Wednesday, 13 September 2017
Monday, 11 September 2017
शिक्षक दिवस पर विशेष
एक
शिष्य एक आदर्श गुरु की तलाश में भटकता भटकता रात
के 2:00 बजे एक गुरु के द्वार पर पहुंचा ।
उसने द्वार पर दस्तक दी, दरवाजा खटखटाया ।
अंदर से आवाज आई,
"कोऽसि अर्थात कौन हो ?"
शिष्य बोला, " न जानामि । मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं?"
अंदर लेटे गुरु ने समझ लिया कि यही सच्चा शिष्य है ।
मेरे लायक यही है ।
मुझे इसे बुला लेना चाहिए ।
रात को 2:00 बजे गुरु ने दरवाजा खोला और शिष्य को अंदर बुला लिया ।
शिष्य के सिर पर एक काफी बड़ी पुस्तकों की गठरी थी ।
गुरु ने कहा, "यह क्या है ?"
शिष्य बोला, "गुरुजी यह कुछ पुस्तके हैं जो मैंने अब तक पढ़ी हैं ।"
तो गुरु ने कहा, "जब आपने इतनी पुस्तकें पढ़ ली हैं तो मेरे पास क्यों आए हो ?"
शिष्य बोला,
"गुरुजी अभी मन को शांति नहीं मिली ।
इसलिए आपसे और अध्ययन करने आया हूं ।"
तो गुरुजी ने कहा, "यदि मुझ से पढ़ना चाहते हो तो इन सारी पुस्तकों को पहले यमुना में बहा आओ ।"
मित्रो! यदि आज का चेला होता तो कहता, "बड़ा घमंडी गुरु है ।
इतना अहंकार । अरे भाई मैंने इतनी पुस्तकें पढ़ी हैं । तो कुछ ना कुछ तो उनमें अच्छा होगा ही।
मैं तो ऐसा करता हूं कि किसी दूसरे गुरु के पास जाता हूं ।
मेरे लिए यह ठीक नहीं है कि इतनी कठिनाई से प्राप्त विद्या की पुस्तकों को यूँ ही फेंक आऊँ।"
लेकिन उसने ऐसा नहीं सोचा ।
वह तत्काल वहां से चला गया ।
वह यमुना के तट पर गया और उसने अपनी पुस्तकों से भरी पूरी गठरी यमुना में फेंक दी ।
और वह वहां से लौट कर गुरु के पास वापस आकर गुरु के चरणों में बैठ गया ।
गुरु ने उसको अपने गले से लगा लिया ।
गुरु बोले, "प्रभु तेरा कोटि-कोटि धन्यवाद।
जो शिष्य मुझे चाहिए था वह मुझे मिल गया ।"
गुरु ने तीन वर्ष तक शिष्य को संस्कृत व्याकरण की सारी की सारी पुस्तकें पढ़ाईं ।
अपना पूरा का पूरा ज्ञान शिष्य के मस्तिष्क में उडेल दिया।
तीन वर्ष बाद जब शिष्य की शिक्षा पूरी हो गई तब उसने सोचा कि अब मैं यहां से जाऊं ।
किंतु जाने से पहले गुरु को गुरु दक्षिणा तो देनी होती है ।
उसने सोचा कि मैं गुरु को क्या गुरु दक्षिणा दूँ?
शिष्य ने काफी परिश्रम करके एक सेर लौंग एकत्रित की ।
उस एक सेर लौंग को लेकर वह गुरु के पास पहुंचा ।
उसने कहा,
"गुरु जी यह आपकी गुरु दक्षिणा है।"
गुरु की आंखों में आंसू आ गए ।
गुरु ने कहा,
"ऐ शिष्य मेरी 3 वर्ष की मेहनत की इतनी सी गुरु दक्षिणा?
यह तो मुझे स्वीकार नहीं है ।"
शिष्य रुआंसा हो गया ।
बोला,
"गुरुजी! मेरे पास तो और कुछ नहीं है ।
जो कुछ मैं एकत्र कर सकता था यही एकत्र कर पाया ।
मेरे पास तो और कुछ नहीं ।
इसके अलावा तो मेरे पास बस मेरा यह शरीर है । इसे ले लीजिए ।"
यह कहकर शिष्य की आंखों से आंसू टपकने लगे ।
गुरु ने कहा,
"ए शिष्य मुझे यही चाहिए ।
मुझे तुम्हारा पूरा का पूरा जीवन चाहिए ।
देखो आज भारत विदेशी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है ।
अंग्रेजों के द्वारा यहां की जनता बुरी तरह पददलित है।
भारतवर्ष को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाओ।
यहां की जनता में अज्ञान का अंधकार फैला हुआ है ।
भांति-भांति के अंधविश्वासों ने प्रगति के रास्ते को रोका हुआ है ।
जाओ और अपने तर्कों से, अपने ज्ञान से
भारत देश की जनता के अज्ञान के अन्धकार को मिटाओ ।
शिष्य ने कहा,"गुरु जी ऐसा ही होगा। मैं अपना पूरा जीवन इस देश की जनता की सेवा में लगाऊँगा । अज्ञान के अंधकार को उखाड़ फेंकूँगा ।और इस देश को ऐसा सत्य ज्ञान दूंगा जिसे प्राप्त कर ऐसे शूरवीर पैदा होंगे जो इस देश से अंग्रेजों को बाहर निकाल सकेंगे ।
गुरु जी आप के आदेश का मैं पूरा पालन करूंगा । पूरे जीवन भर पालन करूंगा ।
यह कहकर शिष्य ने गुरु से भरी आँखों से विदा ली और अपना पूरा जीवन अपनी प्रतिज्ञा के पालन में लगाया ।
आप पूछेंगे कि यह शिष्य और यह गुरु कौन थे ?
मित्रो! यह शिष्य थे स्वामी दयानंद सरस्वती ।
और यह गुरु थे प्रज्ञा चक्षु स्वामी विरजानंद सरस्वती ।
स्वामी विरजानंद ने स्वामी दयानंद को वह ज्ञान दिया जिससे उनके ज्ञान चक्षु खुल गए ।
उन्हें सत्य और असत्य का बोध हो गया ।
अच्छे और बुरे का ज्ञान हो गया ।
अपने और पराए का ज्ञान हो गया ।
विदेशी और स्वदेशी के महत्व का ज्ञान हो गया ।
इसके आधार पर उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी ।
प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने यह लड़ाई नहीं लड़ी ।
क्योंकि वह जानते थे कि यदि प्रत्यक्ष रूप में लड़ाई लड़ेंगे तो उनको पकड़ लिया जाएगा ।
और उनका समाज सुधार का कार्य अधूरा रह जाएगा ।
उन्होंने समस्त विश्व का पथ प्रदर्शन करने वाली सत्यार्थ प्रकाश नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी ।
सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने लिखा कि
विदेशी राजा चाहे कितना ही न्यायप्रिय,
कितना ही सत्यनिष्ठ क्यों न हो
किंतु स्वदेशी राजा सदा
विदेशी राजा से अच्छा होता है ।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लेकर असंख्य नौजवानों ने देश के लिए मर मिटने की कसम खाई ।
इनमें थे पंजाब केसरी लाला लाजपतराय,
शहीदे आजम सरदार भगत सिंह,
अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल,
अशफाक उल्ला खान,
चंद्रशेखर आजाद
और ऐसे ही असंख्य नौजवान ।
इन सब ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी ।
मैं आपको बता दूं कि जिन लगभग सात लाख (7,00,000) देशभक्त शूरवीरों ने अपने प्राणों की आहुति अपने देश को आजाद कराने के लिए दी
उन में से 85 प्रतिशत से अधिक स्वामी दयानंद के विचारों से प्रभावित थे
या कहें कि स्वामी दयानंद के शिष्य थे ।
धन्यवाद उस महान गुरु स्वामी विरजानंद का ।
और धन्यवाद उस श्रेषठतम शिष्य
विश्व गुरु स्वामी दयानंद का ।
उसने द्वार पर दस्तक दी, दरवाजा खटखटाया ।
अंदर से आवाज आई,
"कोऽसि अर्थात कौन हो ?"
शिष्य बोला, " न जानामि । मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं?"
अंदर लेटे गुरु ने समझ लिया कि यही सच्चा शिष्य है ।
मेरे लायक यही है ।
मुझे इसे बुला लेना चाहिए ।
रात को 2:00 बजे गुरु ने दरवाजा खोला और शिष्य को अंदर बुला लिया ।
शिष्य के सिर पर एक काफी बड़ी पुस्तकों की गठरी थी ।
गुरु ने कहा, "यह क्या है ?"
शिष्य बोला, "गुरुजी यह कुछ पुस्तके हैं जो मैंने अब तक पढ़ी हैं ।"
तो गुरु ने कहा, "जब आपने इतनी पुस्तकें पढ़ ली हैं तो मेरे पास क्यों आए हो ?"
शिष्य बोला,
"गुरुजी अभी मन को शांति नहीं मिली ।
इसलिए आपसे और अध्ययन करने आया हूं ।"
तो गुरुजी ने कहा, "यदि मुझ से पढ़ना चाहते हो तो इन सारी पुस्तकों को पहले यमुना में बहा आओ ।"
मित्रो! यदि आज का चेला होता तो कहता, "बड़ा घमंडी गुरु है ।
इतना अहंकार । अरे भाई मैंने इतनी पुस्तकें पढ़ी हैं । तो कुछ ना कुछ तो उनमें अच्छा होगा ही।
मैं तो ऐसा करता हूं कि किसी दूसरे गुरु के पास जाता हूं ।
मेरे लिए यह ठीक नहीं है कि इतनी कठिनाई से प्राप्त विद्या की पुस्तकों को यूँ ही फेंक आऊँ।"
लेकिन उसने ऐसा नहीं सोचा ।
वह तत्काल वहां से चला गया ।
वह यमुना के तट पर गया और उसने अपनी पुस्तकों से भरी पूरी गठरी यमुना में फेंक दी ।
और वह वहां से लौट कर गुरु के पास वापस आकर गुरु के चरणों में बैठ गया ।
गुरु ने उसको अपने गले से लगा लिया ।
गुरु बोले, "प्रभु तेरा कोटि-कोटि धन्यवाद।
जो शिष्य मुझे चाहिए था वह मुझे मिल गया ।"
गुरु ने तीन वर्ष तक शिष्य को संस्कृत व्याकरण की सारी की सारी पुस्तकें पढ़ाईं ।
अपना पूरा का पूरा ज्ञान शिष्य के मस्तिष्क में उडेल दिया।
तीन वर्ष बाद जब शिष्य की शिक्षा पूरी हो गई तब उसने सोचा कि अब मैं यहां से जाऊं ।
किंतु जाने से पहले गुरु को गुरु दक्षिणा तो देनी होती है ।
उसने सोचा कि मैं गुरु को क्या गुरु दक्षिणा दूँ?
शिष्य ने काफी परिश्रम करके एक सेर लौंग एकत्रित की ।
उस एक सेर लौंग को लेकर वह गुरु के पास पहुंचा ।
उसने कहा,
"गुरु जी यह आपकी गुरु दक्षिणा है।"
गुरु की आंखों में आंसू आ गए ।
गुरु ने कहा,
"ऐ शिष्य मेरी 3 वर्ष की मेहनत की इतनी सी गुरु दक्षिणा?
यह तो मुझे स्वीकार नहीं है ।"
शिष्य रुआंसा हो गया ।
बोला,
"गुरुजी! मेरे पास तो और कुछ नहीं है ।
जो कुछ मैं एकत्र कर सकता था यही एकत्र कर पाया ।
मेरे पास तो और कुछ नहीं ।
इसके अलावा तो मेरे पास बस मेरा यह शरीर है । इसे ले लीजिए ।"
यह कहकर शिष्य की आंखों से आंसू टपकने लगे ।
गुरु ने कहा,
"ए शिष्य मुझे यही चाहिए ।
मुझे तुम्हारा पूरा का पूरा जीवन चाहिए ।
देखो आज भारत विदेशी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है ।
अंग्रेजों के द्वारा यहां की जनता बुरी तरह पददलित है।
भारतवर्ष को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाओ।
यहां की जनता में अज्ञान का अंधकार फैला हुआ है ।
भांति-भांति के अंधविश्वासों ने प्रगति के रास्ते को रोका हुआ है ।
जाओ और अपने तर्कों से, अपने ज्ञान से
भारत देश की जनता के अज्ञान के अन्धकार को मिटाओ ।
शिष्य ने कहा,"गुरु जी ऐसा ही होगा। मैं अपना पूरा जीवन इस देश की जनता की सेवा में लगाऊँगा । अज्ञान के अंधकार को उखाड़ फेंकूँगा ।और इस देश को ऐसा सत्य ज्ञान दूंगा जिसे प्राप्त कर ऐसे शूरवीर पैदा होंगे जो इस देश से अंग्रेजों को बाहर निकाल सकेंगे ।
गुरु जी आप के आदेश का मैं पूरा पालन करूंगा । पूरे जीवन भर पालन करूंगा ।
यह कहकर शिष्य ने गुरु से भरी आँखों से विदा ली और अपना पूरा जीवन अपनी प्रतिज्ञा के पालन में लगाया ।
आप पूछेंगे कि यह शिष्य और यह गुरु कौन थे ?
मित्रो! यह शिष्य थे स्वामी दयानंद सरस्वती ।
और यह गुरु थे प्रज्ञा चक्षु स्वामी विरजानंद सरस्वती ।
स्वामी विरजानंद ने स्वामी दयानंद को वह ज्ञान दिया जिससे उनके ज्ञान चक्षु खुल गए ।
उन्हें सत्य और असत्य का बोध हो गया ।
अच्छे और बुरे का ज्ञान हो गया ।
अपने और पराए का ज्ञान हो गया ।
विदेशी और स्वदेशी के महत्व का ज्ञान हो गया ।
इसके आधार पर उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी ।
प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने यह लड़ाई नहीं लड़ी ।
क्योंकि वह जानते थे कि यदि प्रत्यक्ष रूप में लड़ाई लड़ेंगे तो उनको पकड़ लिया जाएगा ।
और उनका समाज सुधार का कार्य अधूरा रह जाएगा ।
उन्होंने समस्त विश्व का पथ प्रदर्शन करने वाली सत्यार्थ प्रकाश नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी ।
सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने लिखा कि
विदेशी राजा चाहे कितना ही न्यायप्रिय,
कितना ही सत्यनिष्ठ क्यों न हो
किंतु स्वदेशी राजा सदा
विदेशी राजा से अच्छा होता है ।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लेकर असंख्य नौजवानों ने देश के लिए मर मिटने की कसम खाई ।
इनमें थे पंजाब केसरी लाला लाजपतराय,
शहीदे आजम सरदार भगत सिंह,
अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल,
अशफाक उल्ला खान,
चंद्रशेखर आजाद
और ऐसे ही असंख्य नौजवान ।
इन सब ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी ।
मैं आपको बता दूं कि जिन लगभग सात लाख (7,00,000) देशभक्त शूरवीरों ने अपने प्राणों की आहुति अपने देश को आजाद कराने के लिए दी
उन में से 85 प्रतिशत से अधिक स्वामी दयानंद के विचारों से प्रभावित थे
या कहें कि स्वामी दयानंद के शिष्य थे ।
धन्यवाद उस महान गुरु स्वामी विरजानंद का ।
और धन्यवाद उस श्रेषठतम शिष्य
विश्व गुरु स्वामी दयानंद का ।
उजड़ रही है हिंदी
एक समय था जब हिन्दी और संस्कृत बोलने वालों में भाषायी दूरी हुआ करती थी, संस्कृत बोलने वाले हिन्दी बोलने वालों
को खुद की अपेक्षा कम ज्ञानी समझा करते थे। आज कुछ ऐसा ही हाल हिन्दी और अंग्रेजी
भाषा के बीच खड़ा हो गया है। कुछ इस तरह कि अगर कोई अंग्रेजी बोल रहा है तो
पढ़ा-लिखा विद्वान ही होगा। कुछ लोगों का कहना है कि शु( हिन्दी बोलना बहुत कठिन है, सरल तो केवल अंग्रेजी बोली जाती है।
अंग्रेजी जितनी कठिन होती जाती है उतनी ही खूबसूरत होती जाती है, आदमी उतना ही जागृत व पढ़ा-लिखा होता
जाता है। आधुनिकीरण के इस दौर में या वैश्वीकरण के नाम पर जितनी अनदेखी और दुर्गति
हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं की हुई है उतनी शायद ही किसी देश की भाषा की हुई हो।
घर में अतिथि आये तो बच्चां से कहते है बेटा अंकल को हलो बोलो और जब जाये तो बेटा
बाय बोलो।
चौदह सितम्बर समय आ गया है एक और हिन्दी दिवस मनाने का, आज हिन्दी के नाम पर कई सारे पाखण्ड
होंगे जैसेकि कई सारे सरकारी आयोजन हिन्दी में काम को बढ़ावा देने वाली घोषणाएँ
विभिन्न तरह के सम्मेलन होंगे हिन्दी की दुर्दशा पर अंग्रेजी में घड़ियाली आँसू
बहाए जाएँगे, हिन्दी
में काम करने की झूठी शपथें ली जाएँगी और पता नहीं क्या-क्या होगा। अगले दिन लोग
सब कुछ भूल कर लोग अपने-अपने काम में लग जाएँगे और हिन्दी वहीं की वहीं ठुकराई हुई
रह जाएगी।
ये सिलसिला आजादी के बाद से निरंतर चलता चला आ रहा है और भविष्य में भी
चलने की पूरी-पूरी संभावना है वास्तव में हिन्दी तो केवल उन लोगों की कार्य भाषा
है जिनको या तो अंग्रेजी आती नहीं है या फिर कुछ पढ़े-लिखे लोग जिनको हिन्दी से कुछ
ज्यादा ही मोह है और ऐसे लोगों को सिरफिरे पिछड़े या बेवकूफ की संज्ञा से सम्मानित
कर दिया जाता है। सच तो यह है कि ज्यादातर भारतीय अंग्रेजी के मोहपाश में बुरी तरह
से जकड़े हुए हैं। आज स्वाधीन भारत में अंग्रेजी में निजी पारिवारिक पत्र व्यवहार
बढ़ता जा रहा है काफी कुछ सरकारी व लगभग पूरा गैर सरकारी काम अंग्रेजी में ही होता
है, दुकानों
आदि के बोर्ड अंग्रेजी में होते हैं, होटलों रेस्टारेंटों इत्यादि के मेनू
अंग्रेजी में ही होते हैं। ज्यादातर नियम कानून या अन्य काम की बातें किताबें
इत्यादि अंग्रेजी में ही होते हैं, उपकरणों
या यंत्रों को प्रयोग करने की विधि अंग्रेजी में लिखी होती है, भले ही उसका प्रयोग किसी अंग्रेजी के
ज्ञान से वंचित व्यक्ति को करना हो। अंग्रेजी भारतीय मानसिकता पर पूरी तरह से हावी
हो गई है।
माना कि आज के युग में अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है, कई सारे देश अपनी युवा पीढ़ी को
अंग्रेजी सिखा रहे हैं पर इसका मतलब ये नहीं है कि उन देशों में वहाँ की भाषाओं को
ताक पर रख दिया गया है और ऐसा भी नहीं है कि अंग्रेजी का ज्ञान हमको दुनिया के
विकसित देशों की श्रेणी में ले आया है। सिवाय सूचना प्रौद्योगिकी के हम किसी और
क्षेत्र में आगे नहीं हैं और सूचना प्रौद्योगिकी की इस अंधी दौड़ की वजह से बाकी के
प्रौद्योगिक क्षेत्रों का क्या हाल हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। दुनिया के
लगभग सारे मुख्य विकसित व विकासशील देशों में वहाँ का काम उनकी भाषाओं में ही होता
है। यहाँ तक कि कई सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अंग्रेजी के अलावा और भाषाओं के
ज्ञान को महत्व देती है। केवल हमारे यहाँ ही हमारी भाषाओं में काम करने को हीन
भावना से देखा जाता है।
भारतीय भाषाओं के माध्यम के विद्यालयों का आज जो हाल है वह किसी से छुपा
नहीं है। सरकारी व सामाजिक उपेक्षा के कारण ये स्कूल आज केवल उन बच्चों के लिए हैं
जिनके पास या तो कोई और विकल्प नहीं है जैसे कि ग्रामीण क्षेत्र या फिर आर्थिक
तंगी। इन स्कूलों में न तो अच्छे अध्यापक हैं न ही कोई सुविधाएँ तो फिर कैसे हम इन
विद्यालयों के छात्रों को कुशल बनाने की उम्मीद कर सकते हैं। भारत आज खुद को सुचना
प्रौद्योगिकी का राजा कहता है किन्तु कहलाने के बाद भी हम हमारी भाषाओं में काम
करने वाले कम्प्यूटर विकसित नहीं कर पाए हैं। किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति को अपनी
मातृभाषा की लिपि में लिखना तो आजकल शायद ही देखने को मिले। बच्चों को हिन्दी की
गिनती या वर्णमाला का मालूम होना अपने आप में एक चमत्कार ही सि( होगा। क्या
विडंबना है? क्या यही
हमारी आजादी का प्रतीक है? मानसिक
रूप से तो हम अभी भी अंग्रेजियत के गुलाम हैं।
प्रश्न सिर्फ भाषा का नहीं है प्रश्न आत्मसम्मान का, अपनी भाषा का, अपनी संस्कृति का है। वर्तमान अंग्रेजी
केंद्रित शिक्षा प्रणाली से न सिर्फ हम समाज के एक सबसे बड़े तबके को ज्ञान से
वंचित कर रहे हैं बल्कि हम समाज में लोगों के बीच आर्थिक सामाजिक व वैचारिक दूरी
उत्पन्न कर रहे हैं, लोगों को
उनकी भाषा, उनकी
संस्कृति से विमुख कर रहे हैं। लोगों के मन में उनकी भाषाओं के प्रति हीनता की
भावना पैदा कर रहे हैं जोकि सही नहीं है। समय है कि हम जागें व इस स्थिति से उबरें
व अपनी भाषाओं को सुदृढ़ बनाएँ व उनको राज की भाषा, शिक्षा की भाषा, काम की भाषा व व्यवहार की भाषा बनाएँ
फिर हम हिन्दी दिवस की प्रतीक्षा में नहीं रहेंगे। आर्य समाज
Friday, 8 September 2017
आत्म ज्ञान से हीन मनुष्य इन्द्रियों के विषयों में फंसा रहता है
बुद्धिपूर्वक अर्थात् ज्ञानपूर्वक कर्म करने वाले प्राणियों को मनुष्य
कहते हैं। मनुष्य की पहचान उसके पास बुद्धि अर्थात् सत्य व असत्य अथवा उचित
व अनुचित का बोध कराने वाली शक्ति होती है। हमारी यह बुद्धि भी ज्ञान व
अज्ञान से युक्त हुआ करती है। अज्ञान इसमें स्वतः होता है और ज्ञान से
युक्त करने के लिए इसे माता-पिता व आचार्यों की शिक्षा की आवश्यकता होती
है। माता-पिता व आचार्यों में जो ज्ञान व क्षमता होती है उसी के अनुरूप ही
सन्तान वा शिष्य की बुद्धि की उन्नति हो सकती है। बहुत से लोग सत्य व असत्य
के स्वरूप को यथार्थ रूप में जानने वाले आचार्यों के सान्निध्य को प्राप्त
नहीं हो पाते जिससे उनकी बुद्धि का यथार्थ विकास नहीं हो पाता। आजकल की
शिक्षा की बात करें तो इसमें मनुष्य को अक्षर ज्ञान सहित व्याकरण एवं
अनेकानेक विषयों का ज्ञान कराया जाता है। कला, विज्ञान, चिकित्सा,
इंजीनियरिंग, गणित, सामाजिक ज्ञान, राजनीतिक ज्ञान, अर्थशास्त्र,
मनोविज्ञान आदि अनेकानेक विषय होते हैं जिनका अध्ययन किया व कराया जाता है।
इन सभी विषयों में आचार्य व अध्यापक को यह पता ही नहीं होता।
विद्यार्थियों को विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में भी ईश्वर,
जीवात्मा, मनुष्य जीवन, मनुष्य के कर्तव्य, जीवन का उद्देश्य,
शुभकर्म-अशुभकर्म-अकर्म-दुष्कर्म आदि क्या हैं, इनका ज्ञान सम्मिलित नहीं
होता है। इन आवश्यक विषयों का ज्ञान न कराये जाने से मनुष्य का सन्तुलित
विकास नहीं हो पाता। उसका ज्ञान एकांगी होता है और उसी को वह पूर्ण ज्ञान
मान लेता है जिससे उसके जीवन में अनेक अनर्थ होते हैं।
विद्यालय में पढ़ाये जाने वाले विषयों से उसे ईश्वर, आत्मा, समाज व देश,
माता-पिता-आचार्य व पर्यावरण के प्रति आज के शिक्षित व्यक्ति को अपने
कर्तव्यों का भली प्रकार से ज्ञान नहीं होता। ईश्वर और जीवात्मा का ज्ञान न
होने से समाज में अविद्या और अज्ञान का प्रसार होता है। इससे मनुष्य
भ्रमों का शिकार होता है और दुष्ट व चतुर लोग उसका भावनात्मक शोषण सहित
आर्थिक व अन्य प्रकार का व अनेक प्रकार से शोषण करते हैं। उनके द्वारा
ईश्वर और आत्मा विषयक अनेक भ्रम फैलाये जाते हैं। अवतारवाद, मूर्तिपूजा,
मृतक श्राद्ध, फलित-ज्योतिष, सामाजिक असमानता, जन्मना जाति प्रथा, छुआछूत,
असमान शिक्षा, बाल विवाह, विधवाओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध व
पुनर्विवाह में अड़चनें आदि कुछ अल्पज्ञानी व अज्ञानियों की देश व समाज के
लिए हानिकारक देनें हैं। इन सबका धर्म विषयों में परम प्रमाण ईश्रीय ज्ञान
वेद से विरोध है जिसे ऋषिकृत वेदभाष्य का अध्ययन करके ही जाना जा सकता है। ।
यह सभी बातें युक्ति व तर्क से भी सिद्ध नहीं होती हैं। सत्यार्थप्रकाश
ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने इनकी असलियत को बताया है। इसी कारण से समाज में
अविद्या व अन्धविश्वास फैले हैं व बढ़ रहे हैं। यदि मनुष्य को ईश्वर व
जीवात्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान हो तो वह इन भ्रमों में नहीं फंसता।
ईश्वर व जीवात्मा का यथार्थ स्वरूप जानकर ही देश व समाज यथार्थ रूप में
उन्नति करते हैं। इस आध्यात्मिक ज्ञान से ही मनुष्य अपने कर्तव्यों को
जानकर अपने जीवन के लक्ष्य “दुःखों की निवृत्ति वा मुक्ति” की प्राप्ति की ओर बढ़ते हुए अपने जीवन में सुख, शान्ति व समृद्धि को प्राप्त होते हैं।
महाभारत काल से पूर्व देश में अज्ञान व अंधविश्वासों की ऐसी स्थिति नहीं
थी जैसी कि वर्तमान में है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल तक देश में ऋषि
मुनियों द्वारा निर्धारित वैदिक शिक्षा का प्रचार था जिसमें अन्य सभी
विषयों के साथ ईश्वर, जीव व सृष्टि का यथार्थ ज्ञान कराया जाता था। लगभग
150 वर्ष पूर्व देश अज्ञान व अविद्या के तिमिर से पूर्णरूपेण आच्छादित हो
गया था जिसके परिणामों में परतन्त्रता व ईश्वर की मिथ्या पूजा सहित समाज के
सभी क्षेत्रों में मिथ्याचार का बोलबाला था। ऐसे समय में ही सन् 1863 में
ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने अपने अपूर्व विद्या व योग बल से
अज्ञान व अविद्या को हटाया और मनुष्य को उसके सच्चे आत्मस्वरूप सहित ईश्वर,
सृष्टि, उसके कर्तव्यों व लक्ष्यों से परिचित कराया। उनका अपना जीवन इन
सभी का आदर्श रूप था। अविद्या, अज्ञान, अंधविश्वास व सामाजिक कुरीतियों से
वह सर्वथा मुक्त थे। सच्चे वेदभक्त और ईश्वरोपासक सहित सच्चे देशभक्त,
आजादी के प्रेरक व समाज सुधारक थे और देश को सुख व समृद्धि की ओर लेकर चले
थे। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक, वेदभाष्य, संस्कारविधि,
आर्याभिविनय आदि उनके ग्रन्थ देश को उन्नति की चरम अवस्था में ले जाने वाले
सत्य विद्या के ग्रन्थ व मनुष्य व देशोन्नति के रोडमैप थे व हैं।
आज की शिक्षा मनुष्य को आत्मज्ञान प्रदान नहीं करती। कठोपनिषद 3/5 श्लोक ‘‘यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दृष्टाश्वा इव सारथेः।।”
में कहा है कि जो मनुष्य आत्म-ज्ञान-विज्ञान से हीन होता है वह विषयों में
फंसा रहता है। आत्मज्ञान न होने से उसका मन चित्त की वृत्तियों को
नियंत्रण में नहीं रख पाता। उसकी सभी इन्द्रियां अनियंत्रित रहती हैं। जिस
प्रकार से किसी रथ में लगे अनियंत्रित घोड़ों से लक्ष्य पर नहीं पहुंचा जा
सकता वही दशा आत्मज्ञान से रहित मनुष्य की होती है। वह अपने लक्ष्य
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति से वंचित रहता है। अतः जीवन में अन्य सभी
प्रकार के लौकिक ज्ञान के समान ईश्वर व जीवात्मा विषयक आध्यात्मिक ज्ञान की
भी आवश्यकता मनुष्य को है जिसका मूल वेद में है और उसी का प्रकाश हमारे
ऋषियों ने उपनिषदों व दर्शनों में किया है। कठोपनिषद बताती है कि आत्मज्ञान
से हीन मनुष्य का मन और इन्द्रियां उसके वश में नहीं रहती और, अज्ञानतावश
सन्मार्ग में न चलने के कारण वह अपने वास्तविक लक्ष्य पर नहीं पहुंच पाती
हैं। इस स्थिति का सुधार आत्म ज्ञान प्राप्त करके ही किया जा सकता है।
आत्मज्ञान क्या है? इसका विचार करने पर ज्ञात होता है हम न केवल जड़ शरीर
हैं और न केवल चेतन जीवात्मा। हम चेतन पदार्थ जीवात्मा और जड़ पदार्थों से
निर्मित शरीर के संयुक्त रूप हैं। जीवात्मा अनादि, अविनाशी, शाश्वत्, अजर,
अमर, नित्य, एकदेशी, ससीम व अल्पज्ञ है जबकि हमारा शरीर अनित्य, मरणधर्मा व
नाशवान है। शरीर जन्मा है अतः कुछ काल बाद इसकी मृत्यु होना अवश्यम्भावी
है। अतः हमारा कर्तव्य बनता है कि हम शरीर को रोगों से मुक्त रखने, इसे
स्वस्थ व बलवान रखने के उपाय करें और अपने शरीर से अधिक से अधिक काम लें।
यह शरीर हमें कर्म करने के लिए मिला है। हम जो कर्म करते हैं वह शुभ व
अशुभ दो प्रकार के होते हैं। अशुभ कर्मों का परिणाम दुःख और शुभ कर्मों का
परिणाम सुख होता है। वेदों में अशुभ वा पाप कर्म करने का निषेध व शुभ
अर्थात् पुण्य कर्म करने की प्रेरणा है। शुभ कर्म व कर्तव्यों में ईश्वर व
जीवात्मा का ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करना
मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है। वायु, जल व पर्यावरण की शुद्धि हेतु देवयज्ञ
अग्निहोत्र करना दूसरा आवश्यक कर्तव्य है। इसी प्रकार पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ
तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ करना, यह सब मिलकर पंचमहायज्ञ हैं जिन्हें सभी
गृहस्थियों को करना होता है। ईश्वरोपासना का एक अंग स्वाध्याय भी है।
ईश्वरोपासना में ईश्वर व जीवात्मा के चिन्तन सहित इन विषयों का स्वाध्याय
भी किया जाता है जिससे मनुष्य आत्मज्ञान से हीन न होकर आत्मज्ञान से
संयुक्त हो जाता है और इस संसार, ईश्वर व जीवात्मा को यथार्थ रूप में जान
लेता है। इससे उसकी अविद्या दूर होती है। ऐसा व्यक्ति ही पांच ज्ञान
इन्द्रियां के विषयों से अपने आप को दूर रखकर, उनसे विमुख होकर वा उनके
अनुचित प्रभाव से बचते हुए, अपने जीवन को परमार्थ में लगा सकता है।
इन्द्रियों के किसी एक व सभी विषयों में फंसे मनुष्य से ठीक विपरीत यह
स्थिति होती है। आत्मज्ञान हो जाने पर मनुष्य का मन चित्त की वृत्तियों
अर्थात् इन्द्रियों के विषयों से मन को रोक उन पर नियंत्रण कर लेता है।
उसकी सभी इन्द्रियां पूरी तरह से उसके वश में हो जाती हैं। यही मनुष्य जीवन
की सफलता कही जा सकती है। ऋषि दयानन्द ऐसे ही मनुष्य हुए हैं। इन गुणों से
युक्त अन्य कोई विद्वान व नेता इतिहास में हमें दिखाई नहीं देता। यदि हुए
हैं तो वह राम, कृष्ण, चाणक्य जी आदि ही प्रतीत होते हैं।
उपनिषद का सन्देश है कि हम अपनी आत्मा व ईश्वर को भी यथार्थ रूप में
जाने। इसी से हमारा मन व इन्द्रियां वश में होंगी, हम दुष्कर्मों से
बचेंगे, ईश्वर में हमारा मन लगेगा, आत्मा के सम्पूर्ण दुर्गुण, दुर्व्यस्न
और दुःख दूर होंगे। मनुष्य जीवन की यह अवस्था ही सफल अवस्था कही जहा सकती
है। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
गुरु विरजानन्द और ऋषि दयानन्द
स्वामी दयानन्द ने अपने गुरु को विद्या का
सूर्य कहा है। यह बात वही कह सकता है जो स्वयं विद्या का सूर्य हो और
विद्या की सभी बारीकियों व सूक्ष्मताओं को बखूबी समझता हो। स्वामी दयानन्द
का जीवन इस बात का प्रमाण है कि वह महाभारत काल के बाद विश्व भर में
उत्पन्न वैदिक विद्वानों में अनेक बातों में अपूर्व एवं अतुलनीय हैं।
उन्होंने वेदों पर प्रवचन, शास्त्रार्थ, सत्यार्थप्रकाश तथा
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों के लेखन द्वारा अपनी जिस विद्वता का
परिचय दिया है उससे वह महाभारत काल से आज तक हुए सभी वैदिक विद्वानों में
अपूर्व व अनुपम हैं। यह भी हमारा अनुमान है कि उनका यह स्टेटस वा स्तर सदैव
बना रहेगा। स्वामी दयानन्द की यह मान्यता वैदिक साहित्य के अध्ययन व वेदों
के भाष्य में विशेष महत्व रखती है कि वेदों के शब्द लौकिक व रूढ़ नहीं
अपितु यौगिक व धातुज हैं जिनके एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं और वह अर्थ
प्रसंगानुसार व वेद मन्त्र के देवता, छंद, स्वर तथा व्याकरण सहित निरुक्त
के निर्वचनों को ध्यान में रखकर संगतिपूर्ण ही होने चाहिये जैसे कि
उन्होंने स्वयं किये हैं। स्वामी दयानन्द जी का वेदभाष्य और उनके बताये
सिद्धान्त विद्वत जगत के सम्मुख हैं और उनके पूर्व भाष्यकारों के वेदों के
पूर्ण व आंशिक भाष्य भी उपलब्ध हैं जिनकी स्वयं स्वामी दयानन्द जी ने
समीक्षा कर अपने पूर्ववर्तीं वेदभाष्यकारों की अनेक बातों व मान्यताओं का
प्रतिवाद व खण्डन किया है। स्वामी दयानन्द जी ने वेदों का जो स्वरूप
प्रस्तुत किया है वह उज्जवल, उपादेय, आचरणीय, सत्य, यथार्थ, अज्ञान से
रहित, विद्या की कसौटी पर खरा है एवं अनेक गुणों से युक्त है। स्वामी
दयानन्द जी के वेदभाष्य वा वेदज्ञान की एक विशेषता यह है कि उनके द्वारा
अपने ग्रन्थों में ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति का जो स्वरूप प्रस्तुत किया
गया है वह सत्य व यथार्थ होने से आलोचना से रहित व सर्वजनहितकारी है।
स्वामी दयानन्द जी ने वेदों के मंत्रों की व्याख्याओं के आधार पर ईश्वर व
जीवात्मा का जो स्वरूप्ां व इनके गुण, कर्म व स्वभाव को प्रस्तुत किया है,
वह उनके समय में प्रचलित व आचरण में न होने के कारण देश व जन-जन के लिए
लाभकारी एवं जीवन को सुखद व कल्याणकारी बनाता है। वेद सब सत्य विद्याओं का
पुस्तक है, इसका उद्घोष भी उन्होंने किया और उसे अपने ग्रन्थ
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं सत्यार्थप्रकाश आदि में सिद्ध भी किया है। वेदों
के ज्ञान के प्रकाश में उन्होंने धार्मिक व सामाजिक जगत में जिस क्रान्ति
का सूत्रपात किया था उसने सभी प्रकार के अज्ञान, अंधविश्वासों सहित
पापाग्नि को भस्म कर दिया है। यह भी विचारणीय है कि ऋषि दयानन्द और उनके
अनुयायी विद्वानों ने विगत 154 वर्षों में विश्व के सभी मतों को उनकी
मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, जन्मना जाति व्यवस्था, विवाह में
गुणकर्मस्वभाव की उपेक्षा कर जन्मपत्र को महत्व देना आदि की जो आलोचना व
उन्हें शास्त्रार्थ, लिखित व मौखिक, की चुनौती दी और लोगों को निरुत्तर
किया जबकि किसी विपक्षी मत-मतान्तर द्वारा उनके द्वारा खण्डित मान्यताओं को
सत्य सिद्ध करने या आर्यसमाज को चुनौती देने का कार्य नहीं हुआ। यदि कभी
कहीं हुआ है तो आर्यसमाज ने उसका उत्तर दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि
स्वामी दयानन्द जी द्वारा खण्डित सभी मत-मतान्तरों की मान्यतायें आज भी
खण्डित हैं और विपक्षियों के पास उनका आज भी कोई उत्तर नहीं है। आज भी वह
अज्ञान व अविद्या से ग्रस्त हैं तथा सत्य को अपनाने को तत्पर नहीं है।
स्वामी दयानन्द और स्वामी विरजानन्द जी का
परस्पर सम्बन्ध विद्या के आदान-प्रदान अर्थात् शिष्य व आचार्य के रूप में
हुआ। ऐसा नहीं है कि स्वामी दयानन्द उनसे मिलने से पूर्व विद्या नहीं पढ़े
थे। स्वामी दयानन्द जी ने उन दिनों देश भर के प्रायः सभी ज्ञात व अनेक
अज्ञात गुरुओं के निवास व आश्रमों आदि पर जाकर उनसे सम्पर्क कर अपनी
जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ उनसे उन विषयों को ज्ञान भी प्राप्त किया
था जो विषय वह आचार्य जानते थे। योग विद्या में वह सफलता प्राप्त कर चुके
थे और उच्च कोटि के साधक एवं सिद्ध योगी थे। फिर भी वह विद्या प्राप्ति की
दृष्टि से स्वयं को अतृप्त अनुभव करते थे। इसी कारण वह सन् 1857 के
स्वातन्त्र्य समर के तीन वर्ष बाद सन् 1860 में गुरु विरजानन्द जी के पास
अध्ययन के लिए पहुंचे थे। उन्होंने लगभग 3 वर्ष गुरु चरणों में बैठकर
संस्कृत की अष्टाध्यायी-महाभाष्य प़द्धति सहित निरुक्त व निघण्टु के विषयों
का अभ्यास किया था। स्वामी विरजानन्द विद्या व ज्ञान के सूर्य थे। उनके
समान अन्य कोई आचार्य दयानन्द जी के जीवन में नहीं आया था। स्वामी
विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द जी की सभी आशंकाओं व भ्रमों का निवारण किया
था। सन् 1863 में उनकी विद्या पूर्ण हुई और उन्होंने गुरु जी से दीक्षा व
विदा ली। विदाई के अवसर पर स्वामी विरजानन्द जी ने उन्हें देश भर में
धार्मिक व सामाजिक जगत सहित राजनीतिक जगत में फैले अविद्या व अज्ञान को दूर
करने का सत्परामर्श दिया था। स्वामी दयानन्द जी ने उनके परामर्श को सहर्ष
यथावत् स्वीकार किया था। सम्भवतः इससे अच्छा परामर्श स्वामी दयानन्द जी को
और कोई नहीं दे सकता था। इसके बाद स्वामी दयानन्द जी ने जो भी कार्य किया,
प्रचार, ग्रन्थ लेखन, आर्यसमाज की स्थापना, समाज सुधार, असत्यमतों व असत्य
मान्यताओं का खण्डन, गोरक्षा, हिन्दी का प्रचार-प्रसार आदि, उन सब के पीछे
गुरु की आज्ञा का पालन व देश सहित मानवमात्र का हित था।
घर में माता-पिता और विद्यालय में आचार्य
अपनी सन्तानों व शिष्यों के हित के लिए उनका ताड़न करते ही हैं। इसी प्रकार
एक सच्चे आचार्य की तरह देश व समाज के सुधार व मानवमात्र के हित में स्वामी
दयानन्द ने असत्य मत व मान्यताओें का खण्डन और सत्य मत व सत्य मान्यताओं
के मण्डन का कार्य किया। स्वामी दयानन्द जी के प्रयासों से देश में लोग
सत्य व असत्य का विवेचन करने की शैली व पद्धति को प्राप्त हुए, उन्हें
अच्छाई व बुराई का ज्ञान हुआ, धार्मिक व सामाजिक असत्य व अज्ञानपूर्ण
मान्यताओं का देशवासियों को ज्ञान हुआ एवं स्वकर्तव्य व अनुचित व्यवहारों
से भी वह परिचित हुए। प्रायः सभी अवैदिक मतों के आचार्यों ने अपने हित वा
स्वार्थ के कारण असत्य व अज्ञान को तो नहीं छोड़ा परन्तु कुतर्कों द्वारा वह
अपने मत का समर्थन करते रहे और आज भी करते हैं। जो भी हो, स्वामी जी के
उपदेशों, शास्त्रार्थों व प्रचार से देश भर में पुनर्जागरण हुआ जिसका
प्रभाव देश व समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ा। इस कार्य को और बढ़ाने के
लिए सन् 1883 में स्वामी दयानन्द जी के परलोक गमन पर उनके शिष्यों ने
‘दयानन्द ऐग्लों वैदिक स्कूल’ व ‘गुरुकुल’ खोले। इन विद्यालयों में
स्वदेशीय हितों को प्रधानता देते हुए अध्ययन-अध्यापन कराया जाता था जिससे
एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जिसमें धर्म व अधर्म को जानने की क्षमता थी और देश
को स्वतन्त्र कराकर स्वराज्य स्थापित करने की भी प्रचण्ड अग्नि उत्पन्न
हुई। अनेक बाधाओं के होने पर भी देश को स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज की
वैदिक विचारधारा से लाभ हुआ जिसके परिणामस्वरूप एक ओर जहां अन्धविश्वास कम व
समाप्त हुए वहीं बाल विवाह आदि पर रोक लगी, विधवा विवाह प्रचलित हुए,
जन्मना जाति में विवाह के साथ गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित अन्तर्जातीय विवाह
भी प्रचलित हुए। सामाजिक असमानता कम व दूर हुई। छुआछूत वा अस्पर्शयता की
भावना समाप्त व कम हुई। आर्यसमाज ने दलित परिवारों के अनेक बच्चों को अपने
गुरुकुलों में पढ़ाकर उन्हें पण्डित, आचार्य, पुरोहित व समाज में उच्च
स्थानों पर स्थित किया। आर्य समाज को यह भी गौरव प्राप्त है कि आर्यसमाज के
कई संन्यासी व विद्वान दलित परिवारों से आये और उन्होंने सर्वश्रेष्ठ
वेदभाष्य व उस पर टीका आदि लिखने का कार्य तक किया है। संस्कृत भाषी दलित
परिवार के अनेक विद्वान बन्धु पहले भी आर्य समाज में थे और आज भी हैं।
आर्यसमाज में आज अधिकांश वैदिक विद्वान सभी वर्णों यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य व शूद्र (जन्मना दलित जाति के बन्धु भी) आदि से हैं। यह भी कम गौरव
की बात नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वामी दयानन्द जी ने किसी
भी पक्ष के औचीत्य को सिद्ध करने के लिए तर्क व युक्ति का हथियार हमें
पकड़ाया था जिसका आज देश भर में सर्वत्र प्रयोग हो रहा है। संक्षेप में इतना
ही कह सकते हैं कि जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां आर्यसमाज ने अपनी
उपस्थिति दर्ज न की हो व उसे प्रभावित कर उससे देश हित सम्पन्न न किया हो।
लेख की अपनी सीमा होती है। अतः लेख का
अधिक विस्तार न करते हुए इतना ही कहना उपयुक्त प्रतीत होता है कि आर्यसमाज
ने अन्धविश्वास, अज्ञानता और परतन्त्रता से भारत को बाहर निकाला। देश को
स्वराज्य, सुराज्य, वैदिक साम्राज्य व चक्रवर्ती राज्य बनाने के मन्त्र
देशवासियों को दिये। ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रकृति के सत्य वैज्ञानिक
स्वरूप को देश व समाज के सामने रखा। जीवन को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष दिलाने
वाली संन्ध्या पद्धति व देवयज्ञ अग्निहोत्र सहित पंचमहायज्ञ पद्धति भी
देशवासियों को प्रदान की है। आज आर्यसमाज को भीतर व बाहर से चुनौतियां मिल
रही है। भीतर से चुनौतियां इसके नेता देते हैं जिनमें लोकैषणा व वित्तैषणा
आदि स्वार्थ हो सकते हैं और बाहर भी मत-मतान्तरों में अज्ञानता व स्वार्थ
दृष्टिगोचर होते हैं जो आर्यसमाज की सत्य मान्यताओं को स्वीकार नहीं करते
और अपनी अविद्यायुक्त बातों का ही आचरण करते व कराते हैं। आर्यसमाज को अपनी
कमियों को दूर कर प्रचार तन्त्र को शक्तिशाली व प्रभावशाली बनाना होगा।
तभी स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द जी द्वारा आरम्भ मिशन सफल हो सकता
है। इन दोनों महापुरुषों के मिलन से देश को अपूर्व व सर्वाधिक लाभ हुआ है।
ओ३म् शम्।
मनुष्य जीवन सफल कैसे बने?’
हमारे मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता
है? इसका सरल उपाय तो वैदिक ग्रन्थों का स्वाध्याय है जिसमें ऋषि दयानन्द
के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय
आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। दर्शनों व उपनिषदों सहित वेदादि भाष्यों का
अध्ययन भी उपयोगी है। मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य तो जीवन से अविद्या को
दूर करना है। अविद्या दूर करने के लिए विद्या का ग्रहण व उसे धारण करना
आवश्यक है। विद्या को धारण कर उसे आचरण में लाना है और विद्या को आचरण में
लाने का अर्थ है विद्या के अनुरूप आचरण अर्थात् सदाचरण और सद्कर्मों को
करना। वेदों में कहा है कि सद्कर्मों व सदाचरण से मनुष्य मृत्यु को पार हो
जाता है और विद्या से उसे अमृत वा मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य को
विद्या प्राप्ति के साथ ईश्वर, आत्मा और सृष्टि का ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर
की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का करना उसका कर्तव्य सिद्ध होता है। ईश्वर
में ध्यान करने के लिए अपने जीवन को ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव के अनुरूप
व अपने स्वभाव व आचरण को ईश्वर के अनुरूप करना आवश्यक है। ऐसा करके ईश्वर
से मेल होने से जीवात्मा दुर्गुण, दुर्व्यस्न व दुःखों से दूर हो जाता है।
इस स्थिति को प्राप्त होने पर ईश्वर का साक्षात्कार होना सम्भव है।
आप्तोपदेश वा ऋषि वचनों से ज्ञात होता है कि ज्ञान, कर्म व उपासना की सफलता
होने पर मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार कर निर्भ्रान्त हो जाता है। यह जीवन
की उच्चतम व श्रेष्ठ स्थिति होती है। सभी मनुष्यों को इसके लिए प्रयत्न
करना चाहिये। यदि यह स्थिति सम्पादित हो गई तो इससे यह जन्म व परजन्म दोनों
सुधरते हैं। यदि यह स्थिति नहीं बनी तो मनुष्य जीवन की बहुत बड़ी हानि होती
है। इसका अनुमान स्वाध्यायशील व्यक्ति, ज्ञानी व विद्वान ही लगा सकते हैं।
एक प्रकार से कहें तो यह वैदिक शिक्षा का सार है। इसी लिए महर्षि दयानन्द
ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि वह व्यक्ति भाग्यशाली हैं जिसके
माता-पिता व आचार्य वैदिक धर्मी व धार्मिक विद्वान हों। उनसे अपनी सन्तान व
शिष्यों का जो कल्याण होता है वह अन्य माता-पिता व आचार्यों के द्वारा
नहीं होता है।
मनुष्य जीवन में जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऋषि
दयानन्द ने प्राचीन काल में प्रचलित पंचमहायज्ञों व उनकी विधि का
पुनरुद्धार किया है। यह भी महर्षि दयानन्द जी की देश व विश्व को बहुत बड़ी
देन है। इसके साथ ही महर्षि दयानन्द के अन्य सभी ग्रन्थ मनुष्य की अविद्या
को दूर कर उसे विद्वान बनाते हैं जिनसे मनुष्य में विवेक उत्पन्न होता है।
सन्ध्या वा ईश्वर के ध्यान की प्रेरणा मिलती है। वह नास्तिकता से दूर वा
मुक्त होकर ईश्वर का सच्चा उपासक, देशहितैषी वा देशभक्त बनता है। सभी
चारित्रिक बुराईयों से ऊपर उठकर एक आदर्श नागरिक बनता है। ऐसे लोगों से ही
देश व समाज का हित होता है। ऐसे लोग अपने जीवन को भी महनीय बनाते हैं व देश
व समाज के लिए उनका योगदान प्रशंसनीय व महत्वपूर्ण होता है।
इस पृष्ठभूमि में जब हम आर्यसमाज के प्रवर्तक ऋषि दयानन्द और उनके कुछ
प्रमुख अनुयायियों के जीवनों पर विचार करते हैं तो हम सभी को स्वाध्यायशील व
ईश्वरोपासना सहित समाज सुधार व दूसरों के कल्याण के कामों में लगा हुआ
पाते हैं। उनमें ज्ञान व कर्म का सन्तुलन दिखाई देता है। मन, वचन व कर्म से
वह एक होते हैं। ऋषि दयानन्द सच्चे ईश्वर उपासक थे और इसका प्रचार
उन्होंने लेख व प्रवचनों सहित अपने जीवन के उदाहरण से भी किया है। वह ऐसे
योगी थे जो लगातार 16 घंटे की समाधि लगा सकता था। समाधि वह अवस्था होती है
जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार होता है। ईश्वर साक्षात्कार मनुष्य की आत्मा
के लिए सबसे अधिक सुखदायक व आनन्द की स्थिति होती है। ऐसा सुख व आनन्द
संसार के किसी भौतिक पदार्थ में नहीं होता। इसी कारण प्राचीनकाल से हमारे
सभी ऋषि व योगी भौतिक पदार्थों, धन व ऐश्वर्य से अधिक महत्व ईश्वर के
ध्यान, उसकी उपासना और समाज हित के कार्यो को देते थे। आज यदि हम मध्यकालीन
समाज और वर्तमान समाज पर दृष्टि डाले और दोनों की तुलना करें तो हमें आज
का समाज कहीं अधिक उन्नत व समृद्ध दृष्टिगोचर होता है। इसका अधिकांश श्रेय
महर्षि दयानन्द को देना होगा। उन्होंने समाज से अन्धविश्वास, कुरीतियां व
पाखण्ड दूर करने के साथ वेद और वैदिक विद्याओं का प्रचार किया। वह ज्ञान की
विपुल राशि समाज को दे गये हैं जिसका जो भी मनुष्य उपयोग करेगा वह उस
विद्या धन से सुखी व समृद्ध बनेगा और उसे सबसे बढ़कर जो प्राप्ति होगी वह
आत्म संतोष कह सकते हैं।
स्वाध्याय का जीवन में प्रमुख स्थान है। इसका ज्ञान उसी को होता है जो
स्वाध्याय करता है। स्वाध्याय के साथ निष्पक्ष व निस्वार्थ भावना वाले
विद्वानों के प्रवचनों का भी महत्व होता है। अतः मनुष्य को अच्छी पुस्तकों
का संग्रह कर उसका नियमित अधिक से अधिक अध्ययन करना चाहिये। इसका प्रभाव
उसके भावी जीवन में पड़ेगा। वह बहुत सी बुराईयों व बुरे कामों से बच जायेगा
और स्वाध्याय के परिणाम स्वरूप श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण कर
वर्तमान व भावी जीवन का निर्माण व उन्नयन करेगा। ऐसा जीवन ही सफल जीवन कहा
जा सकता है। लेख की समाप्ति पर यह निवेदन करना चाहते हैं कि ऋषि दयानन्द
सहित अन्य महापुरुषों के जीवन को सभी मनुष्यों का श्रद्धापूर्वक पढ़ना
चाहिये और सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग को अपने जीवन का उद्देश्य बनाना
चाहिये। इत्योम् शम्।
manmohan kumar
जीवात्मा क्या है तथा उसका स्वरूप?’
जीवात्मा के लिए जीव व आत्मा शब्दों का प्रयोग भी होता है। यह तीनों शब्द
मनु ष्य में जो एक चेतन व संवेदनशील पदार्थ है, उसके लिए प्रयोग
में लाये जाते हैं। आत्मा के रहने से ही मनुष्य व अन्य प्राणी जीवित रहते
है और उनकी मृत्यु तभी कहलाती है जब कि जीवात्मा शरीर को छोड़कर निकल जाता
है। यह जीवात्मा क्या है व इसका उद्गम कैसे होता है? इसका उत्तर शास्त्र और
विचार करने से जो मिलता है उसको प्रस्तुत करते हैं। संसार का नियम है कि
कोई भी नया पदार्थ न तो बनाया ही जा सकता है और न ही बने हुए पदार्थ को
नष्ट ही, अस्तित्व शून्य, किया जा सकता है। पदार्थ का रूप व स्वरूप
परिवर्तन हुआ करता है, उसका पूर्ण अभाव नहीं होता है। जैसे मिट्टी से कई
पदार्थ बनते हैं। इसकी ईंटे बनाकर गृह का निर्माण कर सकते हैं। मिट्टी से
भवन की दीवार सहित मिट्टी के बर्तन व अनेक उपयोगी सामान बनाये जा सकते हैं।
परन्तु अब हम ईंट, दीवार व बर्तनों को नष्ट करते हैं तो वह अपने मूल कारण
मिट्टी के रूप में आ जाते हैं। मिट्टी भी मूल प्रकृति अर्थात् सत्, रज व तम
गुणों वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति से बनी है। संसार के सभी पदार्थ इस मूल
कारण प्रकृति से ही बने हैं। हमारा शरीर भी प्रकृति के अणु व परमाणुओं से
ही बना है। इसी प्रकार हमारा आत्मा भी एक मूल पदार्थ है। यह किसी पदार्थ से
नहीं बना है, अतः यह किसी भी कारण से कभी नष्ट नहीं हो सकता है। आत्मा
किसी मूल पदार्थ का कार्य पदार्थ नहीं है। यह कारण व कार्य दोनों एक
अर्थात् अपने कारण रूप व मूल रूप में ही रहता हैं। हां, जब सृष्टि उत्पन्न
होती है तो परमात्मा सृष्टि के निर्माण की आरम्भ अवस्था में जब मूल प्रकृति
में विक्षोभ व परिवर्तन करते हैं तो जो आरम्भिक पदार्थ महतत्व व पांच
तन्मात्रायें आदि बनती हैं, उससे ब्रह्माण्ड की अनन्त आत्माओं के लिए
सूक्ष्म शरीर बनाते हैं जो प्रलयावस्था पर्यन्त जीवात्मा के साथ रहते हैं।
जब जीवात्मा का मनुष्य व अन्य प्राणियों के रूप में जन्म होता है तो
जीवात्मा इस सूक्ष्म शरीर के साथ ही पिता-माता के शरीरों में प्रविष्ट होता
है और कालान्तर में जब मृत्यु होती है तो आत्मा और यह सूक्ष्म शरीर, स्थूल
शरीर से निकल जाता है। मृत्यु के समय शरीर से आत्मा व सूक्ष्म शरीर दोनों
ही एक साथ निकलते हैं।
आत्मा का स्वरूप हमारे शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है जो कि तर्क एवं
युक्तियुक्त है। शास्त्रों के अनुसार जीवात्मा एक चेतन, सूक्ष्म, अल्प
परिमाण, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, आकार रहित, जन्म मरण धर्मा तथा सुख व दुःख
को अनुभव करने वाला है। मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मों का भोग मिलने तक
उसके संस्कार आत्मा पर अंकित रहते हैं। जीवात्म अनादि है, अमर व अविनाशी
है, यह शस्त्र से काटा नहीं जा सकता, अग्नि से जलता नहीं है, वायु से सूखता
नहीं है और जल से गीला नहीं होता। शरीर के मर जाने पर भी आत्मा का
अस्तित्व बना रहता है। जीवात्मा का अस्तित्व अनादि व अनुत्पन्न है अतः यह
सदा बनेगा रहेगा। जीवात्मा की सत्ता बनी रहने के कारण इसे सत्य कहते हैं।
असत्य उस काल्पनिक पदार्थ को कहते हैं कि जिसका अस्तित्व न हो परन्तु
व्यवहार में उसका प्रयोग किया जाता हो। आत्मा का अस्तित्व असंदिग्ध रूप से
विद्यमान है अतः आत्मा सत्य है। जीवित अवस्था में आत्मा की दो अवस्थायें
होती हैं एक सुख व दूसरी दुःख की। सुख व दुःख की अनुभूमि होने से ही यह
चेतन पदार्थ कहलाता है। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र व किये गये शुभ व अशुभ
कर्मों के फल भोगने में परतंत्र है। संसार में हम देखते हैं कि लोग परस्पर
अच्छे व बुरे कर्मों वा व्यवहार का सेवन करते हैं। किसी मनुष्य का किसी के
प्रति अच्छा या बुरा व्यवहार करना जीव की स्वतन्त्रता में आता है।
परमात्मा उसे बुरा काम करने से दृणता से रोकता नहीं है। इसी कारण देश और
समाज में लोग छोटे व बड़े अनेकानेक प्रकार के अपराध करते हैं। अपराध कर लेने
के बाद उस जीव को उसके कर्मों का अच्छा या बुरा, सुख व दुख रूपी फल देना
ईश्वर के हाथ में है। ईश्वर चेतन, सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक,
सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ व सच्चिदानन्द होने के कारण सभी जीवों के मानसिक,
वाचिक एवं दैहिक कर्मों का साक्षी होता है। अतः वह अपने विधान के अनुसार
जीवों को यथा समय उनका फल देता है। कोई भी जीवात्मा अपने किसी शुभ व अशुभ
कर्म के फल से बच नहीं सकता। ईश्वर न्यायकारी ही नहीं आदर्श न्यायकारी है,
अतः उसका न्याय भी आदर्श न्याय है। हमारे ऋषि मुनि इसका विचार करते हैं और
इसका उल्लेख उनके बनायें ग्रन्थों में मिलता है। जीव का स्वरूप और उसके गुण, कर्म व स्वभाव कैसे हैं? इसका उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के सप्तम समुल्लास में लिखा है कि जीव चेतनस्वरूप है। इसका स्वभाव पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है। जीव के सन्तानोत्पत्ति, उन का पालन, शिल्पविद्या आदि अच्छे-बुरे कर्म ह
न्यायदर्शन और वैशेषिक दर्शन निम्न दो सूत्र आते हैं। ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनोलिंगमिति।।’ तथा ‘प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवन मनोगतीन्द्रियान्तर्विकाराः सुखदुःख इच्छाद्वेषौप्रयत्नाश्चात्मनोलिंगानि।।’
इनका अर्थ है कि (इच्छा) पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा (द्वेष) दुःखादि
की अनिच्छा, वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, बल, (सुख) आनन्द, (दुःख) विलाप,
अप्रसन्नता, (ज्ञान) विवेक, पहिचाना, ये गुण न्यायदर्शन व वैशेषिक दर्शन
में तुल्य हैं, परन्तु वैशेषिक दर्शन में (प्राण) प्राणवायु को बाहर
निकालना, (अपान) प्राण को बाहर से भीतर को लेना, (निमेष) आंख को मींचना,
(उन्मेष) आंख को खोलना, (जीवन) प्राण का धारण करना, (मन) निश्चय, स्मरण और
अहंकार करना, (गति) चलना, (इन्द्रिय) सब इन्द्रियों को चलाना,
(अन्तर्विकार) भिन्न भिन्न क्षुधा, तृषा, हर्ष, शोकादियुक्त होना, ये
जीवात्मा के गुण हैं। जीवात्मा के यह गुण परमात्मा में नहीं हैं। इन्हीं गुणों से आत्मा की प्रतीती करनी चाहिये। यह भी ध्यान रखना चाहिये ये गुण जड़ स्थूल पदार्थों में नहीं होते हैं। जब तक आत्मा देह व शरीर में होता है, तभी तक यह गुण प्रकाशित रहते हैं और जब शरीर छोड़ कर चला जाता है, तब यह गुण मृतक शरीर में नहीं रहते। जिस के होने से जो हों, और न होने से न हों, वे गुण उसी के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के न होने से प्रकाशादि का न होना और होने से होना है, वैसे ही जीव और परमात्मा का विज्ञान, इन दोनों के गुणों द्वारा होता है।
इसके साथ ही जीव के विषय में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें भी जान लेते हैं।
जीव शाश्वत्, अविनाशी एवं नित्य पदार्थ है। ईश्वर भी नित्य है और
सृष्टिकर्ता है। जीवों के पूर्व जन्मों के पाप व पुण्यों के दुःख व सुख
रूपी फल देने के लिए ही ईश्वर ने इस सृष्टि को बनाया है और ईश्वर ही इसका
पालन करता है। मनुष्य योनि उभय योनि अर्थात् कर्म व भोग योनि दोनों है और
अन्य पशु, पक्षी, कीट व पतंग आदि योनियां केवल भोग योनि है। परमात्मा ने
मनुष्य को अन्य इन्द्रियों व सामर्थ्य के साथ एक बुद्धि जैसी सत्यासत्य का
विवेचन करने वाली शक्ति बुद्धि दी है। इस बुद्धि से मनुष्य अपने जीवन के
उद्देश्य को जान सकता है। वेद, दर्शन, उपनिषद व सत्यार्थपकाश आदि ग्रन्थ
बतातें हैं कि जीवात्मा को मनुष्य जन्म पाप व पुण्यों के समान वा पुण्य
कर्मों के अधिक होने पर मिलता है। मनुष्य योनि में जहां वह अपने पूर्व
कर्मों के सुख-दुःख रूपी फल भोगता है वहीं नये शुभ व अशुभ कर्मों को करता
भी है। यदि मनुष्य वेदों व वैदिक विचारधारा के सम्पर्क में आ जाये तो उसे
अपने जीवन का उद्देश्य आसानी से समझ में आ जाता है और साथ ही उद्देश्य, जो
कि मोक्ष व मुक्ति है, को प्राप्त करने के साधनों का ज्ञान भी हो जाता है।
मनुष्य जन्म का उद्देश्य बुरे कर्मों का त्याग व शुभ कर्मों का अनुष्ठान
है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य ईश्वर व जीवात्मा आदि पदार्थों के स्वरूप व
संसार को अच्छी प्रकार से जानकर ईश्वर का ध्यान, स्तुति, प्रार्थना और
उपासना आदि करते हुए तथा यज्ञादि शुभकर्मों को करते हुए ईश्वर साक्षात्कार
करना है जिससे मनुष्य बुरी वासनाओं व बुरे कर्मों में प्रवृत्ति से बच जाता
है और ईश्वर को प्राप्त होता है। समाधि ही मोक्ष का द्वार है जिससे मनुष्य
जन्म व मरण के चक्र से लम्बी अवधि तक के लिए मुक्त हो जाता है। यह मुक्ति योगी, ऋषि मुनि व विद्वानों को ही प्राप्त होती है। असत् कर्म करने वालों को, चाहे वह किसी भी मत को मानते हों, मोक्ष की प्राप्ति कभी सम्भव नहीं है। वैदिक धर्म की शरण में आकर ही जीवन के स्वरूप को यथार्थ रूप में जानकर ही मनुष्य अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है।
manmohan kumar
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