Thursday, 12 April 2018

संसार की बड़ी तीन ही सत्तायें हैं


ससार में केवल तीन ही सत्तायें पदार्थ हैं ईश्वर, जीव सृष्टि। हमें मनुष्य जन्म भी ईश्वर ने हमारे पूर्व जन्मों के अवशिष्ट कर्मों के अनुसार कर्मों का भोग करने के लिए प्रदान किया है। हमारे जीवन मे सुख दुःख आते जाते रहते हैं। धर्म वा धार्मिक कार्यों का फल सुख इसके विपरीत कर्मों कार्यों का परिणाम दुःख होता है। मनुष्यों को तीन प्रकार के दुःख प्राप्त होते हैं। आधिदैविक, आधिभौतिक आध्यात्मिक। अकाल, अतिवृष्टि, बाढ़, भूकम्प, अन्य प्राणियों तथा शारीरिक रोग ज्वर आदि से जो दुःख प्राप्त होते हैं वह इन तीन श्रेणियों में आते हैं। हम सभी दुःखों से बचना चाहते हैं और हमारी भावना होती है कि हमें सभी प्रकार के सुख प्राप्त हों और कोई दुःख प्राप्त हो। संसार में मनुष्य ऐसे ऐसे दुःख भोगते हैं जिन्हें देखकर मन द्रवित दुःखी हो जाता है। करोड़ों की संख्या में हमारे देश में ऐसे लोग हैं जिन्हें दो समय का पेट भर भोजन भी  सुलभ नहीं है, अच्छे स्वादिष्ट भोजन की बात तो बहुत दूर है। यह देश की व्यवस्था की खामियों के कारण मुख्य रूप से है। बहुत से लोग रोगों से पीड़ित हैं परन्तु वह डाक्टर के पास जाने से भी डरते हैं।

अतः साधारण मध्यम वर्गीय लोगों के दुःखों की कोई सीमा नहीं है। ऐसे अनेकानेक दुःखों से बचने के लिए ही धर्म का पालन करने का विधान है। सत्य बोलने, धर्म वा वेद विहित कर्मों को करने से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है। अतः ऐसा करके अधिकांश सभी दुःखों से बचा जा सकता है। इसके लिए हमें अच्छे संस्कारों वेदो के अध्ययन की आवश्यकता है। वेदाध्ययन बाल किशोरावस्था में किसी आर्य गुरुकुल में प्रविष्ट होकर किया जा सकता है। युवावस्था बाद में वेदाध्ययन के लिए सत्यार्थप्रकाश धर्मग्रन्थ सहित ऋषि दयानन्द के अन्य ग्रन्थों वैदिक साहित्य का अध्ययन कर सत्य वैदिक मान्यताओं सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए हमारे मन हृदय में ईश्वर, वेद आर्यसमाज के सिद्धान्तों के प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये। ऐसा करके वैदिक शिक्षाओं, मान्यताओं सिद्धान्तों के अनुसार आचरण करके हम अधिकांशतः सुखी हो सकते हैं।

                वेदों का अध्ययन करने से ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान भी अध्येता को होता है। ईश्वर का ज्ञान होने पर बोध होता है कि ईश्वर अनन्त काल से हम पर असंख्य उपकार करता चला रहा है। ईश्वर के उन उपकारों का ऋण हम कदापि चुका नहीं सकते। इसके लिए वेद और हमारे ऋषि मुनि वैदिक मान्यताओं के अनुरूप ईश्वर के ध्यान चिन्तन का विधान करते हैं जिसके अन्तर्गत मनुष्य को प्रातः सायं की दो सन्धि वेलाओं में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना उपासना करनी होती है। इसे सन्ध्या कहते हैं। इसमें सहायता के लिए ऋषि दयानन्द ने पंचमहायज्ञ विधि नाम से एक लघु ग्रन्थ की रचना की है जिसमें सन्ध्या का विघान विधि दी गई है। इसे कोई भी हिन्दी जानने वाला मनुष्य कर सकता है। पंचमहायज्ञविधि की पद्धति से सन्ध्या कर ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर साधक वा मनुष्य ईश्वर की कृपा रूप में सुख कल्याण करने वाली प्रेरणायें प्राप्त कर सकता है। यह स्तुति, प्रार्थना उपासना ही सच्ची ईश्वर की पूजा है। यह भी जानना चाहिये कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान अविनाशी है। वह हमारे हृदय में स्थित हमारी आत्मा के भीतर बाहर सर्वत्र विद्यमान है। यदि हम शरीर से बाहर ईश्वर को जान मानकर उपासना करेंगे तो ईश्वर की प्राप्ति होना सम्भव नहीं है क्योंकि हमारी आत्मा शरीर के भीतर है। अतः ईश्वर की उपासना आत्मा द्वारा आत्मा के भीतर ही ईश्वर की अनुभूति करते हुए उसका ध्यान चिन्तन करते हुए करना ही सम्भव है। ऐसा करके ही स्तुति, प्रार्थना उपासना के फल ईश्वर से प्रीति, ईश्वर के ध्यान से बुरी आदतों का छूटना ईश्वर के गुण, कर्म स्वभाव के समान जीवात्मा के गुण, कर्म स्वभाव का बनना होता है। इससे सर्वशक्तिमान ईश्वर के सहाय का प्राप्त होना भी सम्भव होता है। अतः सबको वेदाध्ययन वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन करते हुए प्रातः सायं सन्ध्या अवश्य करनी चाहिये जिससे जीवात्मा के दुर्गुण दुःख आदि दूर होकर जीवात्मा सदगुणों सुखों से युक्त हो सके। सन्ध्या ही सच्ची यथार्थ ईश्वर की पूजा है यह विश्वास ईश्वर की पूजा उपासना करने वाले मनुष्यों को दृढ़ता से होना चाहिये।

                संसार की तीन सत्ताओं में एक जड़ प्रकृति है जिससे ईश्वर ने यह भौतिक जगत बनाया है। इस जगत में अग्नि, वायु, जल, आकाश और पृथिवी आदि 33 देवता हैं। अन सबमें उपासनीय केवल ईश्वर है हमारे माता-पिता, आचार्य उनके समान व्यक्ति हैं। जड़ पदार्थ के यथार्थ गुणों को जानना, उनसे यथावत् उपयोग लेना उनका अल्पज्ञानियों में उपदेश प्रचार ही उन पदार्थों की स्तुति होती है। यह कार्य हमारे आचार्य और वैज्ञानिक भली प्रकार करते हैं। जड़ पदार्थों से प्रार्थना करने से तो वह सुन सकते हैं और जब वह सुन ही नहीं सकते तो उस प्रार्थना का फल भी उनसे प्राप्त नहीं हो सकता। प्रार्थना तभी सार्थक सफल होती है जब वह अपने से अधिक किसी सामर्थ्यवान चेतन सत्ता से की जाये। इसमें प्रथम स्थान पर तो ईश्वर ही है और इतर देवताओं में माता, पिता, आचार्य एवं बन्धुगण आदि अनेक मनुष्य हो सकते हैं। अतः हमें ईश्वर से ही प्रार्थना करनी चाहिये जिससे वह सब पूरी हो सकें। जो प्रार्थनायें माता, पिता, आचार्यमण आदि पूरी कर सकते हैं, वह प्रार्थनायें इनसे ही करनी चाहिये। ईश्वर के हमारी आत्माओं के भीतर विद्यमान होने से उसकी उपासना तो हर पल हर क्षण होती रहती है की जा सकती है। अन्य चेतन देवता माता, पिता, आचार्य आदि की यथासमय उपासना आदि की जा सकती है करनी भी चाहिये। यह भी ध्यान रहे कि ईश्वर को हमसे किसी पदार्थ सेवा आदि की आवश्यकता नहीं है जबकि हमारे माता, पिताओं आचार्यों को होती है। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम अपने माता, पिता आचार्यों की तन, मन धन से श्रद्धापूर्वक सेवा सुश्रुषा करें।

                अग्निहोत्र में हम जड़ देवताओं का पूजन सत्यक्रियाओं द्वारा उनका शोधन गुणवर्धन के साथ उन्हें हानि पहुंचे इसका ध्यान रखते हैं। संसार में हमारे लिए प्राणों अन्न आदि का सर्वाधिक महत्व है। अग्निहोत्र यज्ञ करने से सभी जड़ पदार्थ पुष्ट लाभान्वित होते हैं। अग्निहोत्र से वायु शुद्धि का प्रत्यक्ष प्रमुख लाभ होता है। वायु में घृत यज्ञ सामग्री के प्रक्षेपण उनके प्रज्वलन से जो शुद्ध प्राण वायु उत्पन्न होती है उसमें श्वांस लेने से मन स्वास्थ्य को लाभ होने के साथ अनेकानेक रोगों की निवृत्ति बचाव भी होता है। वायु के शुद्ध होने से आकाशस्थ वायु जल दोनों शुद्ध होते हैं। शुद्ध जल वा वर्षा से कृषि उत्पाद, वनस्पतियां ओषधियां आदि भी शुद्ध पवित्र उत्पन्न होती है जिससे मनुष्य के स्वास्थ्य को लाभ सहित उसके बल शक्ति में वृद्धि होती है। अग्निहोत्र से पुरोहित जी आदि विद्वानों की संगति होने से नये नये ज्ञान विज्ञान की उपयोगी बातों की जानकारी भी यज्ञकर्ता को प्राप्त होती है। ऐसे अनेकानेक लाभ यज्ञ की पुस्तकों ग्रन्थों में उपलब्ध है। यज्ञ ऐसा कर्म है जिसका लाभ इस जीवन में तो होता ही है, परजन्म में भी यज्ञ का लाभ मिलता है जिनका सत्शास्त्रों में विधान है। जहां यज्ञ होता है उससे पवित्र वायु चारों ओर फैलता वा दूर दूर जाता है और वहां प्राणियों मनुष्यों को श्वांस के द्वारा लाभान्वित करता है। इसका पुण्य भी यज्ञकर्ता को जन्म-जन्मान्तर में मिलता है। यज्ञ में वेदमन्त्रों का उच्चारण करने से ईश्वर की नाना प्रकार से स्तुति प्रार्थनायें होती हैं जो अनर्थक होकर सार्थक समयानुसार पूर्ण होती हैं। इस प्रकार प्रातः सायं सूर्यास्त के समय सायं सूर्यास्त से पूर्व किया जाने वाला अग्निहोत्र भी गृहस्थी अन्य यज्ञ करने वाले सभी मनुष्यों को समान रूप से लाभ पहुंचाता है। इस अग्निहोत्र को करने से जड़ दवेताओं को लाभ होता है हम जो प्राकृतिक पदार्थों का भोग करते हैं, उससे एक सीमा तक हम उऋण होते हैं। यह भी जान लें कि यज्ञ देवपूजा, संगतिकरण दान को कहते हैं। देवपूजा में अग्निहोत्र जाता है। यज्ञ में विद्वानों के आगमन से उनसे संगतिकरण होने से हमें नाना प्रकार से लाभ होते हैं। दान केवल धन अपितु श्रेष्ठ गुणों के आदान प्रदान को भी कहते हैं। इस दान से व्यक्ति, समाज राष्ट्र का महान उपकार होता है। यह यज्ञ की महनीयता को भी प्रदर्शित करता है। पाठकों को यज्ञ विषयक ग्रन्थों को पढकर इनके लाभों से सुपरिचित होना चाहिये तभी वह यज्ञ करके लाभान्वित हो सकेंगे।

                इस संक्षिप्त जानकारी के साथ ही हम लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य


स्वाध्याय व नियमित जीवन अपनायें


डा.अशोक आर्य
मानव को कभी भी अपने स्वरुप को तथा अपने जीवन के उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिये। एसा करने से ही हम अपने जीवन में स्वाध्याय को अपनाते हुए जीवन को नियम के अनुसार चलावेंगे। इस बात को यह मन्त्र इस प्रकार कह रहा है- अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृंह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय। धर्त्रमसि दिवं दृंह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय। विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य ऽउपदधामि चित स्थोर्ध्वचितो भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्॥यजु.१८॥

इस मन्त्र में निम्न बिन्दुओं पर विचार करते हुए परमात्मा इस प्रकार उपदेश दे रहे हैं -
ज्ञान उन्नति का मूल है-
हे जीव! तेरे अन्दर बुद्धि दी गयी है ताकि तूं सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त कर सके। ज्ञान सब प्रकार की उन्नति का मूल स्रोत है। इसलिए तूं उन्नतिशील कहा जाता है क्योंकि तेरे अन्दर ज्ञान को प्राप्त करने और बढाने की इच्छा सदा बनी रहती है। अत: तूं निरन्तर ज्ञान को प्राप्त करने के प्रयास में लगा रह।
ध्रृतिशील बन-
हे जीव! तूं अपने अन्दर धृति को धारण कर, धैर्य को बनाए रख। जब तक तेरे अन्दर धैर्य बना रहेगा, तब तक कोई विपति तुझे पथ-भ्रष्ट नहीं कर सकती। इस प्रकार तूं अपने जीवन के स्वपनों को साकार करने के लिए निरन्तर आगे बढता ही चला जावेगा। तूं धैर्यवान् होने के कारण अपने हृदय रुप अन्तरिक्ष में, अपने हृदय के अन्दर जो आकाश रुप खाली स्थान है, उसको दृढ बना । हमारे अन्तरूकरण का सब से उतम, सब से महान् गुण तो धैर्य ही है। यह धैर्य अर्थात् यह धृति ही हमारे धर्म के अन्य सब अंगों का आधार है। इस से ही धर्म चलता है। इसके आधार पर ही धर्म खडा है। यह ही कारण है कि मनु महाराज ने इसे (धृति को) धर्म का प्रथम लक्षण कहा है।
शत्रुओं के नाश में समर्थ बन-
हे जीव! तूं शत्रुओं के , ( अपने अन्दर के तथा बाहर के शत्रुओं के) विनाश के लिए सामर्थ्य प्राप्त कर। यह कैसे सम्भव होगा? इस निमित परमपिता परमात्मा उपदेश कर रहे हैं कि हे जीव! तूं अपने अन्त:करण का सम्पादन करने वाला है, अपने अन्तरूकरण को एक नियम से बांधने वाला है। तूं ही ज्ञान का उपभोग करने वाला, सेवन करने वाला, उपयोग करने वाला होने के नाते सदा उत्तम ज्ञान को संकलन कर, ग्रहण कर। तूं ही सब प्रकार के बलों को प्रयोग करने वाला है। इतना ही नहीं सब प्रकार के उत्तम यज्ञों को करने वाला भी तूं ही है। इस प्रकार के गुणों से युक्त, सम्पन्न, तुझे मैं अपने समीप स्थान देता हूं।
मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य परम पिता की समीपता को पाना है, वह सदा उस पिता के निकट अपना आसन लगाने की इच्छा रखता है। इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए वह उसका सदा स्मरण करता है, उसके गुणों का गान करता है। उस पिता ने ही उपर कुछ विधियां दी हैं, जिनके करने से उसकी समीपत मिलती है तथा जीव को पिता ने उपदेश किया है कि तूं यह सब कुछ कर। इससे ही मैं तुझे अपने समीप स्थान दूंगा। जब उस पिता की निकटता मिल जाती है, जब जीव प्रभु के निकट आसन प्राप्त कर लेता है तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है, वह इतनी शक्ति का स्वामी बन जाता है कि वह अपने सब प्रकार के शत्रुओं का नाश कर सके।
शत्रु विनाश के लिए प्रभु की निकटता पा –
हे प्राणी! तेरे अन्दर अत्यधिक धारक शक्ति होने से तूं भरपूर स्मरण शक्ति का भी स्वामी बन गया है। स्मरण शक्ति मानव में तब तक ही रहती है, किसी विषय का स्मरण वह तब तक ही रख सकता है, जब तक उसमें धारण शक्ति है, इसे स्म्भालने की शक्ति है। इसलिए ही पभु कह रहे हैं कि तूं ने यत्न करके अपने अन्दर धारण शक्ति को बढाया है, जिससे तेरी स्मरण शक्ति दृढ हो गयी है। इस स्मरण शक्ति के उपयोग से तूं अपने मस्तिष्क को भी मजबूत कर , प्रबल कर। यह मस्तिष्क प्राणी का द्युलोक ही होता है। यह ही सब प्रकार के ज्ञान को एकत्र कर, उसे देने वाला होता है। हार्दिक बधैप्रभु आपको सौ वर्ष तक निरंतर परोकर का प्रभु चिंतन का अता दुखियों की सहायता करने के अवसर प्रदान करें ओउम्

तीन चेतन देवता माता, पिता और आचार्य”


वेदों में देव और देवता शब्द का प्रयोग हुआ है। देव दिव्य गुणों से युक्त मनुष्यों व जड़ पदार्थों को कहते हैं। परमात्मा अर्थात् ईश्वर परमदेव कहलाता है। देव शब्द से ही देवता शब्द बना है। देवता का अर्थ होता है जिसके पास कोई दिव्य गुण हो और वह उसे दूसरों को दान करे। दान का अर्थ भी बिना किसी अपेक्षा व स्वार्थ के दूसरों को दिव्य पदार्थों को प्रदान करना होता है। हम इस लेख में चेतन देवताओं की बात कर रहे हैं। चेतन देवताओं में तीन प्रमुख देव व देवता हैं जो क्रमशः माता, पिता और आचार्य हैं। इन तीनों देवताओं से सारा संसार परिचित है परन्तु इनके देवता होने का विचार वेदों की देन है। वेद इन्हें देवता इसलिए कहता है कि यह तीनों अपने अपने दिव्य गुणों का दान करते हैं। पहले हम माता शब्द पर विचार करते हैं। माता जन्मदात्री स्त्री को कहते हैं। माता के समान शिशु व किशोर का पालन करने वाली स्त्री भी माता कही जाती है। माता देव क्यों कही जाती है? इसका कारण यह है कि माता सन्तान को जन्म देने व पालन करने में अनेक कष्टों को उठाती है और वह सहर्ष ऐसा करती है। वह अपनी सन्तान से किसी प्रतिकार, धन व सेवा आदि के माध्यम से भुगतान की अपेक्षा नहीं करती। यह बात और है कि विवेकशील व बुद्धिमान सन्तानें अपने माता-पिता के उपकारों को जानकर उनकी सेवा करते हैं और माता-पिता के उपकारों से उऋण होने का प्रयत्न करते हैं। इसका लाभ उनको भविष्य में मिलता है।

वह जब विवाहित होकर स्वयं माता-पिता बनते हैं और उनकी सन्तानें होती हैं तो उनके अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा के संस्कार उनकी अपनी बाल सन्तानों में आते हैं। इन संस्कारों का लाभ यह होता है कि वह भी बड़े होकर अपने माता-पिता की सेवा करते हैं। अतः सभी युवाओं व दम्पतियों को अपने माता-पिता की सेवा अवश्य करनी चाहिये। इसका उनको यह लाभ होगा कि उनकी सन्तानें भी बड़ी होकर उनकी सेवा किया करेंगी। संक्षेप में यह भी लिख दें कि माता को सन्तान को अपने गर्भ में धारण करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयों व पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है। 10 माह की गर्भावस्था में नाना प्रकार की समस्याओं से उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। चिकित्सक माताओं को अनेक प्रकार की सलाह देते हैं व ओषधियां बताते हैं जिनका पालन माताओं को करना होता है। सन्तान के जन्म के बाद भी शिशु की रक्षा, उसके पालन एवं पोषण में बहुत सावधानी रखनी पड़ती है। अपना भोजन व आचारण भी एक माता के उच्च गुणों से युक्त युवती के अनुरूप करना पड़ता है जिसमें उन्हें अपनी अनेक इच्छाओं व सुख-सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है। ऐसा करके सन्तान सकुशल जन्म ले पाती है व उसका पालन हो पाता है। आज हमने दो वर्ष की एक कन्या से फोन पर बातचीत की। यह दो वर्ष की कन्या अभी शब्दों को स्पष्ट रूप से बोल नहीं पाती। उसके माता-पिता, दादा-दादी व बुआ उसे बोलने का अभ्यास करा रहे हैं। अभी 6 माह से 1 वर्ष का समय और लग सकता है। इससे यह ज्ञात होता है कि सन्तान के निर्माण में माता की प्रमुख भूमिका होती है। माता को प्रसव पीड़ा तो होती ही है साथ ही भाषा का ज्ञान कराने में भी बहुत समय देना पड़ता है। अतः सन्तान का यह कर्तव्य होता है कि वह बड़ी होकर माता को सब सुख सुविधायें प्रदान करें और उन्हें मानसिक, शारीरिक व अन्य किसी प्रकार की असुविधा व दुःख न होने दे। सन्तानों का कल्याण करने और अनेक कष्ट व दुःख सहन करने के कारण माता अपनी सभी सन्तानों के लिए पूजनीय देवता होती है।
पिता भी सन्तान के लिए एक देवता होता है। पिता से ही सन्तान होती है। सन्तान के जन्म में माता व पिता दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। माता-पिता के द्वारा एक आत्मा माता के गर्भ में प्रविष्ट होती हैं। आत्मा के माता के शरीर होने में ईश्वर की प्रमुख भूमिका होती है। ईश्वर यह सब कैसे करता है, अल्पज्ञ जीवात्मा इसे पूर्णतः नहीं जान सकता। ईश्वर ने सन्तान उत्पन्न करने का अपना एक विधान बना रखा है। उसी के अनुसार सन्तान जन्म लेती है। पिता की भूमिका माता व भावी शिशु के लिए आवश्यकता की सभी सामग्री व सुविधायें जुटाने की होती है। माता को पौष्टिक भोजन चाहिये। इसके साथ स्वस्थ सन्तान के लिए माता का जीवन चिन्ताओं व दुःखों से मुक्त एवं प्रसन्नता से युक्त होना चाहिये। माता जैसा साहित्य पढ़ती है, विचार व चिन्तन करती है, प्रायः वैसी ही सन्तान बनती है। माता-पिता के चिन्तन के अनुरूप सन्तान की आत्मा में संस्कार उत्पन्न होते जाते हैं। वही संस्कार सन्तान के जन्म के बाद के जीवन में पल्लवित व पुष्पित होते हैं। अतः यह आवश्यक होता है कि गर्भावस्था काल में माता व पिता दोनों सात्विक विचार रखें। वह ईश्वर व जीवात्मा विषयक वैदिक मान्यताओं का अध्ययन किया करें। वह वैदिक साहित्य पढ़े व अपने मन में ऐसे भाव उत्पन्न करें कि हमारी सन्तान धार्मिक, साहसी, निर्भीक, देशभक्त, ज्ञानी, सच्चरित्रता आदि के गुणों से युक्त होगी। यदि ऐसा करते हैं तो सन्तान ऐसी ही बन जाती है। पिता की भूमिका माता के समान ही महत्वपूर्ण होती है। इसलिए उसे माता के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है। सन्तान का जन्म हो जाने के बाद बच्चे की शिक्षा, उसके पोषण व निर्माण का दायित्व पिता का होता है। बच्चे का शारीरिक व बौद्धिक विकास भली प्रकार से हो रहा है, पिता को इसका ध्यान रखना पड़ता है। यदि सन्तान को अच्छे शिक्षक व सामाजिक वातावरण मिलता है तो सन्तान एक सुसंस्कृतज्ञ सन्तान बनती है। आजकल वातवारण कुछ बिगड़ गया है। समाज पर विदेशी मानसिकता का प्रभाव बढ़ रहा है। इस कारण सन्तान में वैदिक संस्कार कम व पाश्चात्य सभ्यता के संस्कार अधिक देखे जाते हैं। विकल्प रूप में बच्चों को यदि गुरुकुलीय शिक्षा मिले तो वह अच्छी प्रकार से संस्कारित हो सकते हैं।
आज अच्छे गुरुकुलों का भी अभाव है जहां आचार्यगण माता-पिता के समान व उससे भी अच्छा, स्वामी श्रद्धानन्द जी के समान, व्यवहार करें और बच्चों की सभी प्रकार की शैक्षिक व स्वास्थ्य विषयक आवश्यकतायें गुरुकुल में पूर्ण हों। आर्यसमाज के कुछ गुरुकुल इसकी आंशिक पूर्ति ही करते हैं। आर्यसमाज के गुरुकुलों में वैल्यू एडीसन की आवश्यकता अनुभव होती है। महर्षि दयानन्द ने अपनी पुस्तक व्यवहारभानु में जैसे आचार्य और शिष्यों का उल्लेख किया है, वैसे आचार्य और शिष्य यदि हों, तो समाज का कल्याण हो सकता है। देश की सरकार मैकाले की पद्धति को प्रमुखता देती है। उसके लिए मोटे मोटे वेतन भी शिक्षकों को देती है। इस पर भी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे संस्कारित न होकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर भी देश विरोधी नारे लगाते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। भ्रष्टाचार की घटनायें लगातार पढ़ रही है। अपराध कम होने के बाद तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। कश्मीर में युवक संगठित रूप से पत्थर बाजी करते हैं और सरकार मूक दर्शक बन कर देखती है। कुछ करें तो मानवाधिकारवादी लोग सरकार की आलोचना करते हैं। ऐसा लगता है कि सेना के मार खाने के अधिकार हैं अपनी रक्षा करने के लिए नहीं। यह देखकर यही लगता है कि यदि माता-पिता संस्कारित हों और आचार्य भी वैदिक संस्कारों से युक्त हों तभी बच्चों व शिक्षा जगत का कल्याण हो सकता है। पिता दूसरा देव है। आजकल के पिता सन्तानों को धन व सुख सुविधायें तो भरपूर देते हैं परन्तु संस्कार न माता-पिता के पास हैं और न स्कूलों में, इसलिए नई पीढ़ी आस्तिकता व संस्कारों से दूर जा रही है और वह कार्य कर रही है जो उसे करने नहीं चाहिये।
आचार्य भी एक देवता होता है। वह बच्चों को दूसरा जन्म, उन्हें विद्यावान् कर देश व समाज के लिए उपयोगी बनाता है जो आगे चलकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करने में समर्थ हो सकते हैं व इनकी योग्यता प्राप्त कर सकते हैं। आचार्य आचरण की शिक्षा देने वाले गुरु को कहते हैं। आचरण की शिक्षा स्वयं सदाचार को अपने चरित्र में धारण करके ही दी जा सकती है। यदि गुरु सदाचारी नहीं होगा तो शिष्य भी सच्चरित्र नहीं हो सकते। अतः आचार्यत्व का कार्य उच्च चरित्र के ज्ञानी व्यक्तियों को ही करना चाहिये, तभी संस्कारित व सच्चरित्र युवक देश को मिल सकते हैं। प्राचीन काल में राम, कृष्ण व असंख्य ऋषि मुनि अच्छे आचार्यों की ही देन होते थे। आज वैसे आचार्य होना बन्द हो गये हैं तो राम, कृष्ण, चाणक्य, दयानन्द जैसे नागरिक व महापुरुष होना भी बन्द हो गये हैं। देश की सरकार को चाहिये कि वह अध्यापकों व आचार्यों की सच्चरित्रता के उच्च मापदण्ड बनायें। सभी गुरुजन आस्तिक व वेदों के जानकार होने चाहिये। वह मांसाहारी न हों, धूम्रपान व अण्डों का सेवन करने वाले भी न हां। वह त्याग व सन्तोष की वृत्ति को धारण करने वाले हों। आचार्यगण यम व नियम का पालन करते हों, योगी व ज्ञानी हों। वह वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करने वाले भी होने चाहियें। ऐसे आचार्य यदि होंगे तभी वह नई संस्कारित युवा पीढ़ी को बना सकते हैं। ऐसे गुणों वाले अध्यापक ही आचार्य कहलाने के योग्य होते हैं। शब्द, भाषा, सामाजिक व राजनैतिक विषयों सहित विज्ञान व गणित आदि विषयों का ज्ञान देने वाले अध्यापक तो हो सकते हैं आचार्य नहीं। आचार्य बनने के लिए उन्हें अपना जीवन वैदिक मूल्यों पर आधारित आचार्य का जीवन बनाना होगा। तभी वह आचार्य कहला सकेंगे और उनके शिष्य चरित्रवान् होने सहित देश व समाज के हितों की पूर्ति करने वाले होंगे। सच्चा आचार्य अपने शिष्य को सच्चरित्रता व ईश्वर, जीवात्मा विषयक जो ज्ञान देता है, उस कारण से वह देवता होता है।
ज्ञान ही संसार की सबसे श्रेष्ठ वस्तु है। ज्ञानहीन मनुष्य तो पशु समान होता है। मनुष्य को पशु से मनुष्य व ज्ञानवान् बनाने में माता, पिता व आचार्य तीनों का अपना अपना योगदान है। अतः तीनों ही किसी भी मनुष्य के लिए आदरणीय, सम्मानीय व पूज्य होते हैं। इन सबकी तन, मन व धन से सेवा करना सभी सन्तानों व शिष्यों का धर्म व कर्तव्य है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य


Wednesday, 4 April 2018

समाज सेवी कैसा हो ?


जब हमारे अन्दर के दिव्यगुणों में भारी वृद्धि होती है. दिव्यगुणों से युक्त व्यक्ति ही लोकहित के कार्यों में अग्रसर होता है.  इस तथ्य को यह मन्त्र इस प्रकार प्रकाशित कर रहा है:
अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीतये त्वा गृह्णामि बृहद् ग्रावासि वानस्पत्यरू स-इदं देवेभ्यो हवि: शमीष्व सुशमि शमीष्व। हविष्कृदेहि हविष्कृदेहि  ||यजुर्वेद 1.15||
मंत्र में सात बातों पर विशेष रूप से बाल देते हुए कहा गया है कि :-

१. अग्नि-
          मंत्र कहता है कि हे पिता!  तूं अग्नि का विस्तारक है.  अर्थात् तूं ही अग्नि को बढ़ाने वाला है. अग्नि तेज का भी प्रतीक है. जो भी जीव अग्नि की आराधना करता है, अग्नि का आत्मसात् करता है, अग्नि के गुण उस में भी आ जाते हैं.  जीव सदा तेजस्वी होना चाहता है. वह अग्नि के सामान निरंतर आगे बढ़ना चाहता है. इस कामना के साथ ही जीव कहता है कि हे प्रभु! तेरे ही आशीर्वाद से यह शरीर पूर्ण स्वस्थ बना है तथा तुंने ही इसे उत्साह से, हिम्मत से , धैर्य से भरपूर किया है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अग्नि उत्साह का प्रतीक है, और जीव धैर्य का प्रतीक है. आलसी व्यक्ति के पास कभी उत्साह नहीं आता, साहस नहीं आता, हिम्मत नहीं आती.  जो सच्चे अर्थों मे अग्निस्वरूप प्रभु का स्मरण करता है, उसका शारीरिक स्वास्थ्य सदा उतम रहता है तथा स्वस्थ होने के कारण ही उसके अंदर से अग्नि की सी ही चमक निकलती है.  इस चमक से ही उसका आभामंडल इस अग्नि के सामन चमकने लगता है.
२. वाचो विसर्जनाम
           मंत्र जो दूसरी बात कह रहा है, वह है वाचो विसर्जनाम अर्थात् बांटने वाला, विस्तार करने वाला प्रचार करने वाला. इस शब्द का भाव यह है कि उतमता का सदा विस्तार होना चाहिये. अच्छाई जहां से भी मिले,  उसे लेना चाहिए. अत: मंत्र दूसरी बात पर प्रकाश डालते हुए अपने भक्त को उपदेश कर रहा है की हे जीव! वेद मेरा दिया हुआ ज्ञान है. मेरा दिया हुआ ज्ञान होने के कारण इसकी उतमता पर संदेह नहीं किया जा सकता. इसलिए मेरे दिए हुए इस उतम ज्ञान को बढाने में ही विश्व का कल्याण है.  अत: हे जीव!  तूं इस ज्ञान को सर्वत्र बांटने वाला बन, इसे बांटने हुए सदा आगे बढाने वाला बन,  इस ज्ञान का सर्वत्र अर्थात् चहूँ दिशाओ में दान करने वाला बन.  तूं जहाँ भी जावे, जहाँ भी विचरण करे, वहाँ ही इस वेदवाणी के ज्ञान को अपने साथ ले जा और इसका वहां भी बाँट द्य इस ज्ञान को सदा और सर्वत्र बांटने का कार्य निरंतर कर.
३. देववीतय
            मंत्र में जिस तीसरी बात पर प्रकाश डाला गया है वह है देववीतम अर्थात् दिव्यगुण.दिव्यगुण ही जीव को आगे ले जाने वाले होते हैं. संसार की प्रगति केवल दिव्य गुणों से युक्त जीव ही कर सकता है. इसलिए प्रभु यहाँ उपदेश करते हुए कह रहा है कि दिव्य गुणों के उत्पन्न करने के लिए हे जीव! मैं तुझे ग्रहण करता हूँ किसी भी देश का मुखिया प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति देश के विभिन्न कार्यों के संचालन के लिए मंत्रियों को ग्रहण करता है, मन्त्री-मंडल विधि का निर्माण करता है अर्थात् यह मंत्रिमंडल ही नियमानुसार राज्य का संचालन करता है.  इस प्रकार ही परमपिता परमात्मा भी इस यज्ञ के विस्तार में जीवन वाले जीव को मात्र इसलिए ही ग्रहण करते हैं ताकि यह जीव, यह मानव इस लोक में दिव्य गुणों का प्रचार वा प्रसार करने वाला बने. इन दिव्य गुणों के प्रचार से संसार को श्रेय मार्ग पर ले जावे, कल्याण मार्ग पर ले जावे.
४. वृहद ग्रावा असी
            मंत्र में चतुर्थ उपदेश करते हुए कहा गया है कि वृहद ग्रावाअसी अर्थात् हे मानव! तूं विशाल हृदय तथा वेदवाणियों का उच्चारण करने वाला, स्वाध्याय करने वाला बन. जो भी उपदेष्टा अथवा उपदेश करने वाला व्यक्ति होता है,  उसका हृदय विशाल होना आवशायक होता है. संकुचित हृदय वाला व्यक्ति तो शास्त्रों की ठीक से व्याख्या भी नहीं कार सकता, जब व्याख्या ही ठीक नहीं कर सकेगा तो उतम उपदेश कैसे करेगा?  इसलिए उसका हृदय विशाल होना आवश्यक है. विशाल हृदय के कारण वह छोटे बिन्दुओं तक के ज्ञान को भी सरलता से आत्मसात् कर लेगा द्य इस प्रकार से महीनता से ज्ञान को ग्रहण कर उसे अपने तक ही सीमित न कर अपितु इसे सर्वत्र बांट कर सब की उन्नति का भी कारण बनेगा.
           इस प्रकार प्रभु चाहता है कि जीव अपने जीवन में सदैव उसके द्वारा दिए गए वेद ज्ञान का निरंतर स्वाध्याय करे. इस वेद्वाणियों में दिए उतम गुणों को स्वयं तो ग्रहण करे ही, साथ ही इसे दूसरों को भी बांटे.
५. वानस्पती:
           मंत्र जो पाँचवाँ उपदेश देता है वह है वानस्पतय: अर्थात् हे मानव!  तूं अपने जीवन में केवल वनस्पतियोपन्न का ही सेवन करने वाला बन. तूं सदा भूमि में उत्पन्न हुए अन्न आदि का ही सेवन कर.   मांस पर अपना पालन - पौषण करने वाला ना बन.  इस प्रकार प्रभु उपदेश कर रहा है कि मांस मनुष्य का भोजन नहीं है. इसलिए कभी भी मांस - भक्षण न कर सदा शाकाहारी जीवन ही व्यतित्त कर. इस से  स्पष्ट होता है की मांस मानवीय भोजन नहीं है.
          इस प्रकार मन्त्र के इस भाग में परमपिता परमात्मा ने स्पष्ट आदेश दिया है कि मांस मनुष्य का भोजन नहीं है. मनुष्य का भोजन न होने के कारण हम अपने भोजन में मांस आदि का कभी प्रयोग न करें.
६. सरू देवेभ्य:
          इस मंत्र मे छटा उपदेश करते हुए कहा गया है कि सरू देवेभ्यरू अर्थात् दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए हे मानव! तू इस हवीरूप, ग्रहण करने योग्य इस शाकाहारी भोजन का ही प्रयोग कर. यह निरामिष अर्थात् यह मांस रहित भोजन ही तुझे शांति देने वाला है. तेरा यह भोजन न केवल यज्ञशेष बने, यह यज्ञ का शेष तो है ही, इसके साथ ही यह सौम्य भी हो ताकि यह सौम्य भोजन तेरे स्वभाव को भी सौम्य बनाने का कारण बने तथा इसे सौम्य बनाता हुआ, शांत बनाता हुआ तुझ में दिव्य-गुणों को बढ़ाने का कारण बने. इस उतम प्रकार से शांति देने वाले इस सौम्य भोजन के द्वारा तुझे शांति देने वाला बने. इस प्रकार तेरा यह भोजन हवी देने वाला होने के साथ ही साथ शांति देने वाला भी होगा.
          इन शब्दों में प्रभु ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया है कि यज्ञ में मांसादि की आहुति नहीं दी जा सकती. जब मांसादि की आहुति यज्ञ ग्रहण नहीं करता तो यह भोजन रूप में कैसे लिया जा सकता है?  अर्थात् नहीं ले सकते. जब यज्ञशेष रूप मांस की आज्ञा नहीं है तो उदर की तृप्ति भी मांस से करना उतम नहीं हो सकता. कहा भी है कि जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन अर्थात् मानव वैसा ही बनेगा जैसा वह खावेगा. हम जानते हैं कि मांस की प्राप्ति क्रूरता से ही होती है. बिना किसी पर अत्याचार किये मांस मिलता ही नहीं है.  इसलिए क्रूरता से प्राप्त किये मांस रूपी इस भोजन को करने वाला निश्चय ही क्रूर होगा. उतम मानव सदा सौम्य स्वभाव वाला होता है. सौम्य स्वभाव उसका ही हो सकता है जो सौम्यता व शान्ति से प्राप्त किया गया उतम भोजन करे. यह भोजन वनस्पतियों से ही मिलता है द्य  इसलिए मन्त्र में सदा वनस्पतिक भोजन ही करने का आदेश दिया गया है.
७. हविष्कृत
           मंत्र में सातवां तथा अन्तिम उपदेश करते हुए कहा है कि हविष्क्रितम अर्थात् इस प्रकार से अपने जीवन को हवी का आहुति के रूप से देने वाले हे जीव! तू मेरे समीप आ. अर्थात् जो इस प्रकार अपने आप को हवी-रूप बना लेता है, वह प्रभु की समीपता को पा लेता है. जब मानव अपने जीवन को अपने सर्वस्व को लोक हित में लगा देता है, जन - कल्याण में लगा देता है ,उसे उस पिता की समीपता मिल जाती है. एसा बनने के लिए शाकाहारी भोजन का हविरूप होना आवश्यक है. जब हम पवित्र होना चाहते हैं तो हम पवित्र भोजन करते है. पवित्र भोजन करने वाले का ही मन पवित्र बनता है. इसलिए हम पवित्र भोजन करें, यह पवित्रता शाकाहारी भोजन में ही है. क्रूरता से, दुसरे जीव की ह्त्या से प्राप्त मांस आदि के भोजन में पवित्रता कभी नहीं हो सकती. सौम्यता कभी नहीं हो सकती, शांति कभी नहीं हो सकती द्य इस लिए सदा वनस्पतिक भोजन ही करना चाहिए.
डा.अशोक आर्य

यह जन्म हमारे पूर्वजन्म का पुनर्जन्म है और मृत्यु के बाद हमारा पुनर्जन्म अवश्य होगा


हम मनुष्य हैं और लगभग 7 दशक पूर्व हमारा जन्म हुआ था। प्रश्न है कि जन्म से पूर्व हमारा अस्तित्व था या नहीं? यदि नहीं था तो फिर यह अभाव से भाव अर्थात् अस्तित्व न होने से हुआ कैसे? विज्ञान का सिद्धान्त है कि किसी भी पदार्थ का रूपान्तर तो किया जा सकता है परन्तु उसे पूर्ण नष्ट अर्थात् उसका अभाव नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार जिस चीज का अभाव है अर्थात् जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उस अभाव से भी कोई चेतन व जड़ पदार्थ बन नहीं सकता। भाव से भाव होता है और अभाव का अभाव रहता है। इस सिद्धान्त के आधार पर हमारा इस जन्म से पूर्व अस्तित्व व पुर्नजन्म सिद्ध होता है। हम यदि आज विद्यमान हैं, जन्म के समय व उसके बाद अब तक विद्यमान रहे हैं तो यह निश्चित होता है कि हमारा अस्तित्व हमारे जन्म से पूर्व भी था। यदि न होता तो फिर इस जन्म में वह माता के शरीर में कहां से व कैसे आता? आज विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। उसने भौतिक पदार्थ को रूपान्तरित करके अनेकानेक नये व भिन्न भिन्न भौतिक पदार्थ बनायें हैं। एक पदार्थ में जो एक से अधिक तत्व जैसे पानी में हाइड्रोजन और आक्सीजन होती है, उन्हें पृथक करने में भी सफलता प्राप्त की है, परन्तु आज का आधुनिक विज्ञान भी किसी एक व एक से अधिक भौतिक पदार्थों से एक व अधिक आत्माओं को नहीं बना सका है। इससे आत्मा का स्वतन्त्र व अन्य पदार्थों से पृथक अस्तित्व सिद्ध होता है। यदि जड़ पदार्थों से सर्वथा भिन्न चेतन आत्मा का पृथक व स्वतन्त्र अस्तित्व न होता तो हम अनुमान कर सकते हैं कि वैज्ञानिकों ने भौतिक पदार्थों से आत्मा को बना लिया होता और आत्मा के बनने के बाद उन्होंने मनुष्य आदि अनेक प्राणियों के शरीर भी प्रयोगशाला में, माता के गर्भ में नहीं, बना लिये होते। ऐसा नहीं हो सका अतः जीवात्मा एक अभौतिक व चेतन पदार्थ है जिसका पृथक व स्वतन्त्र अस्तित्व है। जीवात्मा मनुष्य का हो या किसी भी प्राणी का, यह एक अविनाशी, अनादि, भाव अर्थात् सत्तावान, चेतन व एकदेशी पदार्थ सिद्ध होता है। इसी चेतन आत्मा का मनुष्य व अन्य प्राणियों के शरीरों में जन्म-मरण होता रहता है जिसके कुछ नियम व सिद्धान्त हैं, जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे।


मनुष्य शरीर चेतन जीवात्मा एवं जड़ पदार्थों से निर्मित युग्म को कह सकते हैं। जीवात्मा जन्म से पूर्व माता के गर्भ में आता है। मृत्यु पर्यन्त यह मनुष्य के शरीर में रहता है और मृत्यु के समय शरीर से निकल जाता है। शरीर से निकलने की प्रक्रिया ईश्वर से प्रेरित होती है। कोई भी जीवात्मा मरना अर्थात् अपने इस जीवन के शरीर को छोड़ना नहीं चाहता। एक अदृश्य सत्ता उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध शरीर से निकालती है और जीवात्मा सूक्ष्म शरीर सहित विवश होकर दृश्यमान भौतिक जड़ शरीर का त्याग कर चली जाती है और कुछ काल के बाद ईश्वरीय नियमों व व्यवस्था से पुनर्जन्म ग्रहण करती है। जीवात्मा का शरीर से निकलना ही मनुष्य व अन्य प्राणियों की मृत्यु कहलाती है। डाक्टर भी परीक्षा करने के बाद कहते हैं कि ही इज नो मोरअर्थात् वह मनुष्य वा उसका आत्मा शरीर में नहीं रहा वा शरीर छोड़ कर चला गया है। मर गयाशब्द पर भी विचार करें तो इससे भी यह आभास होता प्रतीत होता है कि कोई शरीर छोड़ कर चला गया है। किसी के मरने पर चल बसाभी कहा जाता है जिसका अर्थ यह होता है कि मृतक शरीर का आत्मा कहीं चला गया है और शरीर यहीं पर बसा व पड़ा है।

मनुष्य का जन्म माता के गर्भ से होता है जहां हिन्दी के 10 महीनों में उसका निर्माण होता है। माता के गर्भ को क्षेत्र या खेत की उपमा दी जाती है और पिता के शुक्राणुओं को बीज की संज्ञा दी जाती है। जिस प्रकार से किसान अपने खेत में बीज बोता है, उससे पौधे निकलते हैं, किसान खेत की निराई व गुड़ाई करता है जिसके परिणाम स्वरूप अथवा प्राकृतिक वा ईश्वरीय नियमों के अनुसार समय पर फसल पक कर तैयार हो जाती है। एक बीज से वटवृक्ष बन जाता है। बीज से पौधे, अन्न, ओषधि, वनस्पतियां तथा फल आदि उत्पन्न होते हैं। वृक्ष व वनस्पतियां केवल जड़ वा भौतिक पदार्थ नहीं होते अपितु इनमें एक बीज से लेकर पौधे के रूप में व उसके बाद भी वृद्धि देखी जाती है। इसके विपरीत जड़ पदार्थ जल, वायु, मिट्टी व पत्थर जैसे होते हैं उनमें किसी प्रकार की वृद्धि नहीं देखी जाती है। अतः वृक्ष व वनस्पतियों में भी मनुष्य शरीर की भांत सुषुप्त अवस्था में चेतन जीवात्मा होना प्रतीत होता है। यदि बीज में जीवात्मा न होती तो फिर पौधों व वृक्षों में वृद्धि का सिद्धान्त काम न करता जैसा कि मनुष्य शरीर में जन्म से लेकर युवा व प्रौढावस्था तक होता है। यह वृक्ष व पौधे वायु, जल, सूर्य की ऊर्जा व प्रकाश सहित भूमि से भोजन ग्रहण करते हैं। मनुष्य भी अन्न, वनस्पतियों, फल व गोदुग्ध आदि से अपना भोजन ग्रहण करता है जो उसके शरीर की वृद्धि व स्थायीत्व का कारण होता है। इससे मनुष्य आदि प्राणियों सहित वृक्षों व वनस्पतियों में भी मनुष्य के समान चेतन जीवात्मा के होने का अनुमान व आभास होता है परन्तु वनस्पतियों आदि में जीवात्मा जाग्रत अवस्था में न होकर सुशुप्त अवस्था में होता है, यह प्रत्यक्ष दीखता है। वनस्पतियों के पास मनुष्यों के समान ज्ञानेन्द्रियां व कर्मेन्द्रियां भी नहीं है।

प्रायः यह प्रश्न किया जाता है कि यदि जीवात्मा शरीर से पृथक एक चेतन पदार्थ है और इसका पुनर्जन्म हुआ व होता है तो फिर इसे अपने पूर्वजन्म की बातें स्मरण क्यों नहीं रहती? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य के पूर्व जन्म के शरीर का मृत्यु को प्राप्त होने पर उसकी अन्त्येष्टि व दाह संस्कार आदि कर दिया जाता है। वह शरीर नये जन्म में साथ नहीं जाता। उसके पूर्वजन्म के मन, मस्तिष्क, बुद्धि व अन्तःकरण आदि शरीर के अवयव सभी यहीं छूट जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि हम इसी मनुष्य जन्म में प्रतिदिन पूर्व की बातों को भूलते रहते हैं। हमने प्रातः कब किससे क्या-क्या बातें की, क्या-क्या पदार्थ कब खाये, आज, कल व परसों कौन-कौन से वस्त्र पहने थे, उनका रंग कैसा था, हम विगत दो चार दिन में किन-किन से मिले और क्या-क्या बातें की आदि का हमें नाम मात्र का ज्ञान रहता है। अधिकांश बातें हम भूल चुके होते हैं। हम किसी से बात कर रहं हों और वह व्यक्ति यदि दस मिनट बाद कहे कि आप अभी जो बोले हैं, उसे उसी रूप में शब्दों व वाक्यों को आगे पीछे किये व छोड़े बिना उसी भाव-भंगिमा में दोहरा दें, तो हम सभी शब्दों व वाक्यों को ज्यों का त्यों नहीं दोहरा सकते। इससे हमारे भूलने की प्रवृत्ति का ज्ञान होता है। जब हमें इस जन्म की दो चार दिन की बहुत सी बातों का ज्ञान नहीं रहता तो फिर यह कहना कि पिछले जन्म की बातें याद क्यों नहीं रहती, उचित प्रश्न नहीं है। यह भी सम्भव है कि हम पिछले जन्म में मनुष्य ही न रहे हों, पशु, पक्षी आदि किसी अन्य योनि में रहे हों, तो फिर कोई कैसे पिछले जन्म की बातों का किंचित भी ज्ञान रख सकता है। इसके विपरीत हमारे भीतर जन्म जन्मान्तरों के संस्कार रहते हैं। बच्चा रोना जानता है, मां का दूध पीना भी उसको आता है। वह सोते हुए हंसता है और कभी गम्भीर व उदास भी हो जाता है। यह सब पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण ही होता है। मां बच्चे को दूध पिलाते समय उसे दूघ खींचना नहीं सिखाती परन्तु बच्चा पहले से दूघ खींचना व पीना जानता है, इससे उसका पूर्वजन्म सिद्ध होता है। अब एक परिवार की चर्चा करते हैं। एक परिवार में जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं। दोनों का लालन पालन समान रूप से किया जाता है परन्तु दोनों की ज्ञान प्राप्ति व विषयों को ग्रहण करने की शक्ति में अन्तर देखा जाता है। एक ही परिवार में एक बच्चा गणित में तेज होता है दूसरा कमजोर, एक को दाल पसन्द है और दूसरे को सब्जी, एक हसंमुख है और दूसरा उदास स्वभाव वाला, एक माता पिता का अज्ञाकारी होता है तो दूसरा अवज्ञा करता है, यह सब भी पूर्वजन्म व पुनर्जन्म को सिद्ध करते हैं।

महाभारत के अंग प्रसिद्ध ग्रन्थ गीता में कहा गया है जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य चअर्थात जन्म लेने वाले मनुष्य व प्राणी की मृत्यु होना निश्चित है और इसी प्रकार मरे हुए प्राणी का पुनर्जन्म होना भी निश्चित अर्थात् घ्रुव सत्य है। हम लोग देखते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के प्राणियों की योनियां हैं। इसका कारण क्या है? इसका कारण जीवात्मा के पूर्व जन्म के कर्म हुआ करते हैं। योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने कहा है कि हमारे प्रारब्ध से हमारा नया जन्म, जाति, आयु और भोग अर्थात् सुख व दुःख निश्चित होते हैं। विवेचन व विश्लेषण करने पर यह बात सत्य सिद्ध होती है। प्रारब्ध पूर्व जन्म में किये गये कर्मों के खाते को कहते हैं जिनका मृत्यु से पूर्व भोग नहीं किया जा सका। जाति का अर्थ यहां मनुष्य जाति, पशु जाति, पक्षी जाति व इतर योनियां हैं। यही कारण है कि वेदों में ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का सत्य स्वरूप वर्णित व व्याख्यात है। इसके साथ मनुष्यों के कर्तव्य कर्मों का विधान भी वेदों में दिया गया है। इन कर्मों में ईश्वरोपासना के प्रयोजन व विधि पर भी प्रर्काश पड़ता है। मनुष्यों को वायु, जल और पर्यावरण की शुद्धि, रोगों से बचाव व निवारण, सुख-शान्ति व परोपकार आदि के लिए अग्निहोत्र करना चाहिये। माता-पिता-आचार्य सहित वृद्ध जनों की सेवा सुश्रुषा करनी चाहिये, पशु-पक्षियों के प्रति दया व प्रेम का भाव रखने के साथ उनके भोजन आदि में भी सहयोग करना चाहिये और विद्वान अतिथियों की सेवा सत्कार का भी विधान वेदों में मिलता है। जीवन को ज्ञान व संस्कार सम्पन्न करने के लिए विद्याध्ययन सहित गृहस्थाश्रम वा विवाह आदि का विधान भी वेदों में प्राप्त होता है। परोपकार व दान की महिमा भी वेदों में गाई गई है। ऐसा करने पर हमारा यह जन्म व भावी पुनर्जन्म उन्नत होता है। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि व वेदों के विद्वान सभी ज्ञानी व मनीषी थे। उन्होंने विश्लेषण, चिन्तन-मनन व वेद प्रमाणों की समीक्षा करने के बाद ही कर्मकाण्ड करने का विधान किया था। ऐसा करके ही हम उन्नति व धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होकर अपने जीवन को सफल कर सकते हैं। यह भी बता दें कि आत्मा सत्य, चेतन, निराकार, अल्पज्ञ, ज्ञान व कर्म के स्वभाव से युक्त, एकदेशी, अल्प शक्तियों से युक्त, ससीम, अनादि, अमर, अविनाशी, जन्म-मरण धर्मा, ज्ञान व श्रेष्ठ कर्मों को करने पर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करती है। जीवात्मा के स्वरूप पर वैदिक साहित्य में अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। उनका अध्ययन करना चाहिये जिससे आत्मा का ज्ञान व विज्ञान हमें सुस्पष्ट रूप से विदित हो सके और हम अपने जीवन को सत्य मार्ग में चला कर जीवन के उद्देश्य को सिद्ध व सफल कर सकें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून