Thursday, 15 February 2018

सत्य की विजय


सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते।
तयोर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमो अवति हन्त्यासत्।। -). 7/104/12ऋ अथर्व. 8/4/12
ऋषि -वसिष्ठः।। देवता-सोमः।। छन्दः-विराट्त्रिष्टुप्।।
विनय-मनुष्य जब वास्तविक ऊँचे ज्ञान को विवेक पूर्वक जानना चाहता है, जब वह सत्यज्ञान की खोज में होता है, तब उस विवेकशील पुरुष के सामने सत् और असत् दोनों स्पर्धा करते हुए आते हैं। दोनों उसके सामने अपनी-अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहते हैं, दोनों उसके हृदय पर अधिकार करना चाहते हैं। कभी सत् प्रबल होता है, कभी असत् प्रबल होता है। इस प्रकार देर तक यह स्पर्धा, यह लड़ाई, चलती रहती है। जब उसपर किन्हीं कुटिल और असत्य से काम निकालने वाले लोगों का प्रभाव पड़ता है तब वह असत्यता को ही उत्तम समझ लेता हैऋ परन्तु जब वह सत्यग्रन्थों को पढ़ता है या सच्चे, निष्कपट, पवित्र लोगों के संग में आता है तब सत्य की महत्ता को समझने लगता है। पुनः किसी बलवान् नीतिनिपुण पुरुष का प्रभाव उसे यह सिखला देता है कि संसार में असत्य के बिना काम नहीं चलता है। पुनः कोई महान् सत्यनिष्ठ पुरुष उसे सत्य का पुजारी, सत्य के पीछे पागल बना देता है। इस प्रकार सत् और असत् दोनों प्रकार के वचन ;ज्ञानद्ध उसपर प्रभाव जमाने के लिए स्पर्धा करते रहते हैं, परन्तु मनुष्य को यह पता होना चाहिए ;और विवेकी पुरुष को यह धीरे-धीरे पता हो जाता हैद्ध कि मनुष्य के हृदय में बैठा हुआ सोम परमेश्वर तो सदा सत् की, अकुटिल की ही रक्षा कर रहा है और असत् का नाश कर रहा है। जो लोग इस सत्य से अभिज्ञ हो जाते हैं वे तब सोम की शरण में जाना चाहते हैं और जो सचमुच सर्वोच्च सत्य ज्ञान की खोज में लगे हुए हैं उन्हें इसी हृदयस्थ सोम देव की शरण में जाना चाहिए, तभी उन्हें अपना अभीष्ट मिलेगा, क्योंकि सब भूतों के हृद्देश में बैठे हुए सोम ईश्वर के आश्रय को मनुष्य जितना ही अधिक सर्वतोभाव से ग्रहण करता है, उतना ही उसमें असत्य का नाश होकर सत्य और निष्कपटता बढ़ती जाती है और उसमें सुविज्ञान भरता जाता है, अतः इस सत् और असत् की लड़ाई में मनुष्य जितना ही सोम का आश्रय लेगा, उतनी ही जल्दी उसमें सत्य की विजय होगी और उसे शान्ति मिलेगी। प्रत्येक जीव की इस सत्-असत् की स्पर्धा में जल्दी या कितनी ही देर में अन्ततः सोम परमेश्वर द्वारा विजय तो सत्य की ही होनी निश्चित है, क्योंकि वे सोम सदा सत्य का, सत्य वचन का, सत्य व्यवहार का रक्षण कर रहे हैं और असत्य का, असत्य भाषण का, असत्य व्यवहार का हनन कर रहे हैं।
शब्दार्थ-सुविज्ञानम्=उत्तम विशेष ज्ञान को चिकितुषे=जानना चाहनेवाले विवेकी जनाय=मनुष्य के लिए सत् च असत् च=सत्य और असत्य वचसी=वचन या ज्ञान पस्पृधाते=परस्पर स्पर्धा करते हैं। तयोः=इन दोनों में यत्सत्यम्=जो सत्य है यतरत् क्षजीयः= जौन-सा सरल, अकुटिल, छलरहित है तत् इत्= उसी की सोम परमेश्वर अवति=रक्षा करता है और असत् हन्ति=असत् का नाश करता है।
...................आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

क्या है पवित्र यज्ञ!


शब्दार्थ-देवाः=हे देवो! हम कर्णेभिः=कानों से भद्रम्=भद्र का ही शृणुयाम=श्रवण करें। यजत्राः=हे यजनीय देवो अक्षभिः=हम आँखों से भद्रं पश्येम=भद्र को ही देखें। स्थिरैः= अÂः=अपने दृढ़ अंगों से तनूभिः=शरीरों से तुष्टुवांसः=सदा स्तुति-पूजन करते हुए ही यत् देवहितं आयुः=जो हमारी देवों द्वारा स्थापित आयु है, उसे व्यशेम=प्राप्त कर लें।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरै रस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः।।-). 1/89/8ऋ यजुः. 25/31ऋ साम. उ. 9/3/9
ऋषि -गोतमो राहूगणपुत्रः।। देवता-विश्वेदेवाः।। छन्दः- विराट्त्रिष्टुप्।।
विनय- मन, वाणी और इन्द्रियों के अगोचर भगवान् तो हमें दीखते नहीं हैं। देवो! उनके हाथों के रूप में हम तुम्हें ही देख पाते हैं। वे भगवान् तुम्हारे द्वारा ही इस सब ब्रह्माण्ड को चला रहे हैं। इसलिए हे देवो! हम तुम्हें ही सम्बोधन करते हैं। इस संसार में जन्म पाकर जब होश आया है तब हम देखते हैं कि हम सबको एक दिन मरना है, एक निश्चित आयु तक ही हमें जीना है। तुमने मनुष्य की सामान्य आयु सौ वर्ष की रक्खी है। हे यजत्रा’! हे यजनीय देवो! हमें तुम्हारा यजन करते हुए ही 100, 116 या 120 वर्ष तक जीवित रहना चाहिए। इसके लिए, हे देवो! हम अपने कानों से सदा भद्र का ही श्रवण करें. जो यजनीय है, जो उचित है, जो कल्याणकारी है, केवल उसे ही सुनें। आँखों से, जो कुछ यजनीय है केवल उसे ही देखें। अभद्र वस्तु, बुरी, अनुचित वस्तु में हमारे कान-आँख कभी न जाएँ। हे देवो! यही तुम्हारा यजन है, यही तुम द्वारा उस भगवान् का यजन है। हे देवो! तुम्हारे अंशों से हमारे शरीर की एक-एक इन्द्रिय और एक-एक अंग उत्पन्न हुए हैं। जिस-जिस देव से हमारा जो-जो इन्द्रिय वा अंग बना है, उस-उस अंग द्वारा सदा भद्र का सेवन करना ही उस-उस देव का यजन करना है। हे देवो! इसी प्रकार हम अपनी एक-एक इन्द्रिय से तुम्हारा यजन करते रहेंगे। हमारे हाथ और पैर सदा भद्र का ही सेवन करने के कारण पूर्ण आयु तक चलने योग्य, दृढ़ और बलवान् होंगे। इन दृढ़ हाथों और पैरों से हम जो कुछ ग्रहण करते हैं, जो कुछ चलते हैं, वह सब तुम द्वारा प्रभु की स्तुति करना है। एवं, हम अपने एक-एक बलिष्ठ स्वस्थ अंग से जो भी कुछ भद्र चेष्टा व गति करते हैं, हे देवो! वह सब प्रभु-यजन है। हम चाहते हैं कि इसी प्रकार हम अपने एक-एक अंग से सदा भद्र ही करते हुए तुम्हारी दी हुई यज्ञिक आयु को पूर्ण कर दें।
अहा! अपने स्वस्थ, बलिष्ठ, पवित्र अंगों द्वारा सदा भद्र का ही सेवन करने वाले के लिए यह जीवन एक कैसा पवित्र यज्ञ बन जाता है!
आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

कैसी होगी परमात्मा की अभय ज्योति!


शब्दार्थ- न दक्षिणा विचिकिते= न दायीं ओर कुछ दिखाई देता है न सव्या=और न बायीं ओर न= न आदित्याः= हे आदित्यदेवो! प्राचीनम्= सामने ही कुछ दिखाई देता है न उत पश्चा= और कुछ पीछे, इसलिए पाक्याचित्=मैं चाहे कितना अपरिपक्व, कच्चा होऊंॅ और धीर्यांचित्=चाहे कितना धैर्यरहित, दीन होऊंॅ वसवः= हे वासक आदित्यो! युष्मानीतः=किसी तरह तुम्हारे द्वारा ले-जाया गया मैं अभयं ज्योतिः=भय रहित प्रकाश को अश्याम्=प्राप्त हो जाऊॅं।
न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा।
पाक्याचित् वसवो धीर्याचिद् युष्मानीतो अभयं ज्योतिरश्याम्।। -). 2/27/11
ऋषि :- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा।। देवता-आदित्याः।। छन्दः-विराट्त्रिष्टुप्।।
विनय- आजकल मैं एक अँधेरी रात्रि में घिरा हुआ हू। मेरे मानसिक नेत्रों के सामने एक ऐसा दुर्भेद्य काला पर्दा आ गया है, जिसने कि मेरा सम्पूर्ण प्रकाश रोक लिया है। अपनी वर्त्तमान आध्यात्मिक समस्या को हल करने में ही मैं दिन-रात डूबा हुआ हूँ कहीं से भी कोई प्रकाश की किरण मिलती नहीं दीखती। चारों ओर अन्धेरा-ही-अन्धेरा है-घोर घुप्प अन्धेरा है। दाएं-बाए कहीं कुछ दृष्टि नहीं आता, आगे या पीछे कहीं भ इस अन्धकारमय उलझन से बाहर निकलने का रास्ता नहीं सूझता। क्या करूं? यह भयंकर रात्रि क्या कभी समाप्त भी होगी या नहीं? इस अन्धे जीवन से तो मरना भला है। खाता-पीता, चलता-फिरता हुआ भी मैं आज मुर्दा हूं। चौबीसों घण्टे विचारने में ग्रस्त हूं, पागल हो रहा हूं, प्रकाश पाने के लिए निरन्तर घोर युद्ध में लगा हुआ हूं, पर इस काली रात्रि का कहीं अन्त होता नहीं दिखाई देता! हे देवो! भगवान् के दिच्य प्रकाश का सन्देश लाने वाले हे आदित्यनामक दूतो! मैं तुम्हें याद कर रहा हूं, तुम्हारी राह देख रहा हूं। तुम मुझे इस रात्रि से शीघ्र पार ले-चलो, नहीं तो अब मेरा जीना कठिन हो रहा है। सुना है कि बुद्ध ईसा, दयानन्द आदि अनेक महात्मा अपना दिव्य प्रकाश पाने से पहले ऐसा अन्धेरी रात्रियों में से गुज़रे थे, परन्तु वे तो जन्म-जन्मान्तरों के पके हुए थे और बड़े धीर थे। मैं बिलकुल कच्चा, अपरिपक्व ज्ञानवाला और बड़ा दुर्बल, अधीर हूं। मुझे इससे पार कौन ले-जाएगा? किसी तरह भी हो, हे वासक आदित्यो! तुम मुझे भी बसा लो, अन्धकार से निकाल मुझे मरने से बचा लो। मैं चाहे जितना अज्ञानी, कच्चाऔर धैर्यरहित होऊॅं, पर यदि तुम मुझे ले-चलोगे-मेरे नायक बन जाओगे-तो मैं निःसन्देह अन्धकार को समाप्त कर प्रकाश को पा जाऊॅंगा और तब इस महाभय से पार हो जाऊॅंगा। मेरी यह भय की अवस्था उस ज्योति को पाकर ही मिटेगी। मुझे चाहिए वह अभय ज्योति! हां, वह अभय ज्योति!! साभार : वैदिक विनय आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

उसको जानो


शब्दार्थ- ऋचः= ऋचाएं, वेदमन्त्र अक्षरे=उस अक्षर अविनाशी परमे व्योमन= परम आकाश में आश्रित हैं यस्मिन्= जिसमें विश्वेदेवाः=सब-के-सब देव अधिनिषेदुः=ठहरे हुए हैं। इसलिए यः= जो मनुष्य तत्=उस अक्षर को न वेद=नहीं जानता, वह ऋचा= ऋचाएं, वेदमन्त्र पढ़कर किं करिष्यति=क्या करेगा और ये=जो तत् विदुः=उसे जानते हैं, ते इत् इमे=वे ही ज्ञानी लोग समासते=समासीन होते हैं। स्वस्थ, स्वरूपस्थ, आत्मानन्द में स्थित होते हैं।
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद् विदुस्त इमे समासते।। -). 1/164/39 अथर्व. 9/10/18
ऋषिः-दीर्घतमा।। देवता-विश्वेदेवाः।। छन्दः-भुरिक्त्रिष्टुप्।।
विनय- हे मनुष्य! यदि तूने सब ऋचाओं की एक आधारभूत वस्तु को नहीं जाना है तो वेद की ऋचाएं पढ़कर तू क्या करेगा? उसके जाने बिना वेद पढ़ना निष्फल है, समय खोना है। वेद उसे ही पढ़ने चाहिए जिसे वेदमन्त्रों के एक प्रतिपाद विष्य उस अक्षरतत्त्व को जाननेकी इच्छा है जोकि परम व्योमहै, एक परम आकाश है। वह इस प्रसिद्ध  आकाश से भी उत्कृष्ट है। वह इतना व्यापक आकाश है कि यह सब विविध ब्रह्माण्ड उसमें ओत-प्रोत है। इसीलिए वह परम व्योमकहाता है। उसे ज्ञानी लोग ओंइस अक्षर से भी पुकारते हैं। वह विविध प्रकार से सबकी रक्षा करने वाला ;व्योमद्ध, अविनाशा ;अक्षरद्ध तत्त्व है। सब देवता, सब संसार, उस एक में समाया हुआ है। प्रत्येक वेदमन्त्र किसी-न-किसी देवता की स्तुति करता है, परन्त ये वेद-प्रतिपाद्य सब-के-सब देवता उस एक ही वेद में ठहरे हुए हैं। इसलिए यदि उस एक देव को जानने की, उसे पाने की इच्छा है, तभी वेदमन्त्रों को पढ़ो। वेदमन्त्रों को इसलिए मत पढ़ो कि उनमें से किन्हीं अपने अभीष्ट विचारों को निकालेंगे या उसके ऐसे अर्थ करेंगे जिनसे कुछ भलाई सिद्ध होगी। वेद का ऐसा पढ़ना तो निष्फल ही नहीं, किन्तु पाप है। हमें वेदमन्त्रां के पास इस पवित्र भाव से पहुंचना चाहिए कि ये हमें उस एक देव के पवित्र चरणों में पहुंचाने के साधन होंगे। प्रत्येक वेदमन्त्र में हमें उस अक्षर प्रभु का प्रतिबिम्ब दिखाई देना चाहिए। इसलिए वे पुरुष जो उस तत्त्व को जानते हैं, ठीक तरह स्थित हो जाते हैंऋ और यह अवस्था केवल ऐसे ही ज्ञानी लोगों कोप्राप्त होती है। ऐसे ही ज्ञानी लोगों को शान्ति-प्राप्ति होती है, सब संशयों से रहित स्वस्थता और आनन्द की एक अवस्था प्राप्त हो जाती है। वेदमन्त्रों के ध्यान से वे लोग समाहित ;समाधिस्थद्ध हो जाते हैं, उस अक्षर में लीन होने का परमानन्द पाते हैं। वहॉं ऋचाओं का पढ़ना सफल हो जाता है।
साभार : वैदिक विनय आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

आत्मा ज्ञान और सौन्दर्य के साथ उदित होता है


केतुं कृण्वन्नाकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषिरजायथाः।।
ऋषि 1/6/3, साम. उ. 6/3/14, अ. 20/69/19
शब्दार्थ - हे इन्द्र आत्मन्! तू मर्या - इस मरण-शील अकेतवे- और ज्ञान रहित अवस्था- वाले शरीर में केतुं कृण्वन् - ज्ञान और जीवन लाता हुआ तथा अपेशसे - इस अरूप, असुन्दर शरीर में पेशं कृण्वन् - रूप -सौन्दर्य लाता हुआ उषि - अपनी जागरण - शक्तियों के साथ सं अजायथाः - उदय होता है - पुनर्जागरण और पुनर्जन्म में उदय होता है।
विनय - यह शरीर तो मर्य है, मुर्दा है। इस समय भी मुर्दा है। जब इस शरीर को अर्थी पर उठाकर जलाने के लिये ले जाया जाता है, उस समय यह शरीर जैसा मुर्दा होता है वैसा ही यह अब भी है, परन्तु इस समय यह मुर्दा इसलिये नहीं दीखता, क्योंकि इन्द्र ;आत्माद्ध ने अपनी चेतनता, अपनी सुन्दरता इसमें बसा रखी है।
हे इन्द्र आत्मन्! जब यह शरीर सुषुप्तावस्था में होता है तब तुम ही इसमें से अपनी जागरण-शक्तियों को समेट लेते हो, अपने में खींच लेते हो, अतः तुरन्त हमारा चलना-फिरना, बोलना आदि सब व्यापार बन्द हो जाता है। सदा चलने वाले मन के भी सब संकल्प-विकल्प बन्द हो जाते हैं। यह शरीर जड़वत् हो जाता है और जब तुम फिर अपनी जागरण रश्मियों को शरीर में फैला देते हो तो फिर मनुष्य उठ बैठता है, सोचना-विचारना शुरू हो जाता है, मनुष्य फिर चलने-बोलने लगता है। इस अकेतुशरीर में फिर चेतना दिखने लगती है, उसका खोया हुआ जाग्रत्-रूप फिर उसमें आ जाता है। हे इन्द्र! सुषुप्ति में तो तुम अपनी जागरण-शक्तियों को केवल समेट लेते हो, पर जब तुम इस शरीर को छोड़ ही देते हो तब क्या होता है? तब यह शरीर अपने असली रूप में मिट्टी के ढेर के रूप में दीख पड़ता है। न इसमें ज्ञान होता है और न रूप। हे इन्द्र! इस मिट्टी के बर्तन में अमृत होकर तुम ही भरे हुए हो। इस मिट्टी में जो रूप, सुडौलता आ गयी है, सुन्दर अवयव-संनिवेश हो गया है यह तुम्हारे व्यापने से हुआ है और इस मिट्टी की मूर्ति में शव की अपेक्षा जो इतनी चेतना दिखाई देती है वह तुम्हारे समाने से ही हुई है। यह शरीर जो मुर्दा होने पर इतना अपवित्र समझा जाता है कि इसे छू लेने से स्नानादि शौच करना पड़ता है वही असल में मुर्दा शरीर, हे परम-पावन इन्द्र! इस समय तुम्हारे समाये रहने के कारण, तुम्हारे पवित्र संस्पर्श से इतना पवित्र हुआ- हुआ है। तुम्हारा इतना अद्भुत माहात्म्य है। मनुष्य तुम्हारे इस माहात्म्य को क्यों नहीं देखता?
आज हम स्पष्ट देख रहे हैं कि इन सब मुर्दा-जड़ शरीरों में चेतनता लाते हुये और इन अरूपों में रूप-सौन्दर्य प्रदान करते हुये तुम्हीं अपनी जाग्रत्-शक्तियों के साथ उदय हुये-हुये हो, तुम ही आये हुये हो।
आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

Monday, 5 February 2018

ईश्वर के गुणों, उपकारों का स्मरण व उसका धन्यवाद सन्ध्या है

मनुष्य जो भी काम करता है वह विचार कर ही करता है। जो मनुष्य विचार किये बिना काम करे उसे पागल कहा जाता है। हमें भूख लगती है तो भूख की निवृत्ति के लिए विचार कर हितकर भोजन करते हैं। इसी प्रकार कोई भी कार्य करें तो पहले सोचते हैं फिर उसके अनुरूप करते हैं। ऐसा करना ही उचित माना जाता है। हमें इन सामान्य कार्यों के अतिरिक्त अपने बारे में भी विचार करना चाहिये कि हम क्या कौन हैं? जब हम क्या हैं प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमें इसके कई उत्तर सूझते हैं। हम कई बार स्वयं ही उन उत्तरों से सन्तुष्ट नहीं हो पाते। दूसरों से पूछते हैं तो उनके उत्तर भी अलग अलग होते हैं। कौन सा उत्तर ठीक है या सभी गलत है यह निर्णय करना होता है परन्तु प्रायः सामान्य लोगयह कार्य भी नहीं कर पाते। इसके लिए सरल उपाय है कि हम वेदों पर आधारित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करें। इससे हमें इस प्रश्न का कि हम क्या हैं कौन हैं, सही उत्तर मिल जाता है। सही उत्तर क्या है? प्रथम बात तो यह है कि हम जड़ शरीर नहीं जो हमें दूसरों को दिखाई देता है। हम एक जीवित शरीर में विद्यमान एक चेतन पदार्थ जिसे जीवात्मा कहते हैं, वह हैं। जड़ पदार्थ वह होता है तो संवेदना शून्य होता है और चेतन पदार्थ वह होता है जो संवेदनशील होता है। हमारे हाथ में यदि सुई चुभोई जाये तो पीड़ा होने से हमारी चीख निकल पड़ती है। किसी जड़ पदार्थ पुस्तक या वनस्पति में भी यही क्रिया की जाये तो उन पर सुई चुभोने का कोई प्रभाव नहीं होता। जीवित शरीर में सुई चुभने से पीड़ा होती है परन्तु मृतक शरीर को सुई चुभाई जाये या उसका पोस्टमार्टम या चीर फाड़ कर दी जाये फिर भी कोई असर नहीं होता। इससे सिद्ध हो जाता है कि मृतक शरीर जड़ है और जीवित शरीर में एक चेतन तत्व है जो आंखों से दिखाई नहीं देता परन्तु वह शरीर के भीतर है अवश्य और उसे इच्छा, द्वेष, सुख, दुख प्रयत्न आदि की क्रियाओं लिंगो से पहचाना जाता है।

                सत्यार्थप्रकाश अथवा ऋषि दयानन्द के कुछ अन्य ग्रन्थों के आधार पर आत्मा का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि यह आत्मा अनादि, अविनाशी, नित्य अमर पदार्थ, तत्व सत्ता है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई है। जिस पदार्थ की उत्पत्ति होती है उसका नाश भी अवश्य होता है। इसके विपरीत कुछ अनादि पदार्थ होते हैं जिनसे जिनके द्वारा उत्पत्ति की जा सकती है परन्तु इन मूल पदार्थों का नाश वा अभाव कभी नहीं होता। मूल अनादि पदार्थ मुख्यतः तीन हैं जिनके नाम हैं ईश्वर जीवन और प्रकृति। इन तीन पदार्थों में ईश्वर जीव चेतन पदार्थ हैं और प्रकृति जड़ हैं। प्रकृति अति सूक्ष्म त्रिगुणात्मक सत्, रज तम गुणों वाली है। मूल प्रकृति सूक्ष्म परमाणु रूप में होती है। इस जड़ प्रकृति से ही ईश्वर जीवात्माओं के लिए इस सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति का पहला विकार महतत्व दूसरा अहंकार कहलाता है। इसके बाद पांच तन्मात्रायें बनती हैं और बाद में पांच स्थूल भूत। यह सृष्टि प्रकृति से निर्मित परमात्मा की रचना है जिसे जड़ प्रकृति के परमाणुओं के संयोग से परमात्मा ने जीवों के पूर्व जन्मों के कर्मफलों का भोग कराने के लिए उत्पन्न किया है। सृष्टि में हमारा वर्तमान जन्म पूर्वजन्म जन्मों के कर्मफलों के भोग के लिए हुआ है। हम जो भी हैं वह हमारे पूरे अतीत का परिणाम है और हमारा भविष्य हमारे अतीत वर्तमान के कर्मों का परिणाम होगा। जीवात्मा के बारे में यह भी जान लें कि यह सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, स्वतन्त्रता से कर्मों को करने वाली और फल भोगने में ईश्वर के अधीन नित्य सत्ता है। ईश्वर सभी जीवात्माओं के जन्म जन्मान्तरों के सभी कर्मों के साक्षी हैं। हम कोई भी कर्म करते हैं, वह आत्मा के भीतर विद्यमान परमात्मा को पूरा पूरा यहां तक की मन आत्मा के विचार भी उसे विदित होते हैं। ईश्वर से संसार, किसी मनुष्य प्राणी की कोई बात छिपी नहीं रहती हम छिपा ही सकते हैं। ईश्वर का स्वरूप सच्चिदानन्दादि गुणों से युक्त है। वह निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर वेद ज्ञान भाषा का दाता, कर्मानुसार जीवों को जन्म देने वाला कर्म-फल प्रदाता है। उसी परमात्मा की जीवात्मा मनुष्य के द्वारा गुण, कीर्तन, स्मरण, कृतज्ञता ज्ञापन, ध्यान, चिन्तन, स्वाध्याय आदि द्वारा उपासना करनी कर्तव्य है।

                मनुष्य को यह जीवन अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के आधार पर ईश्वर से मिला है। वेद ज्ञानी ईश्वर का साक्षात्कार किये ऋषि योगी बताते हैं कि जब मनुष्य के कर्मों के खाते में पाप पुण्य बराबर या पुण्य कर्म अधिक होते हैं तो उसे मनुष्य जन्म मिलता है अन्यथा पाप कर्मों के अधिक होने पर पशु, पक्षी, कीट पतंग आदि अनेक योनियों में से कोई एक योनि मिलती है। मनुष्य जन्म के मुख्यतः दो उद्देंश्य ज्ञात होते हैं। प्रथम पूर्व जन्म के कर्मों का भोग और दूसरा कर्म बन्धनों से छूटने के लिए सन्मार्ग वा वेद मार्ग पर चलकर ईश्वर साक्षात्कार कर विवेक की प्राप्ति करना जिससे मनुष्य की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष वह अवस्था होती है जिसमें बहुत लम्बे समय के लिए मनुष्य जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है। मनुष्य को इन दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही सत्कर्मों को करने का विधान वैदिक शास्त्रों ग्रन्थों में किया गया है। ऋषियों योगियों का जीवन भी आत्मा की उन्नति के लिए ही उपाय करने वाला जीवन होता है जिससे उनका परजन्म सुधरता है और जीवन में विवेक प्राप्त कर वेदज्ञानी योगियों को मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष के साधनों की चर्चा सत्यार्थप्रकाश में मिलती है जिसे पाठक वहां देख सकते हैं। सत्यार्थप्रकाश की पीडीएफ नैट पर भी उपलब्ध होती है। यदि कोई चाहे तो उसे इमेल भी कर सकते हैं।

                मनुष्य जीवन में सुख शान्ति चाहता है जिसका आधार मनुष्य के शुभ पुण्य कर्म होते हैं। शुभ कर्मों को करना ही धर्म कहाता है। हिन्दू ईसाई इस्लाम आदि मजहब या मत मतान्तर हैं। धर्म तो सबका एक ही होता है और वह शुभ कर्मों का आचरण होता है जिसे एक शब्द में सत्याचार भी कह सकते हैं। इन कर्तव्यों का ज्ञान वेद वेदानुकूल सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर भी प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य जीवन की उन्नति के लिए ऋषियों ने पंचमहायज्ञों का विधान किया है। इन पंचमहायज्ञों में ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या का प्रथम स्थान है। इतर चार महायज्ञ देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ बलिवैश्वदेवयज्ञ हैं। प्रथम ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या ईश्वर का भली भांति ध्यान करने को कहते हैं। इसके भी दो भाग है जिसमें प्रथम ईश्वर के गुणों के चिन्तन सहित उसकी स्तुति, प्रार्थना उपासना कर्तव्य है। दूसरा स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय का अर्थ अपनी आत्मा का चिन्तन कर उसके यथार्थ निर्भ्रान्त स्वरूप का ज्ञान वेद आदि शास्त्रों सहित ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थों का अध्ययन करना होता है। यही ईश्वर की पूजा भी है। इससे भिन्न ईश्वर की कोई पूजा नहीं होती। ईश्वर आज्ञा का पालन करना और उसके विपरीत कोई कर्म वा कार्य करना ही ईश्वर की पूजा है। ईश्वर की आज्ञा वही है जो वेदों में वर्णित हैं। ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या में ईश्वर का चिन्तन करते हुए उसके स्वरूप को अपनी स्मृति में लाना, उसके गुणों को स्मरण करना, उसके उपकारों कार्यों का ध्यान करना, ओ३म् गायत्री मंत्र का जप तथा ऐसा करते हुए परमेश्वर का धन्यवाद करना ही सन्ध्या है। इसके लिए स्वामी दयानन्द जी ने सन्ध्या विधि का निर्माण भी किया है जो पंचमहायज्ञविधि पुस्तक में उपलब्ध है। सन्ध्या के मंत्रों का उच्चारण पाठ अर्थ सहित करना चाहिये। इसके लिए पंच महायज्ञ विधि से सन्ध्या करते हुए मन्त्र बोल कर ध्यान पूर्वक मन्त्रों के अर्थां का पाठ कर सकते हैं और उन अर्थों का व्यापक रूप से चिन्तन भी कर सकते हैं। ऐसा करने से ईश्वर के प्रति प्रेम मित्रता स्थापित होने के साथ दुगुर्णों की निवृति होती है और गुणों में वृद्धि होती है।

सन्ध्या के मंत्रों उसके अर्थों का पाठ चिन्तन कर लेने के बाद कुछ समय बिना पुस्तक की सहायता के शान्त चित्त से ईश्वर का ध्यान, चिन्तन, स्तुति प्रार्थना भी कर सकते हैं। उसके बाद शेष समय में वेद भाष्य वा ऋषि के आर्याभिविनय सहित आर्य विद्वानों के ग्रन्थ वेद मंजरी, वैदिक सन्दोह, वैदिक विनय, श्रुति सौरभ, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सन्मार्ग दर्शन, ऋग्वेद ज्योति, यजुर्वेद ज्योति, अथर्ववेद ज्योति आदि का एकाग्रता के साथ पाठ उस पर चिन्तन मनन कर सकते हैं। ऐसा करना ही ईश्वर का ध्यान सन्ध्या प्रतीत होता है। सन्ध्या पर अनेक प्रमुख आर्य विद्वानों ने टीकायें आदि भी लिखी हैं। उनका भी अध्ययन किया जा सकता है। यह टीकायें पं. विश्वनाथ वेदालंकार, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय, स्वामी आत्मानन्द सरस्वती, पं. चमूपति, स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी आदि की पठनीय है। सन्ध्या प्रातः सायं दो समय की जाती है और ऋषि दयानन्द के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को एक समय में न्यूनतम एक घंटा करनी चाहिये। हम अनुमान करते हैं कि इस विधि से आत्मोन्नति की जा सकती है। शीर्ष विद्वान अनेक मार्ग सुझा सकते हैं। योग्य विद्वानों की शरण में जाकर योग विधि से उपासना करनी चाहिये। हमने इस विषय को सरल संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। हमें नहीं पता कि यह कितना उपयोगी है। इतना ही कह सकते हैं कि ऐसा करके आप ईश्वर उपासना के मार्ग में पहला कदम तो रख ही सकते हैं। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य