Saturday, 23 June 2018

व्यक्ति की पहचान कैसे करें


एक गुरु के दो शिष्य थे- आनंद और शिव. आनंद एक राजकुमार था, पर शिव किसान का पुत्र. आनंद घोर आलसी और अहंकारी था, जबकि शिव परिश्रमी और विनम्र था. आनंद के पिता राजा पृथ्वी सिंह प्रतिवर्ष एक प्रतियोगिता आयोजित करते थे, जिसमें हिस्सा लेने दूर-दूर से राजकुमार आते थे. उनकी बुद्धि की परीक्षा ली जाती थी और विजेता को पुरस्कृत किया जाता था. एक बार जब प्रतियोगिता आयोजित हुई तो गुरु जी अपने दोनों शिष्यों के साथ पहुंचे. जब शिव प्रतियोगी राजकुमारों के बीच बैठने लगा तो सभी राजपुत्र अपनी जगह से उठ खड़े हुए और बोले, राजकुमारों के बीच निर्धन किसान का बेटा नहीं बैठ सकता. राजा पृथ्वी सिंह बोले, अभी तुम राजकुमार नहीं शिक्षार्थी हो. इस दृष्टि से तुममें और इसमें कोई भेद नहीं है.


लेकिन राजकुमारों पर इसका कोई असर नहीं हुआ. अंतत: शिव उनसे अलग हटकर बैठ गया. राजा ने प्रश्न पूछा, अगर तुम्हारे समक्ष एक घायल शेर आ जाए जिसे तीर लगा हो, तो तुम उसे तड़पता छोड़ दोगे या उसका उपचार करोगे. प्रश्न सुनते ही राजकुमारों ने एक स्वर से उत्तर दिया कि वे सिंह को छोड़ देंगे, अपनी जान संकट में नहीं डालेंगे.  लेकिन शिव चुप ही बैठा रहा. राजा ने उससे पूछा, या तुम्हारा भी यही उत्तर है. जो इन राजकुमारों का है? शिव ने कहा, नहीं, यदि मेरे समक्ष एक घायल शेर आ जाए तो मैं उसका भी तीर निकाल कर उसका उपचार करूंगा,
क्योंकि उस समय उस घायल जीव की जान बचाना मेरा कर्तव्य होगा. मनुष्य का यही कर्म है. शेर का कर्म है मांस खाना. अगर स्वस्थ होने के बाद वह मुझे मारकर खा गया तो वह उसका कर्म है, दोष नहीं. उत्तर सुन कर राजा पृथ्वी सिंह अपने स्थान से उठ खड़े हुए और बोले, धन्य है वह पिता जिसके तुम पुत्र हो. धन्य है वह गुरु जिसके तुम शिष्य हैं. तब गुरु ने राजकुमारों से कहा, व्यक्ति की पहचान उसके विचारों उसके कर्म से होती है उसकी वेशभूषा और जाति से नहीं.....

गहरा ज्ञान आपको अनुभवी बनाता है


एक गरीब युवक, अपनी गरीबी से परेशान होकर, अपना जीवन समाप्त करने नदी पर गया, वहां एक साधू ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। साधू ने, युवक की परेशानी को सुन कर कहा, कि मेरे पास एक विद्या है, जिससे ऐसा जादुई घड़ा बन जायेगा जो भी इस घड़े से मांगोगे, ये जादुई घड़ा पूरी कर देगा, पर जिस दिन ये घड़ा फूट गया, उसी समय, जो कुछ भी इस घड़े ने दिया है, वह सब गायब हो जायेगा। अगर तुम मेरी 2 साल तक सेवा करो, तो ये घड़ा, मैं तुम्हे दे सकता हूँ और, अगर 5 साल तक तुम मेरी सेवा करो, तो मैं, ये घड़ा बनाने की विद्या तुम्हे सिखा दूंगा। बोलो तुम क्या चाहते हो? युवक ने कहा, महाराज मैं तो 2 साल ही आप की सेवा करना चाहूँगा, मुझे तो जल्द से जल्द, बस ये घड़ा ही चाहिए, मैं इसे बहुत संभाल कर रखूँगा, कभी फूटने ही नहीं दूंगा। इस तरह 2 साल सेवा करने के बाद, युवक ने वो जादुई घड़ा प्राप्त कर लिया, और अपने घर पहुँच गया। उसने घड़े से अपनी हर इच्छा पूरी करवानी शुरू कर दी, महल बनवाया, नौकर चाकर मांगे, सभी को अपनी शान शौकत दिखाने लगा, सभी को बुला-बुला कर दावतें देने लगा और बहुत ही विलासिता का जीवन जीने लगा, उसने शराब भी पीनी शुरू कर दी और एक दिन नशें में, घड़ा सर पर रख नाचने लगा और ठोकर लगने से घड़ा गिर गया और फूट गया. घड़ा फूटते ही सभी कुछ गायब होगया। अब युवक सोचने लगा कि काश मैंने जल्दबाजी न की होती और घड़ा बनाने की विद्या सीख ली होती, तो आज मैं, फिर से कंगाल न होता।ईश्वर हमें हमेशा 2 रास्ते पर रखता है एक आसान जल्दी वाला और दूसरा थोडा लम्बे समय वाला, पर गहरे ज्ञान वाला। ये हमें चुनना होता है की हम किस रास्ते पर चलें

Friday, 15 June 2018

ऋषि दयानन्द का उद्देश्य सद्ज्ञान देकर आत्माओं को परमात्मा से मिलाना था


महाभारत के बाद ऋषि दयानन्द ने भारत ही नहीं अपितु विश्व के इतिहास में वह कार्य किया है जो संसार में अन्य किसी महापुरुष ने नहीं किया। अन्य महापुरुषों ने कौन सा कार्य नहीं किया जो ऋषि ने किया? इसका उत्तर है कि ऋषि दयानन्द ने अपने कठोर तप व पुरुषार्थ से सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त वेदों का ज्ञान प्राप्त किया व उनकी रक्षा के उपाय किए। वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं। वेदों में परा व अपरा अर्थात् अध्यात्मिक व सांसारिक, दोनों प्रकार की विद्याओं का सत्य व यथार्थ ज्ञान है। वेदों में ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रकृति का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षि दयानन्द ने योगाभ्यास एवं आर्ष व्याकरण की सहायता से वेदाध्ययन कर सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने जो ज्ञान प्राप्त किया वह उनके समय में देश व संसार में प्रचलित नहीं था। संसार में वेदों एवं ज्ञान के विपरीत असत्य, अविद्या व अन्धविश्वास आदि प्रचलित थे। लोग लोग ईश्वर, आत्मा, धर्म-कर्म तथा सामाजिक व्यवहार करने के प्रति भ्रमित थे। किसी भी मत के आचार्य व उनके अनुयायियों को ईश्वर, जीवात्मा सहित सृष्टि एवं मनुष्यों के कर्तव्य व अकर्तव्यों का यथार्थ ज्ञान नहीं था। इस कारण मनुष्य का कल्याण न होकर अकल्याण हो रहा था।


मनुष्य भौतिक सुखों की प्राप्ति व उनके उपभोग को ही अपना लक्ष्य मानते थे। आज भी सभी व अधिकांश लोग ऐसा ही मान रहे हैं जिसका कारण मुख्यतः पश्चिमी संस्कार व अविद्या है। संसार में भिन्न भिन्न मत हैं जो सभी अविद्या से ग्रस्त है। इनके आचार्य चाहते नहीं कि ईश्वर व आत्मा विषयक सत्य ज्ञान सहित विद्या पर आधारित ईश्वरोपासना और सामाजिक परम्पराओं का प्रचार व लोगों द्वारा उसका निर्वहन हो। ऋषि दयानन्द ने इसी अविद्या के नाश का आन्दोलन किया था जिसके लिए उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरुणानिधि, व्यवहारभानु आदि ग्रन्थों की रचना की थी। यद्यपि ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों में प्रायः सभी मुख्य विषयों का ज्ञान है परन्तु आत्मा और परमात्मा के ज्ञान व विज्ञान को जानना सबसे मुख्य है। ऋषि दयानन्द ने आत्मा व परमात्मा के यथार्थ ज्ञान को प्राप्त कर उसका देश व विश्व में प्रचार करने में सफलता प्राप्त की। सफलता से हमारा अभिप्राय इतना है कि ऋषि के विचार उनके समय देश के अधिकांश भागों सहित इंग्लैण्ड, जमर्नी आदि अनेक देशों में पहुंच गये थे। आज इण्टरनैट का युग है। आज इंटरनैट के माध्यम से किसी भी प्रकार की जानकारी का कुछ क्षणों में ही विश्व भर के लोगों मे ंआदान-प्रदान किया जा सकता है। दूसरे देशों में कहां क्या हो रहा है, उसका परिचय व जानकारी भी हमें प्रतिदिन मिलती रहती है।

महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में मनुष्य, समाज, देश व विश्व के हित के अनेक कार्य किये। उन्होंने देश के अनेक भागों में जा जाकर धर्म व समाज सुधार के उपदेश दिये। पूना में दिए उनके 15 उपदेश तो सार रुप में संग्रहित किये गये परन्तु अन्य सहस्रों उपदेशों को संग्रहित नहीं किया जा सका। यह ज्ञान की बहुत बड़ी हानि हुई है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। इन ग्रन्थों में मनुष्य की प्रायः सभी जिज्ञासाओं को वेद, युक्ति व प्रमाणों के समाधान के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसमें ईश्वर के यथार्थ स्वरुप सहित आत्मा के स्वरुप व उनके गुण, कर्म व स्वभावों पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के स्वरुप को अपने साहित्य में अनेक स्थानों पर प्रस्तुत करने के साथ आर्यसमाज के दूसरे नियम में संक्षेप में प्रस्तुत किया है। उसी को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।ईश्वर वेद ज्ञान का देने वाला और सभी प्राणियों के हृदयों में सत्कर्मों की प्रेरणा करने वाला भी है। वह जीवात्माओं का अनादिकाल से मित्र, आचार्य व राजा है और उनके कर्मों के अनुसार उन्हें सुख-दुःख देने सहित उन्हें नाना प्राणी योनियों में जन्म देने और सच्चे ईश्वर भक्तों व साधकों को मोक्ष आदि प्रदान करता आ रहा है।

जीवात्मा के स्वरुप पर विचार करें तो हम पाते हैं कि जीवात्मा एक चेतन तत्व है जो अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, अनादि, अमर, अविनाशी, जन्म-मरण धर्मा, ईश्वर की उपासना, यज्ञ व वेदानुरुप कर्तव्यों का पालन कर सुख व उन्नति को प्राप्त होता है। ईश्वर व आत्मा का परस्पर व्याप्य-व्यापक संबंध है। व्याप्य-व्यापक संबंध होने के कारण दोनों सदा एक साथ रहते हैं परन्तु जीवात्मा की अविद्या जीवात्मा के ईश्वर के आनन्द को प्राप्त करने व उसका साक्षात्कार करने में बाधक होती है। ऋषि दयानन्द ने आत्मा की अविद्या को दूर करने के वेद व योग के आधार पर अनेक उपाय बताये हैं। यह उपाय उनके ग्रन्थों को पढ़कर जाने जा सकते हैं। यहां इतना ही कहना उपयुक्त होगा कि मनुष्य को सत्कर्मों का ज्ञान प्राप्त कर उन्हीं का आचरण करना तथा असत्कर्मों को जानकर उनका सर्वथा त्याग करना ही आत्मा की अविद्या को दूर करता है। इसके साथ ही वेद एवं वैदिक साहित्य का नित्य प्रति स्वाध्याय, योग दर्शन का अध्ययन व उसके अनुसार अभ्यास, ऋषि प्रणीत सन्ध्या एवं अग्निहोत्र आदि यज्ञों को करने सहित अन्य तीन महायज्ञों को भी करने से मनुष्य की अविद्या दूर होकर उसकी ईश्वर से आध्यात्मिक निकटता हो जाती है जो उसे ईश्वर का यथार्थ ज्ञान कराने के साथ सन्ध्या व योग साधना में सहायक होकर लक्ष्य तक पहुंचाती हैं।

महर्षि दयानन्द जी ने ईश्वर की प्राप्ति वा उसका साक्षात्कार करने के लिए सन्ध्या नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसका उद्देश्य प्रतिदिन प्रातः सायं दो समय ईश्वर के व उसके गुण, कर्म व स्वभाव आदि का ध्यान करते हुए उसकी निकटता को प्राप्त करना है। ईश्वर के स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदवादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय व वेदभाष्य ग्रन्थों को पढ़कर हो जाता है। सन्ध्या करने से मनुष्य की आत्मा का सुधार होता है और वह असत् से दूर होकर सत् अर्थात् ईश्वर की निकटता से शुद्ध व पवित्र हो जाता है। मनुष्य वा उपासक जितना अधिक सन्ध्योपासना करता है उतना ही उसकी आत्मा की उन्नति होकर उसका ज्ञान बढ़ता है। मनुष्य ईश्वर के वेद वर्णित सभी गुणों का विचार करने पर अनुभव करता उसे उपासना से लाभ हो रहा है। ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरुप को जानना व वेद सम्मत विधि से सन्ध्या करना भी मनुष्य की उन्नति के लिए बहुत बड़ी बात है। ऐसा करने से अन्धविश्वास व पाखण्ड दूर हो जाते हैं और मनुष्य सब प्राणियों में अपनी जैसी आत्मा के दर्शन करता है व उसे इसकी ज्ञानानुभूति होती है। यह ज्ञान ऋषि के ग्रन्थों सहित दर्शन, उपनिषद आदि ग्रन्थों के अनुकूल होता है जो तर्क व युक्ति से भी प्रमाणित होता है। हमारे पुराने सभी योगी व विद्वान इसी मार्ग का अवलम्बन करते थे और अपने जीवन में ध्यान, जप, स्वाध्याय, अग्निहोत्र आदि के द्वारा मन को एकाग्र कर नाना प्रकार की उपलब्ध्यिं प्राप्त करते हैं।

ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व आत्मा के सच्चे स्वरुप से तो विश्व के लोगों को परिचित कराया ही इसके साथ जीवन का कोई विषय ऐसा नहीं था जिसका ज्ञान उन्होंने न दिया हो। उन्होंने हिन्दी भाषा को देश की एकता व अखण्डता के लिए आवश्यक माना और अपने सभी ग्रन्थों को हिन्दी में लिखने के साथ पराधीनता के काल में अपने समय में हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए हस्ताक्षर अभियान व आन्दोलन भी चलाया था। गोरक्षा के प्रति भी वह पूर्ण सजग थे। उन्होंने गोरक्षा के अनेक कार्य किये। गोरक्षा से आर्थिक लाभों को बताते हुए उन्होंने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक गोकरुणानिधिकी रचना की थी। सच्चे हिन्दुओं के लिए गोरक्षा का प्रश्न जीवन व मरण का प्रश्न है। हमारे देश राजनीतिज्ञों में इच्छा शक्ति का अभाव है। इसी कारण गोरक्षा मानवीय एवं आर्थिक दृष्टि से देश हित में होने पर भी यह गोहत्या का दुष्कर्म देश में बढ़ता ही जा रहा है। ऋषि दयानन्द अपने समय में अनेक अंग्रेज अधिकारियों से भी मिले थे और उन्हें गोरक्षा के लाभों का परिचय देकर उनसे गोहत्या बन्द कराने में अपनी भूमिका निभाने को कहा था।

ऋषि दयानन्द ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने विचारों व मान्यताओं को वेद पर आधारित बनाया। वेद ज्ञान व विज्ञान के आधार है। इस कारण वेद में किसी प्रकार का अन्धविश्वास व मिथ्या परम्पराओं का होना सम्भव ही नहीं है। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में समाज में प्रचलित सभी मिथ्या परम्पराओं का भी खण्डन किया और उनके वेदों के अनुरुप समाधान प्रस्तुत किये। उन्होंने नारियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के साथ बाल विवाह का विरोध किया। विधवाओं के प्रति भी उन्हें सहानुभूति थी। अल्प आयु की युवा विधवाओं के पुनर्विवाह का उन्होंने कभी विरोध नहीं किया। ऋषि दयानन्द एक पति एक पत्नीकी वैदिक व्यवस्था के समर्थक थे। ऋषि दयानन्द ने पूर्ण युवावस्था में गुण, कर्म व स्वभाव की समानता के अनुसार विवाह करने का समर्थन व प्रचार किया। वह ग्रहस्थ जीवन में भी ब्रह्मचर्य के नियमों के पालन के समर्थक व प्रचारक थे। उन्होंने स्त्री व पुरुष शिक्षा के लिए भी उत्तम आदर्श विचार दिये और धर्म रक्षा के लिए सभी को वेद एवं पूर्व ऋषियों के ग्रन्थों को नियमित रुप से पढ़ने की प्रेरणा की। दलित बन्धुओं के प्रति भी उनका हृदय दया और करुणा से भरा हुआ था। उनके अनुसार सभी अशिक्षित व्यक्ति ज्ञान न होने से शूद्र होते हैं जिनका कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा व उनके कार्यों में सहयोग करना होता था। छुआछूत का उन्होंने समर्थन नहीं किया। उन्होंने दलित बन्धुओं के हाथ का भोजन कर समाज को दलितों से प्रेम व उन्हें साथ रखने का सन्देश दिया था। देश की आजादी में भी उनका सभी सामाजिक संगठनों व बाद में बने राजनीतिक संगठनों से अधिक योगदान है। आजादी की प्रेरणा भी उन्होंने अपने ग्रन्थों के माध्यम से की थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि विदेशी राजा माता-पिता के समान कृपा, न्याय व दया के साथ भी शासन करें तब भी उनका शासन स्वदेशीय राज्य से हितकर नहीं होता। उनके अनुयायियो ंवा आर्यसमाज ने आजादी के आन्दोलन में सबसे अधिक योगदान दिया है तथा बदले में कोई लाभ नहीं लिया जैसा कि कुछ नेताओं व परिवारों ने लिया है।

हमने आत्मा व परमात्मा का जो ज्ञान प्राप्त किया है वह सब ऋषि दयानन्द व उनके अनुयायी वैदिक विद्वानों के ग्रन्थों व सन्ध्या-यज्ञ पद्धति के आधार पर ही किया है। आर्यसमाज का प्रत्येक सदस्य वा अनुयायी आर्यसमाज में विद्वानों के प्रवचन सुनकर ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप को भली भांति जानता व समझता है। हम जब देश विदेश में उत्पन्न व स्थापित अन्य मतों पर दृष्टि डालते हैं तो हमें किसी मत में ईश्वर व जीवात्मा के ज्ञान सहित ईश्वर की प्राप्ति के लिये की जाने वाली साधना-विधि में वह उत्तमता दिखाई नहीं देती जैसी श्रेष्ठता ऋषि की वेदों के आधार पर बनाई गई उपासना पद्धति में है। यदि मनुष्य जन्म को सफल बनाना है तो उसे ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की शरण में आना ही पड़ेगा तभी मनुष्य अज्ञान, अन्धविश्वास, अधर्म व मिथ्या परम्पराओं से मुक्त हो सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

राजा अपनी प्रजा की रक्षा कैसे करें


          


वेद के अनेक मन्त्र स्पष्ट संकेत देते हैं कि राजा का चुनाव प्रजा अपने में से किसी योग्य व्यक्ति को चुनकर करे. योग्य व्यक्ति भी एसा हो जिस के पास अतुलित साहस प्रेम, शक्ति आदि हो. वह सब से प्रेम करने वाला, सब का आदर करने वाला हो, सब प्रकार की प्रशस्तियों को पाने की उसमें शक्ति हो, प्रजा को अपनी संतान के सामान स्नेह देने वाला हो तथा शत्रुओं से सब की रक्षा करने में सक्षम हो. इस तथ्य का प्रकाश हमें महाभारत के शान्ति पर्व के अंतर्गत राजधर्म पर्व के अध्याय १६ में भी किया गया है द्य इस अध्याय के श्लोक संख्या ४४,४५ तथा ४६ अवलोकनीय हैं.  जो इस प्रकार हैं :-
                 भवितव्यं  सदा  राजा, गर्भिणी  सह  धर्मीणा|
                 कारणं    महाराज,  शणु  येनेदमिष्यते   ||४४||
                 यथा हि गर्भिणी  हितय, स्वंप्रिय  मनसोनुगम्|
                 गर्भस्य हितामाधत्ते, तथा  राज्ञाप्यसंशसम्   ||४५||
                 वर्तीतव्यं   कुरुश्रेष्ठ ,  सवा   ध्रर्मनुवर्तिना    |
                 स्वंप्रियं तू परित्यज्य, यद् यात्लोकहितं भवेत् ||४६||
||महाभारत शांतिपर्व राजधर्म पर्व अ.१६ श्लोक ४४,४५,||     
            महाभारत का ये श्लोक कहते है कि प्रत्येक राजा को गर्भिणी माता के समान होना चाहिए क्योंकि सम्पूर्ण देश, सम्पूर्ण राज्य उसके अंतर्गत आने के कारण उसकी प्रजा भी उसके अन्दर ही आ जाती है. इसलिए यह राज्य की सीमा उसकी गर्भ होती है तो प्रजा उसके गर्भ में निवास करने वाले शिशु के ही समान होती है. जिस प्रकार माता अपने मन के सब भावों को छोड़कर केवल और केवल अपने गर्भस्थ शिशु का ही ध्यान करती है. उसके हित को ही अपना हित मानती है. माता अपने गर्भ में पल रहे बालक के सुख सुविधा का सदा ध्यान रखती है, उसके भरण पौषण की व्यवस्था करती है. अपने गर्भ में पल रहे शिशु को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने देती तथा इस अवस्था में शिशु का कष्ट उसका अपना कष्ट होता है. अब उस के जीवन का केवल एक ही उद्देश्य रह जाता है और वह होता है उस के गर्भ में पल रहे शिशु को सुरक्षित रखना, उसे किसी प्रकार के रोग और क्लेश से दूर रखना तथा उसकी रक्षा के लिए अपने कष्ट की भी चिंता न करना आदि.
       राजा जब अपनी प्रजा को अपनी गर्भ में धारण कर लेता है, उसे अपनी गर्भ के शिशु के समान समझता है तो वह भी इस प्रजा की रक्षा को अपना प्रमुख कर्तव्य समझता हुआ, उस के लिए वह सुखों की व्यवस्था करते हुए उसके कष्टों को अपना कष्ट समझता हुआ उसके सुखों का विस्तार करने के लिए अपने राज्य में उत्तम शिक्षा की व्यवस्था करता है, उसके लिए रोगावस्था में उपचार के लिए औषधालय की एसी उतम व्यवस्था करता है कि जिस में सब प्रकार की दवाइयां निरूशुल्क अथवा नाममात्र के मूल्य पर मिलती हों. बुरे लोगों से रक्षा के लिए पुलिस थानों की व्यवस्था करता है. किसानों की सहायता करते हुए उन्हें अधिक से अस्धिक व उत्तम प्रकार के अनाजों की उत्पति के लिए उन्हें प्रात्साहित करता है. किसानों द्वारा उत्पन्न किए गए इस धान्य को जन जन तक पहुंचाया जावे, इसके लिए वह उत्तम मंडीकरण की तथा उतम व्यापारियों की व्यवस्था करता है और यदि कभी किसी प्रकार की कमी अनुभव हो, अभाव अनुभव हो, तो विदेश से भी इस सामग्री का आयात करता है.
       किसी विदेशी शत्रु के आक्रमण की आशंका होने पर वह अपने राज्य में सदा ही उतम सैनिकों की व्यवस्था करता है, जो शत्रु को मार भगाने में सक्षम हों. इस प्रकार वह अपनी प्रजा को धन धान्य संपन्न करने में ही अपनी खुशी अनुभव करता है. इस प्रकार के सब कार्य ठीक उस प्रकार ही होते हैं जिस प्रकार गर्भस्थ माता अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए किया करती है. इसलिए ही कहा गया है कि राजा अपनी प्रजा का पालन गर्भस्थ शिशु के सामान करता है.
        राजा अपने सब आमोद प्रमोद को त्याग देता है, अपने कष्टों की चिंता नहीं करता. अब वह केवल और केवल जनहित को ही अपना हित मानता है तथा सदा ही जनहित के कार्यों में लगा रहता. जनहित ही उसका प्रमुख कर्तव्य होता है, जनहित ही उसका कार्य होता है तथा जनहित ही उसका व्यापार होता है. इस कार्य में जितनी उसे सफलता मिलती है, उतनी ही वह प्रसन्नता अनुभव करता है तथा उतना ही यश उसे सब और से मिलता है. इस कारण हित कारक कर्मों के कारण ही उसका यश बढ़ता है, उसकी कीर्ति दूर दूर तक जाती है. इस यश और कीर्ति को ही वह प्राप्त करने के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है क्योंकि वह जानता है कि राजा की सफलता का कारण उसकी यश और कीर्ति ही होती है जो उसे प्रजा प्रेम से ही मिलती है. इसलिए वह इस प्रकार के कार्य करता है जिस से प्रजा उससे अधिकाधिक प्रेम करे तथा उसके यश की सर्वत्र चर्चा करे.
         राजा गर्भिणीवत व्यवहार करे इस बात की चर्चा यजुर्वेद के मन्त्र संख्या १२.२३ में भी बहुत ही सुन्दर की गई है. जब राजा वेदानुसार प्रजा का पालन करेगा तो निश्चय ही उस का यश बढेगा, उसकी कीर्ति बढ़ेगी यश और कीर्ति बढ़ेगी तथा वह अपने पद पर एक लम्बे अंतराल तक स्थिर रहेगा.

Wednesday, 13 June 2018

जीवात्मा के बाहर भीतर व्यापक परमात्मा को जानना मनुष्य का मुख्य कर्तव्य


संसार में अनेक आश्चर्य हैं। कोई ताजमहल को आश्चर्य कहता है तो कोई लोगों को मरते हुए देख कर भी विचलित होने और यह समझने कि वह कभी नहीं मरेगा, इस प्रकार के विचारों को आश्चर्य मानते हैं। हमें इनसे भी बड़ा आश्चर्य यह प्रतीत होता है कि मनुष्य स्वयं को यथार्थ रूप में जानता नहीं है। वह समझता है कि मैं एक शरीर हूं और इसका भरण पोषण करना, इससे सुन्दर, स्वस्थ आकर्षक बनाकर रखना ही उसके जीवन का उद्देश्य है। धनोपार्जन से मनुष्य को सभी प्रकार की सुख सुविधायें प्राप्त होती हैं। अतः धनोपार्जन ही उसे मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है। यहां तक की आज के धर्मगुरु कहे जाने वाले भी नाना प्रकार के साधन अपनाकर धनोपार्जन में ही लगे हुए हैं। उनकी सम्पत्ति का विवरण जाना जाये तो वह शायद भारत के बड़े बड़े उद्योगपतियों से भी कहीं अधिक धनवान हैं। ऐसे मनुष्य आत्मा और परमात्मा की बातें करें तो वह विवेकशील मनुष्यों को उचित प्रतीत नहीं होती। हमारे सामने हमारे ऋषि-मुनियों योगियों के आदर्श अनुकरणीय जीवन हैं। इन ऋषि योगियों में से कभी किसी ने अपने निजी सुख के लिए लोगों से सत्यासत्य का प्रयोग करते हुए धनैश्वर्य की कामना मांग नहीं की। आश्चर्य यह भी होता है कि धर्म विवेक से सर्वथा अनभिज्ञ जिन्हें अज्ञानी, मूर्ख भोला मनुष्य कह सकते हैं, ऐसे लोग धर्मगुरुओं की अनुचित बातों का शिकार हो कर अपना सब कुछ लुटा बैठते हैं और उन्हें यह अहसास तक भी नहीं होता कि उनसे क्या भूल या मूर्खता का काम हुआ है?


                मनुष्य का जीवन मात्र शरीर नहीं अपितु इससे कहीं अधिक है। मनुष्य के भीतर एक चेतन तत्व जीवात्मा है जो अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, अल्पज्ञ, जन्म मरण के बन्धनों में बन्धा हुआ, सद्कर्मों दुष्कर्मों को करने वाला ईश्वर की व्यवस्था से वर्तमान भावी जन्मों में उनके फलों का भोग करने वाला, ससीम, सुख दुःखों का भोक्ता होने सहित अपनी विद्या को बढ़ाने वाला, वेद ज्ञान को प्राप्त होने में सक्षम समर्थ तथा वेदानुसार ईश्वरोपासना कर ईश्वर का साक्षात्कार करने मोक्ष प्राप्त करने भी समर्थ है। इस जीवात्मा के अनादि काल से अनन्त बार जन्म हो चुके हैं और आगे भी इसी प्रकार से यह अपने कर्मों के अनुसार जन्म मरण के बन्धनों में फंसा रहेगा। वेदों वा शास्त्रों में ज्ञान प्राप्ति कर्म के फलों का भोग करने के बाद विवेक होने पर मोक्ष का विधान है परन्तु अनुमान से यह मोक्ष ऋषि, योगी बहुत उच्च कोटि के वैदिक विद्वान ईश्वरोपासक जो यम नियमों को अपने जीवन में यथार्थ रूप में सेवन करते हैं, उनको प्राप्त होता है। ऐसे लोग संसार में देखने में या तो आते ही नहीं अथवा प्रायः सामान्य लोगों की दृष्टि से दूर ही रहते हैं। अतः सामान्य वेद ज्ञानविहीन लोगों की प्रवृत्तियों को देखकर यही अनुमान होता है कि सभी अधिकांश लोगों का उनके इस जन्म पूर्व के बिना भोगे हुए कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म होता रहेगा और वह कभी मनुष्य योनि कभी पशु, पक्षी आदि नीच योनियों में जन्म लेकर अपने मनुष्य जीवन में किये हुए कर्मों का भोग करते रहेंगे। यह भी तथ्य है कि हम अपने इस जन्म से पूर्व जन्मों को अपनी अल्पज्ञता शरीर परिवर्तन आदि के कारण भूल चुकें हैं जबकि परमात्मा को अनादि काल से अब तक के हमारे केवल सभी जन्मों अपितु सभी कर्मों का भी पूर्ण निर्भ्रान्त ज्ञान है। परमात्मा कभी किसी जीवात्मा के किसी भी कर्म अथवा पूर्व की बातों को विस्मरण नहीं करता या उससे पूर्व की कोई बात कभी विस्मरित नहीं होती है।

                हम उपर्युक्त सभी बातों, सिद्धान्तों वैदिक मान्यताओं को अपने जीवन में भूले रहते हैं। हमारे धर्म गुरु विद्वान भी हमें यह तथ्य बताना नहीं चाहते। वह भी प्रायः हमसे धन की अपेक्षा रखते हैं और उसे प्राप्त करने के लिए इधर उधर की अनावश्यक बातें करके हमें खुश रखते हुए जीवन की यथार्थ सच्चायियों से विमुख रखते हैं जिससे वह भी धन प्राप्त कर सुखों की प्राप्ति कर सकें। आर्यसमाज उसका वैदिक साहित्य ही हमें इन सत्य सिद्धान्तों मान्यताओं से परिचित कराता है। वैदिक साहित्य के अध्ययन से एक अन्य प्रमुख बात हमारे सम्मुख यह आती है कि इस संसार का रचयिता ईश्वर है। ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी है। वह हमारी आत्मा के भीतर बाहर सर्वत्र समान रूप से एकरस आनन्द से पूर्ण होकर विद्यमान है और हमारे प्रत्येक विचार कर्म को, भले ही हम उस कर्म को दिन के उजाले में करें या फिर रात्रि के अन्धकार में छुप कर करें, पूर्णतया जानता है। वह कर्म फल प्रदाता है और यथासमय इस जन्म में परजन्म में न्यायपूर्वक अवश्यमेव उनका फल देता है। इस तथ्य को विस्मृत कर हम संसार में शुभ पुण्य अथवा पाप अशुभ दोनों प्रकार के कर्म किया करते हैं। पुण्य कर्मों से हमें सुख प्राप्त होता है और पाप कर्म हमारे जन्म जन्मान्तरों में दुःख का कारण बनते हैं। इन दुःखों से बचने के लिए ही परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में हमें वेद ज्ञान दिया था जिससे हम कर्म के स्वरुप उसके महत्व को समझ सकें और पाप कर्मों से बचकर अपने जीवन की दुःखों से रक्षा कर सकें। परन्तु देखा यह गया है कि बड़े बड़े विद्वान भी पाप करने से पूर्णतया बच नहीं पाते। बड़े बड़े विद्वान धर्माचार्यों में पूर्ण विद्या नहीं होती। उनमें भी कम अधिक अविद्या उसके संस्कार उनके चित्त में होते हैं। उनका नाश निर्बीज होना तो समाधि प्राप्त कर विवेक की प्राप्ति होने पर ही होता है। अतः विद्वानों से भी अशुभ कर्म अपराध हो जाते हैं जिसका परिणाम दुःख होता है।

आधुनिक युग में महर्षि दयानन्द जी एक आदर्श पुरुष हुए हैं। उन्होंने केवल योग विद्या को सिद्ध किया, उसे अपने आचरण जीवन में धारण किया अपितु उन्होंने विद्या प्राप्त कर उसका अभ्यास करते हुए वेदों का यथार्थ ज्ञान भी प्राप्त किया था। वह कर्म कर्म फल को वेदादि शास्त्रों से यथावत् जान पाये थे और उसे जानकर उन्हें अशुभ पाप कर्मां का सर्वथा त्याग भी किया था। वेद, वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द जी का जीवन सभी मनुष्यों के लिए एक आदर्श उदाहरण हैं जिसको अपनाकर हम अपनी विद्या बढ़कार सन्मार्ग का अवलम्बन कर सकते हैं। इससे हमें भी लाभ होगा और हमारे सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को भी लाभ होगा। यह जीवन बहुत लम्बा नहीं है। यदि हम अपनी एक सौ वर्ष की आयु की कल्पना करें तो हमारे आरम्भ के 25 वर्ष तो बाल युवा काल जिसमें हम अध्ययन आदि करते हैं व्यतीत हो जाते हैं। बाद के 75 वर्षों में 25 वर्ष कुछ अधिक वर्ष हम गृहस्थ जीवन का निर्वाह करते हैं। इन 25 वर्षों में न्यूनतम एक चौथाई अर्थात् 6 वर्ष से अधिक का समय तो हमारे सोने में ही व्यतीत हो जाता है। आजीविका के कामों में भी हमें प्रतिदिन 8 से 12 घंटे देने पड़ते हैं। यदि औसत 10 घंटे भी माने तो 25 वर्षों में 10 से 11 वर्ष हमारे आजिविका के कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं। इस प्रकार लगभग 25 वर्ष में से 16-17 निकल जाने पर हमारे पास 8-9 वर्ष ही बचते हैं। हमारा यह समय भी स्वास्थ्य रक्षा सहित अनेक सामाजिक, धार्मिक आदि अनेक कार्यों को करने में व्यतीत होता है। अतः हमें गृहस्थ जीवन में सुख भोगने के लिए बहुत अधिक समय नहीं मिलता। वानप्रस्थ संन्यास के 25-25 वर्ष तो साधना धर्म प्रचार के लिए होते हैं। इसमें जो मनुष्य सुख भोगेगा वह एक प्रकार से अपने परजन्म को किसी किसी रूप में बिगाड़ता है।

                वैदिक साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि हम जितना अधिक सुख भोगेंगे उतना अधिक हमारी इन्द्रिया शरीर के अवयव कमजोर निर्बल होते जाते हैं जो आगे चलकर रोग आयुनाश का कारण बनते हैं। अतः ईश्वरोपासना एवं यज्ञ प्रधान वैदिक धर्म संस्कृति ही सर्वोत्तम साधन है जिसका अनुसरण कर मनुष्य अपने इस जीवन को शारीरिक बल की हानि रोगों से बचाकर अपने परजन्म को भी सुधारता है। अतः हमें वेदों के मार्ग पर ही चलना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के सप्तमसमुल्लास में बृहदारण्यक उपनिषद का वचन देकर उसका हिन्दी अनुवाद किया है। उसमें महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मा में विद्यमान ईश्वर को जानने की प्रेरणा कर रहे हैं। उपनिषद का वचन है आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा वेद यस्यात्मा शरीरम्। आत्मनोऽन्तरो यमयति आत्मान्तर्याम्यमृतः। इसका अर्थ करते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्त्री मैत्रेयी से कहते हैं कि हे मैत्रेयि! जो परमेश्वर आत्मा अर्थात् जीव में स्थित और जीवात्मा से भिन्न है, जिस को मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता कि वह परमात्मा मेरे में (मेरी आत्मा में) व्यापक है, जिस परमेश्वर का जीवात्मा शरीर अर्थात् जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है। जीवात्मा से भिन्न रहकर (परमात्मा) जीव के पाप पुण्यों का साक्षी होकर उन के फल जीवों को देकर नियम में रखता है वही अविनाशीस्वरूप (परमात्मा) तेरा भी अन्तर्यामी आत्मा अर्थात् तेरे भीतर व्यापक है, उस (अपनी आत्मा और परमात्मा) को तू जान।

                हम यदि अपनी आत्मा और परमात्मा को यथार्थरुप में जान लेंगे तो हमें अपने जीवन के उद्देश्य लक्ष्य सहित अपने साधनों का भी ज्ञान हो जायेगा और तब हम अपनी आत्मा के प्रति न्यायपूर्वक सत्य व्यवहार कर उसकी उन्नति कर सकते हैं। सांसारिक सुखों में पड़कर हम अपनी आत्मा को निर्बल करते हैं जिसका परिणाम परजन्म में उन्नति होकर अवनति होता है। पशु, पक्षियों स्थावर योनियों के उदाहरण हमारे सामने हैं। वेद और सत्यार्थप्रकाश पढ़कर हम जीवन जीने की सही दिशा प्राप्त कर सकते हैं और अपने मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य