Saturday, 18 March 2017

स्वामी दयानन्द के जीवन पर एक रोचक लेख


स्वामी दयानन्द महापुरुष थे
संसार में लाखों मनुष्य नित्य जन्मते और मरते हैं । सैंकड़ों नवीन आत्मायें नवीन सजधज और शोभा के साथ सृष्टि में आती हैं । उनके जन्म लेने पर अत्यन्त प्रसन्नता प्रकट की जाती है, संसार के समाचारपत्र उनकी प्रशंसा के गीत गाते हैं और उनके माता पिता तथा परिवार के लोगों को बधाईयाँ देते हैं । देश के मन्दिरों में उनकी आयु-वृद्धि के लिये प्रार्थना की जाती है । बड़े-बड़े धर्मनिष्ठ लोग उनकी सफलता के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हैं । प्रतिक्षण उनकी सुरक्षा के कदम उठाये जाते हैं । प्रतिवर्ष उनकी प्रगति की रिपोर्टें छपती हैं । उनके कार्यों को सृष्‍टि के अद्‍भुत कार्यों में गिना जाता है । उनकी उत्पत्ति से ही लोगों के मन में एक अपूर्व आह्लाद पैदा हो जाता है क्योंकि लोगों को उनसे बहुत बहुत आशाएँ होती हैं । परन्तु खेद इस बात का है कि ऐसे लोगों में से अधिसंख्य अपने कार्यों से यह सिद्ध कर देते हैं कि उनका जन्म लेना लोगों के लिये प्रसन्नता का हेतु नहीं था । उनमें से अनेक अपने माता-पिता तथा अपने वंश को कलंकित काने वाले सिद्ध होते हैं तथा मानवता से सर्वथा रहित होते हैं । जब वे मर जाते हैं तो संसार को उनकी मृत्यु से कोई खेद नहीं होता अपितु कई लोग तो उनसे इतनी घृणा करने लगते हैं कि उनकी मौत को पृथ्वी का भार दूर होना ही समझते हैं । लोग यही समझते हैं कि धरती से एक बला टली । दूसरी ओर बहुत कम संख्या में ऐसे लोग भी जन्म लेते हैं जिनके आने की दुनिया को खबर ही नहीं लगती । केवल उनके नाते-रिश्तेदारों को ही उनके जन्म का ज्ञान होता है और उनका आविर्भाव संसार के लिये किसी भी प्रकार महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता । ऐसे लोग पर्याप्‍त समय तक गुमनामी की ही जिन्दगी जीते हैं और इस अप्रसिद्धि में ही जीवन-यात्रा का कुछ भाग व्यतीत करते हैं । वे अप्रसिद्ध रहकर ही मर जाते हैं । उनका जन्म, जीवन और मृत्यु संसार की कोई प्रसिद्ध घटना नहीं मानी जाती । लोगों को पता ही नहीं चलता कि कौन जन्मा और कौन मरा । अनेक ऐसे भी होते हैं जो अप्रसिद्धि की अवस्था में जन्म लेते हैं, इसी अवस्था में शिक्षा ग्रहण करते हैं किन्तु जब युवा होते हैं तो उनकी गणना प्रसिद्ध लोगों में होती है । समस्त संसार में नहीं तो कम से कम एक प्रान्त में तो वे अपना नाम करते ही हैं । जब उनकी मृत्यु होती है तो अनेक लोग उनके लिये शोक करते हैं और उनके गुणों का स्मरण करते हैं । उनका यश थोड़ा स्थायी होता है । किन्तु एक-दो पीढ़ी के बाद लोग उन्हें भी भूल जाते हैं परन्तु किसी समय विशेष पर ही लोग उन्हें याद करते हैं । इसके अतिरिक्त एक श्रेणी उन लोगों की है जिनकी संख्या अत्यन्त कम है । ये लोग गुमनामी में ही पैदा होते हैं और गुमनामी में ही पलते हैं किन्तु जब कर्मक्षेत्र में आते हैं तो अपने बुद्धि, अन्तश्चेतना, लगन, योग्यता, मनुष्यत्व तथा वीरता के कारण संसार के लोगों को अपनी ओर खींचते हैं । वे लोग संसार में दृढ़ प्रभाव उत्पन्न करते हैं, लोगों में खुद के लिए आकर्षण पैदा करते हैं । कार्लाइल ने ऐसे मनुष्यों की उपमा अग्नि के स्फुलिंगों से दी है जिन्हें लोग परमात्मा कहते हैं । ऐसे मनुष्य पृथ्वी को प्रकाशित करने के लिये सूर्य तुल्य हैं । वे सूर्य के तुल्य ही यश पाते हैं और संसार को उनसे प्रकाश मिलता है । उनकी मृत्यु मनुष्य जाति के एक सीमित वर्ग के लिये ही नहीं, बल्कि समस्त मानव-जाति के लिए खेदजनक होती है । उनका नाम कभी नहीं मरता और उनका काम कभी नष्‍ट नहीं होता । उनकी याद कुछ दिनों या कुछ शताब्दियों में भी विलीन नहीं होती, किन्तु वह सदा तरोताजा रहती है । उनके द्वारा फैलाई गई ज्योति एक काल या एक पीढ़ी को ही प्रकाशित नहीं करती, किन्तु उसका प्रभाव सदा के लिए जगत् में रहता है । उनकी कार्यप्रणाली एक वंश या एक समय तक ही स्मरणीय नहीं रहती, अपितु उस पर सदा चर्चा और वाद-विवाद होता रहता है । ऐसे मनुष्यों का आचरण ही संसार में महत्त्वपूर्ण होता है । ऐसे मनुष्य बहुत थोड़े होते हैं । संसार में अन्य लोगों के लिये वे प्रकाशस्तम्भ तुल्य होते हैं । संसार के महावन में वे विश्रामस्थल के समान होते हैं । विश्व के राजमार्ग पर मील के पत्थर के तुल्य होते हैं जिन पर यात्रा की मंजिलें अंकित रहती हैं । ऐसे लोग आत्मिक क्षुधातुरों तथा तृषा से व्याकुल पुरुषों के लिए भोजनागार तथा जलाशय के तुल्य हैं । लोग उनके व्याख्यान सुनकर ही अपनी आत्मा का आहार पाते हैं और व्याकुलता को शान्त करते हैं । आप चाहे उन्हें अवतार कहें या पैगम्बर, ईश्वर का स्थानापन्न कोई ऋषि-महर्षि कहें अथवा महापुरुष कहकर पुकारें, वे एक की शिला के खण्ड, एक ही अग्नि के स्फुलिंग, एक ही कारखाने के पहिये और एक ही कल के पुर्जे होते हैं । संसार का कोई भाग ऐसे मनुष्यों के अस्तित्व से खाली नहीं होता । भगवान् कृष्ण, महात्मा बुद्ध, महर्षि व्यास, गौतम, कणाद, जैमिनि, कपिल और पतञ्जलि आदि इसी श्रेणी के मनुष्य थे । स्वामी शंकराचार्य, गुरु नानकदेव, गुरु गोविन्द सिंह भी इसी कोटि के थे । महाराज विक्रमादित्य, सम्राट् अशोक तथा शिवाजी महाराज भी ऐसे ही महापुरुष थे । हमने केवल नमूने के रूप में ये नाम लिखे हैं ।

हमारा दृढ़ विश्वास है कि स्वामी दयानन्द भी इसी श्रेणी के महापुरुष थे । अप्रसिद्धि में जन्मे, उसी रूप में पले, शिक्षा-प्राप्‍ति तक भी अप्रसिद्ध ही रहे, किन्तु जब कर्मक्षेत्र में आये तो जीवनपर्यन्त सिंह की तरह गरजते रहे । स्वामी जी ने एक पुरातन जाति को मृत्यु की स्थिति से हटा कर आशा के आसन पर ला बिठाया । एक महान् धर्म को गड्ढ़े से निकालकर प्रकाश के उच्च शिखर पर स्थापित कर दिया । संस्कृत जैसी गौरवमयी भाषा को अप्रसिद्धि की हालत से हटा कर संसार की भाषाओं में प्रधान स्थान दिला दिया । संसार की सभ्यता को गतानुगति से हटा कर सचेत किया । प्रत्येक प्रकार से देखें तो स्वामी दयानन्द महापुरुष सिद्ध होते हैं । यदि शारीरिक दृष्टि से देखें तब भी स्वामी जी महान् प्रतीत होते हैं । वे शरीर से दुर्बल लोगों को सदा तुच्छ मानते थे । शारीरिक बल तथा इन्द्रिय दमन में वे अद्वितीय थे । जीवन से मृत्युपर्यन्त उन्होंने कभी नारी का सान्निध्य नहीं किया । उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य पर उनके बड़े से बड़े शत्रु ने भी शंका नहीं की, न उनके जीवनकाल में और न उनकी मृत्यु के पश्‍चात् ।

स्वामी जी उच्च कोटि के विरक्त और वीतराग पुरुष थे । उन्होंने अपने पिता की सम्पत्ति को लात मारी । जीवन में ऐसे अनेक अवसर आये जब उन्हें अपरिमित धन तथा ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने के प्रलोभन दिये गये किन्तु वे इससे सर्वथा असंपृक्त रहे । उनमें तीव्र बुद्धि तथा अपूर्व स्मरण शक्ति थी । उनके समकालीनों में उनकी सी तीक्ष्ण बुद्धि वाला शायद ही कोई रहा हो । विद्या और चारित्रिक श्रेष्ठता में वे अद्वितीय थे । संस्कृत ज्ञान में उनका कोई सानी नहीं था । निर्भयता में अद्वितीय थे । वे अपने विश्वास पर आजीवन दृढ़ रहे । एक समय ऐसा था जब सारा संसार एक ओर था और स्वामी दयानन्द एक ओर थे । अपने विश्वास को व्यक्त करने तथा विचारों क प्रचार करने में उनके तुल्य अन्य कोई नहीं था । उनको न राजा का भय था और न प्रजा का । वे अपने परिजनों या जाति वालों से कभी भयभीत नहीं हुए और न इतर जाति वालों से । अनथक परिश्रम करने से कभी विरत नहीं हुए । यदि उनके सार्वजनिक जीवन के उस स्वल्प काल ला लेखा-जोखा किया जाए तो उनकी कर्मठता का पूर्ण प्रमाण मिल जाता है । उनकी वाणी और लेखन तथा शास्‍त्रार्थ कौशल सब कुछ असाधारण था । लोगों को अपनी ओर आकृष्ठ करने की उनमें अद्‍भुत शक्ति थी । जो मनुष्य उनके समक्ष आता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता । वे उच्च कोटि के योगी थे किन्तु उनमें अपने योग बल का स्वल्प भी अभिमान नहीं था ।

योग शक्ति का अभिमान करना तो दूर, वे इसे प्रकट करने में भी संकोच करते थे । कठिनाइयों से कभी घबराये नहीं बल्कि साहस और वीरतापूर्वक उनका सामना किया । न किसी की मित्रता की परवाह की और किसी की शत्रुता की चिंता, अपितु हुआ यह कि अनेक शत्रु उनके मित्र बन गये और मित्र शत्रुवत् आचरण करने लगे । तथापि उस महापुरुष के कार्य और व्यवहार में थोड़ा भी अन्तर नहीं आया । सारांश यह कि स्वामी जी में महापुरुषों के सभी गुण विद्यमान थे । उनके समग्र कार्यों का मूल्यांकन करने का अभी उचित समय नहीं आया है किन्तु हमारा विश्वास है कि एक समय आएगा जब उनके नाम से सारा संसार परिचित हो जाएगा । संस्कृत पृथ्वी की समस्त भाषाओं में वरिष्ठ पद प्राप्‍त करेगी तो विश्व के लोग उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में उच्च पद पर प्रतिष्ठित करेंगे । उनके मिशन और कार्य को भी आदर की दृष्टि से देखा जाएगा ।


- लाजपतराय

गिरना मना है ....



जब कोई छोटा बच्चा चलना सीखता है तब प्रायः बार-बार गिर जाता है और फिर से चलने के लिए  तैयार उठ खड़ा हो जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि वह चलने में पूर्णतः समर्थ हो जाता है । ऐसे ही जब हमने साईकिल सिखी थी तो न जाने कितनी बार गिरे होंगे परन्तु कुछ काल पश्चात् उसमें भी हम पारंगत हो गए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि आगे बढ़ने के लिए या सफल होने के लिए सब से पहले हमें गिरना होता है जैसे कि हम देखते हैं कि एक बछड़ा जब जन्म लेता है तो गाय उसको चाट-चाट कर साफ़ करती है, बछड़ा बार-बार गिरते रहता है परन्तु उसकी माँ तब तक चाटते रहती है जब तक वो पूरी तरह खड़ा नहीं हो जाता।
इन सब दृश्यों को देखते हुए कुछ लोग यह निश्चय कर लेते हैं कि गिरना भी जरुरी है। कुछ लोगों का कहना है कि “गिरता वही है जो चलता है” परन्तु यह एक विचारणीय बिन्दु है कि- क्या गिरना जरुरी है ? क्या बिना गिरे कोई चल नहीं सकता ? आखिर कोई गिरता क्यों है ? वास्तव में देखा जाये तो व्यक्ति की असामर्थ्यता, अयोग्यता, अथवा न्यूनता के कारण ही व्यक्ति पतन को प्राप्त होता है। गड्ढ़े में गिरना, कहीं फिसल जाना, पतित होना किसी को भी अच्छा नहीं लगता। व्यक्ति स्वयं भी पतित होना नहीं चाहता और किसी को पतित होते देख कर उसको भी अच्छा नहीं मानता। गिरने से हानि होती है, यह सब जानते हैं इसीलिए हमारे बुजुर्ग अनुभवी लोग हमें सदा सचेत करते रहते हैं और कहते हैं कि “गिरना मत”। जीवन में हम अनेक बार गिरते हैं, गिरने पर कुछ लोग हंसनेवाले भी होते हैं और कुछ सहारा देकर उठाने वाले भी। हंसने वालों को देखकर ऊपर उठाना कभी नहीं भूलना चाहिए, उन्नति के लिए अपने प्रयत्न को स्थगित नहीं करना चाहिए।
केवल शरीर से ही भूमि पर गिर जाना मात्र पतित होना नहीं होता किन्तु जीवन में हम अनेक बार अनेक प्रकार से पतन को प्राप्त होते हैं। जब हमें कोई रोग विशेष हो जाता है और शरीर कमजोर हो जाता है तब हम कहते हैं कि हमारा शारीरिक स्वास्थ्य में गिराबट हो गया है। ठीक ऐसे ही जब हम किसी कार्य में अथवा अपने लक्ष्य के प्रति उत्साहहीन हो जाते हैं तब हम मन से पतित हो जाते हैं। हमारा मन सत्व-रज-तम तीनों गुणों से बना हुआ है अतः जब मन में सत्वगुण की न्यूनता और तमोगुण की अधिकता हो जाये और हम असत्य, अन्याय वा अधर्म आदि से युक्त हो जाते हैं तब हम मानसिक रूप से पतित हो जाते हैं। ऐसे अनेक प्रकार से हम गिरते रहते हैं। जब जब हम ईश्वर को छोड़ देते हैं तब तब हम गिर जाते हैं, पतन को प्राप्त होते रहते हैं। यदि एक व्यक्ति ने संकल्प लिया है कि मैं किसी मांस आदि अभक्ष चीज को नहीं खाऊंगा, शराब आदि नशीली चीज को नहीं पीऊंगा, किसी अश्लील चीज को नहीं देखूंगा इत्यादि फिर भी संकल्प के विपरीत यदि हम खा-पी लेते हैं, उस वस्तु का सेवन कर लेते हैं तो वहां पर हम पतित हो जाते हैं। सबसे पहले तो हम अपने ही नजर में गिर जाते हैं, जिससे हमारी संकल्प शक्ति में कमी आ जाती है और आत्मविश्वास भी घट जाता है। इस प्रकार दूसरे लोग भी हमें विश्वास नहीं करते और समाज में हमारी अप्रतिष्ठा भी हो जाती है।

एक पाठशाला में गुरु जी अपने शिष्यों को कुछ जीवनोपयोगी शिक्षा दे रहे थे। वहां पर एक बालक एकलव्य जैसा भी था जो दूर से उस पाठ को श्रवण कर रहा था। गुरुदेव ने उपदेश दिया कि बच्चो! अपने जीवन में किसी भी परिस्थिति में कभी भी गिरना मत। बस इतना सुनना था कि उस उपदेश का शिष्य के हृदय में गहरा छाप पड गया और उसका जीवन ही बदल गया। उसने इस छोटे से उपदेश को ही अपने जीवन का सर्वस्व मान लिया, मन ही मन उसको गुरु जी का आदेश मान लिया। उसने मन में निश्चय कर लिया कि इस वचन को मैं कभी भी भंग नहीं करूँगा,इसी को ही आजीवन पालन करूँगा। इसी को ब्रह्म-वाक्य मान करके दिन रात केवल इसी के विषय में विचार करने लगा । सदा इसी के चिंतन-मनन में खो गया। एक दिन  ऐसा आया कि न वो अपने आपके नज़र में कभी गिरा और न ही माता पिता के नज़र में गिरा और न ही समाज के नज़र में गिरा और न ही ईश्वर के नज़र में गिरा । पग पग में अपने समस्त व्यवहारों में बस यही निरिक्षण करते रहता था कि मैं कहीं गिर न जाऊं । क्योंकि उसने गुरु जी से एक दिन के उपदेश में यह भी सुना था कि विद्या चार प्रकार से आती है , आगम काल, स्वाध्याय-काल, प्रवचन-काल और व्यवहार-काल। इस विषय में गुरु जी ने एक दृष्टान्त भी सुनाया था कि गुरु द्रोणाचार्य ने अपने विद्यार्थियों को एक उपदेश दिया कि क्रोध नहीं करना चाहिये, सभी ने पाठ सुना दिया परन्तु युधिष्ठिर ने कहा कि मुझे याद नहीं हुआ। फिर जब गुरु जी ने डंडे से मारा, ताड़ना की तब युधिष्ठिर जी ने कहा कि गुरु जी मुझे पाठ याद हो गया। गुरु द्रोणाचार्य जी ने पूछा कि पहले तो पाठ याद नहीं हुआ था फिर मार पड़ने मात्र से याद कैसे हो गया ? तब युधिष्ठिर ने कहा कि आपने इतना मारा फिर भी मेरे मन में लेश मात्र भी क्रोध नहीं आया। इसका अर्थ हुआ कि पाठ का चौथा स्तर व्यवहार में आ गया। हम अनेक बातों को, उपदेशों को केवल सुनते ही रहते हैं और कुछ स्मरण रखते तथा कुछ को भूला देते हैं। नहीं तो एक ही उपदेश व्यक्ति के जीवन को पूर्णतया परिवर्तन करने में, उसको उन्नति के शिखर पर पहुँचा देने में समर्थ है, यदि वह उस सुनी हुई विद्या को अपने जीवन में व्यावहारिक स्तर पर क्रियान्वयन करके चतुर्थ-स्तर पर हस्तगत कर लेता है। महर्षि दयानन्द जी जैसे अनेक साधु, सन्त, महात्मा, ऋषि हुए हैं जिन्होंने अपने एक ही उपदेश के माध्यम से अमीचंद जैसे अनेकों के जीवन को एक नया मोड़ ही दे दिया और सफलता और उत्कर्ष के शिखर को प्राप्त तक करा दिया। ये केवल उपदेश करने वाले की विशेषता नहीं है अपितु उस उपदेश को क्रियान्वयन करके सफल करने वाले की विशेषता है। यदि हम अपनी अज्ञानता, अल्पज्ञता वा असामर्थ्यता के कारण कभी गिर भी जाते हैं तो भी सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये फिर से उठ खड़े होने के लिए और सबसे अच्छी स्थिति तो यही है कि हम इतना सजग-सावधान व जागरूक रहें कि कभी गिरने का अवसर ही प्राप्त न हो। एक अध्यात्मिक व्यक्ति अथवा एक योगाभ्यासी सदा सजग- सावधान व जागरूक रहता है और अपने जीवन में कभी पतित होता ही नहीं। नवीन केवली 

Saturday, 11 March 2017

संस्कृत भाषा की महता

असम सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में 8वीं क्लास तक संस्कृत को अनिवार्य बनाने का फैसला किया है। हमारे देश में एक विशेष समूह है जो हमारी सभी प्राचीन मान्यताओं का हरसंभव विरोध करना अपना कर्त्तव्य समझता है। इन्हें हम साम्यवादी, कम्युनिस्ट, एक्टिविस्ट, पुरस्कार वापसी, JNU के अधेड़ आदि नामों से जानते है। अपनी पुरानी आदत के चलते इन्होंने अनेक कुतर्क देने आरम्भ किये। नवभारत टाइम्स अख़बार में 6 मार्च को दिल्ली संस्करण में "संस्कृत का मोह" शीर्षक से संपादकीय प्रकाशित हुआ। इस संपादकीय में दिए गए कुतर्कों कि हम समीक्षा करेंगे। 
कुतर्क नंबर 1. आज जब दुनिया भर के शिक्षाविद और मनोवैज्ञानिक बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के उपाय खोजने में जुटे हैं, तब असम सरकार उन पर एक और विषय का भार लाद रही है।

समाधान- बच्चों के बस्ते का बोझ तो केवल बहाना है। शिक्षा के मूल उद्देश्य से परिचित होते तो कभी ऐसा कुतर्क नहीं देते। वैदिक विचारधारा में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को समाज का एक ऐसा आदर्श नागरिक बनाना है जो समाज और राष्ट्र को अपने योगदान द्वारा समृद्ध करे एवं उन्नति करे। पाश्चात्य शिक्षा का उद्देश्य केवल एक पैसा कमाऊ मशीन बनाना है जो अपने भोगवाद की अधिक से अधिक पूर्ति के लिए येन-केन प्रकारेण धन कमाए। आप स्वयं देखे अनेक पढ़े लिखे युवक आज अपनी महिला मित्र को प्रसन्न करने के लिए या सैर सपाटे के लिए चोरी करते है। क्योंकि उनकी शिक्षा में उन्हें नैतिक मूल्यों, सामाजिक कर्त्तव्य, राष्ट्र उन्नति के लिए योगदान देने, महान एवं प्रेरणादायक प्राचीन इतिहास आदि के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बताया जाता।  यह कार्य संस्कृत शिक्षा के माध्यम से भली प्रकार से हो सकता है। यही प्राचीन गुरुकुलीय संस्कृत शिक्षा पद्यति का उद्देश्य था। 
कुतर्क नंबर 2- अंग्रेजी-हिंदी के अतिरिक्त तीसरी भाषा के रूप में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ या असमिया आदि जीवित स्थानीय भाषा सिखाई जाये। संस्कृत तो मृत भाषा है।
समाधान-  मृत और जीवित भाषा की कल्पना केवल मात्र कल्पना है। भारत में कुछ लोग लैटिन, हिब्रू, ग्रीक, अरबी, फारसी आदि भाषाओं को प्रोत्साहित करते है।  आप कभी इन भाषाओं को मृत नहीं बताते। क्यों? क्योंकि यह दोहरी मानसिकता है।  उसके ठीक उलट आप इन भाषाओँ के संरक्षण के लिए सरकार से सहयोग की अपेक्षा करते है। कोई भी व्यक्ति जो संस्कृत भाषा कि महता से अनभिज्ञ है इसी प्रकार की बात करेगा परन्तु जो संस्कृत भाषा सीखने के लाभ जानता है उसकी राय निश्चित रूप से संस्कृत के पक्ष में होगी। संस्कृत भाषा को जानने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि हमारे धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, दर्शन, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि में वर्णित नैतिक मूल्यों, सदाचार,चरित्रता, देश भक्ति, बौद्धिकता शुद्ध आचरण आदि गुणों को संस्कृत की सहायता से जाना जा सकता हैं। जो जीवन में हर समय आपका मार्गर्दर्शन करने में परम सहायक है। कल्पना कीजिये जिस समाज में कोई चोर न हो, कोई व्यभिचारी न हो, कोई पापकर्म न करता हो।  वह समाज कितना आदर्श समाज होगा। वैदिक शिक्षा प्रणाली में इसी प्रकार के आदर्श समाज की परिकल्पना है। इसी समाज को महात्मा गाँधी आदर्श समाज के रूप में रामराज्य के रूप में मानते थे। अगर संस्कृत भाषा को अंग्रेजी के समान प्रोत्साहन दिया जाता तो आप इसे कभी मृत भाषा  कहते अपितु इसके लाभ से भी परिचित होते।  
कुतर्क नंबर 3 - अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को सीखने से रोजगार के नवीन अवसर मिलने की अधिक सम्भावना है जबकि संस्कृत सीखने का कोई लाभ नहीं है। दुनिया के साथ हमकदम होकर चलने, आधुनिक ज्ञान और प्रौद्योगिकी की जानकारी हासिल करने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य है। इससे आगे चलकर तकनीकी क्षेत्रों और शोध में भी मदद मिलती है।
समाधान- लगता है आप अपनी छोटी सी दुनिया तक सीमित है। विश्व में अनेक देश अपनी राष्ट्रभाषा को प्रोत्साहन देकर विकसित देशों की सूची में शामिल हुए है। जैसे रूस वाले रुसी भाषा, चीन वाले चीनी भाषा, जापान वाले जापानी भाषा, फ्रांस वाले फ्रांसीसी भाषा, इटली वाले इटालियन भाषा सीख कर ही संसार में अपना सिक्का ज़माने में सफल हुए है। अंग्रेजी भाषा मुख्य रूप से उन देशों में अधिक प्रचलित है जिन देशों पर अंग्रेजों ने राज किया था।  स्वतंत्र होने के पश्चात भी उन देशों के लोग गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए है। वे अब भी अपने देश के श्रेष्ठ मान्यताओं को निकृष्ठ एवं अंग्रेजों की निम्नस्तरीय मान्यताओं को श्रेष्ठ समझते हैं। यही नियम आप पर भी लागु होता है। आप भूल गए कि संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर द्वारा अंग्रेजी के स्थान पर संस्कृत को मातृभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया गया था।  जिसे अंग्रेजी समर्थक लोगों ने लागु नहीं होने दिया। जब अन्य देश अपनी मातृभाषा में शोध और आधुनिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। तो फिर भारत संस्कृत के माध्यम से क्यों नहीं कर सकता?
कुतर्क नंबर 4- संस्कृत भाषा में रोज़गार की सम्भावना न के बराबर है। संस्कृत जानने वालों का भविष्य उन्नत नहीं है।
समाधान- लगता है आप व्यावहारिक एवं सामाजिक यथार्थ से अनभिज्ञ है। हमारे शिक्षा पद्यति में अनेक पाठ्क्रम विद्यमान है जैसे विज्ञान, वाणिज्य, ललित कलाएं आदि। इनमें से उतीर्ण होने वाले क्या सभी बालक क्या अपनी शिक्षा को रोजगार में प्रयोग कर पाते है? नहीं। बहुत सारे छात्र अपने पारिवारिक व्यवसाय को चुनते है, बहुत सारे अन्य कार्य करते है।  इसलिए यह कहना कि संस्कृत शिक्षा प्राप्त भूखे मरेगे केवल अपनी अव्यवहारिक कल्पना हैं। हमने अनेक संस्कृत शिक्षा प्राप्त छात्रों को IAS, IPS तक बनते देखा है।  दूसरी ओर पढ़े लिखे बेरोजगार भी देश में बहुत है। 
आपको एक अन्य उदहारण भी देते है। JNU दिल्ली में राजनीती करने वाले अधेड़ छात्रों के शोध विषय देखिये। कोई बुद्धित स्टडीज से पीएचडी कर रहा है। कोई अफ्रीकन स्टडीज से पीएचडी कर रहा है। कोई पाली भाषा में शोध कर रहा है। कोई ग़ालिब की गजलों पर शोध कर रहा है।  इन सभी को उचित रोजगार मिलने कि क्या गारंटी हैं? अगर भूले भटके कोई शिक्षक लग गया तब तो ठीक है।  अन्यथा नारे लगाने के अलावा किसी काम का नहीं है। निश्चित रूप से अगर देश में संस्कृत भाषा में शोध होने लगे तो निश्चित रूप से संस्कृत भाषा के माध्यम से भी रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। इसलिए भूखे मारने का कुतर्क अपने पास रखे।
कुतर्क नंबर 5- विदेशी भाषा को जानने से व्यापार आदि की संभावनाएं प्रबल होगी। इसलिए संस्कृत पर समय लगाना व्यर्थ है।

समाधान- संसार की सभी विदेशी भाषाओँ का ज्ञान किसी एक व्यक्ति को नहीं हो सकता। कामचलाऊ ज्ञान एक-दो भाषाओँ का हो सकता हैं। मगर इस कामचलाऊ ज्ञान के लिए संस्कृत जैसे महान भाषा की अनदेखी करना मूर्खता है। एक उदहारण से इस विषय को समझने का प्रयास करते है। एक सेठ की तीन पुत्र थे। वृद्ध होने पर उसने उन तीनों को आजीविका कमाने के लिए कहा और एक वर्ष पश्चात उनकी परीक्षा लेने का वचन दिया और कहा जो सबसे श्रेष्ठ होगा उसे ही संपत्ति मिलेगी। तीनों अलग अलग दिशा में चल दिए। सबसे बड़ा क्रोधी और दुष्ट स्वाभाव का था। उसने सोचा की मैं जितना शीघ्र धनी बन जाऊंगा उतना पिताजी मेरा मान करेंगे। उसने चोरी करना, डाके डालना जैसे कार्य आरम्भ कर दिए एवं एक वर्ष में बहुत धन एकत्र कर लिया। दूसरे पुत्र ने जंगल से लकड़ी काट कर, भूखे पेट रह कर धन जोड़ा मगर उससे उसका स्वास्थ्य बहुत क्षीण हो गया।  तीसरे पुत्र ने कपड़े का व्यापार आरम्भ किया एवं ईमानदारी से कार्य करते हुए अपने आपको सफल व्यापारी के रूप में स्थापित किया। एक वर्ष के पश्चात पिता की तीनों से भेंट हुई।  पहले पुत्र को बोले तुम्हारा चरित्र और मान दोनों गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा सब कुछ गया क्यूंकि मान की भरपाई करना असंभव हैं, दूसरे पुत्र को बोले तुम्हारा तन गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा कुछ कुछ गया और जो स्वास्थ्य की तुम्हें हानि हुई है उसकी भरपाई संभव हैं, तीसरे पुत्र को बोले तुम्हारा मान और धन दोनों बना रहा इसलिए तुम्हारा सब कुछ बना रहा। ध्यान रखो मान-सम्मान तन और धन में सबसे कीमती है।

यह मान सम्मान, यह नैतिकता, यह विचारों की पवित्रता, यह श्रेष्ठ आचरण, यह चरित्रवान होना यह सब उस शिक्षा से ही मिलना संभव हैं जिसका आधार वैदिक शिक्षा प्रणाली है।  जिस शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन हैं उससे इन गुणों की अपेक्षा रखना असंभव है। यह केवल उसी शिक्षा से संभव है जो मनुष्य का निर्माण करती है। मनुष्य निर्माण करने और सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान से प्रभावित करने की अपार क्षमता केवल हमारे वेदादि धर्म शास्त्रों में हैं और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता है। जीवन यापन के लिए क्या क्या करना चाहिए यह आधुनिक शिक्षा से सीखा जा सकता हैं मगर जीवन जीने का क्या उद्देश्य हैं यह धार्मिक शिक्षा ही सिखाती हैं। समाज में शिक्षित वर्ग का समाज के अन्य वर्ग पर पर्याप्त प्रभाव होता हैं। अगर शिक्षित वर्ग सदाचारी एवं गुणवान होगा तो सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करेगा। अगर शिक्षित वर्ग मार्गदर्शक के स्थान पर पथभ्रष्टक होगा तो समाज को अन्धकार की और ले जायेगा। संस्कृत भाषा में उपस्थित वांग्मय मनुष्य को मनुष्यत्व सिखाने की योग्यता रखता हैं।  हमारे देश की अगली पीढ़ी को संस्कृत भाषा का पर्याप्त ज्ञान हो और उससे उन्हें जीवन में दिशानिर्देश मिले। यही संस्कृत की महत्ता है।
डॉ विवेक आर्य