकेगी.
हुतात्मा की राख से अधिक शक्तिशाली इस संसार में अन्य कोई होगा क्या? वही
भस्म हे हिंदुयों! फिर से अपने भाल पर लगाकर संगठन ओर शुद्धि का प्रचार ओर प्रसार
करो ओर उस वीर सन्यासी की स्मृति ओर प्रेरणा हम सबके हृदयों में निरंतर प्रजल्वित
रहे, अपनी संपत्ति अपना परिवार, अपना जीवन और अपना सर्वस समाज के लिए दान
करने वाले अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द जी को शत-शत नमन
Wednesday, 2 November 2016
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के निर्वाण पर्व पर
दीपावली के दिन
हर वर्ष की भांति दिल्ली रामलीला मैदान में एक बार फिर स्वामी दयानन्द जी के
निर्वाण पर्व पर आर्यों का विशाल हुजूम देखने को मिला. वैदिक जय-जयकार करते ऋषि
भक्त स्वामी दयानन्द जी के समाज हित और देश हित के कार्यों की सराहना करते दे रहे
थे. किन्तु निर्वाणपर्व की पूर्व संध्या पर दिल्ली सभा के कार्यालय में यज्ञ के
पश्चात स्वामी सम्पूर्णानन्द जी ने दुखद स्वर में एक बात कही जिसने सभी को कुछ पल
के लिए भावुक कर दिया था. कि वैसे तो दीपावली का त्यौहार खुशियों का त्यौहार है
किन्तु जब दीपावली की रात आती है तो मन में एक दुःख के लहर सी भी दौड़ जाती है कि
वर्षो पहले आज की ही रात भारत माता ने अपने एक महान सपुत्र दया के देव दयानन्द को
खोया था. दुनिया में अभी तक अनेक महापुरुष हुए और उनके सिद्धांत मानने वाले भी करोड़ों
लोग है किन्तु वो लोग उनके सिद्धांतों को उस स्वरूप में नहीं बचा पाए जिस स्वरूप
में उन्हें बनाया गया था. परन्तु आर्य समाज एक ऐसी संस्था है जिसने स्वामी जी के
महान सिद्धांतों को उसी स्वरूप में बचाकर तो रखा ही साथ में यदि किसी ने उन
सिद्धांतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिस की तो उसे बाहर का रास्ता भी दिखाया.
जब
जगन्नाथ ने अंग्रेजो के बहकावे में आकर ऋषि दयानन्द जी को दूध में जहर मिलाकर दे
दिया, स्वामी जी की हालत बिगड़ने
लगी, डॉ अलीमरदान ने दवा के बहाने स्वामी जी के शरीर में जहर से भरा
इंजेक्शन लगा दिया और स्वामी जी के शरीर से जहर फूटने लगा अतः रसोईये को अपनी गलती
महसूस हुई,तो
उसने स्वामी जी के पास जाकर माफी मांगी. मुझे क्षमा कर दिजिए,स्वामी
जी। मैने भयानक पाप किया हैं, आप के दूध में शीशायुक्त जहर मिला दिया
था. “ये तुने
क्या किया?समाज
का कार्य अधुरा ही रह गया। अभी लोगों की आत्मा को और जगाना था, स्वराज
की क्रांति लानी थी. पर जो होना था हो गया
तु अब ये पैसा ले और यहां से चला जा नहीं तो राजा तुझे मृत्यु दंड दे देगें। ऐसे
थे हमारे देव दयानन्द जी, दया का भंडार,करुणा के
सागर आकाश के समान विशाल ह््रदय जो अपने हत्यारे को भी क्षमा कर गये थे। जिसका
दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा दीपावली की रात देश में लाखो दीप जलाकर
जब एक दीप बुझ गया.
यू तो स्वतन्त्र
भारत में ऋषि निर्वाणोत्सव पहली बार सन 1949 में
मनाया गया और इस अवसर पर मुख्य वक्ता स्वतन्त्र भारत के राष्ट्रध्यक्ष चक्रवर्ती
राजगोपालचारी थे इस अवसर पर समारोह की अध्यक्षता कर रहे केन्द्रीय मंत्री श्री नरहरि विष्णु गाडगिल जी
ने बोलते हुए कहा कि “यदि यह देश स्वामी दयानन्द के मार्ग पर चला
होता तो कश्मीर पाकिस्तान में न जाता” इस बात को अल जमीयत अखबार ने मोटे अक्षरो में
मुख्य पेज पर दिया। इसकी एक प्रति लेकर मौलाना अबुल कलाम आजाद तत्कालीन
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के पास लेकर पहुंचे और शिकायत की कि आपका मन्त्री
शुद्धी का प्रचार कर रहा है. अगले साल 1950 मुख्यवक्ता के रुप में सरदार बल्लभभाई पटेल पधारे और उन्हौनें अपने
भाषण में कहा कि “यदि हमनें स्वामी दयानन्द की बात मानी होती तो
आज कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में लटका न होता.”
इसके
कुछ दिन बाद ही बम्बई में सरदार पटेल जी का निधन हो गया और उनके इस कथन के
अभिप्राय को पूरी तरह न जाना जा सका।
लेकिन इंडियन एक्सप्रैस नई दिल्ली के 7 जून 1990 के अंक
में प्रकाशित एक व्क्तव्य से पूरी तरह स्पस्ट हो गया उसमें लिखा था. देश के
स्वतंत्र हो जाने पर यहां रहे ब्रिटिष सैनिकों अधिकारियों ने भारत सरकार को कश्मीर
का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपने की सलाह दी थी. इससे पाकिस्तान को कश्मीर
के मामले को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने का अवसर मिला. इसी के परिणाम स्वरूप भारत
को पाकिस्तान के तीन चार आक्रमणों का सामना करना पड़ा. इसी संदर्भ में सरदार पटेल
के अनुसार यह सब ऋषि दयानन्द की बात न मानने के कारण हुआ. सत्यार्थ प्रकाश के छटे
सम्मुलास में उन्होंने लिखा है कि मंत्री स्वराज स्वदेश में उत्पन्न होने चाहिए.
वे जिनकी जड़े अपने देश की मिट्टी में हो,जो
विदेश से आयातीत न हो और जिनकी आस्था अपने धर्म संस्कृति ,सभ्यता,परम्पराओं
में हो. दयानन्द के उक्त लेख की अवेहलना के कारण ही हमने इतनी हानि उठाई है.
विदेशी प्रशासक कुशल तो हो सकता है,पर
हितेषी नहीं. पटेल आर्य समाज के कार्यो से भली भांति परिचित थे. जब नेहरु ने पटेल
से कहा कि हैदराबाद ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र में
गुहार लगाई है, ऐसे में उसके अंतरिम मामलों में दखल देना क्या उचित रहेगा? “सरदार पटेल ने नेहरु
की ओर देखते हुए कहा आर्य समाज के नेत्तर्त्व में जनक्रांति हो चुकी है जिसने
हैदराबाद के विलय की नींव रख दी है बस आप पुलिस कारवाही के आदेश दीजिये..
स्वामी दयानन्द
जी का मत था भिन्न-भिन्न भाषा प्रथक-प्रथक शिक्षा और अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति
दुष्कर है. दयानन्द के शब्दों में जब तक एक मत एक हानि-लाभ,एक
सुख-दुःख न मानें तब तक उन्नति होना बहुत कठिन है. जब भूगोल में एक मत था उसी में
सबकी निष्ठा थी और एक दूसरे का सुख-दुःख,हानि-लाभ
आपस में सब समान समझते थे तभी तक सुख था. स्वामी जी हमेशा कहते थे एक धर्म,एक भाषा
और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित होना कठिन है. सब उन्नतियों का केन्द्र
स्थान एक है। जहां भाषा व भावना में एकता आ जाए वहां सागर की भांति सारे सुःख एक-एक
करके प्रवेश करने लगते हैं. मैं चाहता हूं कि देश के राजा महाराजा अपने शासन में
सुधान व संशोधन करें. अपने-अपने राज्य में धर्म भाषा और भाव में एकता करें। फिर भारत
में आप ही आप सुधार हो जाएगा.....Rajeev choudhary
Thursday, 15 September 2016
जिन्दा माँ पर कर दिया..श्राद्ध
रोहन बाज़ार में मिठाई की दूकान से गुज़र रहा था तभी
उसे उसका एक दोस्त मिला ! तो उसने अपने दोस्त से पूछा क्या चल रहा है आज कल...?
दोस्त ने कहा कुछ नहीं बस माँ का श्राद्ध है तो मिठाई
लेने आया था ! रोहन ने कहा पागल
माँ तो अभी मुझे बाजार में मिली थी और तुम ऐसी बात कर रहे हो शर्म नहीं आती क्या तुम्हे?
दोस्त ने मुस्कुराते हुए कहा... देखो लोग माँ बाप के
मरने के बाद श्राद्ध करते है !
पर जब माँ बाप जिंदा होते है तो उन्हें खून के आंसू रुलाते है...!
मेरी माँ जिंदा है तो उनकी सब पसंद की हर चीज़ में
मेरे घर में रखता हूँ क्योंकि मैं
उनकी हर कामना जो पूरी करना चाहता हूँ. उनके मरने के बार श्राद्ध से क्या वो संतुष्ट होंगी. जब उनके ज़िंदा रहते
हुए मैंने उनके लिए कुछ ना क्या
होंगा तो? मेरा मानना है कि जीते जी माता पिता को हर हाल में खुश रखना ही उनका सच्चा श्राद्ध है!
उसने आगे कहा कि मेरी माँ को मिठाई में लड्डू, फलों में आम आदि पसंद है ! में वह सब उन्हें खिलाता
हूँ !
लोग मंदिरों में जाकर अगरबत्तियां लगाते है में न
मंदिर जाता हूँ और न अगरबत्तियां
जलाता हूँ, हाँ माँ के सो जाने पर उनके कमरे में मच्छर भागने की अगरबत्ती
अवश्य जला देता हूँ !
जब माँ सुबह उठती है तब उनका चश्मा साफ़ करके उन्हें
दे देता हूँ, मुझे लगता है कि ईश्वर की फोटो, तस्वीर साफ़ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ़ करने में मिलता है !
वह कुछ और कहता इससे पहले ही उसकी माँ हाथ में झोला
लिए स्वयं वहां आ पहुंची तब उसने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखते हुए
हंसकर कहा – ‘भाई बात यह है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोस कर उसे जीते जी तृप्त करूँ ! यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है ! हम
बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते है ! पंडितों को खीर पुड़ी खिलाते है ! रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिये कि गाय-कौवों को खिलाया हुआ ऊपर पहुंचता है या नहीं, यह किसे पता? पर माता-पिता की सेवा का फल जरुर मिलता यह सबको पता है...आर्य समाज (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा)
Tuesday, 13 September 2016
भारतीय मूल के सांसद ने ऋग्वेद पर हाथ रख ली शपथ,
जितेश गढ़िया ने
ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में ब्रिटिश भारतीय सांसद के तौर
पर शपथ ली। वह ऐसा करने वाले सबसे कम आयु के व्यक्ति हैं। वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड
कैमरन के करीबी माने जाते हैं। बता दें कि
ब्रिटिश संसद के अपर हाउस में भारतीय मूल के
लगभग 20 सांसद हैं।
इस दौरान ख़ास बात यह रही कि गढ़िया ने क्वीन एलिजाबेथ-द्वितीय के
प्रति वफादारी की शपथ भारत के प्राचीन ग्रंथ
ऋग्वेद पर हाथ रखकर ली है। माना गया है कि यह
ग्रंथ दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसका इतिहास 1500 बीसी से शुरू होता है। ब्रिटेन
की संसद में नए सदस्यों को बाइबल के अलावा दूसरे धार्मिक ग्रंथ चुनने की भी अनुमति है। हालांकि, बता दें
कि इससे पहले किसी भी ब्रिटिश भारतीय
ने ऋग्वेद पर हाथ रखकर शपथ नहीं ली थी। जितेश
गढ़िया गुजरात से संबंध रखते हैं। वह दो साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे।
वह ब्रिटेन और भारत के बीच कुछ बड़ी इन्वेस्टमेंट में भी शामिल रह
चुके हैं। कहा जाता है कि पिछले साल जब पीएम
नरेंद्र मोदी लंदन गए थे तो गढ़िया ने ही
उनका भाषण लिखा था। उन्हें पीएम मोदी का काफी करीबी माना जाता है।
गढ़िया गुजरात
से संबंध रखते हैं। वह दो साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे। वह
ब्रिटेन और भारत के बीच कुछ बड़ी इन्वेस्टमेंट में भी शामिल रहे हैं।
कहा जाता है कि पिछले साल जब नरेंद्र मोदी
लंदन गए थे तो जितेश ने ही उनका भाषण लिखा था।
उन्हें नरेंद्र मोदी का काफी करीबी माना जाता है।
जितेश गढ़िया यूरोप की फाइनेंश कंपनी एबीन और बारक्लेज के साथ भी काम
कर चुके हैं। कहा जाता है कि वह टाटा
स्टील की ब्रिटेन की कोरस को खरीदने में हुई
डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।
ब्रिटिश संसद में सांसद के रूप
में शपथ लेने के बाद जितेश ने कहा कि वह ऐसे समय
संसद में शामिल हो रहे हैं, जब ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन अपने
इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। उन्होंने
कहा कि वह फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर
के लिए भविष्य में अच्छी संभावनाएं सुनिश्चित करने में मदद करना चाहता हैं।
उन्होंने कहा कि उनका फोकस ब्रिटेन सहित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध
मजबूत करने में योगदान देने पर भी होगा।....
आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
इस दौरान ख़ास बात यह रही कि गढ़िया ने क्वीन एलिजाबेथ-द्वितीय के प्रति वफादारी की शपथ भारत के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद पर हाथ रखकर ली है। माना गया है कि यह ग्रंथ दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसका इतिहास 1500 बीसी से शुरू होता है। ब्रिटेन की संसद में नए सदस्यों को बाइबल के अलावा दूसरे धार्मिक ग्रंथ चुनने की भी अनुमति है। हालांकि, बता दें कि इससे पहले किसी भी ब्रिटिश भारतीय ने ऋग्वेद पर हाथ रखकर शपथ नहीं ली थी। जितेश गढ़िया गुजरात से संबंध रखते हैं। वह दो साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे।
जितेश गढ़िया यूरोप की फाइनेंश कंपनी एबीन और बारक्लेज के साथ भी काम कर चुके हैं। कहा जाता है कि वह टाटा स्टील की ब्रिटेन की कोरस को खरीदने में हुई डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।
Thursday, 8 September 2016
क्या मदर टेरेसा संत थीं?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केथोलिक संप्रदाय के विश्व-गुरु पोप फ्रांसिस आज मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान करेंगे। मदर टेरेसा भारतीय नागरिक थीं। इसलिए उन्हें कोई संत कहे और विश्व-स्तर पर कहे तो क्या हमें अच्छा नहीं लगेगा? वैसे भी उन्हें भारत-रत्न और नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके योगदान पर कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं और छोटी-मोटी फिल्में भी बन चुकी हैं।
लेकिन मेरे मन में आज यह जिज्ञासा पैदा हुई कि मालूम करुं कि केथोलिक संप्रदाय में संत किसे घोषित किया जाता है? संत किसे माना जाता है? दो शर्तें हैं। एक शर्त तो यह है कि जो ईसा मसीह के लिए अपना जीवन समर्पित करे और दूसरी यह कि जो जीते-जी या मरने के बाद भी कम से कम दो चमत्कार करे। टेरेसा ने ये दोनों शर्तें पूरी की हैं। इसीलिए पूरी खात्री करने के बाद रोमन केथोलिक चर्च आज उन्हें ‘संत’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित कर रहा है।
जहां तक ‘चमत्कारों’ की बात है, यह शुद्ध पाखंड है। विज्ञान, विवेक और तर्क की तुला पर उन्हें तोला जाए तो ये चमत्कार शुद्ध अंधविश्वास सिद्ध होंगे। टेरेसा का पहला चमत्कार वह था, जिसमें उन्होंने एक बंगाली औरत के पेट की रसौली को अपने स्पर्श से गला दिया। उनका दूसरा चमत्कार माना जाता है, एक ब्राजीलियन आदमी के मष्तिष्क की कई गांठों को उन्होंने गला दिया। यह चमत्कार उन्होंने अपने स्वर्गवास के 11 साल बाद 2008 में कर दिखाया। ऐसे हास्यास्पद चमत्कारों को संत-पद के लिए जरुरी कैसे माना जाता है? ऐसे चमत्कार सिर्फ ईसाइयत में ही नहीं हैं, हमारे भारत के हिंदू पाखंडी, स्याने-भोपे और बाजीगर भी दिखाते रहते हैं और अपनी दुकानें चलाते रहते हैं।
जहां तक मदर टेरेसा की मानव-सेवा की बात है, उसकी भी पोल उन्हीं के साथी अरुप चटर्जी ने अपनी किताब में खोलकर रखी है। उसने बताया है कि मदर टेरेसा का सारा खेल मानव-करुणा पर आधारित था। वे अपने आश्रमों में मरीजों, अपंगों, नवजात फेंके हुए बच्चों, मौत से जूझते लोगों को इसलिए नहीं लाती थीं कि उनका इलाज हो सके बल्कि इसलिए लाती थीं कि उनकी भयंकर दुर्दशा दिखाकर लोगों को करुणा जागृत की जा सके। उनके पास समुचित इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी और मरनेवालों के सिर पर पट्टी रखकर उन्हें वे छल-कपट से बपतिस्मा दे देती थीं याने ईसाई बना लेती थीं। मरते हुए आदमी से वे पूछ लेंती थीं कि ‘क्या तुमको स्वर्ग जाना है?’ इस प्रश्न के जवाब में ‘ना’ कौन कहेगा? ‘हां’ का मतलब हुआ बपतिस्मा। किसी को दवा देकर या पढ़ाकर या पेट भरकर बदले में उसका धर्म छीनने से अधिक अनैतिक कार्य क्या हो सकता है? कोई स्वेच्छा और विवेक से किसी भी धर्म में जाए तो कोई बुराई नहीं है लेकिन इस तरह का काम क्या कोई संत कभी कर सकता है? 1994 में लंदन में क्रिस्टोफर हिचंस और तारिक अली ने एक फिल्म बनाई, जिसमें मदर टेरेसा के आश्रमों का आंखों देखा हाल दिखाया गया था। हिचंस ने फिर एक किताब भी लिखी। उसमें बताया कि कैसे हैती के बदनाम और लुटेरे तानाशाह ज्यां क्लाड दुवालिए से टेरेसा ने सम्मान और धनराशि भी हासिल की। लंदन के राबर्ट मेक्सवेल और चार्ल्स कीटिंग-जैसे अपराधियों से उन्होंने करोड़ों रु. लिये। उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया और भोपाल गैस-कांड पर लीपा-पोती की। धन्य है, मदर टेरेसा, जिनके संत बनने पर हमारे भोले प्रचार प्रेमी नेता वेटिकन पहुंच गए हैं। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
Thursday, 1 September 2016
प्रसिद्द साहित्यकारों के दृष्टि में स्वामी दयानंद
आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द भारत के निर्माताओँ मेँ प्रमुख स्थान रखते हैँ । ये ऐसे महापुरूष हुए हैँ जिन्होने भारत की आत्मा को पुनर्जीवत किया जो १८५७ की असफलता से दुःख और निराशा मेँ डूब चुकी थी । पुनर्जीवन का यह कार्य जितना हिन्दी के माध्यम से सम्भव हो सकता था उतना किसी अन्य माध्यम से नही । सारे देश मेँ भ्रमण करते हुए हिन्दी भाषा के महत्व को भलीभांति समझ चुके थे । हिन्दी के प्रचार को वे इतने सजग थे कि अपने जीते जी उन्होने अपनी किसी पुस्तक के अनुवाद की अनुमति नही दी(गोकरूणानिधि को छोड़कर) वे कहते थे कि जिसे मेरे विचारो को जानने की उत्सुकता होगी वो हिन्दी भाषा सीखेगा । महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज को पंजाब प्रान्त मेँ हिन्दी का उद्धारक कहा जा सकता है । प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर तो ऋषिवर को आधुनिक हिन्दी साहित्य का पिता कहते हैँ । परन्तु उनके अतिरिक्त देश के सभी जाने माने मूर्धन्य साहित्यकारोँ ने भी ऋषिवर की मुक्तकंण्ड से प्रशंसा की है। आज उनमेँ कुछ के विचार आपके सामने रखेगेँ ।
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी- "मेरे ह्रदय मेँ श्री स्वामी दयानन्दजी सरस्वती पर अगाध श्रद्धा है । वे बहुत बड़े समाज संस्कर्ता, वेदोँ के बहुत बड़े ज्ञाता तथा समयानुकूल वेदभाष्यकर्ता और आर्य संस्कृति के बहुत बड़े पुरस्कर्ता थे।"
मुंशी प्रेमचन्द- आर्यसमाज ने साबित कर दिया है कि समाज सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने का लक्षण है । हरिजनोँ के उद्धार मेँ सबसे पहला कदम आर्यसमाज ने उठाया, लड़कियोँ की शिक्षा की जरूरत सबसे पहले उसने समझी । वर्ण व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिद्ध करने का सेहरा उसके सिर है | जातिभेद भाव और खानपान के छूतछात और चौके चूल्हे की बाधाओँ को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है । अंधविश्वास और धर्म के नाम पर किये जाने वाले हजारोँ अनाचारोँ कब्र उसीने खोदी ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- "पैगम्बरी एकेश्वरवाद की ओर नवशिक्षित लोगोँ को खिँचते देख स्वामी दयानन्द वैदिक एकेश्वरवाद लेकर खड़े हुए और सं॰१९२० से घूम घूम कर व्याख्यान देना आरम्भ किया । स्वामीजी ने आर्यसमाजियोँ के लिए आर्यभाषा या हिन्दी का पढ़ना आवश्यक ठहराया । संयुक्त प्रान्त और पंजाब मेँ आर्यसमाज के प्रभाव से हिन्दी गद्य का प्रचार बड़ी तेजी से हुआ । आज पंजाब मेँ हिन्दी की पूरी चर्चा इन्ही के कारण है।
मैथिलीशरण गुप्त- वैष्णव कुल का होने पर भी मैँ स्वामी दयानन्द को देश का महापुरूष मानता हूँ । कौन उनके महान कार्य को स्वीकार नही करेगा?
जो आज वेद ध्वनि गूंजती है।
कृपा उन्हीँ की यह कूजती है।
जयशंकर प्रसाद- महर्षि दयानन्द द्वारा प्रस्थापित आर्यसमाज इन सभी संस्थाओँ यथा ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, तथा रामकृष्ण मिशन से अग्रणी रहा क्योँकि इसके द्वारा सैद्धान्तिक उपदेशोँ के स्थान पर रचनात्मक कार्योँ को व्यवहार मेँ लाया गया। भारतीय संस्कृति का प्रचार, बाल विवाह निषेध, विधवा विवाह का समर्थन और गुरूकुलोँ की स्थापना, आर्यसमाज के प्रमुख कार्य हैँ। स्त्री शिक्षा के लिए आर्य कन्या पाठशालाओँ की स्थापना का सर्वोत्तम प्रबंध है। स्वामी दयानन्द ने युगनिर्माता की भांति देश के सुप्त मस्तिष्क को प्रबुद्ध करने का प्रयत्न किया । उनका 'सत्यार्थ प्रकाश' इस दिशा मेँ निजी महत्व रखता है।
पं॰सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' "चरित्र, स्वास्थ्य, त्याग, ज्ञान और शिष्टता आदि मेँ जो आदर्श महर्षि दयानन्दजी महाराज मेँ प्राप्त होते हैँ, उनका लेशमात्र भी अभारतीय पश्चिमी शिक्षा संभूत नही, पुनः ऐसे आर्य मेँ ज्ञान और कर्म का कितना प्रसार रह सकता है, वह स्वंय इसके उदाहरण हैँ । मतलब जो लोग कहते हैँ कि वैदिक शिक्षा द्वारा मनुष्य उतना उन्नतमना नही हो सकता, जितना अंग्रेजी शिक्षा द्वारा होता है, महर्षि दयानन्द इसके प्रत्यक्ष खंडन हैँ । महर्षि दयानन्द जी से बढ़कर भी मनुष्य होता है, इसका प्रमाण प्राप्त नही हो सकता । यही वैदिक ज्ञान की मनुष्य के उत्कर्ष मेँ प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है, यहीँ आदर्श आर्य हमेँ देखने को मिलता है।
रामधारी सिँह दिनकर- "जैसे राजनीति के क्षेत्र मेँ हमारी राष्ट्रीयता का सामरिक तेज पहले पहल 'तिलक' मेँ प्रत्यक्ष हुआ वैसे ही संस्कृति के क्षेत्र मेँ भारत का आत्माभिमान स्वामी दयानन्द मेँ निखरा। रागरूढ़ हिन्दुत्व के जैसे निर्भीक नेता स्वामी दयानन्द हुए वैसा और कोई भी नहीँ। दयानन्द के समकालीन अन्य सुधारक केवल सुधारक थे किन्तु दयानन्द क्रान्ति के वेग से आगे बढ़े । वे हिन्दू धर्म के रक्षक होने के साथ ही विश्वमानवता के नेता भी थे।
महादेवी वर्मा- "स्वामी दयानन्द युग दृष्टा, युग निर्माता थे । मेरे संस्कारोँ पर ऋषि दयानन्द का प्रर्याप्त प्रभाव है । स्त्रियोँ को वेदाधिकार दिलाकर उन्होनेँ महिलाओँ मेँ नवीन क्रान्ति का बीजारोपण किया । नारी की स्थिति मेँ सुधार की अनवरत चेष्टा करते रहे । दयानन्दजी ने वेदोँ की वैज्ञानिक व्याख्यायेँ प्रस्तुत कर, वैदिक अध्ययन प्रणाली मेँ एक नूतन युक का सूत्रपात किया।
डा॰श्यामसुन्दर दास- "गोस्वामी तुलसीदास के ठीक २०० वर्ष पीछे गुजरात प्रदेश मेँ एक महापुरूष का अविर्भाव हुआ जिन्होने उत्तर भारत को ईसाई और मुसलमान होने से बचा लिया तथा सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक जीवन मेँ जो दुर्बलता आ गयी थी तथा उसमेँ जो बुराइयाँ घुस गई थीँ उनका अत्यन्त दूरदर्शिता पूर्वक निदान का एक ऐसा आदर्श स्थापित किया जो हिन्दी समाज की रक्षाकर उसकी भावी उन्नति का मार्गदर्शन हुआ है। इसमेँ संदेह नही कि स्वामी दयानन्द एक अवतारी पुरूष थे और भारत का परम कर्तव्य है कि उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर अपने को धन्य करेँ ।
मिश्र बन्धु- महर्षि दयानन्द सरस्वती ने देश और जाति का जो महान उपकार किया है, उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीँ है। अनेक भूलोँ और पाखण्डो मेँ फंसे हुए लोगो को सीधा मार्ग दिखलाकर उन्होने वह काम किया, जो अपने समय मेँ महात्मा बुद्ध, स्वामी शंकराचार्य, कबीरदास, बाबा नानक, राजा राममोहन राय ठौर-ठौर कर गये । दयानन्दजी ने हिन्दी मेँ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका इत्यादि अनुपम ग्रन्थ साधु और सरल भाषा मेँ लिखकर उसकी भारी सहायता की।
विशेष- महर्षि दयानन्द सत्य कहने में इसकी परवाह नही करते थे कि इससे कोई शुभचिंतक रुष्ट हो जायेगा, एक बार ऋषि के सत्संगी प्रसिद्द मुस्लिम विद्वान 'सर सय्यद अहमद खां' ने उर्दू की प्रशंसा करते हुए हिन्दी को 'गंवारू' भाषा कहकर उसका उपहास किया तो ऋषि ने पं.प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट जैसे साहित्यकारों की मौजूदगी में हिन्दी को 'कुलकमिनी
और उर्दू को वारविलासनी(वेश्या) कहकर उनको सटीक उत्तर दिया |........ डॉ विवेक आर्य (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा)
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