Monday, 5 February 2018

स्त्री जाति के हितों के रक्षक व उद्धारक ऋषि दयानन्द सरस्वती

मध्यकाल में जब भारत कमजोर हुआ और यहां छोटे छोटे राज्य बन गये, साथ ही चहुं ओर अविद्या फैल गई तबयहां विदेशी यवनों के आक्रमण आरम्भ हो गये थे। यह लोग जहां राजाओं क्षत्रियों की हत्यायें करते थे वहीं मन्दिरों आदि को लूटते थे और आर्य हिन्दू स्त्रियों को दूषित भी करते थे। बहुसंख्यक हिन्दू अपनी अविद्या कमजोरियों के कारण मुट्ठीभर यवनों के दास बनते अपना सर्वस्व स्वस्व गवां बैठते थे। ऐसे समय में ही रक्षा बन्धन और भाई दूज जैसे पर्व आरम्भ हुए प्रतीत होता है। किसी प्रकार उस विनाश काल में हिन्दुओं ने भारी बलिदान देकर जाति की रक्षा की और उस भंवर से आर्य जाति को निकाला। ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश में आर्य स्त्रियों की दशा अत्यन्त निराशा शोकजनक थी। स्त्रियां अपढ़ रहा करती थी या बहुत कम पढ़ती थी। विद्या के संस्कार होने से बच्चे भी अपढ़ होते थे। विद्या की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य सभी का पतन हुआ था। देश की गुलामी अन्य सभी सामाजिक धार्मिक समस्याओं का कारण भी अविद्या वा अज्ञान ही थे। बाल विवाह, बेमेल विवाह जैसी कुप्रथायें प्रचलित थी और इसके साथ ही बाल युवा विधवाओं की भी गहन जटिल समस्या थी जिससे समाज जर्जरित हो गया था। राजर्षि मनु के वाक्य यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता को पूरी तरह से भुला दिया गया था। ऐसे काल में ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भव हुआ और उन्होंने इस दयनीय स्थिति को सर्वथा उलट दिया। नारी को पुरुष से केवल समान अपितु अधिक अधिकार प्रदान करते हुए ऋषि दयानन्द के मनु के वचनों का का उच्च स्वर से उद्घोष किया, ऐसा अनुमान कर सकते हैं।

                स्त्री जाति के लिए क्या आवश्यक है, इस पर विचार करते हैं तो सबसे पहली बात तो उन्हें पुरुष के समान समानता की आवश्यकता अनुभव होती है। ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में उन्हें पुरुषों के समान अवसर मिलने चाहिये। इसका कारण यह है कि परमात्मा ने विद्या प्राप्ति के साधन वाणी बुद्धि को समान रूप से स्त्रियों को भी प्रदान किया है। अतः किसी कारण से भी स्त्री पुरुषों के किसी वर्ग को विद्या से वंचित नहीं किया जा सकता। महर्षि दयानन्द के काल में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही नहीं साधारण ज्ञान प्राप्त करने का भी अधिकार नहीं था। दूसरा उनका अपकार उनका बाल विवाह करके किया जाता था। यहां तक की गोद की बच्चियों का विवाह कर दिया जाता था। जिनका विवाह होता था वह विवाह का अर्थ भी नहीं जानते थे। इसका अनेक प्रकार से उनके भावी जीवन पर कुप्रभाव देखा जाता था। अधिंकाश का जीवन पूरी तरह से नष्ट हो जाता था। पुरुष अनेक विवाह कर सकते थे परन्तु स्त्री एक बार विधवा हो जाने पर जीवन भर विवाह नहीं कर सकती थी। उसे कुलक्षणी, पतिघ्नी आदि अनेक निन्दनीय उपाधियां दी जाती थी जिससे वह अपना सारा जीवन अपमान सहते हुए दुःख पूर्वक व्यतीत करतीं थीं। छोटी ही आयु में वह माता बनती थी और अनेकों की तो प्रसव के समय मृत्यु हो जाया करती थी। यह अमानवीय कार्य धर्म परम्परा के नाम पर समाज में होते थे और हिन्दुओं के धर्म गुरु इनका विरोध करने के स्थान पर उनका समर्थन करते थे, बहुत से आज भी करते हैं। बाल कुछ अधिक आयु की विधवाओं को भी नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था। आज भी वृन्दावन जैसे स्थानों पर बाल विधवाओं की असहाय दयनीय स्थिति को देखा जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने नारियों की इस दयनीय स्थितियों को देश भर में घूम कर देखा था। हम अनुमान कर सकते हैं कि उनका दिल इन घटनाओं को देख कर गहरी पीड़ा के साथ रोता रहा होगा। इसी प्रकार से समाज में शूद्रों निम्न जन्मना जाति के बन्धुओं की स्थिति भी थी। उन पर भी अमानवीय अत्याचार हमारे द्विज वर्ग के लोग करते थे। जिनका काम ज्ञान देना था, वही इन अन्यायपूर्ण कार्यों के समर्थक बने थे, अतः अपराध बढ़ते ही जा रहे थे। 

                ऋषि दयानन्द ने नारी जाति की स्थिति के प्रति संवेदना व्यक्त की और वेद वेदानुकूल ऋषियों के ग्रन्थों के अनुसार उन्हें केवल पुरुषों के समान अध्ययन-अध्यापन युवावस्था में स्वयंवर रीति से विवाह करने के अधिकार दिये अपितु कहा कि नारी जाति का स्थान पुरुषों की तुलना में उच्च है। ईश्वर के बाद माता को उन्होंने प्रथम पिता को दूसरे स्थान पर पूजनीय चेतन देवता बताया। उन्होंने मनुस्मृति का श्लोक उद्धृत कर बताया कि जिस समाज में नारियों का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं और जहां नारियों का सम्मान नहीं होता वहां की सब क्रियायें विफल होती है। उनके समय में स्त्रियों और शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था। स्वामी दयानन्द जी ने यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः यजुर्वेद के 26/2 मंत्र का प्रमाण देकर बताया कि वेद स्वयं ही मानवमात्र को उसके अध्ययन का अधिकार देते हैं। वेद को शूद्र, अतिशूद्र उससे भी निम्न कोटि का मनुष्य पढ़ सकता है आचरण कर सकता है। इससे यह भी अनुमान लगता है कि जो स्त्री शूद्र को वेदाध्ययन का विरोध करते हैं वह वेद ईश्वर के शत्रु हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक स्थानों पर पाठशालायें गुरुकुल खुलें जहां कन्याओं को प्रविष्ट किया गया तथा जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज को केवल शिक्षित कन्यायें ही मिली अपितु वेद विदुषी नारियां आचार्यायें भी मिली। आचार्या प्रज्ञा देवी, आचार्या सूर्यादेवी और आचार्या प्रियवंदा वेदशास्त्री को हम वेद विदुषी देवियां मान सकेत हैं। बाल विवाह का ऋषि दयानन्द जी ने विरोध किया था। उनकी विवाह विषयक मान्यतायें सत्यार्थप्रकाश सहित संस्कार विधि में भी वर्णित हैं। वह मानते थे कि बाल विवाह वेद शास्त्र विरुद्ध है। विवाह युवावस्था में ही होना चाहिये। इससे पूर्व का काल ब्रह्मचर्यकाल होता जिसमें कन्या बालक को ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते हुए वेद विद्याओं को प्राप्त करना होता है। स्वामी जी के विचारों को पढ़कर लगता है कि युवावस्था की विधवा स्त्री का पुनर्विवाह समान आयु के विधुर से किया जा सकता है। इससे कन्याओं पर होने वाला एक बहुत बड़ा अत्याचार समाप्त हो गया। जिस समाज में नारी पुरुष समान माने जायें, नारी को पुरुषों के समान वेद सहित समस्त विषयों की शिक्षा का अधिकार हो और जहां युवावस्था में विवाह की स्वयंवर की परम्परा हो वह समाज श्रेष्ठ समाज क्यों नहीं होगा। इन व्यवस्थाओं वा विधानों के कारण नारी जाति किसी की सबसे अधिक कृतज्ञ आभारी है तो वह ऋषि दयानन्द जी की ही है। यह भी बता दें कि ऋषि दयानन्द के इन वाक्यों विधानों का प्रभाव पौराणिको सहित ईसाई मुस्लिम जाति की महिलाओं पर भी हुआ है। ऋषि की शिक्षाओं में नारियों के लिए परदा वा घुघंट का कोई स्थान नहीं है। ऋषि दयानन्द एक गोत्र में विवाह करने के समर्थक थे और दूर देश में कन्या का विवाह करने के समर्थक थे। इससे श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होते हैं जिससे सामाजिक एवं राष्ट्रीय उन्नति होती है।

                ऋषि दयानन्द ने संस्कारविधि में वेद मन्त्र के आधार पर बताया है कि वेद कहते हैं कि भाई भाई, बहिन बहिन भाई बहिन में परस्पर द्वेष नहीं होना चाहिये अपितु उन्हें एक दूसरे से प्रेम पूर्वक मंगलकारक रीति से सुखदायक वाणी बोलनी चाहिये। रक्षा बन्धन और भाई दूज पर्व में जो भावनायें है वह वेद के इसी मन्त्र का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं। भाई बहिन परस्पर प्रेम से सनी हुई मंगलकारी रीति से सुखदायक वाणी का प्रयोग करे इसी में इन दोनों का देश समाज का हित है। जब तक देश में वेदों के सत्य अर्थों के आधार पर सामाजिक व्यवस्था थी तब तक सभी परस्पर प्रेम सहृदयता पूर्वक रहते थे और देश में चहुं ओर सुख समृद्धि विद्यमान थी। महाभारतकाल के बाद वेद विलुप्त हो गये और अज्ञान का काल आरम्भ हुआ जिसकी देन पौराणिक मत हैं। इनके प्रवर्तन से ही समाज में अनेकानेक समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। हमें उन्नति के शिखर पर पहुंचनें के मत-मतान्तरों की कपोल कल्पित मान्यताओं को छोड़कर वेद की ज्ञान विज्ञान से युक्त मान्यताओं को ही स्वीकार कर आचरण में लाना चाहिये। इसी में स्त्री जाति की रक्षा और समाज देश का कल्याण भी निहित है। स्वामी दयानन्द जी ने वेदों का प्रकाश प्रचार कर तथा आर्यसमाज की स्थापना करने के साथ सत्यार्थप्रकाश आदि अनेकानेक ग्रन्थ लिख कर मानव जाति सहित स्त्री जाति का भी उद्धार किया है। स्त्री जाति को वेदों का अध्ययन कर वेद मर्यादाओं का पालन कर ऋषि दयानन्द के ऋण को चुकाना चाहिये। इसी में नारी जाति का हित है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

सत्य के पुजारी दयानंद

ॠषि दयानंद सरस्वती जी अपने गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से दीक्षित हो कर, गुरु को वेद विद्या के प्रचार का आश्वासन दिया और प्रचार के क्षेत्र में प्रवेश से पूर्व सुनियोजित ढंग से रणनीति निश्चित की, अनेकों मत मतान्तरों के धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय तो गुरु चरणों में बैठ कर ही कर लिया था। अब सभी ग्रन्थों का सार-निचोड़ लगाना सरल था। वेद और ॠषिओं ने आदि काल में मनुष्यों को सत्यं वद धर्मं चर का उपदेश किया है। इसका अर्थ है कि सत्य बोलो, धर्म पर चलो। इससे संकेत मिलता है कि सत्य बोलना व सत्य का आचरण करना धर्म कहलाता है।


अब सत्य व असत्य के स्वरुप पर ऋषि विचार करते हैं कि सत्य किसी पदार्थ के यथार्थ व वास्तविक स्वरूप को कहते हैं । अन्त में सभी ग्रन्थों के सार के अनुसार महर्षि दयानन्द सरस्वती जी धर्म का सार संक्षेप व सरल भाषा में करते हैं कि -जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है उसी का नाम धर्म हैं |” उपनिषदकार भी सत्य की परिभाषा करते हुए लिखते हैं—- सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं | सत्य से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं, इसलिए सत्य का ही व्यवहार करना चाहिए | धर्म उन सत्य कर्तव्य कर्मों का नाम है, जिनका पालन करके व्यक्ति इस संसार में सब प्रकार की भौतिक उन्नति कर सकता है तथा मोक्ष पा सकता है |

हमारे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि :- धर्म को जानने वाला दुर्लभ होता है, उसे श्रेष्ठ तरीके से बताने वाला उससे भी दुर्लभ, श्रद्धा से सुनने वाला उससे दुर्लभ, और धर्म का आचरण करने वाला सुबुद्धिमान सबसे दुर्लभ है। इन दुर्लभ सुबुद्धिमानों की शृंखला में ॠषि दयानंद सरस्वती जी को विभूषित किया जा सकता है। सत्य के प्रति पूर्णतः समर्पित व्यक्ति दयानंद सरस्वती जी ने सत्य से बढ़कर कोई धर्म स्वीकार नहीं किया। सत्य और दयानंद एक दूसरे में इतना घुल मिल गए कि कोई भी प्रलोभन सत्य पथ के पथिक को डिगा नहीं सका। ॠषि जी को अनेकों प्रलोभन दिए | उन्हें मठाधीश बनाने के प्रलोभन भी दिए गये परन्तु सत्य के प्रति निष्ठा व श्रद्धा ने इतना कहने का साहस व बल दिया कि मेरी उँगलियों को चाहे बत्ती बना कर जला दिया जाए फिर भी मैं सत्य के साथ समझौता नहीं करूंगा |” सच्चे अर्थों में ऋषि जी प्रकाश स्तम्भ थे, प्रकाश स्तम्भ वह होता है जो मार्ग दर्शक होता है, सदमार्ग जानता है, उस पर चलता है और अन्य को चलने की प्रेरणा देता है। ऋषि जीवन पर्यंत सत्य विद्या के अनुकूल जीवन जीने के साथ सारी मानव जाति को सत्य मार्ग के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए।

अपनी अमर कृति सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में ॠषि दयानंद सरस्वती जी लिखते हैं कि उनका इस ग्रंथ बनाने का प्रयोजन सत्य अर्थ का प्रकाश करना है। अर्थात् जो सत्य है उस को सत्य और जो मिथ्या है उस को मिथ्या प्रतिपादित करना है, जो जैसा है, उसको वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त रहता है, इसलिए सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता। सत्योपदेश ही मनुष्य जाति की उन्नति का कारण होता है। आर्य समाज के नियम बनाए कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। सभी काम धर्मानुसार अर्थात सत्य असत्य को विचार कर करने चाहिए।

सत्यमेव जयति नानृतं, सत्येन पन्था विततो देवयानी:।अर्थात् सर्वदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय होती है और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है।

जिस प्रकार एक पृथ्वी है, एक सूर्य है, एक ही मानव जाति है ठीक इसी प्रकार मानवीय धर्म भी एक ही है जिस का आधार सत्य है, इसके अतिरिक्त बाकी तो सब भ्रम ही है न कि सत्य या धर्म | सत्य हमारे जीवन को सरल बनाता है। सत्य से हमें सुरक्षा का भाव मिलता है। सत्यवादी कभी ऊबता या दुखी नहीं होता। सत्यवादी के जीवन में सम्पूर्ण समरसता होती है।
संसार में आज बहुत बडी समस्या चल रही है, कि सत्य क्या है और असत्य क्या ? क्या उचित है क्या अनुचित है ?क्या ग्रहण करने योग्य है ?क्या छोड़ने योग्य है? क्या क्या पढ़ने और पढाने योग्य है ? क्या हितकर है? और क्या अहितकर है? ऐसे ही हजारों शंकाओं से सामान्य जन ही नहीं अपितु बुद्धिजीवी का बहुत बड़ा वर्ग भी भ्रम जाल में फंसा हुआ है। करोड़ों व्यक्ति सत्य को न पहचान पाने के कारण अंधविश्वासों और पाखंडों में फँसकर अपना जीवन, धन तथा शक्ति नष्ट कर रहे हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के लिखे सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में सत्य और असत्य को ठीक प्रकार से जानने के लिए पाँच प्रकार से परीक्षा करनी चाहिए।-
पहली जो जो ईश्वर के गुण-कर्म-स्वाभाव और वेदों के अनुकूल हो, वह वह सत्य और उससे विरूद्ध असत्य है। वेद ही सब सत्य विद्या की पुस्तक है। इस सृष्टि का कर्ता ईश्वर है और सृष्टि के उपयोग का विधि निषेधमय ज्ञान वेद है। वेद सर्वज्ञ ईश्वर के द्वारा प्रदत्त होने से निर्भांन्त एवं संशय रहित है, इसी वेद ज्ञान के अनुसार आर्यों ने सिद्धांत निर्धारित किए और जीवनयापन किया।
दूसरी जो-जो सृष्टि क्रम के अनुकूल है, वह वह सत्य और जो जो विरूद्ध है, वह सब असत्य है। सृष्टि की रचना और उसका संचालन ईश्वरीय व्यवस्था और प्राकृतिक नियमों के अधीन है। ये सभी नियम त्रिकालाबाधित है। प्रत्येक पदार्थ के गुण-कर्म-स्वाभाव सदा एक से रहते हैं। अभाव से भाव की उत्पत्ति अथवा असत् का सदभाव, कारण के बिना कार्य, स्वाभाविक गुणों का परित्याग, जड़ से चैतन्य की उत्पत्ति अथवा चेतन का जड़ रूप होना, ईश्वर का जीवों की भांति शरीर धारण करना आदि सब सृष्टि क्रम के विरुद्ध होने से असत्य है।
तीसरी आप्त अर्थात जो यथार्थ वक्ता, धार्मिक, सबके सुख के लिए प्रयत्नशील रहता है। ऐसा व्यक्ति छल कपट और स्वार्थ आदि दोषों से रहित होता है और धार्मिक और विद्वान होता है और सदा सत्य का ही उपदेश करने वाला होता है। सब पर कृपादृष्टि रखते हुए सब के सुख के लिए अविद्या अज्ञान को दूर करना ही अपना कर्तव्य समझता है। ऐसे वेदानुकूल विद्या का ही उपदेश करने वाले आप्त के कथन अनुकरणीय होते हैं। इस लिए कहा जाता है कि सत्यज्ञानी, सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारी और जो पक्षपात रहित विद्वान जिसकी कथनी और करनी एक जैसी हो, उसकी बात सब को मन्तव्य होती है।
चौथी मनुष्य का आत्मा सत्य-असत्य को जानने वाला है तथापि अपने हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोषों के कारण सत्य को छोड़ असत्य में झुक जाता है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार मनुष्य का आत्मा सत्य-असत्य को जानने वाला है, अर्थात् आत्मा में सत्य और असत्य का विवेक करने की शक्ति है। अपने आत्मा की पवित्रता, विद्या के अनुकूल अर्थात जैसा अपने आत्मा को सुख प्रिय और दु:ख अप्रिय है,ऐसी ही भावना सम्पूर्ण प्राणी मात्र में रखनी चाहिए। अर्थात् जिस आचरण को, व्यवहार को हम अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के साथ कभी भी नहीं करना चाहिए| धर्म और सत्य का सार-निचोड़ यही है, इसे ही सुनना और सुनकर इस पर ही आचरण करना मानव जाति का प्रथम कर्तव्य है |
पाँचवी आठों प्रमाण अर्थात प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापति, सम्भव और अभाव से प्रतिपादित होना चाहिए|
दयानंद सरस्वती जी की शिक्षा व्यक्ति को एक परिपूर्ण मानव बना सकती है। व्यक्ति जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के भेदों से ऊपर उठकर मनुष्य मात्र की एकता के लिए सदा ही प्रयास शील बन जाते हैं। जीवन और जगत के प्रति हमारी सोच अधिकाधिक वैज्ञानिक होती चली जाती है। हम इसी बात को सत्य मानेंगे जो युक्ति, तर्क और विवेक की कसौटी पर खरी उतरती है। इसे ही ॠषि दयानंद सरस्वती जी ने सृष्टि क्रम से अविरूद्ध होना कहा है। मिथ्या चमत्कारों और ऐसे चमत्कार दिखाने वाले ढोंगी बाबाओं के चक्कर में दयानंद जी के अनुयायी कभी नहीं आते। वैदिक सतग्रंथो के अध्ययन में व्यक्ति की रूचि बढ़ेती है, फलतः बौद्धिक क्षितिज विस्तृत होता है और विश्व बंधुता बढ़ती है। महर्षि ने वेदों के सनातन चिन्तन को आधार बनाकर नियम बना दिया कि वेद सब सत्य विद्या की पुस्तक है, सत्य को जीवन का आधार बना कर जीवन जीने की जो शैली निर्मित की उस पर स्वयं चले और सामान्य जनों को उस पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनका तेजस्वी और आचरणीय व्यक्तित्व आम आदमी में स्फूर्ति भरने वाला था। सत्य के तेज़ से ॠषि दयानंद के व्यक्तित्व से प्रभावित स्वामी श्रद्धानंद जी लिखते हैं कि ह्रदय स्वामी जी की ओर आकर्षित होता जाता था, जैसे कि भटका हुआ जहाज़ प्रकाश पा कर तीव्रता से उधर बढ़ जाता है।
ॠषि दयानंद सरस्वती जी एक ऐसा सत्य का पूजारी, धर्म धुरंधर जिसने सभी पाखंडों का खंडन कर आर्यों को सत्य की राह दिखाई। एक ऐसा सत्य का पुजारी जो अपनी हर बात को डंके की चोट पर कहता था। एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी भी सत्य से समझोता नहीं किया, एक ऐसा महान व्यक्ति जिस ने लाखों की संपत्ति को ठोकर मार दी पर सत्य के मार्ग से विचलित नहीं हुआ। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी एक ऐसे ब्रह्मास्त्र थे जिन्हें कोई भी पंडित, पादरी, मौलवी, औघड़, ओझा, तांत्रिक हरा नहीं पाया और न ही उन पर अपना कोई मंत्र तंत्र या किसी भी प्रकार का प्रभाव छोड़ पाया।
जन सामान्य को ऋषि का संदेश बड़े ही सरल शब्दों में यह है कि व्यक्ति को सदा सच बोलने का साहस रखना चाहिए। परिणाम भुगतने की शक्ति परमात्मा देंगे। आइए संकल्प लें कि आज से ही नहीं अपितु अभी से हम केवल ऋषि दयानंद जी के सच्चाई के ही मार्ग पर चलेंगे।
ईश्वर हम सब को श्रेष्ठ बुद्धि दे कि सदा सत्य मार्ग पर चलें।
राज कुकरेजा\करनाल