Thursday, 8 September 2016

क्या मदर टेरेसा संत थीं?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक


केथोलिक संप्रदाय के विश्व-गुरु पोप फ्रांसिस आज मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान करेंगे। मदर टेरेसा भारतीय नागरिक थीं। इसलिए उन्हें कोई संत कहे और विश्व-स्तर पर कहे तो क्या हमें अच्छा नहीं लगेगा? वैसे भी उन्हें भारत-रत्न और नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके योगदान पर कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं और छोटी-मोटी फिल्में भी बन चुकी हैं।

लेकिन मेरे मन में आज यह जिज्ञासा पैदा हुई कि मालूम करुं कि केथोलिक संप्रदाय में संत किसे घोषित किया जाता है? संत किसे माना जाता है? दो शर्तें हैं। एक शर्त तो यह है कि जो ईसा मसीह के लिए अपना जीवन समर्पित करे और दूसरी यह कि जो जीते-जी या मरने के बाद भी कम से कम दो चमत्कार करे। टेरेसा ने ये दोनों शर्तें पूरी की हैं। इसीलिए पूरी खात्री करने के बाद रोमन केथोलिक चर्च आज उन्हें ‘संत’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित कर रहा है।
जहां तक ‘चमत्कारों’ की बात है, यह शुद्ध पाखंड है। विज्ञान, विवेक और तर्क की तुला पर उन्हें तोला जाए तो ये चमत्कार शुद्ध अंधविश्वास सिद्ध होंगे। टेरेसा का पहला चमत्कार वह था, जिसमें उन्होंने एक बंगाली औरत के पेट की रसौली को अपने स्पर्श से गला दिया। उनका दूसरा चमत्कार माना जाता है, एक ब्राजीलियन आदमी के मष्तिष्क की कई गांठों को उन्होंने गला दिया। यह चमत्कार उन्होंने अपने स्वर्गवास के 11 साल बाद 2008 में कर दिखाया। ऐसे हास्यास्पद चमत्कारों को संत-पद के लिए जरुरी कैसे माना जाता है? ऐसे चमत्कार सिर्फ ईसाइयत में ही नहीं हैं, हमारे भारत के हिंदू पाखंडी, स्याने-भोपे और बाजीगर भी दिखाते रहते हैं और अपनी दुकानें चलाते रहते हैं।

जहां तक मदर टेरेसा की मानव-सेवा की बात है, उसकी भी पोल उन्हीं के साथी अरुप चटर्जी ने अपनी किताब में खोलकर रखी है। उसने बताया है कि मदर टेरेसा का सारा खेल मानव-करुणा पर आधारित था। वे अपने आश्रमों में मरीजों, अपंगों, नवजात फेंके हुए बच्चों, मौत से जूझते लोगों को इसलिए नहीं लाती थीं कि उनका इलाज हो सके बल्कि इसलिए लाती थीं कि उनकी भयंकर दुर्दशा दिखाकर लोगों को करुणा जागृत की जा सके। उनके पास समुचित इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी और मरनेवालों के सिर पर पट्टी रखकर उन्हें वे छल-कपट से बपतिस्मा दे देती थीं याने ईसाई बना लेती थीं। मरते हुए आदमी से वे पूछ लेंती थीं कि ‘क्या तुमको स्वर्ग जाना है?’ इस प्रश्न के जवाब में ‘ना’ कौन कहेगा? ‘हां’ का मतलब हुआ बपतिस्मा। किसी को दवा देकर या पढ़ाकर या पेट भरकर बदले में उसका धर्म छीनने से अधिक अनैतिक कार्य क्या हो सकता है? कोई स्वेच्छा और विवेक से किसी भी धर्म में जाए तो कोई बुराई नहीं है लेकिन इस तरह का काम क्या कोई संत कभी कर सकता है? 1994 में लंदन में क्रिस्टोफर हिचंस और तारिक अली ने एक फिल्म बनाई, जिसमें मदर टेरेसा के आश्रमों का आंखों देखा हाल दिखाया गया था। हिचंस ने फिर एक किताब भी लिखी। उसमें बताया कि कैसे हैती के बदनाम और लुटेरे तानाशाह ज्यां क्लाड दुवालिए से टेरेसा ने सम्मान और धनराशि भी हासिल की। लंदन के राबर्ट मेक्सवेल और चार्ल्स कीटिंग-जैसे अपराधियों से उन्होंने करोड़ों रु. लिये। उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया और भोपाल गैस-कांड पर लीपा-पोती की। धन्य है, मदर टेरेसा, जिनके संत बनने पर हमारे भोले प्रचार प्रेमी नेता वेटिकन पहुंच गए हैं। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

Thursday, 1 September 2016

प्रसिद्द साहित्यकारों के दृष्टि में स्वामी दयानंद

आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द भारत के निर्माताओँ मेँ प्रमुख स्थान रखते हैँ । ये ऐसे महापुरूष हुए हैँ जिन्होने भारत की आत्मा को पुनर्जीवत किया जो १८५७ की असफलता से दुःख और निराशा मेँ डूब चुकी थी । पुनर्जीवन का यह कार्य जितना हिन्दी के माध्यम से सम्भव हो सकता था उतना किसी अन्य माध्यम से नही । सारे देश मेँ भ्रमण करते हुए हिन्दी भाषा के महत्व को भलीभांति समझ चुके थे । हिन्दी के प्रचार को वे इतने सजग थे कि अपने जीते जी उन्होने अपनी किसी पुस्तक के अनुवाद की अनुमति नही दी(गोकरूणानिधि को छोड़कर) वे कहते थे कि जिसे मेरे विचारो को जानने की उत्सुकता होगी वो हिन्दी भाषा सीखेगा । महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज को पंजाब प्रान्त मेँ हिन्दी का उद्धारक कहा जा सकता है । प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर तो ऋषिवर को आधुनिक हिन्दी साहित्य का पिता कहते हैँ । परन्तु उनके अतिरिक्त देश के सभी जाने माने मूर्धन्य साहित्यकारोँ ने भी ऋषिवर की मुक्तकंण्ड से प्रशंसा की है। आज उनमेँ कुछ के विचार आपके सामने रखेगेँ ।

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी- "मेरे ह्रदय मेँ श्री स्वामी दयानन्दजी सरस्वती पर अगाध श्रद्धा है । वे बहुत बड़े समाज संस्कर्ता, वेदोँ के बहुत बड़े ज्ञाता तथा समयानुकूल वेदभाष्यकर्ता और आर्य संस्कृति के बहुत बड़े पुरस्कर्ता थे।"
मुंशी प्रेमचन्द- आर्यसमाज ने साबित कर दिया है कि समाज सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने का लक्षण है । हरिजनोँ के उद्धार मेँ सबसे पहला कदम आर्यसमाज ने उठाया, लड़कियोँ की शिक्षा की जरूरत सबसे पहले उसने समझी । वर्ण व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिद्ध करने का सेहरा उसके सिर है | जातिभेद भाव और खानपान के छूतछात और चौके चूल्हे की बाधाओँ को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है । अंधविश्वास और धर्म के नाम पर किये जाने वाले हजारोँ अनाचारोँ कब्र उसीने खोदी ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- "पैगम्बरी एकेश्वरवाद की ओर नवशिक्षित लोगोँ को खिँचते देख स्वामी दयानन्द वैदिक एकेश्वरवाद लेकर खड़े हुए और सं॰१९२० से घूम घूम कर व्याख्यान देना आरम्भ किया । स्वामीजी ने आर्यसमाजियोँ के लिए आर्यभाषा या हिन्दी का पढ़ना आवश्यक ठहराया । संयुक्त प्रान्त और पंजाब मेँ आर्यसमाज के प्रभाव से हिन्दी गद्य का प्रचार बड़ी तेजी से हुआ । आज पंजाब मेँ हिन्दी की पूरी चर्चा इन्ही के कारण है।
मैथिलीशरण गुप्त- वैष्णव कुल का होने पर भी मैँ स्वामी दयानन्द को देश का महापुरूष मानता हूँ । कौन उनके महान कार्य को स्वीकार नही करेगा?
जो आज वेद ध्वनि गूंजती है। 
कृपा उन्हीँ की यह कूजती है।
जयशंकर प्रसाद- महर्षि दयानन्द द्वारा प्रस्थापित आर्यसमाज इन सभी संस्थाओँ यथा ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, तथा रामकृष्ण मिशन से अग्रणी रहा क्योँकि इसके द्वारा सैद्धान्तिक उपदेशोँ के स्थान पर रचनात्मक कार्योँ को व्यवहार मेँ लाया गया। भारतीय संस्कृति का प्रचार, बाल विवाह निषेध, विधवा विवाह का समर्थन और गुरूकुलोँ की स्थापना, आर्यसमाज के प्रमुख कार्य हैँ। स्त्री शिक्षा के लिए आर्य कन्या पाठशालाओँ की स्थापना का सर्वोत्तम प्रबंध है। स्वामी दयानन्द ने युगनिर्माता की भांति देश के सुप्त मस्तिष्क को प्रबुद्ध करने का प्रयत्न किया । उनका 'सत्यार्थ प्रकाश' इस दिशा मेँ निजी महत्व रखता है।
पं॰सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' "चरित्र, स्वास्थ्य, त्याग, ज्ञान और शिष्टता आदि मेँ जो आदर्श महर्षि दयानन्दजी महाराज मेँ प्राप्त होते हैँ, उनका लेशमात्र भी अभारतीय पश्चिमी शिक्षा संभूत नही, पुनः ऐसे आर्य मेँ ज्ञान और कर्म का कितना प्रसार रह सकता है, वह स्वंय इसके उदाहरण हैँ । मतलब जो लोग कहते हैँ कि वैदिक शिक्षा द्वारा मनुष्य उतना उन्नतमना नही हो सकता, जितना अंग्रेजी शिक्षा द्वारा होता है, महर्षि दयानन्द इसके प्रत्यक्ष खंडन हैँ । महर्षि दयानन्द जी से बढ़कर भी मनुष्य होता है, इसका प्रमाण प्राप्त नही हो सकता । यही वैदिक ज्ञान की मनुष्य के उत्कर्ष मेँ प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है, यहीँ आदर्श आर्य हमेँ देखने को मिलता है।

रामधारी सिँह दिनकर- "जैसे राजनीति के क्षेत्र मेँ हमारी राष्ट्रीयता का सामरिक तेज पहले पहल 'तिलक' मेँ प्रत्यक्ष हुआ वैसे ही संस्कृति के क्षेत्र मेँ भारत का आत्माभिमान स्वामी दयानन्द मेँ निखरा। रागरूढ़ हिन्दुत्व के जैसे निर्भीक नेता स्वामी दयानन्द हुए वैसा और कोई भी नहीँ। दयानन्द के समकालीन अन्य सुधारक केवल सुधारक थे किन्तु दयानन्द क्रान्ति के वेग से आगे बढ़े । वे हिन्दू धर्म के रक्षक होने के साथ ही विश्वमानवता के नेता भी थे।
महादेवी वर्मा- "स्वामी दयानन्द युग दृष्टा, युग निर्माता थे । मेरे संस्कारोँ पर ऋषि दयानन्द का प्रर्याप्त प्रभाव है । स्त्रियोँ को वेदाधिकार दिलाकर उन्होनेँ महिलाओँ मेँ नवीन क्रान्ति का बीजारोपण किया । नारी की स्थिति मेँ सुधार की अनवरत चेष्टा करते रहे । दयानन्दजी ने वेदोँ की वैज्ञानिक व्याख्यायेँ प्रस्तुत कर, वैदिक अध्ययन प्रणाली मेँ एक नूतन युक का सूत्रपात किया।
डा॰श्यामसुन्दर दास- "गोस्वामी तुलसीदास के ठीक २०० वर्ष पीछे गुजरात प्रदेश मेँ एक महापुरूष का अविर्भाव हुआ जिन्होने उत्तर भारत को ईसाई और मुसलमान होने से बचा लिया तथा सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक जीवन मेँ जो दुर्बलता आ गयी थी तथा उसमेँ जो बुराइयाँ घुस गई थीँ उनका अत्यन्त दूरदर्शिता पूर्वक निदान का एक ऐसा आदर्श स्थापित किया जो हिन्दी समाज की रक्षाकर उसकी भावी उन्नति का मार्गदर्शन हुआ है। इसमेँ संदेह नही कि स्वामी दयानन्द एक अवतारी पुरूष थे और भारत का परम कर्तव्य है कि उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर अपने को धन्य करेँ ।

मिश्र बन्धु- महर्षि दयानन्द सरस्वती ने देश और जाति का जो महान उपकार किया है, उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीँ है। अनेक भूलोँ और पाखण्डो मेँ फंसे हुए लोगो को सीधा मार्ग दिखलाकर उन्होने वह काम किया, जो अपने समय मेँ महात्मा बुद्ध, स्वामी शंकराचार्य, कबीरदास, बाबा नानक, राजा राममोहन राय ठौर-ठौर कर गये । दयानन्दजी ने हिन्दी मेँ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका इत्यादि अनुपम ग्रन्थ साधु और सरल भाषा मेँ लिखकर उसकी भारी सहायता की।

विशेष- महर्षि दयानन्द सत्य कहने में इसकी परवाह नही करते थे कि इससे कोई शुभचिंतक रुष्ट हो जायेगा, एक बार ऋषि के सत्संगी प्रसिद्द मुस्लिम विद्वान 'सर सय्यद अहमद खां' ने उर्दू की प्रशंसा करते हुए हिन्दी को 'गंवारू' भाषा कहकर उसका उपहास किया तो ऋषि ने पं.प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट जैसे साहित्यकारों की मौजूदगी में हिन्दी को 'कुलकमिनी
और उर्दू को वारविलासनी(वेश्या) कहकर उनको सटीक उत्तर दिया |........ डॉ विवेक आर्य (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) 

Saturday, 20 August 2016

योगीराज श्रीकृष्ण महाराज जी का असली जन्म

अगस्त माह में हम योगीराज श्रीकृष्ण जी महाराज का पुनः जन्मदिन मना रहे हैं। वही श्रीकृष्ण जी महाराज जिसे पौराणिकों ने लीलाधर, रसिक, गोपी प्रेमी, कपड़े चोर, माखन चोर और न जाने क्या-क्या लिखा। जिससे उनका मनोरथ तो पूरा हो गया लेकिन कहीं न कहीं योगीराज श्रीकृष्ण जी का वास्तविक चरित्र नष्ट हो गया। पूरा विवरण लिखने के पूर्व एक छोटी सी घटना उदाहण स्वरूप देना चाहूँगा कि छतीसगढ़ राज्य के एक आदि वासी गांव में भोले-भाले लोगों को एक पादरी प्रवचन दे रहा था और बीच-बीच में बेहद सरल तरीके से अपने प्रश्न भी रखता जा रहा था, जैसे कि वह पूछता किसी की हत्या करना पाप है या पुण्य? श्रोता कह उठते पाप, फिर पूछता चोरी करना अच्छी बात है या बुरी? लोग कहते बुरी, अब पादरी ने पूछा तुम सब भगवान श्रीकृष्ण को मानते हो ना? सभी ने एक सुर में कहा, हाँ मानते हैं। अचानक पादरी ने चेहरे पर गंभीर भाव लाकर कहा इसी वजह से तुम लोग गरीब और दरिद्र हो क्योंकि एक चोर को भगवान मानते हो। गुस्से से कुछ लोग भड़क गये। पादरी का स्वर धीमा पड़ गया और उसने सफाई देते हुए कहा ऐसा मैं नहीं आप लोगों के ही ग्रन्थ कहते हैं कि वह कपड़े या माखन आदि चुराता था। भीड़ से पहले तो इक्का-दुक्का इसके बाद बहुमत से आवाज आनी शुरू हुई कि हाँ हमने भी सुना है एक धीमी कुटिल मुस्कान के साथ पादरी का हौसला बढ़ गया उसने अपने शब्दों से हमारे महापुरषों पर अधिक तेज हमला किया और अंत में उसने कहा छोडो इन राम और श्रीकृष्ण को यदि सच्चे ईष्वर पुत्र को जानना है तो अपनी दरिद्रता दूर करनी है तो जीसस को जानो। यह घटना मात्र समझाने की है क्योंकि वैदिक धर्म को हिन्दू धर्म बनाने वालों ने महापुरषों की जीवनी इस कदर बिगाड़ दी और उनमें इस तरह से संशय पैदा कर दिए जिसका फायदा हमेशा से अन्य मतों-पंथों के लोग उठाते आये हैं।
आज बड़ा दुःख होता है कि जब-जब आर्य समाज ने हमेशा अपने महापुरुषों को इस तरह के आरोपों से मुक्त करने का काम किया लोगों को वास्तविक सत्ता का बोद्ध कराया, तब-तब उल्टा उन लोगों ने आर्य समाज पर आरोप जड़ने की कोशिश की, “कि आर्य समाज भगवान को नहीं मानता।“ आर्य समाज पर आरोप लगाने वाले उन पाखंडियों ने कभी सोचा है कि योगिराज श्रीकृष्ण चंद्र जी महाराज के चरित्र को किस तरह उन्होंने पेश किया- लिख दिया 16 हजार गोपियाँ थी, वे छिपकर कपड़े चुराने जाया करते थे, गीत बना दिए कि मनिहार का वेश बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया, अश्लील कथा जोड़ दी कि उनके आगे पीछे करोड़ो स्त्रियाँ नाचती थी वो रासलीला रचाते थे। यदि कोई हमारे सामने हमारे माता-पिता के बारे में ऐसी टिप्पणी करे तो क्या हम सहन करेंगे? नहीं ना! तो फिर आर्य समाज कैसे सहन करे? ऐसी स्थिति में  श्रीकृष्ण को समझना बहुत आवश्यक है। श्रीकृष्ण महाभारत में एक आलोकिक पात्र है जिनका वर्णन सबने अपने-अपने तरीके से किया। हर किसी ने श्रीकृष्ण के जीवन को खंडो में बाँट लिया सूरदास ने उन्हें बचपन से बाहर नहीं आने दिया, सूरदास के श्रीकृष्ण बच्चे से कभी बड़े नहीं हो पाते।
बड़े श्रीकृष्ण के साथ उन्हें पता नहीं क्या खतरा था? इसलिए अपनी सारी कल्पनायें उनके बचपन पर ही थोफ दीं? रहीम और रसखान ने उनके साथ गोपियाँ जोड़ दीइन लोगों ने वो श्रीकृष्ण मिटा दिया जो शुभ को बचाना और अशुभ को छोड़ना सिखाता था। श्रीकृष्ण की बांसुरी में सिवाय ध्यान और आनंद के और कुछ भी नहीं था पर मीरा के भजन में दुख खड़े हो गये, पीड़ा खड़ी हो गयी। हजारों सालों तक श्रीकृष्ण के जीवन को हर किसी ने अपने तरीके से रखा, भागवत कथा सुनाने लगे। श्रीकृष्ण का जो असली चरित्र, जो वीरता का चरित्र था, जो साहस का था, जो ज्ञान और नीति का था जिसमें युद्ध की कला थी वो सब हटा दिया नकली श्रीकृष्ण रासलीला वाला खड़ा कर दिया। गीता की व्याख्या बदल दी| जिसका नतीजा आने वाली नस्लें ज्ञानहीन होती गयीं।
हमारी अहिंसा की बात के पीछे हमारी कायरता छिप कर बैठ गई है। हम नहीं लड़े, बाहरी लोग हम पर हावी हो गये, हमें गुलाम बना लिया और फिर हम उसकी फौज में शामिल होकर उसकी तरफ से दूसरों से लड़ते रहे। हम गुलाम भी रहे और अपनी गुलामी बचाने के लिए लड़ते रहे। कभी हम मुगल की फौज में लड़े तो कभी अंग्रेज की फौज में। नहीं लड़े तो केवल अपनी स्वतंत्रता के लिए। फिर स्वामी दयानंद जी आये हमारे सामने श्रीकृष्ण के उद्गारों को रखा हमें बताया कि हम लड़ तो रहें पर अपने लिए नहीं अपितु दूसरों के लिए लड़ रहे है, उठो जागो अपने लिए लड़ो। योगिराज की नीति और उनकी युद्ध कला को समझाया। श्रीकृष्ण जी महाराज का असली चरित्र हमारे सामने रखा। हमने जाना अर्जुन नाम मनुष्य का है श्रीकृष्ण नाम चेतना का है जो सोई चेतना को जगा दे उसी जाग्रत चेतना का नाम श्रीकृष्ण है। जो अपने धर्म व देश के प्रति आत्मा को जगा दे उसी नाम श्रीकृष्ण है।
पुराणों का चश्मे से श्रीकृष्ण को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि वहां सिवाय मक्खन और चोरी के आरोपों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। इस्कान के मन्दिरों में नाचने से श्रीकृष्ण को नहीं पाया जा सकता। उसके लिए अर्जुन बनना पड़ेगा तभी श्रीकृष्ण को समझा जा सकता है। पहली बात तो यह है कि कोई अवतार जन्म नहीं लेता हैहर किसी के अन्दर ईश्वर का अंश है इस संसार में सब अवतार हैं। जिसकी ज्ञान, चेतना और विवेक जाग्रत है जिसे सत्य-असत्य का ज्ञान है, वही परमात्मा के निकट है। श्रीकृष्ण जैसा कोई दूसरा उदहारण फिर पैदा नहीं हुआ। यदि स्त्री जाति के सम्मान की बात आये तो श्रीकृष्ण जैसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा बुद्ध ने स्त्री से को दीक्षित करने से मना किया। महावीर ने तो उसे मोक्ष के लायक ही नहीं समझा, मुहम्मद ने उसे पुरषों की खेती कहा, तो जीसस ने तो उनके बीच प्रवचन करने से मना कर दिया। श्रीकृष्ण ने शायद भूलकर भी जरा-सा भी अपमान किसी स्त्री का नहीं किया। जरूर उस समय स्त्री जाति श्रीकृष्ण का सम्मान करती रही होगी। लेकिन इन झूठ के ठेकेदारों ने खुद नारी जाति का शोषण करने के लिए योगीराज के महान चरित्र को रासलीला से जोड़ दिया।

हमारा वर्तमान नित्य भविष्य के करीब पहुँचता है, अतः हमें समझ लेना चाहिए कि जहाँ श्रीकृष्ण की प्रतिमा बनेगी वहीं श्रीकृष्ण का विचार दफन हो जायेगा। जहाँ श्रीकृष्ण को अंधविश्वास में लपेटा जायेगा वहीं धर्म की हानि होगी जो लोग सोचते है श्रीकृष्ण फिर धर्म की हानि होने पर अवतार लेंगे और विधर्मियों का नाश करेंगे तो सोचें धर्म का असल नाश किसने किया उस पादरी ने या उन्हें चोर और रसिक लिखने वालों को? तो मारा कौन जायेगा? धर्म की बुनियादों में श्रीकृष्ण हमेशा जीवित है बस जिस दिन यह अंधविश्वास के अंधकार का पत्थर हटेगा फिर श्रीकृष्ण का जन्म दिखाई देगा, उनका विराट स्वरूप दिखाई देगा। राजीव चौधरी 

Thursday, 11 August 2016

हैदराबाद सत्याग्रह शहीद आर्य समाजी

ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा याद करो इन आर्य समाजियों की कुर्बानी
                संसार के सम्मानित राष्ट्रों का इतिहास उन व्यक्तियों के चरित्रों से सदा भरपूर रहा है, जिन्होंने उच्च एवं पवित्र उद्देष्यों की पूर्ति के लिए महान् से महान् त्याग किया और समय पड़ने पर इस संघर्ष में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया और पीछे बलिदानों के अवषेश रख गए, जो अनुगामियों का पथ प्रदर्शन कर सकते हैं
शहीदों को मृत्यु कभी स्पर्श नहीं करती अपितु वे स्वयं मर कर अमर हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है। ऐसी महान् आत्माओं का रक्त कदापि व्यर्थ नहीं गया अपितु समय आने पर एक ऐसे प्रखर प्रचंड रूप में प्रवाहित हो निकला जिसमें हिंसा, अत्याचार और पाशविकता के दल स्वतः निमग्न हो गए। ये व्यक्ति धर्म-प्रचार, सदुपदेश, प्रजावाद की प्रस्थापना, शांति और प्रेम एवं सत्य को साधारण व्यक्तियों तक पहुंचाने के लिये अपने जीवन-लक्ष्य की कठिनाईयों को पार कर आगे बढ़ते ही रहे। इन्होंने सदा पराक्रान्तों का साथ दिया और मानवता के उच्च आदर्शो के रक्षक हुए और इन हेतुओं से निज तन-मन-धन की बलि देकर स्पष्ट कर दिया कि इनका सेवा कार्य में कितना उत्साह था तथा बलिवेदी से कितना ऊंचा प्रेम था।
आर्य समाज के शहीद मरने के बाद अमर हो गये और इन हुतात्माओं के रक्त से हैदराबाद में वैदिक धर्म का जो चमन सींचा गया, वह अब एक विस्तृत उद्यान बन गया है और रियासत में वैदिक धर्म का नव सन्देश दे रहा है। यहां हम कुछ आर्य समाजी शहीदों का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं जो वर्तमान में संसार में उपस्थित तो नहीं हैं पर वे सबके ह्रदयों  में स्मरण रहेंगे और ऐसा प्रतीत होता है कि हम इन्हें कभी भूल नहीं सकेंगे।
1. वेद प्रकाश जी
                वेद प्रकाष जी का पूर्व नाम दासप्पा था। दासप्पा संवत् 1827 में गुजोटी में पैदा हुए। इनकी माता का नाम रेवती बाई और पिताश्री का नाम रामप्पा था। गरीब माता-पिता को इसकी क्या सूचना थी कि उनका बेटा बड़ा होकर हुतात्मा बनेगा और वैदिक धर्म के मार्गं में शहीद होकर अमर हो जाएगा। दासप्पा ने मराठी माध्यम से आठवीं श्रेणी तक षिक्षा ग्रहण की। जैसे-जैसे ये बढ़ते गये वैसे-वैसे वे धर्म की ओर आकर्षित होते गये। वे आर्य समाज के सत्संगों में बराबर सम्मिलित होते थे। वैदिक धर्म के आकर्षण ने इन्हें महर्शि दयानन्द का पक्का भक्त बना दिया। आर्य समाजी बनने के बाद यह वेद प्रकाश कहलाने लगे थे। इनका आर्य समाज में असाधारण प्रेम एवं निश्ठा के ही कारण गुंजोटी में आर्य समाज की नींव डाली गयी पर स्थानीय इर्स्यालू यवन इन्हें देखकर जलने लगे थे। वेद प्रकाश जी सुगठित शरीर एवं सद्गुण रखते थे और लाठी-तलवार चलाने की विद्या में पर्याप्त दक्ष थे। इनकी यह दक्षता कई भयंकर संकटों के समय इनकी सहायक सि( हुई। कई बार विरोधी दल ने इन पर आक्रमण किये और ये अपने आपको सुरक्षित रखने में सफल हुए।

 गुंजोटी का छोटे खां नाम का एक पठान स्त्रियों को गलत निगाहों से देखता था। एक दिन वेद प्रकाश  जी ने इसे ऐसा करने से रोका और सावधान किया कि भविष्य में इस प्रकार कुद्रष्टि मातसमाज पर न डालें। यह बात गुण्डों को हृदयग्राही न थी और सब इनके शत्रु हो गए। वेद प्रकाश जी ने गुंजोटी में हिन्दुओं के लिये पान की एक दुकान खोल दी और चांद खान पान का एक व्यापारीद्ध इनका शत्रु हो गया और भीतर ही भीतर इनके विरुद्ध  षड्यंत्र रचने लगा। एक दिन यवनों ने स्थानीय आर्य समाज के मन्त्री के मकान पर अकस्मात् धावा बोल दियाइसकी सूचना वेद प्रकाश जी को मिली, वे इन आक्रमणकारियों को रोकने के लिए निःशस्त्र ही चले गये। मन्त्री के मकान के समीप दो-तीन मुसलमानों ने इन्हें पकड़ लिया और आठ-नौ व्यक्तियों ने इन्हें नीचे गिरा कर हत्या कर दी। विषेश उल्लेखनीय बात यह है कि उस दिन पुलिस ने वहां के प्रतिष्ठित हिन्दुओं को थाने में बुलाकर बैठा रखा था। आक्रमकत्र्ताओं और हत्यारों को पहचान लिया गया और न्यायालय में गवाह भी उपस्थित किये, पर फिर भी हत्यारों को निर्दोश घोषित कर दिया गया। वेद प्रकाश जी का रक्त हैदराबाद में पहला रक्त था जो बड़ी निर्दयता के साथ बहाया गया था और इसके बाद वीर आर्यों के बलिदानों का एक सिलसिला सा चल पड़ा।
2. धर्म प्रकाश  जी
 धर्म प्रकाश जी का पूर्व नाम नागप्पा था। नागप्पा जी का जन्म कल्याणी में संवत् 1839 में हुआ था। इनके पिताश्री का नाम सायन्ना था। इनका पदार्पण जब आर्य समाज में हुआ तब से ये धर्म प्रकाश  कहलाने लगे। कल्याणी एक मुस्लिम नवाब की जागीर थी। वहां मुसलमानों का अत्याचार नंग-नाच कर रहा था। मुसलमानो के अत्याचारों को देखकर धर्म प्रकाश इसकी रोक-थाम की तैयारी में लग गये। हिन्दुओं को शस्त्र विद्या सिखाने लगे। कल्याणी के मुसलमान हिन्दुओं के शारीरिक अभ्यास से रुस्ठ हो गये और उन्होंने इनकी हत्या करने की कमर कस ली। कल्याणी के इस धर्मवीर पर कई बार आक्रमण किये गये पर आक्रमकारियों को सफलता नहीं मिली। कल्याणी के खाकसार इनकी हत्या की ताक में रहने लगे। 27 जून 1837 ई. की रात को धर्म प्रकाश  आर्य समाज कल्याणी के सत्संग से अपने घर वापस जा रहे थे कि खाकसारों ने इन्हें एक गली में घेर कर बरछों और भालों की सहायता से मार डाला। वेद प्रकाश  की हत्या से आर्य समाज में शोक  व दुःख की लहर दौड़ गयी। इस हत्याकाण्ड के हत्यारे भी न्यायालय से निर्दोष छोड़ दिये गये।
3. महादेव जी
 महादेव जी अकोलगा के रहने वाले थे। साकोल आर्य समाज के सत्संगों में जब इन्हें कई बार सम्मिलित होने का अवसर मिला, तब वैदिक धर्म का जादू इन पर चढ़ गया। इनके मन और मस्तिक्ष पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि आर्य समाजी बन जाने के बाद वैदिक धर्म के प्रचार की धुन लग गयी। तरुणोत्साह और साहस इन्हें इस मार्ग पर आगे बढ़ाता ही रहा। महादेव जी की मुखाकष्ति पर तेज था। भाषण देते समय इनके मुख से जो वाक्य निकलते, उन्हें लोग बड़ी तन्मयता और रुचि से सुनते और एक तरुण आर्य युवक को प्रचार के काम में  इस प्रकार तल्लीन देखकर लोगों को भी इच्छा होती थी कि वे भी इसी प्रकार बनें। महादेव जी के प्रचार का काम जब प्रगति पर था उस समय मुसलमान इनके अकारण षत्रु बन गये। कई बार इन पर इस द्रष्टि से आक्रमण हुए कि वे सदा के लिए मौन हो जाए पर वे बचते ही रहे।
एक दिन की घटना है कि महादेव जी अपने प्रिय धर्म प्रचारार्थ कहीं जा रहे थे कि रास्ते में किसी अज्ञात व्यक्ति ने पीछे से आकर छुरा घोंप दिया और 14 जुलाई 1938 के दिन यह आर्य युवक 25 वर्ष की आयु में सदा के लिए इस संसार से बिदा हो गया।
4. श्याम लाल जी
  धर्मवीर श्याम लाल जी का जन्म 1903 ई. भालकी में हुआ था। इनके पिताश्री का नाम भोला प्रसाद और माता का छोटूबाई था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में हुई। ये एक पौराणिक परिवार से थे। इनके एक मामा आर्य समाजी थे, जिनके प्रभाव से श्याम लाल जी के ज्येश्ठ भ्राता बंसीलाल जी वैदिक धर्म के अनुयायी और स्वामी दयानन्द के अन्तःकरण के भक्त बन गये और आर्य समाज के सर्वप्रिय नेता भी कहलाने लगे। गुलबर्गा में आपके ही प्रयासों से आर्य समाज की स्थापना हुई। वे स्वयं इस समाज के मन्त्री बनकर कार्य संचालन करते रहे। 1925 ई. में वकील बने और उदगीर में वकालत करने लगे। निजी जीविकोपयोगी कार्य करते हुए आर्य समाज का प्रचार भी करते थे। 1926 ई. में इन्हें चर्म रोग लग गया और वह इतना बढ़ा कि पूरा शरीर फूल गया। रोग निवारणार्थ आप लाहौर गये। अभी आप लाहौर में ही थे कि 1926 ई. में स्वामी श्रद्धानन्द  जी शहीद हो गये। स्वामी जी के इस बलिदान का प्रभाव इन पर अत्यधिक पड़ा। लाहौर से वापस आकर उदगीर में आर्य समाज की स्थापना की और प्रतिज्ञा की कि आजीवन वैदिक धर्म का प्रचार करेंगे। उदगीर के तात्कालीन मुसलमान तहसीलदार ने स्थानीय मुसलमानों को प्रेरित कर इनके मकान पर आक्रमण करवा दिया, परन्तु यह आक्रमण विफल रहा। आर्य समाज उदगीर की स्थापना के बाद आपके अथक प्रयासों से विजय दशमी के अवसर पर प्रथम बार जुलूस निकाला गया। होली के जुलूस के अवसर पर आप पर पुनः आक्रमण हुआ पर इस बार भी आप बच गये। श्याम लाल जी ने अछूतों के लिए एक पाठशाला, एक व्यायाम शाला तथा एक निःशुल्क चिकित्सालय भी स्थापित किया। 1928 ई. में उदगीर आर्य समाज का वार्षिकोत्सव हुआ और इसी के बाद पुलिस आपका पीछा करने लगी। इसी वर्ष धारा 104 के अधीन आप पर झूठा मुकद्दमा चलाया गया और आपसे दो हजार की जमानत और मुचलका लिया गया। श्याम लाल जी उदगीर से बाहर निकलकर भालकी, कल्याणी, औराद, शाहजहानी, लातूर तथा औसा आदि स्थानों पर प्रचार करने लगे। कई बार मुसलमानों ने आप पर आक्रमण किया और कई ऐसे अवसर आये जब कि हिन्दुओं ने आपको अपने पास आश्रय देना अस्वीकार किया। आपने कई रातें मार्ग पर चलते हुए बितायीं और दिन में फिर प्रचार कार्य किया। 1935 ई. में माणिक नगर की यात्रा के अवसर पर मुसलमानों ने आप पर छुरा घोंप देने का प्रयत्न किया पर एक नवयुवक बीच में आया, स्वयं जख्मी हुआ और इन्हें बचा लिया। 1938 ई. में इन पर पुलिस ने एक झूठा मुकद्दमा चलाया और न्यायालय ने इन्हें दीर्घकालिक दण्ड दिया। अभी आप कारावास में दंड भोग रहे थे कि आपका देहांत हो गया। पं. श्याम लाल जी का नाम हैदराबाद आर्य समाज के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा क्योंकि ये अपने अथक प्रयत्नों, संघर्ष और श्रद्धा से आर्य समाज को शक्तिषाली और विस्तृत करने की चिन्ता अन्तिम श्वास तक करते रहे।
5. व्यंकटराव जी
  व्यंकटराव जी कंधार जिला नांदेड़ के रहने वाले थे। इन्होंने स्टेट कांग्रेस द्वारा संचालित सत्याग्रह में भाग लिया और दण्ड भोगते रहे। कारावास के अधिकारियों द्वारा मार-पीट के कारण 18 अप्रैल 1938 ई. में आप परलोक सिधार गये।
6. विष्णु भगवान् जी
 विष्णु भगवान् जी ताण्डूर ;गुलबर्गाद्ध के रहने वाले थे। इन्होंने गुलबर्गा में ही सत्याग्रह किया और वहीं इन्हें कारावास का दण्ड दिया गया। आपको गुलबर्गा से औरंगाबाद और फिर हैदराबाद जेल में रखा गया और यहां दूसरे सत्याग्रहियों के साथ इन्हें इतना पीटा गया कि ये सहन न कर सके और 2 मई 1939 ई. में आपने 30 वर्ष की आयु में अपना शरीरान्त किया।
7. माधवराव सदाशिवराव  जी
 आप लातूर के रहने वाले थे। आपने 30 वर्ष की आयु में आर्य सत्याग्रह में भाग लिया और गुलबर्गा जेल में बन्द कर दिये गए। 26 मई 1939 ई. के दिन कड़कती धूप में नंगे पैर जेल में कठिन परिश्रम करने से रोगग्रस्त हो गए। चिकित्सा का कोई प्रबन्ध नहीं किया गया और आप इस प्रकार निजाम सरकार की क्रूरता के कारण देहावसान कर गये। माधव राव सदाशिवराव के देहान्त की सूचना पाकर असंख्य नर-नारी इनके अन्तिम दर्शन करने गए पर पुलिस ने रोक  दिया और जेल में ही इनका शव अग्नि की भेंट कर दिया गया।
8. पाण्डुरंग जी
उस्मानाबाद के रहने वाले युवा आर्य सत्याग्रही को सत्याग्रह के कारण ही कारावास का दंड दिया गया था। गुलबर्गा जेल में इन पर इन्फुएंजा का आक्रमण हुआ पर चिकित्सा का कोई प्रबन्ध न किया गया। हालत चिन्ताजनक होती गई। 25 मई 1939 के दिन इन्हें नागरिक औषधालय में भेजा गया और वहीं 27 मई को इनका देहान्त हो गया। असंख्य नर-नारी इनके अन्तिम दर्शन को आए पर पुलिस ने इन्हें वापस जाने पर विवश कर दिया और पुलिस द्वारा ही इनका अन्तिम संस्कार किया गया।
9. राधाकृष्ण  जी
 राधाकृष्ण जी निजामाबाद के एक राजस्थानी थे। 1903 ई. में आपका जन्म हुआ था। आपके पिता का नाम जीतमल था। 1934 ई. में आप आर्य समाजी बने और तभी से इसके प्रचार की धुन लग गई। इन्होंने ही निजामाबाद में आर्य समाज की स्थापना की थी। इसी कारण आप पुलिस की वक्रद्रष्टि में खटने लगे। मुहर्रम के दिनों में आप पर मुकद्दमा चलाया गया और इनसे एक साल के लिए दो हजार रुपये का मुचलका लेकर छोड़ा गया। आर्य सत्याग्रह के समय आप बड़े उत्साह के साथ चन्दा एकत्रित करने में जुटे थे। 2 सितम्बर 1931 ई. के दिन एक अरबी ने छुरा घोंप कर मार डाला और यह बात सर्व विदित हो गई कि इनकी हत्या के षड्यंत्र में पुलिस का हाथ था।
10. लक्ष्मण राव जी आपने धार्मिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह किया। जेल के कठोर व्यवहार को सहन न कर सकने के कारण 3 अगस्त 1939 ई. को हैदराबाद जेल में आपका देहान्त हो गया।
11. शिवचन्द्र जी
 आपका जन्म 3 मार्च 1916 ई. में दुबलगुण्डी में हुआ था। आपके पिताश्री का नाम अन्नपक्षप्पा था। 1935 ई. में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। सरकार की ओर से आपको छात्रवष्त्ति भी प्राप्त हुई थी। आप हुमनाबाद की एक पाठशाला में अध्यापक हो गये थे। पाठशाला के अवकाष  के समय आप आर्य समाज के साहित्य का अध्ययन किया करते थे। आर्य समाज के लिए आपने बड़े उत्साह और श्रद्धा से काम किया। शोलापुर से आप सत्याग्रहियों को हैदराबाद लाते थे और सत्याग्रह के समाचार हैदराबाद से बाहर भेजते थे। 3 मार्च 1942 ई. के दिन होली में जुलूस के अवसर पर मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया, फलस्वरूप आप शहीद हो गए। आप के साथ आपके साथी लक्ष्मण राव जी, राम जी अगडे़ और नरसिंह राव जी गोलियों का निषाना बने थे।

12. राम कृष्ण जी
 राम कृष्ण जी का जन्म लावसी ग्राम में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था और यह शहीद होने से केवल दो सप्ताह पूर्व ही आर्य समाजी बने थे। एक दिन पठानों ने घोषणा की थी कि उस दिन वे मन्दिर को तोड़ेंगे, जिसे धर्म पर विश्वास हो वे आकर उन मन्दिरों को उनके हाथों से बचा लें।सब हिन्दू घबरा कर अपने-अपने मकानों में बैठ गये किन्तु जब राम ने यह घोषणा सुनी तो वे क्रोधाग्नि से जल उठे। पुजारियों ने कभी इन्हें मन्दिर में प्रवेश होने नहीं दिया था और फिर आर्य समाजी होने के कारण इन्हें मन्दिर और इन मन्दिरों की मूर्तियों से क्या रुचि, परन्तु पठानों की इस घोषणा को इन्होंने सम्पूर्ण हिन्दू जाति के लिए एक चैलेंज समझा और जाति की मान रक्षा  हेतु मन्दिर द्वार पर अपना डेरा डाला। यहाँ इन पर गोलियों की वर्षा हुई, घायल होने पर भी आपने पठानों को मार भगाया और हिन्दू जाति की लाज रख ली। स्वयं शहीद होकर इन्होंने मन्दिर की रक्षा की और जिस जाति में वे पैदा हुए थे, उसकी प्रतिष्टा रख ली।
13. भीम राव जी
  आप हिपला उदगीरद्ध के रहने वाले थे। इनके मित्र माणिक राव की बहन को मुसलमानों ने मुसलमान बना लिया था। भीमराव ने उसे शुद्ध कर लिया था। इस कारण मुसलमानों ने क्रोधित होकर इनके घर को आग लगा दी और इन्हें मार कर इनके हाथ-पांव काट डाले और इन्हें आग में जला दिया।
14. माणिक राव जी
 यह भी हिपला उदगीरद्ध के रहने वाले थे। इनकी बहन को मुसलमान बना लिया गया था। जब इनकी बहन को शुद्ध कर लिया गया तो मुसलमानों ने माणिक राव जी को गोलियों का निशाना बना दिया था।
15. सत्य नारायण जी
  आप अम्बोलगा ;वीदरद्ध के रहने वाले थे। आर्य समाज का काम बड़े जोष  के साथ करते थे, इसीलिए मुसलमान इनके शत्रु हो गए। मुहर्रम के दिनों में वे बाजार से जा रहे थे कि एक मुसलमान ने पीछे से तलवार से हमला कर दिया। वे तुरन्त ही चिकित्सालय पहुंचाए गये पर वहां जाते ही परलोक सिधार गये।
16. महादेव जी
यह तिवाड़े के रहने वाले थे। गुलबर्गा में ही सत्याग्रह करने के कारण जेल में  डाल दिए गये थे। जेल वालों के अत्याचार से 1939 ई. में ही चल बसे।
17. अर्जुन सिंह जी
 आप आर्य समाज के एक नर-रत्न थे। आप तालुका कन्नड़ औरंगाबाद में पैदा हुए थे। बचपन से ही आप हैदराबाद में रहने लगे थे। अपने उत्साह और निष्ठां के कारण आप हैदराबाद दयानन्द मुक्ति दल के सेनापति बनाए गए थे। सम्वत् 1861 में जंगली विठ्ठोबा की यात्रा में कुषल प्रबन्ध करने के बाद घर वापस लौट रहे थे कि मार्ग में कुछ सशस्त्र मुसलमानों ने आप पर आक्रमण कर दिया, तुरन्त ही उस्मानिया दवाखाना भेजे गए पर दूसरे ही दिन परलोक सिधार गये।
18. गोविन्द राव जी
आप निलंगा जिला बीदर के रहने वाले थे। सत्याग्रह करके जेल गये। पर वहां के अत्याचारों को सहन न कर सकने के कारण देहावसान कर गये।
19. गोन्दिराव जी, लक्ष्मण राव जी इन दोनों ने सत्याग्रह में अपनी जान की बाजी लगा दी। आर्य समाजी शहीदों का यह बहुत ही संक्षिप्त परिचय है। जिसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हैदराबाद में वे निजाम सरकार और मुसलमानों के अत्याचारों का किस प्रकार निषाना बने और वैदिक पताका को ऊॅंचा रखने के लिए किस प्रकार इन्होंने अपना अन्तिम रक्त बिन्दु तक बहा दिया।

यदि किसी आर्य महानुभाव के पास उपरोक्त क्रांतिकारियों की फोटो उपलब्ध हो तो वे उस फोटो को दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा को उपलब्ध कराने की कष्पा करें। जिससे इन क्रांतिकारियों की स्मष्ति में कार्यक्रम आयोजित कर इनको सच्ची श्रधान्जली अर्पित की जा सके और लोगों को इनके विशय में सम्पूर्ण जानकारी हासिल कराई जा सके। फोटो ईमेल कर सकते हैं| ..........(दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) राजीव 

Thursday, 28 July 2016

मूर्तिपूजा पर निष्पक्ष विचार

मेरे अनेक मूर्तिपूजक मित्र है। सभी जानते है कि मैं मूर्तिपूजा नहीं करता क्यूंकि ईश्वरीय ज्ञान वेद में मूर्तिपूजा को अमान्य कहा है। कारण ईश्वर निराकार और सर्वव्यापक है। इसलिए सृष्टि के कण कण में व्याप्त ईश्वर को केवल एक मूर्ति में सीमित करना ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव के विपरीत है। ईश्वर हमारे ह्रदय में स्थित आत्मा में वास करते है। इसलिए ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना के लिए मूर्ति अथवा मंदिर कि कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए अपने भीतर ही ईश्वर को खोजना चाहिए।
आज एक मित्र ने मुझसे मूर्तिपूजा को लेकर शंका पूछी। उन्होंने कहा मूर्तिपूजा अध्यात्म जगत में प्रथम सीढ़ी है। जो अल्पमति लोग है उनके लिए मूर्तिपूजा का प्रावधान किया गया था। मैंने उत्तर दिया फिर तो पहली सीढ़ी चढ़ने के पश्चात अगली सीढ़ी चढ़कर निराकार ईश्वर कि स्तुति-प्रार्थना एवं उपासना तक अनेक लोगों को पहुँचना चाहिए। मगर हम किसी भी मूर्तिपूजक की ऐसी प्रगति नहीं देख पाते।
उल्टा हम उनकी अवनति देखते है। उदहारण के लिए वैदिक काल में केवल निराकार ईश्वर कि उपासना का प्रावधान था। मध्यकाल में बुद्ध और जैन मत वालों ने बुत पूजा आरम्भ करी। उन्हें देखकर श्री राम जी और श्री कृष्ण जी की मूर्तियां बनाई जाने लगी। मध्य काल के अग्रिम भाग में विभिन्न पुराणों की रचना हुई। जिससे अनेक कल्पित अवतार प्रचलित हुए। विभिन्न अवतारों की मूर्तियां बनने लगी। कालांतर में देवियों का प्रवेश हुआ। मूर्तिपूजा में विभिन्न मतों के प्रवर्तकों, गुरुओं आदि जुड़ गए। अगली सीढ़ी तो अभी बहुत दूर थी। कलियुग में केवल मूर्ति का सहारा ऐसा सिखाया गया। इसका प्रभाव ऐसा हुआ कि मूर्तिपूजा में अब एक ऐसा दौर आया कि लोग श्री राम, श्री कृष्ण और वीरवर हनुमान जी को भी भूलने लग गए। महान पुरुषों का स्थान अब साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां एवं अजमेर वाले गरीब नवाज़ की कब्र ने ले लिया। बुत परस्ती अब कब्र परस्ती में बदल गई। जिन हिन्दुओं को अगली सीढ़ी चढ़ना था वो जमीन के अंदर समा गए। अक्ल में दखल देना बंद हुआ। हिन्दुओं को इतनी भी मति न रही कि साईं बाबा और गरीब नवाज सभी बिगड़े काम बनाने वाले बन गए। राम और कृष्ण के मंदिरों खाली हो गए। रामायण-महाभारत और गीता का पाठ छूट गया। वेद, दर्शन और स्मृतियों का स्वाध्याय तो अतीत कि बात हो गई। साईं संध्या गाई जा रही है। अब कब्रों पर कलमा पढ़ सुन्नत की तैयारी हो रही है।


आगे ईश्वर ही इस हिन्दू समाज का रक्षक होगा। इसलिए मित्रों इस काल्पनिक तर्क से बाहर निकले कि मूर्तिपूजा अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं अपितु गहरा गड्ढा है। इसमें जो एक बार गिरा। तो निकलने के लिए बहुत प्रयास करना होगा।
आईये वेद विदित निराकार ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना और उपासना अपने ह्रदय में स्थित आत्मा में ही करें। इसी में हिन्दू समाज का भला है।
(इस लेख का उद्देश्य हिन्दू समाज में मूर्तिपूजा के कारण हो रही दुर्दशा से सभी को परिचित करवाना है। कृपया निष्पक्ष रूप से अपनी प्रतिक्रिया दीजिये) आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
लेख 
डॉ विवेक आर्य 

Wednesday, 27 July 2016

नई शिक्षा निति में लागू हो संस्कृत!!

यदि आप संस्कृत की दी हुई रोटी खाते हैं तो सभी सदस्यों से निवेदन इस पत्र को मानव संसाधन विकास मंत्रालय कोnep.edu@gov.in पर ईमेल करें। आप और भी कुछ जोड़ने के लिए स्वतन्त्र हैं।सुझाव भेजने की अन्तिम तिथि ३१/०७/२०१६ है।आप अपना नाम तथा हस्ताक्षर कर साधारण डाक से भी भेज सकते हैं।आज आपके पास अवसर है। आगे आने वाले २० वर्षों तक संस्कृत को सुरक्षित रखने में अपना योगदान करें। यह ऐतिहासिक क्षण है। अपनी वफादारी निभाएं।

.......प्रिय सदस्यों! नई शिक्षानीति २०१६ की कमेटी ने संस्कृत बोलने/ समझने वाले लोगों की संख्या जनगणना २००१का हवाला देखते हुए १४०००(चौदह हजार), हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या ४०℅ (अड़तालीस करोड़)पूरे देश में बताकर महत्वहीन माना है तथा उचित स्थान नहीं दिया। पूरे देश में केवल ३℅ अंग्रेजी जानने वालों की सुविधा का ध्यान रखते हुए पूरे देश पर अंग्रेजी थोप दी गयी है।अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया है । अत: यह समय व्यर्थ के चुटकुलों , आराम के संदेशों का नहीं है। hrd को ईमेल करने का है। कविता,कहानी ३१ जुलाई के बाद जी भर के शेयर करना।फिलहाल जिसकी कृपा से रोटी,कपड़े, गाड़ी,मकान ,सैर-सपाटा आदि का सतत आनन्द आप,आपके बच्चे ले रहे हैं,उसके संरक्षण एवं संवर्धन को सुनिश्चत करने के लिए nep.edu@gov.in पर ईमेल करो। देश और देश की भाषाओं के प्रति वफादारी दिखाओ।
जिन सदस्यों ने संस्कृत भाषा को नई शिक्षानीति २०१६ में उचित स्थान देने के लिए सुझाव ईमेल किये हैं, उन सभी का हार्दिक आभार। अब आप अपने मित्रों से ईमेल कराने का प्रयास करें। संस्कृत विरोधी लोग लोकसभा तथा राज्यसभा में सक्रिय हो चुके हैं। आप सभी से निवेदन है कि आप अपने राजनैतिक प्रतिनिधियों के सहयोग हेतु  प्रयास शुरू करें। अब तक हम ५ सांसदों की ओर से सुझाव भिजवा चुके हैं तथा आगे भी प्रयास जारी है।
डॉ व्रजेश गौतम ,अध्यक्ष ,संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली
सम्पर्क सूत्र 9968812963
9868879710 डॉ दयालु (महासचिव) (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) 

Wednesday, 13 July 2016

सवेंदनशीलता की अनूठी मिसाल

पिछले दिनों मुम्बई की सड़क पर दुर्घटना में एक कुत्ते और आदमी की मौत हो गयी थी दुर्घटना के काफी देर बाद तक उस आदमी के पास से लोग गुजरते तो रहे पर कोई पास नहीं आया| किन्तु उस मृत कुत्ते के पास एक कुत्ता बैठा पाया| यही हाल उत्तराखंड में देखने को मिला| शायद इंसानों को संवेदनशीलता के मामले में इन बेजुबान जानवरों से कुछ सीख लेना चाहिए उत्‍तराखंड के चंपावत में बंदरों ने इंसानियत की एक ऐसी मिशाल पेश की जिसे शायद इंसान भी ना पेश कर सके। मगर दुख भरी बात यह रही कि सभी बंदरों को अपनी जान देनी पड़ी। चंपावत के लोहाघाट रोडवेज कार्यशाला में बने पानी के टैंक में एक बंदर का बच्‍चा डूबने लगा। यह देखकर 10 बंदर उसे बचाने के लिए टैंक में कूद गए। फिर बंदर पानी से बाहर नहीं निकल पाए और उनकी मौत हो गई।
सूचना पाकर मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम ने सभी बंदरों के शवों को बाहर निकाला और पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया। बाद में उन्‍हें रोडवेज कार्यशाला परिसर में दफना दिया गया। जानकारी के मुताबिक सोमवार की देर शाम एक बंदर का बच्चा अपनी मां से बिछड़ कर छमनियां स्थित रोडवेज कार्यशाला परिसर में वाहनों की साफ-सफाई के लिए बने पानी के टैंक में गिर गया, जिसे बचाने की खातिर अन्य सभी बंदर टैंक में कूद गए।
हालांकि टैंक में पानी करीब तीन फिट था, लेकिन टैंक की करीब 10 फिट की गहराई होने के कारण कोई भी बंदर वहां से निकल नहीं पाया। काफी देर तक टैंक में फंसे रहने के कारण टैंक में डूबे सभी 10 बंदरों की मौत हो गई।..........दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा खबर और चित्र डेली हंट से साभार