Thursday, 12 July 2018

वेद में प्रसन्नता के उपाय


मानव सुखी तब ही रह सकता है, जब उसका मन उत्तम हो , जब वह प्रसन्न रहे, सुखों की उस पर सदा वर्षा होती रहे. इसके लिए यह आवश्यक है कि वह भौतिक सुखों की और न भाग कर वास्तविक सुख के साधनों को ग्रहण करने का संयोजन का प्रयत्न करता रहे. इस सम्बन्ध में ऋग्वेद का यह मन्त्र खुले स्वर से हमारा मार्गदर्शन करते हुए उपदेश कर रहा है कि-   
 विश्वदानीं सुमनस: स्याम पश्येम नु  सूर्यमुच्चरन्तम̖ |
     तथा करद्वसुपतिर्वसूनां  देवाँ ओहानौवसागमिष्ठ ||ऋग्वेद ६.५२.५ ||

       मन्त्र उपदेश करते हुए हमारा मार्गदर्शन कर रहा है और कह रहा है कि हम सदा उत्तम मन वाले हों तथा सदा प्रसन्न रहने वाले हों. यहाँ मन्त्र कह रहा है कि प्रसन्न रहने की औषध है उत्तम मन. जिसका मन उत्तम है, भौतिक क्रियाओं से बचा हुआ है, कभी किसी का बुरा करने का सोचता नहीं है, बुराइयों से बचा हुआ है, उसे कभी कोई कष्ट क्लेश नहीं घेर सकता.  इसलिए इस प्रकार का व्यक्ति सुखी
होता है प्रसन्न होता है द्य निराशा कभी उत्तम मन वाले प्राणी को कभी छू भी नहीं सकती द्य इस लिए हे मानव ! तूं उत्तम मन वाला बन कर सदा प्रसन्न रह.
          मन्त्र आगे कहता है कि हम ज्ञान रूपी सूर्य को सदा उदित
होते हुए देखें. हम जानते हैं कि सब क्रियाओं का मूल ज्ञान है और मन्त्र इस ज्ञान को सदा अपने अन्दर उदय होने का उपदेश कर रहा है. जब हम वेद रूपी ज्ञान का सूर्य अपने अन्दर उदय कर पाने में सक्षम होंगे तो हम उत्तम प्रसन्न रह सकेंगे प्रसन्न रह सकेंगे.
         मन्त्र हमें परमपिता परमात्मा की सदा प्रार्थना करने का उपदेश दे रहा है और कह रहा है कि वह प्रभु सब प्रकार के एश्वर्यों का स्वामी है. पृथिवी आदि जितनी भी वस्तुएं हमें दिखाई दे रही हैं, ओंअ सब का आधार भी वह प्रभु ही है. इस कारण ही हमारा अस्तित्व है. यदि यह न हो तो हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं है. इस सब के होने से ही हमारी प्रसन्नता संभव हो पाती है. इस लिए हम सदा उस प्रभु की सेवा में ही रहें.
          हम उस सर्वशक्तिमान प्रभु से यह भी प्रार्थना करें कि हे पिता! आप दिव्य गुणों की वर्षा करने वाले हैं. एसी कृपा करें कि हम भी इन दिव्य गुणों को ग्रहण कर पावें. इतना ही नहीं आप हमें सदा       
विद्वान लोगों का सत्संग भी कराते रहें ताकि हम उनसे भी ज्ञान प्राप्त कर सकें. आप सब के रक्षक हो, आप के चरणों में रहते हुए हम भी सदा आप से रक्षित होते रहें.
         इस प्रकार सार रूप में उपदेश देते हुए यह मन्त्र एक स्पष्ट तथा बड़ा ही सरल सन्देश दे रहा है कि-         
१.हम अपने मन में सदा उत्तम विचार रखें 
२.हम सदा प्रसन्न रहें
         वेद ने हमें यह आदेश क्यों दिया है ? स्पष्ट है कि उत्तम विचारों वाला मन ही सुख, शांति तथा धन एश्वर्य की प्राप्ति का साधन है. यही प्रसन्नता का साधन है. एक प्रसन्न मानवाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं हो सकता. जब मन के अन्दर असत्य, ईर्ष्या, द्वेष, छल कपट सरीखे विचार जब टाक मन में रहेंगे तब तक वह लड़ाई झगडा, कलह व कलेश में उलझा रहेगा द्य मन में कभी शान्ति न आ पावेगी. अशांत मन कभी भी उत्तम नहीं हो सकता. जब मन में बुराइयां भर राखी हैं तो वहां अच्छे विचारों के लिए स्थान ही नहीं रहता. इसलिए मन से यह बुराइयां निकाल कर उत्तम विचारों के लिए स्थान खाली करें और अपने मन को उत्तमता की और लगा कर उत्तम विचारों का प्रवेश करावें.
        एक प्रसन्नता एसी भी होती है जिसे हम आज्ञान मूलक कह सकते हैं. इस प्रसन्नता का कारण हमारा अज्ञान होता है. जैसे अफीम, भंग, चरस, गांजा, शराब आदि अभक्ष्य पदार्थों आदि के सेवन से मानव कुछ समय के लिए अपनी चिंताओं से मुक्त हो जाता है किन्तु तो भी वह सच्ची प्रसन्नता नहीं पा सकते क्योंकि कुछ समय के पश्चात ही इन वस्तुओं का सेवन न केवल परिवार में बल्कि गली मोहल्ले में भी लड़ाई , झगड़े का कारण बन जाता है. अत: इस से प्रसन्नता के स्थान पर उसे कष्ट ही मिलता है, जब कि वेद तो ज्ञान मूलक प्रसन्नता प्राप्ति का उपदेश करता है. मन्त्र में कहा भी है कि ज्ञान के सूर्य को हम प्रतिदिन उदय होते हुए देखें अर्थात हम प्रातरू बिस्तर छोड़ने से लेकर रात्रि को बिस्तर में आने तक निरंतर अपने ज्ञान को बढाने का प्रयास करते हुए सच्चे अर्थों में प्रसन्नता प्राप्त करने के प्रयास में रहें. सूर्य परम पिता के विशेषनात्मक नामों में से एक है.
         इससे इस मंत्रांश का यह भी भाव बनता है कि जो पिता सब का प्रकाशक है, हम उस परमपिता परमात्मा को अपने हृदय के आकाश में सब स्थानों पर अनुभव करें, उसकी सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करते हुए आशा करें कि चाहे हम दुख में हों या सुख में ,हानि  हो रही हो अथवा लाभ,  विजयी हो रहे हों या पराजित ,  प्रत्येक अवस्था में हमारी यह प्रसन्नता बनी रहे. 
          वह प्रभु मंगलमय है, वह प्रभु आनंद देने वाला है, वह प्रभु सुख दायक है. उस प्रभु की कृपा को पाने के लिए, उस प्रभु की दया को पाने के लिए हमें सदा निरंतर अभ्यास करने की आवश्यकता होती है. निरंतर अभ्यास से, प्रभु के दिए गये वेद ज्ञान के निरंतर स्वाध्याय के बिना हम कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते इस लिए हमें निरंतर ,विशेष रूप से प्रतिदिन शुभ मुहूर्त से उठें तथा प्रभु के श्री चरणों में बैठ कर उसकी वाणी वेद का सदा स्वाध्याय करें द्य इससे ही हम विषाद रहित होकर प्रसन्न होंगे, सुखी होंगे.
डा. अशोक आर्य                  

माता पिता की नित्य सेवा करना सन्तान का धर्म वा पितृ-यज्ञ है


मनुष्य के जीवन में ईश्वर के बाद माता-पिता का सबसे अधिक महत्व है। इसके बाद जिन लोगों का महत्व है उनमें हमारे आचार्य, गुरु व उपाध्याय आते हैं जिनसे हम ज्ञान, विज्ञान व अनेक विद्याओं का अध्ययन करते व सीखते हैं। यदि दुर्भाग्य से कोई मनुष्य अपने माता-पिता आदि देवताओं के सान्निध्य को प्राप्त कर उनकी सेवा आदि नहीं करता तो उसका जीवन पशुओं से भी निकृष्ट श्रेणी का होता है। माता-पिता न हों तो हमें मनुष्य जीवन मिलना ही असम्भव है। माता-पिता हमारे जन्मदाता होने के साथ हमारे पालनकर्ता भी होते हैं। वह हमारी शिक्षा व ज्ञान सम्बन्धी आवश्यकताओं को अपने पुरुषार्थ से अर्जित धन का व्यय कर पूर्ति करते हैं। यह कार्य माता पिता के अतिरिक्त समाज में कोई और नहीं करता है। इस प्रकार से माता-पिता से हमें जो लाभ व सुख प्राप्त होता है, उसका ऋण उतारना हमारा कर्तव्य है। यदि हम अपने माता-पिता के प्रति अपना ऋण नहीं उतारेंगे तो कर्म फल सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर हमसे उसकी पूर्ति इस जन्म वा परवर्ती जन्मों में करेगा जिसका परिणाम सुख तो होना सम्भव नहीं है, अवश्य दुःख ही होगा।


संसार का कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो दुःख चाहता हो। सभी दुःख से बचने के उपाय करते हैं। मनुष्य उच्च शिक्षा प्राप्त करता है, यह आवश्यक है। इसी के साथ उसे यह भी चाहिये कि वह योग्य विद्वानों से सम्पर्क कर जीवन में होने वाले सभी दुःखों के कारणों को जाने और उन कारणों से बचने व उन्हें दूर करने के उपायों को भी जानना चाहिये। जीवन में मिलने वाले दुःखों के अनेक कारण होते हैं। उनमें से एक कारण यह भी होता है कि हमने पूर्वजन्म या इस जन्म में अपने माता-पिता के प्रति वह सद्व्यवहार न किया हो जो हमें करना चाहिये था अर्थात् जो हमारा कर्तव्य था। हो सकता है कि हमारे व्यवहार से उनकी आत्मा व शरीर को दुःख पहुंचा हो जिसमें यह भी सम्मिलित है कि हमारे होते हुए उन्हें उचित आवास, भोजन, वस्त्र व सुरक्षित जीवन उपलब्ध न हो पाया हो। हमें अपने माता-पिता की तो आवश्यकताओं का ध्यान तो रखना ही है, इसके साथ हमें अपने आचार्य, गुरुओं व उपाध्यायों की भोजन, वस्त्र व धन आदि से सेवा करने का अवसर गंवाना नहीं है। ऐसा यदि हम करेंगे तो इन कर्मों को करके हम अनेक दुःखों से बच सकते हैं। जहां तक पूर्व जन्म के हमारे कर्मों का फल है, वह तो हमें अवश्य ही भोगने होंगे। उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। हां, हमें यह जानकर कि हमें पूर्वजन्मों के कर्मों को अवश्य भोगना है, हंस कर भोगें या रो कर भोगें, इनमें अच्छा है कि हम हंस कर उन दुःखों को भोगें। हमें ईश्वर का ध्यान व उपासना सहित सत्यार्थप्रकाश आदि सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हुए अविचलित होते हुए वाचिक, मानसिक व कायिक दुःखों को धैर्य पूर्वक सहन करना चाहिये। ऐसा करने से हमारे प्रारब्ध से अशुभ कर्म न्यून होते रहते हैं।

हम अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों व उनके निर्वाह की चर्चा कर रहे हैं। माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों की भली प्रकार से पूर्ति का नाम ही पितृ यज्ञ है। मनुष्य को चाहिये कि जहां वह नाना प्रकार के मानसिक व्यवहार करता है, वहीं अधिक नहीं दो से पांच मिनट अपने माता-पिता के उपकारों व उनके कष्टों को भी प्रतिदिन स्मरण कर लिया करे। ऐसा करने से उसे यह लाभ होगा कि वह उनके प्रति अपने कर्तव्यों से शायद विमुख न हो। वह यदि माता-पिता की अच्छी तरह से सेवा करेगा तो उसे माता-पिता का आर्शीवाद मिलेगा और साथ ही माता-पिता की सेवा द्वारा वह जो सद्कर्म कर्म रहा है उसका लाभ भी उसे तत्काल व कालान्तर में अवश्य ही प्राप्त होगा। हम जब अपने जीवन के विषय में सोचते हैं तो हमारे माता-पिता के हमारे लिये गये अनेक उपकार सम्मुख आते हैं जिन्हें करने में उन्होंने अनेक कठिनाईयां व दुःख सहे थे। आज हम चाह कर भी उनकी आत्मा को अपनी सेवा के द्वारा प्रसन्न व सुखी नहीं कर सकते। इसका कारण की बहुतों के माता-पिता संसार में ही न हो। बहुत लोगों को माता-पिता, समाज व विद्यालयों से माता-पिता के प्रति सन्तानों के कर्तव्यों की शिक्षा ही नहीं मिलती। अतः बचपन से ही हमारे विद्वान, पुरोहित, आचार्य व गुरु आदि सन्तानों को घर व विद्यालय आदि में उपदेश करते रहें। राम व श्रवण कुमार आदि की कथाओं के द्वारा भी सन्तानों को माता-पिता की सेवा के महत्व को बताया जाये तो उन सन्तानों को बड़ा होने पर इस विषय में पश्चाताप नहीं करना पड़ेगा।

हम जीवन में जो कुछ भी बनते हैं वह माता-पिता सहित अपने आचार्य व गुरुओं की कृपा से बनते हैं। जीवन में शिक्षा व ज्ञान का बहुत महत्व है। हमारे सभी ऋषि वेदों के परम ज्ञानी मनुष्य हुआ करते थे। यह ज्ञान उनको गुरुकुलों में अपने आचार्य व ऋषियों से ही प्राप्त होता था। स्वाध्याय का भी जीवन में बहुत महत्व है। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषियों ने स्वाध्याय को नित्य कर्मों में सम्मिलित किया है। वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, वेदांग आदि का स्वाध्याय मनुष्य को जीवन भर करना चाहिये। स्वाध्याय सन्ध्या का भी आवश्यक अंग है। यदि हम स्वाध्याय नहीं करेंगे तो हम सन्ध्या को उचित तरह से नहीं कर सकेंगे। स्वाध्याय करने से मनुष्य को ईश्वर, जीव व संसार के ज्ञान सहित अपने कर्तव्यों, लक्ष्यों तथा उसके साधनों का भी ज्ञान होता है। जीवन के आरम्भ काल में हमें विद्यालयों में अपने आचार्यों से व्याकरण, भाषा, ज्ञान, विज्ञान तथा सामान्य विषयों का ज्ञान भी प्राप्त करना होता है।

आजकल अनेक भाषायें प्रचलित हैं। हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं का अपना महत्व है। यह भाषायें हम सभी को सीखनी चाहियें। हम जहां रहते हैं वहां की क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान भी हमें होना चाहिये। इसके साथ संस्कृत का ज्ञान होना भी आवश्यक है। इसके लिये सभी को विशेष प्रयत्न करने चाहिये। यदि सभी आर्य-हिन्दू यह निश्चय कर लें कि हमें संस्कृत का अध्ययन करना है तो इससे हमें बहुत लाभ हो सकता है। संस्कृत का अध्ययन कर हम अपने शास्त्रों को अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं। शास्त्रीय ज्ञान से हमारा धर्म व संस्कृति बलशाली होंगे। महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ लिखकर एक बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति की। उनके बनाये सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को, जो कि आर्यभाषा हिन्दी भाषा में है, पढ़कर हम धर्म व संस्कृति विषयक अनेक बातों को आसानी से जान व समझ सकते हैं। यह सत्यार्थप्रकाश ऋषि का समस्त मानव जाति पर एक महान उपकार है और हिन्दुओं व आर्यों पर तो यह उपकार ऐसा है कि जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही ऋषि दयानन्द को अपने माता-पिता व उनका घर छोड़ना पड़ा था और देश के अनेक भागों में जाकर विद्वानों व योगियों को ढूंढ कर उनसे ईश्वर व आत्मा संबंधी अपने प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए अपूर्व पुरुषार्थ करना पड़ा था। हमें सत्यार्थप्रकाश का नित्य पाठ करना चाहिये। जीवन में जितनी बार भी सत्यार्थप्रकाश का पाठ करेंगे उतना अधिक लाभ हमें मिलेगा।

पितृ यज्ञ के अन्तर्गत हमें अपने माता-पिता की भोजन, वस्त्र, आवास आदि की अपने समान व्यवस्था कर उनकी प्रातः व सायं आवश्यकतानुसार सेवा भी करनी है। हमें उनके प्रति ऐसा सभ्य व्यवहार करना है कि जिससे उनका मन व आत्मा सदैव सन्तुष्ट रहें। जहां तक सम्भव हो उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये। इस कार्य से हमें इस जन्म व परजन्म में भी सुख का लाभ होगा। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो ईश्वर की व्यवस्था से हमें माता-पिता की उपेक्षा का दण्ड मिलेगा जिससे बचने का अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः माता-पिता, आचार्य और गुरुओं के प्रति हमें अपने कर्तव्य को जानकर वा पितृ यज्ञ करके पितृ ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

हम जीवित हैं अथवा मरे हुए है


जीवित हुए अथवा मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्तिओं को हम कैसे पहचान सकते हैं ? सामान्य रूप से जो व्यक्ति प्राण धारण किया हुआ है अर्थात् जब तक श्वास-प्रश्वास की क्रिया से युक्त है तब तक उसे हम यह कह देते हैं कि यह व्यक्ति जीवित है। ठीक इसी प्रकार जब श्वास-प्रश्वास की गति रुक जाती है, प्राण छूट जाते हैं, तब हम यह कह देते हैं कि यह व्यक्ति मृत हो गया । यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है । यदि हम जीवित रहना चाहते हैं तो इसके ऊपर अवश्य चिन्तन करना चाहिये ।
किसी नीतिकार ने कहा है कि - "स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य स जीवति। गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम्" । जिसके पास सद्गुण हैं, तथा जिसके पास धर्म है, वही वास्तव में जीवित है। गुण और धर्म- दोनों जिसके पास नहीं है, उसका जीवन निरर्थक है, वह व्यक्ति मरा हुआ है । हमें स्वयं निरीक्षण करके देखना चाहिए कि क्या मैं अच्छे अच्छे गुणों से युक्त हूँ अथवा अपने व्यवहार में धर्माचरण करता हूँ या नहीं ? यदि मेरे अन्दर धैर्य, क्षमा, आदि धर्म के दस लक्षण विद्यमान नहीं हैं, और यदि मैंने अच्छे गुणों का संग्रह भी नहीं किया तो फिर मेरा जीवन व्यर्थ ही है । जब हम इस प्रकार स्वावलोकन करने लग जायेंगे तो निश्चित रूप से हमें विदित हो जायेगा कि हम जीवित हैं अथवा मरे हुए हैं ।

और भी कहा गया है कि - "आत्मार्थं जीवलोकेSस्मिन्को न जीवति मानवः | परं परोपकारार्थं यो जीवति सः जीवति |" अर्थात् इस संसार में अपने स्वार्थ के लिए अपना ही कल्याण करने के लिए कौन व्यक्ति प्रवृत्त नहीं होता ? अर्थात् सभी मनुष्य अपने ही प्रयोजन सिद्ध करने हेतु जीवित रहते हैं, इस प्रकार के जीवन का कोई महत्व नहीं है, उसको जीवित रहना नहीं कहा जा सकता, परन्तु जो व्यक्ति अपना स्वार्थ छोड़कर दूसरे के कल्याण हेतु, परोपकार के लिए, प्रयत्नशील रहता है वास्तव में उसी का जीवन ही सार्थक है उसी को कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति जीवित है । जो व्यक्ति न अपने समाज के लिए और न ही राष्ट्र की उन्नति के लिए अपना तन-मन-धन समर्पित करता है, ऐसे व्यक्ति को कभी भी जीवित नहीं कहा जा सकता ।
अब आइये देखते हैं कि वेद क्या कहता है इस विषय में - "यस्य छायामृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम" अर्थात् जो ईश्वर हमें आत्मबल का देने वाला है, समस्त संसार जिसकी उपासना करता है, और विद्वान् लोग जिसके अनुशासन का पालन करते हैं, जिसने समग्र सृष्टि की रचना की, पालन कर रहा और समयानुसार विनाश भी करता है, उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना, उसी ईश्वर के सान्निध्य में रहना, शरण में जाना ही अमृतत्व है अर्थात् जो व्यक्ति सदा ईश्वर के सानिध्य में रहता, उसी का ध्यान उपासना करता, उसी की छाया में उसके आज्ञाओं का पालन करता, वास्तव में वही व्यक्ति जीवित है और जो व्यक्ति इसके विपरीत ईश्वर की छाया में नहीं रहता, उसके आज्ञाओं का परिपालन नहीं करता, ईश्वर की भक्ति या उपासना नहीं करता, ईश्वर का यह निर्देश है कि - वास्तव में वह व्यक्ति जीवित है ही नहीं बल्कि वह मरा हुआ है, उसकी मृत्यु हो गयी है, ऐसा समझना चाहिए ।
हम प्रायः प्रातःकाल उठते हैं और सबसे पहले यह अनुभव करते हैं कि मैं जीवित हूँ क्योंकि मैं देख पा रहा हूँ, सुन रहा हूँ, बोल पा रहा हूँ, खाना खा रहा हूँ, पानी पी रहा हूँ, समस्त क्रियाओं को करने में समर्थ हो पा रहा हूँ और मुख्यतः मैं श्वास-प्रश्वास ले रहा हूँ और छोड़ रहा हूँ, प्राणधारण किया हुआ हूँ, अतः जीवित हूँ । परन्तु यह भूल जाते हैं कि मैं वास्तव में जीवित हूँ या मरा हुआ हूँ । केवल खाते-पीते रहने मात्र से, प्राण-धारण किये हुए होने मात्र से ही यह सिद्ध नहीं होता कि मैं सही अर्थ में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ ।
मेरे जीवन में यदि प्रतिदिन सत्य, न्याय, परोपकार, सरलता, विनम्रता, दया, आदि कुछ उत्तम गुणों का संग्रह कर पा रहा हूँ और झूठ, छल-कपट, इर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आदि कुछ दुर्गुणों का या दोषों का परित्याग भी कर पा रहा हूँ तो मैं वास्तव में जीवित हूँ । इसके विपरीत यदि मैं दोषों को ग्रहण करता जाता हूँ किन्तु गुणों को अपनाने में समर्थ नहीं हो पाता हूँ तो मैं जीवित नहीं हूँ, मरा हुआ हूँ । इस जीवन का मुख्य लक्ष्य है जीवन में ज्ञान, वैराग्य तथा आध्यात्मिकता हो और उससे फिर सुख-शान्ति, आनन्द, उत्साह, दया, परोपकार आदि गुणों का विकास हो। समाधि की प्राप्ति हो, आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो, सभी क्लेशों का विनाश हो और हम मोक्ष के अधिकारी बन जायें । यदि हमारी प्रत्येक क्रिया हमारे जीवन के उद्देश्य की पूर्ति में सहायक नहीं हो रही है और हम अपने लक्ष्य की और आगे नहीं बढ़ रहे हैं, तो हमारा जीवन व्यर्थ ही है, हमारा जीना जीना नहीं किन्तु मृत्यु के समान ही है । इस विषय में स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि हमारी क्या स्थिति है ?
आचार्य नवीन केवली


Friday, 6 July 2018

भारतीयों के पूर्वज बनाम पश्चिमी लोगों के पूर्वज

हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षि लोग समाधिस्थ होकर अनेक सूक्ष्म वस्तुओं को भी जान लेते थे जो कि आज कल के भौतिक वैज्ञानिक, बड़े-बड़े सूक्ष्म यन्त्रों के माध्यम से भी जान नहीं पाते । हमारे ऋषि-मुनियों की जो योग्यता थी विज्ञान के क्षेत्र में हो या अध्यात्म के क्षेत्र में हो, आजकल के वैज्ञानिक उनके सामने कुछ भी नहीं हैं बल्कि अध्यात्म के क्षेत्र में तो शून्य ही हैं । कुछ लोग मानते होंगे कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे, उनको कुछ नहीं आता था, यहाँ तक कि भोजन पकाना नहीं आता था अतः वे लोग मांस खाया करते थे इत्यादि । वास्तव में देखा जाये तो संभावना है कि यह सब इतिहास पाश्चात्य लोगों के साथ घटित हुई हो और उन्होंने हमारे पूर्वजों के ऊपर मढ़ दिया और अपने को विद्वान घोषित कर दिया । हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे और न ही बन्दर थे, यह सब पाश्चात्य मूर्खों की ही मिथ्या परिकल्पना मात्र है ।


ऋषि लोग शरीर में होने वाली सूक्ष्म प्रक्रियाओं को भी जान लेते थे जैसे कि बालक गर्भ में किस प्रकार रहता है और किन किन क्रियाओं को करते रहता है, कितने समय में गर्भस्थ शिशु कितना विकास को प्राप्त होता जाता है? ठीक ऐसा ही जो हम सब मनुष्य अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए अत्यन्त सरलता से शब्दों का उच्चारण कर लेते हैं वे शब्द किस प्रकार अन्दर से उत्पन्न होते हैं और किस पद्धति से बाहर प्रकट रूप में आते हैं ? यह सब हमारे लिए बुद्धिगम्य ही नहीं है परन्तु ऋषि-मुनियों को यह सहजता से ही अंतःकरण से अनुभूत हो जाता था और वे इस शब्दोच्चारण की सूक्ष्म विद्या को 4-5 वर्ष अल्पायु के बालक को भी सिखा दिया करते थे । जैसे कि वर्णोच्चारण शिक्षा पुस्तक में बताया गया है कि -
आत्मा बुद्ध्या समेत्यर्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥
मारुतस्तूरसि चरन् मन्दं जनयति स्वरम् ॥ अर्थात् सर्व प्रथम आत्मा बुद्धि के साथ संयुक्त होकर कुछ कहने की इच्छा से मन को युक्त करता है, पुनः मन जठराग्नि को प्रताड़ित करता है, फिर वह जठराग्नि वायु को प्रेरित करता है । उसके पश्चात् वह वायु हृदय प्रदेश में गति करता हुआ धीरे-धीरे स्वरों को अर्थात् वर्णों को उत्पन्न करता है जिससे फिर सामनेवाले को सुनाई देता है ।
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण: ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ।। (ऋ. 1.164.45)
ऋग्वेद और अथर्ववेद में कहा गया है कि वाणी चार प्रकार के भेदों वाली है । उनके नाम क्रमशः परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी हैं । इन भेदों को तत्वज्ञ या ब्रह्मज्ञ ही जानने में समर्थ होते हैं । इनमें से तीन भेद बुद्धिरूपी गुफा में ही विद्यमान हैं और इनमें किसी भी प्रकार की स्थूलरूप शारीरिक चेष्टा नहीं होती है अतः ये तीनों सुनने योग्य नहीं होती है । केवल चतुर्थ वैखरी वाणी को ही मनुष्य लोग अपने व्यवहार में प्रयोग कर पाते हैं अथवा उच्चारण के पश्चात् सुन पाते हैं ।
परावाणी :- परा वाणी शुद्ध ज्ञानरूप है और सर्वत्र व्यापक रहने वाली है । यह शान्त समुद्र के तुल्य निश्चल और निष्क्रिय है । यह अक्षय है, विनाशरहित है । इस अवस्था में यह अपने शुद्ध शब्दब्रह्म के रूप में विद्यमान रहती है । यह वाणी की अव्यक्त एवं सूक्ष्मतम अवस्था मानी जाती है । योगी ही इसके शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार कर पाते हैं ।
पश्यन्ति वाणी :- जब किसी विचार या भाव को प्रकट करने की इच्छा होती है, तब पश्यन्ति वाणी का कार्य प्रारम्भ होता है । शान्त समुद्र में छोटी तरंग के समान विचाररूपी तरंग वाक् तत्व में प्रकट होते हैं । इन विचारों को व्यक्त करने की भावना का उदय होना और शान्त समुद्र में थोड़ी हलचल का होना, तरंगे उठना और विचारों की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया का प्रारम्भ होना पश्यन्ति अवस्था है । यह द्वितीय अवस्था है जो कि मस्तिष्क तक सिमित है, अतः अव्यक्त है । योगी ही विचारों के उदय होने की प्रक्रिया को देख सकते हैं ।
मध्यमा वाणी :- यह तृतीय अवस्था है । इसमें शरीर यंत्र में हलचल प्रारंभ हो जाती है । नाभि से प्राणशक्ति ऊपर उठती है और सर से टकराकर स्वरयंत्र तक मुख में पहुँच जाती है । केवल वर्णों के उच्चारण का कार्य ही शेष रह जाता है । यह उच्चारण से पूर्व की अवस्था है, अतः इसे मध्यमा या मध्यगत वाणी कहते हैं ।
वैखरी वाणी :- यह वाणी की चतुर्थ अवस्था है । इसमें वर्णों का कंठ, तालु आदि स्थानों से उच्चारण प्रारंभ हो जाता है । अब विचार या भाव अव्यक्त या गुप्त न रहकर प्रकट हो जाते हैं । यह वैखरी वाणी ही जन साधारण के व्यवहार में आती है ।
यह सब सूक्ष्म विद्याएँ हमारे ऋषि-मुनियों की गवेषणा और खोज का ही प्रतिफल है, उन्होंने तो ऐसे अनगिनत सूक्ष्म वैज्ञानिक तथ्यों की खोज की है,जिनके इतिहास को ही बदलकर रख दिया गया । ऋषियों की गवेषणा में से महर्षि भरद्वाज मुनि प्रणीत बृहद्विमानशास्त्र आज भी उपलब्ध है । ऐसे अनेकों ऋषि-महर्षि हुए हैं जिन्होंने समाधिस्थ होकर सीधे-सीधे ईश्वर से शुद्ध ज्ञान प्राप्त किया करते थे और वह ज्ञान मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए होता था । उन दिव्य पुण्यात्माओं, ऋषि-मुनियों के सामने तो इन वैज्ञानिकों की कुछ भी योग्यता नहीं है। वर्त्तमान के वैज्ञानिकों का विषय तो ये वैज्ञानिक लोग तो ऐसे हैं जैसे कि "अविद्यायामन्तरे विद्यमाना: स्वयं धीराः पण्डित मन्यमानाः । दन्द्रम्यमाना परियन्ति मूढाः अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा: "।। अर्थात् कुछ लोग स्वयं को धीर पण्डित माननेवाले परन्तु वे अविद्या के अन्दर गोते लगाते रहते हैं ऐसे मूर्ख लोगों के पीछे चलने वालों की स्थिति भी वैसी ही होती है जैसी अंधों के पीछे चलनेवाले अंधों की होती है । अतः हे मनुष्यो ! सावधान हो जाओ ! नहीं तो दुर्गति सुनिश्चित है । हमारे पूर्वजों के ग्रन्थों को पढ़ के तो देखें फिर बड़े बड़े साइंटिस्ट्स और साइंस के छात्रों की बुद्धि भी अवरुद्ध हो जाएगी । हमारे ऋषियों के प्रश्नों का इनके पास कोई उत्तर नहीं होता ।

ईश्वर या ईश्वर के उपासक- श्रीकृष्ण, श्रीराम

श्रीराम का बड़प्पन और गौरव किस बात में है ? क्या वे इसलिए महान थे कि वे अपने पिताजी की अनुचित बात को मानकर वन में चले गये थे ? क्या वे इसलिए आदर के पात्र हैं कि वे एक आदर्श शासक थे, एक आदर्श पुत्र थे,एक आदर्श भाई थे,एक आदर्श पति थे,एक आदर्श मित्र थे?
श्रीकृष्ण जी किस लिए महान कहलाते हैं ? क्या वो अपने जन्मभूमि को छोड़कर पूरे राष्ट्र की प्रगति के लिए अपना पृथक कर्मभूमि चयन कर लिया ? क्या उनके पास सुदर्शन चक्र था इसीलिए वे महान थे ? क्या उन्होंने प्रजा की रक्षा के लिए अपने मामा जी को भी वध कर दिया था इसीलिए ?

मैं समझता हूं- नहीं । उनके विमल यश का कारण तो कुछ और ही है। न ही रघुवंश की परम्परा थी और न ही यदुवंश की प्रसिद्धि ।
इसका मुख्य कारण यह है कि वे दोनों के दोनों ईश्वर के सच्चे उपासक थे । किसी भी परिथिति में वे ईश्वर को छोड़ते नहीं थे अर्थात् यथा-सामर्थ्य ईश्वर की आज्ञाओं का परिपालन करते थे । चाहे यात्रा में हों चाहे युद्ध भूमि में हों परन्तु ईश्वर की उपासना नहीं छोड़ते थे ।


इनके अन्दर मनुष्योचित गुण ही विद्यमान थे अतः इन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहें या फिर योगीराज श्रीकृष्ण परन्तु ईश्वर कदाचित नहीं, क्योंकि ईश्वर भला अपनी ही उपासना क्यों करने लगा ?
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।
वार्धके मुनिवृत्तिनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।। (रघुवंश १/८)
रघुवंशी बालकपन में समस्त विद्याओं का अभ्यास कर लेते थे। युवावस्था में वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर भोगों की अभिलाषा करते थे। बुढ़ापे में वे वानप्रस्थी बन जाते थे और अन्त में योगाभ्यास करते हुए अपने शरीरों का त्याग करते थे।
परन्तु,
*मर्यादा पुरुषोत्तम राम* इसके अपवाद थे-
*पुत्रसंक्रान्तलक्ष्मीकैर्यद् वृद्धेक्ष्वाकुभिर्धृतम् ।*
*धृतं बाल्ये तदार्येण पुण्यमारण्यकव्रतम् ।।-(उत्तररामचरित १/१२)*
पुत्र को राज्यलक्ष्मी सौंपकर इक्ष्वाकुवंशोत्पन्न राजा वृद्धावस्था में जिस वानप्रस्थ-व्रत को धारण करते थे, श्रीराम ने उस पवित्र व्रत को यौवनावस्था में ही धारण कर लिया था।
उठती हुई जवानी और जीवन में प्रसन्नतापूर्वक वन में चले जाना ही श्रीराम के गौरव को बढ़ाता है। श्रीराम वन में जाते हैं परन्तु उनके मुखमण्डल पर विषाद की रेखा तक नहीं है। उनकी स्थिति के सम्बन्ध में महाराज दशरथ ने महानाटक ३/२२ में ठीक ही कहा था-
*आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च ।*
*न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ।।*
राज्याभिषेक के लिए बुलाए गए और वन के लिए विदा किये गए श्रीराम के मुख के आकार में मैंने कोई भी अन्तर नहीं देखा।
हर्ष और शोक में,सुख और दुःख में,मान और अपमान में,लाभ और हानि में समान रहना यह महापुरुषों का चिन्ह होता है।
किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है-
*उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ।*
*सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरुपता ।।*
उदय होता हुआ सूर्य लाल होता है और अस्त होता हुआ सूर्य भी लाल ही होता है,इसी प्रकार सम्पत्ति और विपत्ति में महापुरुष समान ही होते हैं। सम्पत्ति प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होते और विपत्ति पड़ने पर दुःखी नहीं होते।
श्रीकृष्ण जी भी किशोर अवस्था में ही गुरुकुल में अध्ययन हेतु चले गए थे । एक राजकुमार होने के कारण उनका देश वा राज्य के प्रति जों भी कर्त्तव्य होता था उन्होंने बहुत ही उत्तमता के साथ निभाया ।
श्रीराम और श्रीकृक्ष्ण तो स्वयं ईश्वर की पूजा करते थे। रामायण और महाभारत इसके साक्षी हैं-
प्रक्षिप्त भाग को छोड़कर जब हम शुद्ध रामायण या शुद्ध महाभारत का स्वाध्याय करते हैं तो हमें वास्तविक इतिहास का ज्ञान होता है । उसके कुछ प्रसंग उद्धृत किये जाते हैं -
"कौशल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्मिकम्।।
तस्यर्षे: परमोदारं वच: श्रुत्वा न्रपात्मजौ।
स्नात्वा क्रतोदकौ वीरो जपेतु परमं जपम्।।"(बाल० २३.३)
'हे कौशल्या की संतान! प्रात:काल की सन्ध्या का समय हो गया है। हे धरशार्दूल ! उठो और उपासना करो। उस ऋषि के परम उदार वचनों को सुनकर, स्नान करके उन दोनों, श्रीराम और श्रीलक्ष्मण जी ने गायत्री का जाप किया। रामायण में यह नहीं लिखा कि उन्होंने मूर्तिपूजा की।
इसी प्रकार का वर्णन महाभारत में श्रीकृष्ण जी के विषय में प्राप्त होता है-
अत्रतीर्य रथात् तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि।
रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेश ह।।(महा० उद्योग०८४/२१)
जब सूर्यास्त होने लगा तब श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथ से उतरे और घोडों को रथ से खोलने की आज्ञा देकर और विधिपूर्वक शौच-स्नान करके सन्ध्योपासना करने लगे।
ब्रह्ममुहूर्त उत्थाय वाय्रुपस्प्रश्य माधव:।
दध्यो प्रसन्नकरण आत्मनं तमस: परम् ।।(भा० पु० ९०.७०.४)
श्रीकृष्ण जी ब्रह्ममुहूर्त में उठकर , पवित्र जल से हाथ मुंह धोकर, अत्यन्त प्रसन्न हो, हृदय में प्रकृति से परे ज्योतिस्वरुप परब्रह्म का ध्यान करने लगे।
अथाप्लुतोसम्भस्यमले यथाविधि।
क्रियाकलापं परिधायं वाससी।
चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमो।
हुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यत: ।।(भा० पु० १०.७०.६)
श्रीकृष्ण जी ने स्वच्छ जल में डुबकी लगाकर स्नान किया। फिर स्वच्छ धोती पहनकर एवं उत्तरीय धारण करके श्रद्धापूर्वक सन्ध्योपासना की। तदनन्तर वे हवन करके मौन होकर गायत्री का जाप करने लगे।
श्री राम स्थितप्रज्ञ थे―*संसार में हम देखते हैं कि जब कभी हमारी इच्छापूर्ति में कोई छोटा मोटा भी आघात उपस्थित करता है, तो हम उसके प्रति कुपित ही नहीं प्रत्युत मरने-मारने को भी तैयार हो जाते हैं। किन्तु श्रीराम असाधारण योगीसम स्थिरप्रज्ञ थे जो बड़े से बड़े कष्ट के समय भी लेशमात्र विचलित नहीं होते थे। इसीलिए महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं―
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम्।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ।।
―(वा०रा० अयो० १९/३३)
अर्थात्― जिस समय श्रीराम को राजतिलक के लिए बुलाया गया तथा जिस समय उनको १४ वर्ष के वनवास के लिए कहा गया, ऐसे हर्षविषाद के समय में भी श्रीराम की मुखाकृति में कोई अन्तर नहीं था अर्थात् न तो युवराज बनने की खुशी और न ही वनवास जाते समय विषाद के चिन्ह थे। ऐसा सुख-दुःख में समता से रहने वाला व्यक्ति पूर्ण वेदज्ञ व स्थिरप्रज्ञ ही हो सकता है।
शत्रु के साथ भी आदर्श व्यवहार― रावण द्वारा वानर-सेना का संहार होते देख श्रीराम रावण के सम्मुख आये। श्रीराम ने अपना अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाते हुए रावण के रथ के टुकड़े कर डाले। उसके घोड़े और सारथि को भी मार गिराया और रावण के चमचमाते मुकुट को भी काट डाला। सन्ध्या-समय निकट देख श्रीराम ने रावण से कहा―
कृतं त्वया कर्म महत्सुभीमं,
हतप्रवीरश्च कृतस्त्वयाहम् ।
तस्मात्परिश्रान्त इव व्यवस्य,
न त्वां शरैर्मृत्युवशं नयामि ।।
―(वा०रामा०यु० ५९/१४२)
भावार्थ― प्रातःकाल से घोर युद्ध करते हुए आपने बड़े वीरत्व का परिचय दिया है। आज आपके द्वारा हमारी सेना के बहुत-से वीर मारे अथवा घायल किये गये हैं। अत्यन्त थके होने के कारण आपका वध करना बहुत सरल है, परन्तु थके हुए शत्रु का वध करना आर्य-मान और मर्यादा के विरूद्ध है, अतः अब आप घर जाइये। जब स्वस्थ होकर कल आप पुनः युद्ध में आयेंगे तब मैं आपका युद्धोचित स्वागत करुँगा।
श्रीराम शत्रु थे। परन्तु कितने आदर्श शत्रु थे ! रावण भी मन-ही-मन श्रीराम के शील और पराक्रम की प्रशंसा करता हुआ नगर में प्रविष्ट हुआ और श्रीराम जी अपने डेरे में पहुँचकर लक्ष्मण जी के उपचार में लगे।
दूसरी जगह श्रीराम ने रावण की अन्त्येष्टि का आदेश देते हुए विभीषण से कहा―
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।।
―(वा०रामा० यु० ११२/२६)
भावार्थ― मरने तक ही वैर रहता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अतः अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी है। अतएव इसका यथोचित संस्कार कीजिये।
कैसा उच्च और महान् आदर्शमय जीवन था इन दोनों महापुरुषों का ? कितने ही उत्कृष्ट ईश्वर भक्त थे ? कितने बड़े वेदों के व्यावहारिक विद्वान थे ?
इन दोनों ने ही गुरुकुलों में गुरुओं के सान्निध्य में रहते हुए, गुरुजनों की सेवा करते हुए, प्रतिदिन ईश्वर की उपासना, सन्ध्या-वन्दन और हवन-यज्ञ आदि करते हुए वेद शास्त्रों का अध्ययन किया और उस विद्या को अपने जीवन में भी पूरी श्रद्धा वा लगन के साथ अपनाया, जिससे सम्पूर्ण मनुष्य समाज के लिए एक प्रेरणा के पात्र बन गए और स्वयं को एक आदर्श के रूप में स्थापित कर गए जिनका यश-कीर्ति इतनी फैली कि वर्त्तमान में पूरे विश्व के लोग उनको भगवान् ही मानने लग गए । परन्तु वास्तव में देखा जाये तो वे दोनों ही हमारे जैसे सामान्य मनुष्य थे, योग्य शासक, राजा थे, वेद शास्त्रों के ज्ञाता थे । हमने उनको ईश्वर बना दिया और खुद ईश्वर की उपासना करना भूल गए जैसे कि वे लोग करते थे । हम उनके चरित्र की पूजा करना या उनका अनुसरण-अनुकरण करना छोड़ दिए और चित्र की पूजा करने लग गए ।