Friday, 9 June 2017

मन को ईश्वर में लगाने से मन में निर्मलता आती हैः डा. सोमदेव शास्त्री’

आज इस लेख में हम गुरुकुल पौंधा देहरादून में आयोजित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका स्वाध्याय शिविर के दूसरे दिन 30 मई 2017 को आयोजित अपरान्ह सत्र में आर्य विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री द्वारा वर्णित कुछ विषयों पर प्रकाश डाला रहे हैं। आचार्य जी ने बताया कि सांख्य दर्शन में जड़ चेतन का विवेचन है। आपने एक अन्धे एक लंगड़े की कथा सुनाई और कहा अन्धा लगड़ा एक दूसरे की सहायता करके अर्थात् अन्धा लंगडे को अपने कन्धे पर बैठाकर दोनों गन्तव्य पर पहुंच सकते हैं। आचार्य जी ने शरीर और आत्मा का उदाहरण देकर कहा कि आत्मा भी अन्धे शरीर की सहायता से अपने लक्ष्य धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति करता हे। कथा में आचार्य जी ने आत्मा को लगंड़ा एवं शरीर को अन्धा बताया। उन्होंने कहा कि शरीर जीवात्मा को उसके गन्तव्य पर पहुंचा कर उससे पृथक हो जाता है। आचार्य जी ने कहा कि जीवात्मा प्रकृति से अलग है। शरीर आत्मा का विवेचन सांख्य दर्शन में होता है। योग दर्शन में आत्मा और परमात्मा इन दो चेतन पदार्थों का वर्णन है। वेद मन्त्र के आधार पर विद्वान आचार्य जी ने कहा कि शरीर में रहने वाले जीवात्मा को 10 अंगुल वाले शरीर की आवश्यकता होती है। ब्रह्माण्ड में रहने वाले परमात्मा को 10 अंगुलियों वाले शरीर की आवश्यकता नहीं है। योग दर्शन में इनका विस्तृत वर्णन है। स्वामी दयानन्द जी के अनुसार वेदों का कोई मन्त्र ऐसा नहीं है जिसमें कि ब्रह्म का वर्णन हो। सत्य उसे कहते हैं जिसका कोई कारण हो। सत्य नित्य होता है। जो तीनों कालों में रहता है उसे सत्य कहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि जहां ईश्वर, जीव और प्रकृति का विवेचन किया जाता है उसे सत्संग कहते हैं। जिसको अपनी सत्ता का अनुभव होता है उसे चित वा चेतन पदार्थ कहते हैं। जहां पर इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान प्रयत्न होता है वहां आत्मा होता है। ज्ञान प्रयत्न को उन्होंने आत्मा की पहचान बताया। जीवात्मा प्रयत्न सुखों की प्राप्ति तथा दुःखों को छोड़ने के लिए करता है। आनन्द हमारा वा जीवात्मा का स्वाभाविक गुण नहीं अपितु नैमित्तिक गुण है।

अग्नि में पदार्थों को जलाने का गुण उसका स्वाभाविक गुण है। पाणिनी के अनुसार अन्तर्यामी उसे कहते हैं जो अन्दर से नियमन करता है। ईश्वर सब पदार्थों के अन्दर विद्यमान है। इसलिये वह अन्दर से सब व्यवस्थायें करता है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा का कोई भी निर्णय गलत नहीं होता क्योंकि वह सबका हर काल में साक्षी होता है। विद्वान आचार्य जी ने कहा कि ईश्वर की स्तुति करने से ईश्वर से प्रीति होती है। ईश्वर की प्रार्थना करने में मनुष्यों को निरभिमानता का गुण प्राप्त होता है। ईश्वर की व्यवस्था में स्वयं को समर्पित कर देने से ईश्वर उस मनुष्य को ठीक प्रकार से संभालता है। आचार्य जी ने कहा योग दर्शन पर व्यास मुनि का भाष्य पढ़ना चाहिये। मनुष्य का मन संकल्प और विकल्प करता है तथा बुद्धि उनका निर्णय करती है।

आचार्य जी ने कहा कि योग चित्त की वृत्तियों के निरोध को कहते हैं। आत्मा के साधन शरीर में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, सभी ज्ञान कर्मेन्दियां आदि हैं। प्रत्याहार की चर्चा कर आचार्य जी ने कहा कि भोजन करना बुरा नहीं है अपितु भोजन की उतनी मात्र लेनी चाहिये जो हमारे स्वास्थ्य को किसी प्रकार से हानि पहुंचायें। आत्मा को उन्होंने शरीर रूपी रथ का स्वामी बताया। मन को लगाम, बुद्धि को चालक, इन्द्रियों को रथ के घोड़े, विषयों को रास्ते तथा जीवात्मा को उस रथ का रथी बताया। वृत्तियों की चर्चा कर आचार्य जी ने कहा कि क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध यह 6 प्रकार की वृत्तियां होती हैं। क्षिप्त वह वृत्ति है जिसमें तमो गुणों की अधिकता होती है। मृढ़ वह अवस्था है जिसमें मुनष्य सही और गलत का निर्णय नहीं कर पाता। यह रजो गुण की प्रधानता के कारण होता है। विक्षिप्त वृत्ति में रजोगुण तमोगुण मिलकर सतोगुण को दबा देते हैं। सतोगुण की प्रधानता से एकाग्रता की स्थिति बनती है। आचार्य जी ने कहा कि प्रातः 3 से 6 बजे तक सतोगुण प्रधान रहता है जिसमें अशान्ति नहीं रहती। दिन निकलने पर रजोगुण प्रधान हो जाता है। सायं रात्रि को तमोगुण प्रधान रहता है जिसके प्रभाव से मनुष्य में आलस्य रहता है वह आराम करना पसन्द करता है। आचार्य जी ने कहा कि आत्मा, सत, रज तम गुणों से ऊपर है। वृृत्तियों का परमात्मा में रूक जाना निरुद्ध अवस्था है। भक्ति का सच्चा अर्थ ईश्वर की आज्ञा पालन में तत्पर रहना है। मन की वृत्तियों को बाह्य विषयों से रोकने पर वह परमात्मा में स्थिर होती हैं।

आचार्य जी ने स्वस्थ अस्वस्थ मनुष्य की मीमांसा भी की उसके अनेक उदाहरण दिये। उन्होंने कहा कि कोई मनुष्य मकान की प्राप्ति तो कोई शरीर के रोगों में टिका हुआ है। चिकित्सा शास्त्र का उल्लेख कर आचार्य जी ने कहा कि शरीर में रोग के दो कारण होते हैं। शारीरिक मानसिक। जीवन में प्रसन्नता की अल्पता भी शरीर को रोगी बनाती है। अतः मनुष्य को प्रसन्न रहने का अभ्यास करना चाहिये जिससे वह अस्वस्थ हो। आचार्य जी ने कहा कि जीवात्मा अपने स्वरूप सत्य चित्त में स्थिर होकर सच्चिदानन्द परमात्मा में स्थिर हो जाता है। अपने स्वरूप में स्थिर हुए बिना जीवात्मा परमात्मा में स्थिर स्थित नहीं हो सकता। आचार्य जी ने कहा कि मन को ईश्वर में लगाने से मन में निर्मलता आती है। जो परमात्मा का चिन्तन नहीं करते उनके मन में कलुषता आती है। आचार्य जी ने पांच वृत्तियों प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय प्रमा आदि की भी चर्चा की उनके स्वरूप पर प्रकाश डाला और इसके उदाहरण भी दिये।

                इसी के साथ मंगलवार 30 मई, 2017 का अपरान्ह सत्र का ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका स्वाध्याय शिविर सम्पन्न हुआ। इसके बाद दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के अधिकारी श्री सुखवीर सिंह जी ने आचार्य जी का धन्यवाद करते हुए कुछ सूचनायें दी। शान्ति पाठ के साथ शिविर के सदस्य विसृजित हुए।
-मनमोहन कुमार आर्य


गुरुकुल, पौंधा-देहरादून में आयोजित 4 दिवसीय स्वाध्याय शिविर

ओ३म्
-गुरुकुल, पौंधा-देहरादून में आयोजित 4 दिवसीय स्वाध्याय शिविर का दूसरा दिन-
बुरे काम करने और दिखाने के लिए ईश्वर की उपासना करने वाले मनुष्यों को ईश्वर कभी प्राप्त नहीं होताः डा. सोमदेव शास्त्री
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आज मंगलवार 30 मई, 2017 को गुरुकुल पौंधा, देहरादून में आयोजित 4 दिवसीय ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका स्वाध्याय शिविर दूसरे दिन भी आचार्य डा. सोमनाथ शास्त्री, मुम्बई के पावन सान्निध्य में जारी रहा। शिविर में भाष्य-भूमिका के उपासना विषय का अध्ययन वा स्वाध्याय चल रहा है। प्रथम दिन उपासना विषय के प्रथम 7 मन्त्रों तक का स्वाध्याय सम्पन्न हुआ था। आज आठवें मन्त्र से स्वाध्याय आरम्भ किया गया। शिविर में आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री जी प्रथम विषय को स्पष्ट करते हैं। उसके बाद मन्त्र को पढ़कर ऋषि दयानन्द द्वारा किये गये मन्त्र के सभी पदों वा शब्दों का अर्थ समझाते हैं। फिर ऋषि द्वारा की गई व्याख्या पर प्रकाश डाला जाता है। उसके बाद मन्त्र के हिन्दी अर्थ को एक श्रोता द्वारा पढ़ा जाता है। श्रोता द्वारा पढ़े गये अर्थों को आचार्य जी और गम्भीरता से समझाते हैं। मन्त्र व उसके अर्थों से संबंधित अन्य बातों को भी आचार्य जी बताते रहते हैं। आचार्य जी जिस प्रकार से वर्णन करते हैं उससे उनके वैदिक एवं ऋषि वांग्मय के गम्भीर ज्ञान का श्रोताओं को ज्ञान होता है। सभी श्रोता इस स्वाध्याय शिविर में भाग लेकर स्वयं को धन्य अनुभव कर रहे हैं। आज प्रातः 10 बजे ऋग्वेदभाष्य-भूमिका के आठवें मन्त्रअष्टाविशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु में। ... मन्त्र से पाठ आरम्भ हुआ जो प्रातः एवं अपरान्ह के सत्रों में योगदर्शन के 12 वें सूत्र के अध्ययन तक चला। इस बीच आचार्य जी ने जो महत्वपूर्ण बातें कहीं और जिन्हें हम नोट कर सके, वह प्रस्तुत कर रहे हैं।
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आचार्य जी ने कहा कि हमें ईश्वर की हर प्रकार से स्तुति करनी चाहिये। जो हमने ग्रन्थों में पढ़ा है, उसकी बार बार आवृत्ति करनी चाहिये। संसार में ब्रह्म से बड़ा और कोई तत्व नहीं हो सकता। वह सारे संसार को बनाने वाला है। उस परमात्मा को जानकर और उसका निश्चय करके उसे जीवन में सबको धारण करना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि सब तरफ से अपने मन को हटाके परमात्मा के स्वरूप में उसे स्थित करें। ईश्वर के गुणों को भी हम सबको धारण करना है। परमात्मा सत्य स्वरूप है। हमारे व्यवहार में सत्य होना चाहिये। ऋषि दयानन्द के सत्य के प्रति निष्ठा का उदाहरण देते हुए आचार्य जी ने उन्हीं के कहे शब्दों को स्मरण कराया जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि उन्हें तोप के मुंह से बांध कर पूछा जाये तब भी उनके मुंह से सत्य ही निकलेगा। आचार्य जी ने कहा कि यह सत्य को धारण करने की स्थिति है। उन्होंने कहा कि गलत कामों को करने वाला ईश्वर का उपासक कदापि नहीं हो सकता। जो मनुष्य दिखाने के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते हैं, उन्हें परमात्मा कभी प्राप्त नहीं होता। आचार्य जी ने लौकिक विषयों में मन की एकाग्रता का उदाहरण देते हुए क्रिकेट के खेल और प्रसिद्ध टीवी सीरियलों की चर्चा की। आचार्य जी ने कहा कि जब इन व ऐसे अनेक कार्यों में मन को एकाग्र किया जा सकता है तो ईश्वर की उपासना में मन को एकाग्र क्यों नहीं किया जा सकता? जिस मनुष्य का मन वा अन्तःकरण शुद्ध होता है, वही अपने मन को परमात्मा में लगा सकता है। आचार्य जी ने बताया कि ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका का प्रकाशन एक पत्रिका की तरह मासिक अंकों में हुआ था। जो लोग महर्षि दयानन्द का वेद भाष्य क्रय करते थे उन्हें ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लेना अनिवार्य होता था।
आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई ने बताया कि ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के अंक 13 14 में इसके ग्राहकों की एक सूची प्रकाशित हुई थी जिसमें प्रथम स्थान पर प्रोफेसर मैक्समूलर का नाम था। वेदों के अध्येता प्रो. विल्सन का नाम भी ग्राहक सूची में था। आचार्य जी ने कहा कि मैक्समूलर ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य को पढ़कर प्रभावित हुए थे। प्रो. मैक्समूलर भारत में नियुक्त होने वाले सिविल व पुलिस सर्विस के अधिकारियों को भारत आने से पहलेे लैक्चर दिया करते थे। उनके व्याख्यानों का वह संकलन हम भारत से क्या सीखें?’ नाम से प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में मैक्समूलर ने ऋषि दयानन्द और भारत देश की प्राचीन संस्कृति की प्रशंसा की है। आचार्य जी ने यह भी बताया कि प्रो. मैक्समूलर ऋषि दयानन्द की मृत्यु के बाद उनका जीवन चरित लिखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने परोपकारिणी सभा से पत्रव्यवहार भी किया था। खेद है कि परोपकारिणी सभा व पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा व आर्यसमाज के उस समय के प्रमुख विद्वानों ने उन्हें उसका समुचित उत्तर नहीं दिया। आचार्य जी ने कहा कि यदि मैक्समूलर को ऋषि जीवन की जानकारी उपलब्ध कराई जाती और वह जीवन चरित्र लिख देते तो ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज का यूरोप में बहुत प्रचार होता।

 लेख मनमोहन कुमार आर्य