Wednesday, 17 May 2017

जीवन एक निरंतर अग्निहोत्र

मानव जीवन एक निरंतर चलने वाले यज्ञ के सामान है. हम सदा एवं सर्वत्र यह यज्ञ करते हुए अपने जीवन को भी अग्निहोत्रम य बनावें. जिस प्रकार अग्निहोत्र सर्वजन सुखाय होता है, उस प्रकार ही हमारा जीवन भी सर्वजन सुखाय ही हो. इस भावना को यजुर्वेद प्रथम अध्याय का यह अंतिम मन्त्र इस प्रकार प्रकट कर रहा है-
सवितुस्त्वा प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्य्यस्य रश्मिभि:। सवितुवर्रू प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्य्यस्य रश्मिभि:
मन्त्र उपदेश कर रहा है कि
१  पौष्टिक वातावरण में रहें
समुदाय का एक व्यक्ति जब उत्तम होता है तो पूरा का पूरा समुदाय  ही उत्तमता की और अग्रसर हो जाया करता है. समुदाय के स्वास्थ्य का प्रभाव सदा व्यक्ति पर पड़ता है. यदि मेरे चारों और के व्यक्ति स्वस्थ हैं, हृष्ट-पुष्ट हैं, ज्ञानवान् हैं तो इस समुदाय का प्रभाव मेरे पर भी पड़ना अनिवार्य हो जाता है.  इन के प्रभाव से मैं भी स्वस्थ बनूंगा मैं भी हृष्ट व पुष्ट बनूँगा, मेरे में भी ज्ञान का आघान होगा.  क्योंकि मेरे चारों और का वातावरण इन गुणों से भरा हुआ है तो इन गुणों की वर्षा समुदाय के अन्दर के प्रत्येक प्राणी पर होना आवश्यक है. अत: मैं ही नहीं मेरे साथ के लोगों में भी इन सब गुणों का आघान होगा. सब लोग स्वस्थ , हृष्ट-पुष्ट और ज्ञानवान् होंगे.

२  क्षेत्र रोगाणु रहित हो
इस के उल्ट यदि हमारे समुदाय के चारों और यदि कूड़े करकट के ढेर लगे रहेंगे तो इस क्षेत्र में रोगाणुओं का होना भी अनिवार्य हो जाता है. जहाँ रोगाणुओं का, रोग के कृमियों का निवास हो, उस क्षेत्र के समुदाय पर इनका प्रभाव न हो , यह तो कभी संभव ही नहीं होता. अत: इस क्षेत्र के निवासियों पर यह रोगाणु सदा ही हमले करते ही रहेंगे और इस क्षेत्र के लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड जावेगा. परिणाम – स्वरूप इस क्षेत्र का निवासी होने के कारण इस सब का प्रभाव मेरे स्वास्थ्य पर भी पडेगा और मैं किसी भी प्रकार रोगों से बच न पाउँगा और रोग – ग्रस्त हो जाउंगा.
३  उत्तम स्वास्थ्य के लिए अग्निहोत्र
मैं सदा स्वस्थ रहूँ.  मेरे क्षेत्र के लोग सदा स्वस्थ रहें.  मेरे चारों और का स्वास्थ्य उत्तम हो , इसके लिए हमें इस प्रकार के उपाय करने होंगे कि सब समुदाय का क्षेत्र स्वास्थ्य वर्धक गुणों रूपी वातावरण में पुष्पित व पल्वित होता रहे. इस के लिए आवश्यक है कि हम सदा अग्निहोत्र की शरण में रहें और दूसरों को भी एसा ही करने के लिए प्रेरित करें. इस हेतु ईश्वर हमें आशीर्वाद देते हुए उपदेश करते हैं कि
क)  तेजोसि
जब जीव अपने समुदाय में उत्तम स्वास्थ्य के साथ निवास कर रहा होता है तो प्रभु उसे अनेक प्रकार की प्रेरणाएं देता है. इन प्रेरणाओं में एक है तेजोैसि अर्थात् हे जीव !  तूं तेजस्वी है. उत्तम स्वास्थ्य सदा ही तेजस्विता का कारण होता है.  जो व्यक्ति  रोगों से ग्रस्त रहता है , वह सदा दुरूखों में, संताप में डूबा रहता है तथा कष्ट-दायक जीवन यापन कर रहा होता है.  इस प्रकार का जिवन  जीने वाले के पास न तो समय ही होता है और न ही इतनी शक्ति ही होती है कि वह कभी कहीं से भी कोई उत्तम प्रेरणा प्राप्त कर सके द्य  इसलिए प्रभु ऊत्तम स्वास्थ्य लाभ पाने वाले प्राणी को ही तेजोअसि का आशीर्वाद देता है और कहता है कि हे जीव!  तूं तेजस्वी बन.
ख)  शुक्रम् असि
हम जानते हैं कि शुक्र से अभिप्राय वीर्य से होता है द्य वीर्य सब शक्तियों का आधार होता है.  जो व्यक्ति अपने वीर्य का नाश कर लेता है , वह शक्तिहीन हो जाता है.  इसलिए वीर्य की रक्षा आवश्यक होती है .इस कारण ही इस मन्त्र में परमपिता परमात्मा आशीर्वाद देते हुए कह रहा है कि हे जीव!  तूं वीर्यवान बन क्योंकि उत्तम वीर्य से युक्त व्यक्ति का स्वास्थ्य सदा उत्तम रहता है .
ग)  अमृतम् असि
जिस मनुष्य का स्वास्थ्य उत्तम होता है , वह सदा रोगों से मुक्त रहता है. इस लिए मन्त्र के माध्यम से उपदेश देते हुए प्रभु जीव को आशीर्वाद देते हुए आगे कहते हैं कि अमृतम् असि  हे जीव! तूं स्वस्थ होने के कारण कभी कष्ट दायक असमय को मृत्यु प्राप्त ही नहीं होगा.
घ)  धाम असि
अमृत का पान करने के कारण हे जीव तूं धाम असि अर्थात् तेज का पुंज बन गया है. तेरे शरीर के प्रत्येक अंग से तेज टपकने लगा है. तेज से प्राप्त तेजस्विता ने तेरा यश, तेरी कीर्ति सब और पहुंचा दी है. इस के साथ ही साथ नाम अर्थात् तेरे में विनम्रता भी है.  स्वभाव से विनम्र होने के कारण तेरे अन्दर जो शक्ति है , वह विनय से विनम्रता से विभूषित है.
ङ)  देवानां प्रियं
इन सब कारणों से तूं अनेक प्रकार के दिव्यगुणों का स्वामी बन गया है. तेरे अन्दर अनेक प्रकार के दिव्य गुण आ गए हैं.  इसलिए तूं देवताओं को अत्यधिक पसंद होने के कारण देवता लोगों का तूं प्रिय हो गया है.
च)  अनाधृष्टम्
इन दिव्यगुणों का स्वामी होने के कारण तूं कभी धर्षित न होने वाला बन गया है.
छ)  देवयज्ञनम्
तूं अबाधित रूप से निरंतर अग्निहोत्र करने वाला बन गया है. सदा अग्निहोत्र के कार्यों को संपन्न करने के लिए प्रयासरत रहता है. इस प्रकार तूं देवों का , देने वालों का यज्ञ करने वाला बन गया है.  निरंतर देवयज्ञ करने वाला होने के कारण  तूं अबाध गति से यज्ञ करने वाला हो गया है. तेरा यह अगनिहोत्र सदा ही अविच्छिन्न रहता है.  इस में कभी कोई बाधा नहीं आती.
जब तूं पुरुषार्थ करते हुए इस देवयज्ञ को निरंतर करता है तो देवता लोग तेरे से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और इस कारण सब आवश्यक पदार्थ तुझे उपलब्ध करवाते हैं किन्तु तेरे अन्दर जो यज्ञ की भावना है, जो परोपकार की भावना है, जो दूसरों को कुछ देने की भावना है, तूं कभी इस भावना को भूलता नहीं और कुछ देने की अभिलाषा अपने अन्दर सदा बनाए रखता है, इस कारण ही तूं कुछ भी लेने के स्थान पर सब कुछ देवताओं के अर्पण कर देता है. अपने लिए कुछ भी नहीं रखता. यदि कुछ रखता है तो वह होता है यज्ञशेष.  भाव यह है कि तूं केवल यज्ञशेष को अर्थात् यज्ञ करने के पश्चात् शेष रूप में बचे का ही स्वयं के लिए उपभोग करता है. यह ही तेरी पवित्र कमाई है.
इस प्रकार मन्त्र ने हमें उपदेश किया है कि हमारा जीवन अनाधृष्ट देवयजन हो. हम बिना किसी बाधा के सदा प्रभु की सृष्टि को स्वास्थ्यवर्धक बनाए रखने के लिए यज्ञ की कड़ी को कभी टूटने न दे और इसे करने की परम्परा को सदा बनाये रखें. हम इस बात को कभी मत भूलें की देवताओं के हमारे ऊपर बहुत से ऋण हैं.  इन सब ऋणों से उऋण होने का एकमात्र साधन यह देवयज्ञ ही है.  इस ऋण से उऋण होने के लिए यह अगनिहोत्र ही एकमात्र साधन है. इससे हम अनेक प्रकार के वार्धक्य अर्थात् उन्नति को प्राप्त करते हैं और मृत्यु होने पर भी हम पुन: बंधन में नहीं आते और मुक्ति को प्राप्त होते हैं…डॉ अशोक आर्य

आर्यसमाज वजीरपुर दिल्ली द्वारा सम्मानित किए जाने के लिए आर्यसमाज के यशस्वी विद्वान नेता श्री धर्मपाल आर्य जी को बधाई’


30 अप्रैल, 2017 को आर्यसमाज वजीरपुर, जेजे कालोनी के स्वर्ण जयन्ती समारोह के अवसर पर श्री धर्मपाल जी को सपत्नीक सम्मानित किया गया है। आज कुछ समय पूर्वयह जानकारी पाकर हमें हार्दिक प्रसन्नता हुई। यह सम्मान श्री धर्मपाल जी आर्य को तो है ही, हमें लगता है कि इसका श्रेय उनके ऋषिभक्त पूज्य पिता लाला दीपचन्द आर्य जी और माता बालमति आर्या जी को भी जाता है। इन आर्य माता-पिता से प्राप्त संस्कारों के कारण ही श्री धर्मपाल जी आर्य की गुरुकुल झज्जर में प्रसिद्ध विद्वानों के आचार्यत्व में शिक्षा दीक्षा हुई। इस शिक्षा के परिणाम से वह संस्कृत के विद्वान बनने के साथ ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के समस्त परम्पराओं से भी परिचित हुए। ऋषिभक्त लाला दीपचन्द जी आर्य ने ऋषि दयानन्द और आर्ष ग्रन्थों के प्रचार प्रसार का अति प्रशंसनीय कार्य किया है। उनका यश अमर अक्षुण है। आपने आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली की स्थापना कर उसके माध्यम से अनेक दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण ग्रंथों का लागत से भी कम मूल्य पर भव्य एव आकर्षक आकार प्रकार में प्रकाशन किया। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली की स्थापना वर्ष 1966 में हुई थी। हम सन् 1970 उसके कुछ बाद ही इस ट्रस्ट की मासिक पत्रिका दयानन्द सन्देश से जुड़ गये थे। सन् 1974 के मई महीने में दिल्ली जाकर माता बालमति आर्या और लाला दीपचन्द आर्य जी से पहली बार मिले थे। पं. राजवीर शास्त्री न्यास की पत्रिका दयानन्द सन्देश का उत्तम सम्पादन करते थे। उनके लेख पढ़कर पाठक उनकी ऋषि भक्ति के सम्मुख नतमस्तक हो जाते थे। आपने आर्यसमाज को नये नये विषयों के महत्वपवूर्ण विशेषांक देकर आर्य साहित्य को समृद्ध किया है। वैदिक मनोविज्ञान, जीवात्म ज्योति, विषय सूची, सृष्टि संवत् तथा वेदार्थ समीक्षा विशेषांक और ऐसे अनेक महत्ववपूर्ण शोध पूर्ण विशेषांक वा ग्रन्थ आपकी लेखनी से निःसृत होकर आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट से प्रकाशित हुए हैं। अब हम इनके नये संस्करणों की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब कि किसी प्रकाशक आर्य नेताओं की इन पर दृष्टि पड़े और इनका कल्याण हो।

                श्री धर्मपाल आर्य जी आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली के यशस्वी प्रधान हैं। समय समय पर इस प्रकाशन से आर्य जगत को अनेक नये ग्रन्थों का उपहार मिलता रहा है। आर्यसमाज नया बांस खारी बावरी के बिलकुल समीप है। लाला दीपचन्द आर्य जी और श्री धर्मपाल आर्य जी इसी समाज से जुड़े हैं और इसके मुख्य अधिकारी रहते रहे हैं। सन् 1875 में दिल्ली में आर्यसमाज की शताब्दी मनाई गई थी। हम भी इस समारोह में सम्मिलित हुए थे। इस अवसर पर आर्यसमाज नयाबांस की ओर पं. हरिशरण सिद्धान्तालंकार जी का सामवेद भाष्य प्रकाशित कर बहुत अल्प मूल्य पर वितरित किया था। मूल्य सम्भवतः 16 रूपये था। हमें स्मरण है कि बहुत लोगों ने यह सामवेद भाष्य खरीदा था। हमारे पास भी यह संस्करण था जिसे बाद में हमने अपने किसी मित्र को भेंट कर दिया था। अब हमारे पास इसका नया भव्य संस्करण है। इस समय हमारी स्मृति में रहा है कि आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली से ऋषि की आद्य जीवनीदयानन्द दिग्विजयार्क, यजुर्वेद भाष्य भाष्कर यजुर्वेद भाष्य भाष्कर भाषानुवाद टीकायें, उपदेशमंजरी का विस्तृत विषय सूची सहित एक उपयोगी भव्य संस्करण, ऋग्वेद भाष्य भाष्कर टीका के कुछ भाग, मनुस्मृति विशुद्ध मनुस्मृति के अनेक संस्करण, तीन वृहत् खण्डों में वेदार्थ कल्पद्रुम, वैदिक कोष आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन हुआ है। पं. लेखराम रचित ऋषि का वृहद जीवन चरित्र आर्य साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों में है। इसका प्रकाशन भी ट्रस्ट की ओर से होता आया है। अब यह संस्करण सम्भवतः समाप्त हो गया है। हम आशा करते हैं कि शीघ्र ही इसके प्रकाशन की व्यवस्था भी होगी। अजमेर में आयोजित ऋषि निर्वाणोत्सव के अवसर पर दयानन्द ग्रन्थमाला का प्रकाशन सहित दीर्घकाल से सत्यार्थ प्रकाश के विभिन्न भव्य संस्करणों एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय दयानन्द लघु ग्रन्थ संग्रह आदि ग्रन्थों का प्रकाशन भी ट्रस्ट से हो चुका है कुछ का अब भी हो रहा है। सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा संस्कार विधि के आरम्भिक प्रामाणिक संस्करणों की फोटो प्रतियां भी पुस्तक रूप में ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित की गई थी जिसका उद्देश्य मूल ग्रन्थों का संरक्षण एवं इन ग्रन्थों में पाठ परिवर्तनों को रोकना था। इन्हीं के आधार पर अब इन ग्रन्थों का प्रकाशन किया जाता है। हमें यह लिखने में भी प्रसन्नता एवं गौरव अनुभव होता है कि आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली ने सत्यार्थ प्रकाश का लगभग 13 लाख की संख्या में प्रकाशन कर पुण्य अर्जित किया है और ऋषि मिशन की प्रशंसनीय सेवा की है। यह भी बता दें कि एक ओर जहां इन ऋषि ग्रन्थों का भव्य प्रकाशन हुआ है वहीं ट्रस्ट द्वारा इनका मूल्य भी बहुत अल्प रखा गया है। इस गुण ने ही आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट ने आर्यजगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है।

                हमारा सौभाग्य है कि हमें लाला दीपचन्द आर्य जी माता बालमति आर्या जी के दर्शन करने उनसे वार्तालाप का अवसर मिला है। आर्यजगत की इन महान् हस्तियों से भेंट में हमें जो स्नेह मिला उसने हमारे मन पर एक विशेष सात्विक छाप बनाई हुई है। हमें कोई पूछे कि आदर्श आर्य कैसे होते हैं, तो हम इन्हीं की ओर संकेत करेंगे। माता-पिता के गुणों से परिपूर्ण श्री धर्मपाल आर्य जी आर्यसमाज सहित दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा और आर्यसमाज के अनेक कार्यों से सक्रिय रूप से जुड़े हैं। हमें स्मरण है कि जब जयपुर में महाराज मनु की प्रतिमा को उच्च न्यायालय परिसर से हटाने का आदेश हुआ था तो श्री धर्मपाल जी ने ही स्टे आर्डर लिया था और मुकदमें में बहस के लिए स्वयं ही पहुंचते थे। ऐसे अनेक कार्यों के लिए आप आर्यजगत के पूज्य हैं। हमें विश्वास है कि आप भविष्य में भी इन सभी कार्यों को जारी रखेंगे। हम समझते हैं कि आप जो सामाजिक सार्वजनिक जीवन में कार्य कर रहे हैं उससे अच्छे कार्य और कुछ नहीं हो सकते। आप इन कार्यों को करते रहें। हम आपकी सफलता की कामना करते हैं। ईश्वर आपको स्वस्थ रखें। आपकी सार्वत्रिक उन्नति हो। आर्यसमाज वजीरपुर जेजे कालोनी में हुए सम्मान के लिए हम आपको और आपके पूरे परिवार को पुनः पुनः हार्दिक बधाई देते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य